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तुम कल्पना, मैं कड़वा यथार्थ हूं,

तुम जीवन, मैं मुसीबतों का पहाड़ हूं

इसलिए, ये इश्क नही है आसान प्रिये।

तुम अनन्त, मैं शून्यता का प्रमाण हूं

तुम ज्योति, मैं चहुंओर फ़ैला अंधकार हूं

इसलिए, ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

तुम अर्चना और उपासना जैसी हो,

मैं विधुर अर्द्ध कुमार हूं

तुम सोलह साल की मराठन बाला हो,

मैं लालू का रिश्तेदार हूं

तुम राजनीति की ऐश्वर्या हो,

मैं नौटंकी का एक किरदार हूं

इसलिए ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

तुम सत्ता की मीठी चासनी हो,

मैं नीतीश जैसा खट्टा आचार हूं

तुम नरेंद्र मोदी की गर्मागर्म चाय हो,

मैं मुलायम जैसा बासी आहार हूं

तुम बिजली तुम ऊर्जा हो

मैं लोडशेडिंग का शिकार हूं

इसलिये ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

तुम कोसी की तेज लहरें हो

मैं सुशासन का बाढ हूं

तुम सरकारी फ़ैमिली पैक राहत हो

मैं पीड़ितों का खंडित जीवनाधार हूं

तुम बांध बनाने वाली कंपनी हो

मैं बाढ में डूबा एक इंसान हूं

इसलिये ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

तुम चुनावी घोषणापत्रों की जान हो

मैं सरकारी आदेशों के उपेक्षा का शिकार हूं

तुम अफ़सर लोगों के टेबल की शोभा हो

मैं आम आदमी का धुल खाता दरखास्त हूं

तुम नेताजी की लक्ष्मी हो,

मैं नगर निगम का चौकीदार हूं

इसलिये ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

नवल की कविता : पहले तुम कहते थे लो अब हम कहते हैं

तुम्हारे वेद तुम्हें मुबारक

तुम्हारा राम भी तुम्हें ही मुबारक

चाहो तो तुम अपनी दुर्गा और लक्ष्मी भी ले लो

ऐसा हम यूं ही नहीं कह रहे

पहले तुम कहते थे

लो अब हम कहते हैं।

तुम्हारे वेद अब सचमुच

कानों में गर्म शीशे ही तो है

तुम्हारे पुराणों में वर्णित कथायें

सब सुनना ही बेहतर है हमारे लिए

तुमने तो हमें अछूत कहा था

अब तुम सचमुच अछूत हो

यह हम ऐसा यूं ही नहीं कह रहे

पहले तुम कहते थे

लो अब हम कहते हैं।

तब तुम्हारी मर्जी थी,

तुम्हारा सिंहासन था

हमारे एकलव्य का अंगुठा मांगा

निर्दोष शंबूक का वध किया

तुम्हारे लिए तो हम कभी इंसान थे

आज तुम हमारे लिए इंसान नहीं

यह हम यूं ही नहीं कह रहे

पहले तुम कहते थे

लो अब हम कहते हैं।

छीन लेंगे तुमसे यह ऐश्वर्य तुम्हारा

जल, जंगल और जमीन भी हमारा होगा

तुम कहते हो इंसाफ का ठेका है तुम्हारे पास

धैर्य रखो और करो इंतजार

खिसक जायेगी जमीन, फट जाएगा आसमान तुम्हारा

यह हम यूं ही नहीं कह रहे

पहले तुम कहते थे

लो अब हम कहते हैं।

सीता राम की मोहताज नहीं, पटना साहित्य उत्सव में महिलाओं ने दिखाये बगावती तेवर

पटना(अपना बिहार, 17 फ़रवरी 2014) - आधुनिक युग में भी महिलाओं ने अब जीना सीख लिया है। दूसरे पटना साहित्य उत्सव के अंतिम दिन महिला वक्ताओं ने परंपराओं को दरकिनार करते हुए कहा कि आज की सीता अब किसी राम की मोहताज नहीं है। सीता : देवी और औरत विषयक सत्र को संबोधित करते हुए फिल्मकार नमिता गोखले ने कहा कि रामायण में वर्णित सीता ने भी राम द्वारा परित्यक्त होने पर खुद को संभाल लिया था। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में महिलाओं ने समाज के हर क्षेत्र में अपना आत्मविश्वास साबित किया है। हालांकि पुरूष समाज अभी भी उसे महज एक वस्तु ही मानता है। इससे पहले नमिता गोखले द्वारा निर्देशित वृत चित्र नमिता गोखले की सीता का प्रदर्शन किया गया।

 

साहित्य उत्सव के तीसरे दिन की शुरूआत राजनीतिक गोष्ठी सुशासन की कला से हुई। इस विशेष सत्र में प्रो. नवल किशोर चौधरी ने राज्य सरकार पर जमकर प्रहार किये वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जीवन पर पुस्तक लिखने वाले संकर्षण ठाकुर ने श्री कुमार के पक्ष में अपनी बातें रखीं। वहीं पुष्पेश पंत ने कहा कि आज की राजनीति में विकास सबसे बड़ा मुद्दा है। भ्रष्टाचार के सवाल ने भी राजनीति को प्रभावित किया है। सुबह के सत्र में ही मशहूर लेखिका लीला सेठ ने कहा कि उन्होंने उस समय पटना में वकालत शुरू किया था जब पूरे अदालत में केवल दो महिलायें थीं। उन्होंने कहा कि अब स्थिति बदल गयी है। बड़ी संख्या में मलिायें इस क्षेत्र में आ रही हैं। यह सकारात्मक संकेत है।

 

साहित्य उत्सव के तीसरे दिन यतीन्द्र मिश्रा की पुस्तक हमसफर का लोकार्पण किया गया। इस समारोह में मशहूर गीतकार गुलजार, लेखक यतीन्द्र मिश्रा के अलावा पीयूष मिश्रा, यतीन्द्र मिश्रा और डा. विभावरी आदि मौजूद थे। वहीं मगही साहित्य के इतिहास के विषय पर मिथिलेश सिंह और डा भरत ने अपने विचार व्यक्त किया। सत्र का संचालन नरेन जी ने किया। लोक साहित्य की दुनिया में अंगिका और बज्जिका विषयक सत्र में डा. लखन सिंह आरोही, डा. अमरेंद्र, डा. योगेन्द्र ने अपने विचार प्रस्तुत किये। इस सत्र का संचालन युवा साहित्यकार अरूण नारायण ने किया।

साहित्य उत्सव : बौद्धिक समाज को याद आया बेटी बेचवा

पटना(अपना बिहार, 16 फ़रवरी 2014) - कल रामाज्ञा राम पटना में थे। सूबे के प्रबुद्ध नागरिकों के बीच। बेटीबेचवा की कहानी सुना रहे थे। वही बेटीबेचवा जिसे पहली बार मंचित करने पर जगदीशपुर के सामंतों ने भिखारी ठाकुर और उनके सहयोगियों को खदेड़-खदेड़कर पीटा था। कल जो समाज बेटीबेचवा मजे ले लेकर सुन रहा था, उसमें जगदीशपुर वाला समाज भी शामिल था। पटना लिटरेचर फ़ेस्टिवल के दूसरे दिन बिहार के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के सहयोगी रहे रामाज्ञा राम ने भोजपुरी को लेकर भी अपने विचर व्यक्त किये। इस अवसर पर अरुणेश नीरन और सरिता बुधु ने भी अपने विचार व्यक्त किया।

 

साहित्य उत्सव के दूसरे दिन अखबार और मीडिया से जुड़े लोगों की बेचैनी भी सामने आयी। मीडिया पर आधारित सत्र को मशहूर पत्रकार रविश, श्रवण गर्ग, श्रीकांत और संदीप भटुडिया ने अपने विचार व्यक्त किये। इस मौके पर जहां एक ओर सत्र का संचालन कर रहे दैनिक जागरण के पत्रकार राघवेन्द्र दूबे ने अखबारों के पक्ष में कहा कि मीडिया अब भी सबसे अधिक लोकतांत्रिक संस्थान के रुप में काबिज है। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि अखबारों में छपने वाली खबरें अब प्रोडक्ट के रुप में पेश की जाने लगी हैं। इस्के बावजूद उन्होंने कहा कि तमाम प्रतिकुलतओं के बावजूद अखबारों में कोई बड़ा विचलन नहीं आया है।

 

वही श्रवण गर्ग ने यह कहकर अपनी झिझक मिटाने का प्रयास किया कि अखबार आज भी शोषितों की आवाज है। जबकि मशहूर टेलीविजन एंकर और पत्रकार रविश कुमार ने मीडिया में बाजार द्वारा लगायी गयी सेंधमारी की बात कही। उन्होंने कहा कि कुछ पत्रकारों ने अपने लिए एक दुनिया बना ली है। वे सीमित दायरे को ही अपनी दुनिया मान ली है। दिल्ली में बहुत सारे पत्रकार लूटियन जोंस की परिधि में ही रहकर खुद को पत्रकार मान रहे हैं। वहीं वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत ने साफ़गोई से कहा कि अखबार निकालना अब एक धंधा मात्र है, जिसका एक ही मकसद मुनाफ़ा कमाना होता है। उन्होंने कहा कि बाजार के कारण मीडिय की विश्वसनीयता कम हुई है।

 

बहरहाल, साहित्य उत्सव के दूसरे दिन कबीरपंथ को आधार बनाकर प्रबुद्ध समाज ने खुद को वंचित तबके के साथ जोड़ने का प्रयास किया। स्ररकार के प्रतिनिधि के रुप में जदयू के विधान पार्षद व तथाकथित साहित्यकार डा रामवचन राय ने कबीरपंथ को तीन श्रेणियों में विभाजित किया। उनका कहना था कि कबीर पंथ का पहला स्वरुप लोक जीवन की है। दूसरा स्वरुप मठों का है जिसके मूल में आध्यात्मिकता है। तीसरा स्वरुप शैक्षणिक संस्थाओं में पढा लिख जाने वाला कबीरपंथ है। इस विषय पर यतीन्द्र मिश्रा और अब्दुल बिस्मिल्लाह ने भी अपने विचार व्यक्त किया। अब्दुल बिस्मिल्लाह का कहना था कि कबीर प्रेम से अधिक पीड़ा के कवि हैं। ताज्जुब इस बत की हुई कि हिन्दू धर्म और सामंती ताकतों के विरुद्ध कबीर द्वारा किये गये विद्रोह की चर्चा तक करने से वक्ताओं ने बचने का प्रयास किया।

बहस तलब - शिव और विष्णु भी समलैंगिक थे : विक्रम सेठ की सचबयानी से उपजे सवाल

पटना में दूसरे साहित्य उत्सव के पहले दिन आयोजकों को थोड़ी निराशा झेलनी पड़ी। दरअसल हुआ यह कि विलेन बने मौसम ने उत्सव से दर्शकों को दूर रखा। फ़िर भी बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी और बुद्धिजीवी उत्सव में शरीक हुए। मौसम की मार और पहले दिन सरकारी एजेंडे के नाम होने के बावजूद कई सवाल खड़े हुए। हालांकि बौद्धिक जुगाली के पर्याय ये सवाल अपनी दशा और दिशाहीनता के कारण किसी खास अंजाम तक नहीं पहुंच सके। इनमें से एक सवाल विक्रम सेठ के द्वारा उठाया गया एक सवाल था।

सवाल किसी युवा ने पूछा था। ग़े राइट्स यानी समलैंगिकों के अधिकार के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फ़ैसला। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि विक्रम सेठ ने खुद को कई बार समलैंगिक समर्थक घोषित कर रखा है। सवाल था कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को किस नजरिए से देखा जाये।

 

फ़ौरी तौर पर यह सवाल मानों ऐसा था जैसे यह सवाल किसी ने पूर्व से निर्धारित योजना के मुताबिक पूछा गया हो। विक्रम ने इस सवाल का बखूबी जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला निंदनीय है। यह समलैंगिकों के मानवाधिकारों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है। अपनी बात को साबित करने के लिए विक्रम ने पौराणिक कथाओं का भी सहारा लिया। दक्षिण के एक देवता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वह शिव और विष्णु के बीच समलैंगिक रिश्ते का परिणाम था।

 

अन्य बातों को छोड़ दें तो यह एक बड़ा सवाल है खासकर उन लोगों के लिए जो हिन्दू देवताओं को पौरुषता का पर्याय मानते हैं। पौराणिक कथाओं में स्त्रियां उन्मुक्त थीं, इसके कई उदाहरण मिलते हैं। मसलन राम जिनके जन्मस्थली के सवाल पर आज देश में सवाल खड़े किये जा रहे हैं, उनके जन्म की ही कहानी पुत्रकामेष्टि यज्ञ से प्रारंभ होता है। अग्निदेव के खीर से कौशल्या और उसकी सौतनों को गर्भ प्राप्त हुआ। इसके अलावा पांचाली का उदाहरण दिया जा सकता है जिसने एक साथ पांच पतियों के साथ जीवन और अपना शरीर साझा किया। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि उसने सभी पतियों से एक-एक पुत्र भी प्राप्त किये।

 

बहरहाल, विक्रम के अनुसार इस देश में समलैंगिकता कोई नई बात नहीं है। इसके पौराणिक और ऐतिहासिक दोनों तरह के सबूत हैं। अतीत में भी उन्हें अपने तरीके से जीवन जीने की स्वतंत्रता थी। उन्होंने सवाल उठाया कि देश की मौजूदा व्यवस्था लोगों को उनका जीवन अपने तरीके से जीने से कैसे रोक सकता है। अब देखना है कि समलैंगिकता के सवाल पर हिन्दू धर्म के पुरोधाओं को समलैंगिक बताने के मामले को लेकर देशा का बौद्धिक जगत किस तरह जुगाली करता है।

चौराहा ! विजय कुमार सप्पति की कहानी

करीब ८ महीने पहले.

डॉक्टर वर्मा ने मुझे अपने करीब बिठाया और कहा, देखो देव, तुम एक संवेदनशील कवि और लेखक हो, मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा। तुम लंग कैंसर की एडवांस स्टेज पर हो। तुम्हारी सिगरेट पीने की आदत ने तुम्हे ख़तम कर दिया है। अब ज्यादा से ज्यादा ६ या ८ महीने बस !

मैंने उसे गले से लगा लिया, यार वर्मा, तुमने तो मेरी ज़िन्दगी की सबसे अच्छी खबर मुझे सुनाई है, पता नहीं कितने बरसो की मेरी ये तमन्ना थी कि मैं मर जाऊं। शुक्रिया तुम्हारा और सिगरेट का!

डॉक्टर वर्मा की आँखे भीग गयी, अब मैं तुम्हारी कविताये नहीं पढ़ पाऊंगा, इस बात का मुझे ज्यादा, बहुत ज्यादा दुःख है।

मैंने उसे फिर से गले लगा लिया, यार अब कुछ अगले जनम के लिए तो रखो!

 

करीब ४ महीने पहले

मैंने इन्टरनेट में सर्च किया और उसका पता ढूँढा और उसे फ़ोन किया। मैंने कहा, मैं देव बोल रहा हूँ निम्मो, एक बार मिलना है, शायद आखरी बार। जल्दी से मिलने आ जाओ।

बहुत देर की ख़ामोशी के बाद उसकी हिचकियो से भरी हुई भीगी हुई आवाज़ आयी, अब? इतने बरस बाद? क्या तुमने मुझे माफ़ कर दिया देव? क्या तुम्हारे मन में मेरे लिए अब कोई नफरत नहीं रही?

मैंने कहा, माफ़ी? प्रेम में माफ़ी? हाँ, क्रोध रह सकता है पर कोई उससे कैसे नफरत करे जिसे टूट-टूट कर चाहा हो। जीवन के इस मोड़ पर मैं माफ़ी जैसे शब्द से ऊपर, बहुत ऊपर उठ चूका हूँ। बस जीवन के आखरी कुछ दिन बचे हुए है। तुम्हे देखना चाहता हूँ एक बार! हाँ ; बेटी को लेते आना। और अमित को भी। उसे कुछ देना है

दूसरी ओर बहुत देर तक रोने की आवाज़ आती रही! यहाँ भी सात समंदर पार आकाश भीगा सा रहा, असमय मेघो ने बारिश की। मेरे आँखों के साथ मेरा मन भी भीग गया।

 

आज सुबह

घर के दरवाजे पर दस्तक भी हुई और घंटी भी बजी, मैं पूजा कर रहा था।

मैंने प्रभु को प्रणाम करते हुए दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा, आ रहा हूँ भाई, ज़रा रुक जाओ

मैंने अपना चश्मा पहना और फिर धीरे धीरे चलते हुए दरवाजे की ओर बढ़ा और फिर दरवाजा खोला। पुराना दरवाजा था, कुछ आवाज़ करते हुए खुला।

 

सामने जो शख्स खड़ा था, उसे देखकर मैं चौंका। मैं समझा, मेरी नजरो का धोखा होंगा, मैंने अपने चश्मे को साफ़ किया और उस शख्स को गौर से देखा। वो मुस्कराता हुआ खड़ा था और मैंने उसे पहचान लिया।

वो अमित था!

मुझे आभास हुआ कि मैंने जो फ़ोन किया था, शायद वो बात मान ली गयी है।

उसने कहा, देव मैं हूँ अमित, पहचाना या पूरी तरह से भूल गया?

मैंने कहा, नहीं। मैं तुझे कैसे भूल सकता हूँ, कभी भी नहीं, कम से कम इस जन्म में तो नहीं।

वो मुस्कराया, हां न, मैंने तो काम ही कुछ ऐसा किया था। खैर तूने मुझे बुलाया है। मुझे अन्दर नहीं बुलाएंगा रे।

मैंने कहा, आना। अन्दर आ, तेरा ही घर है।

मैंने उसके कंधे के पार देखा। दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आया।

मैंने अमित की ओर देखा, वो मुझे ही देख रहा था। जैसे ही उससे नज़रे मिली, वो मुस्कराया। अब भी तेरी आँखे उसे तलाश करती है देव? उसने मुझसे पुछा।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया, जिसे मैंने दिल से चाहा हो, उसे तो हमेशा ही मेरी नज़रे ढूंढेंगी। ये बात ये व्यापारी क्या समझेंगा।

वो अन्दर आया, चारो तरफ देखा, और कहा, वैसे ही है रे। कुछ भी तो नहीं बदला। हाँ शायद सफेदी करवाई है बस और कुछ नहीं।

मैंने कुछ नहीं कहा। उससे क्या कहता।

वो भीतर आया और घर के किनारे में रखे हुए सोफे पर बैठ गया।

उसने हँसते हुए कहा, देव, कुछ भी तो नहीं बदला है। सब कुछ वैसे ही रखा हुआ है। वही पुराना घर। पुराना सोफ़ा, पुराना फर्नीचर, तेरी तरह!

मैंने उसकी ओर देखा और कहा, हां तो, क्या हुआ, मेरा मन इसमें लगता है। बस वही मेरे लिए काफी है। और फिर मुझे मेरा पुरानापन पसंद है।

उसने हँसते हुए कहा, मेरा घर इससे कई गुना बड़ा और खूबसूरत है, आज आधे संसार में मेरे घर बने हुए है, इससे अच्छा सोफ़ा तो मेरे नौकर के घर में होंगा। कहकर उसने खिल्ली उड़ाने वाली नज़र से मुझे देखा। वो मेरी हंसी उड़ा रहा था।

मैं चुप रहा। मैंने उसे गहरी नज़र से देखा और कहा, तू बदला नहीं अमित।

उसने कहा, इसमें बदलने की क्या बात है, जो है सो वही मैने कहा।

मैंने हँसते हुए कहा, हाँ, तेरे पास कई बड़े घर है, वो भी आधे संसार में, लेकिन तूने उन सबको अपने पुस्तैनी मकान की नींव पर बनाया है। होंगे तेरे पास वो सारे घर, लेकिन आज वो तेरा पुराना घर नहीं है जिसमे तू कभी खेलता था। पैदा हुआ, पढ़ा लिखा, बढ़ा हुआ और इस काबिल बना कि उस घर को बेचकर उसे और इस देश को छोड़कर विदेश चला गया। जिसके पास अपने गाँव का घर नहीं, जिसमे उसने दिवाली का पहला दिया जलाया हुआ हो, उसके पास क्या है। वो तो बहुत गरीब हुआ जो कि तू है।

अमित का चेहरा गुस्से में लाल सा हो गया। फिर हम दोनों के बीच बहुत देर की ख़ामोशी रही।

मैंने कहा, चाय पियेंगा रे?

उसने करवट बदलते हुए कहा, हाँ।

मैंने उससे पुछा, मैंने निम्मो को और बच्ची को भी बुलाया था। वो लोग नहीं आये?

अमित ने कहा, आये है, हम सब कल देर रात यहाँ पहुंचे है, बिटिया की तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी, मैंने उन दोनों को थोड़ी देर आराम कर के आने को कहा है।

मैं किचन में गया और केतली में चाय उबालने रखा। मेरे पीछे अमित आ गया था।

मैंने उसे गहरी नजर से देखा, वो भी बुढा हो ही गया था, लेकिन मैं ज्यादा बुढा लगता था। वो थोडा कम लगता था। मुझे चश्मा लग गया था, उसे नहीं, मैं लगभग गंजा हो गया था, वो नहीं, वो अब भी सुन्दर और बेहतर दिखता था, मेरे नजरो के सामने से २५ बरस पहले के बहुत से चित्र गुजर गए।

उसने मुझे देखा और पुछा, तू क्यों चाय बना रहा है, कोई और नहीं है?

मैंने एक पल रूककर, भीगे स्वर में कहा, मैंने शादी नहीं की अमित।

वो चुप हो गया। मैंने उसकी ओर देखा और उसने मुझे देखा।

२५ बरस पहले के पल हम दोनों के बीच में फिर ठहर से गए थे।

मैंने उससे पुछा, शक्कर कितनी?

उसने कहा, तू बना तो। तेरे हाथ की चाय पीऊंगा। बरसो बीत गए।

मैंने कहा, ठीक है, आज तुझे मैं गुड़ की चाय पिलाता हूँ। याद है, हम दोनों कितना पिया करते थे।

उसने फिर मेरी खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज में हँसते हुए कहा, लेकिन यार देव, तूने अपने आपको नहीं बदला, अपने माइंडसेट को नहीं बदला, वही का वही रहा। आज भी केतली में चाय! यार मेरे नौकर भी इलेक्ट्रिक स्टोव में कॉफ़ी बनाकर पीते है। मैंने तो बरसो से चाय नहीं पी, मैं तो दुनिया की बेहतरीन कॉफ़ी पीता हूँ। Rwanda Blue Bourbon, Hawaiian Kona Coffee, Hacienda La Esmeralda मैं तो सिर्फ इन ब्रांड्स के काफी को पीता हूँ।

मैंने उसे टोककर कहा, फिर भी मेरे घर की चाय पीना चाहता है।

मैं सर हिलाते हुए हंस पड़ा।

उसने खिसियाने स्वर में कहा, तो क्या हुआ, दोस्त के घर में उसके पास जो होंगा वही तो पिऊंगा न।

मैंने सूखे हुए स्वर में कहा, दोस्त? क्या तू इस शब्द के अर्थ समझता है अमित। नहीं! न तब और न ही अब!

एक लम्बी खामोशी छा गयी। मैंने चाय उबाली और उसे कप में दिया। वो चुपचाप चाय पीने लगा। मैंने घर की खिडकियों को खोल दिया, ताज़ी हवा भीतर आई। दूर कहीं आरती चल रही थी।

उसने कहा, संगम के हनुमान मंदिर की आरती है न।

मैंने कहा, हाँ !

बहुत सी यादे हम दोनों के दरमियान फिर तैर गयी।

हम दोनों ने चुपचाप चाय पी।

चाय ख़त्म हुई। मैंने अमित से पुछा, वो दोनों कब तक आयेंगे?

अमित ने कहा, शायद दोपहर तक। तू मिलना चाहता था। हम सबसे। हमें देरी हो गयी आने में। वीसा इत्यादि में समय लग गया। बोल, क्या बात है।

मैंने कहा, कोई खास नहीं, बस एक बार तुम सभी को देखना चाहता था।

एक अजनबी सी चुप्पी हम दोनों के बीच फिर आ गयी।

फिर अमित ने कहा, तू कितना बुढा हो गया है। तूने उस कॉलेज की नौकरी को छोड़ देना था, ज़िन्दगी भर एक ही जगह रहने में क्या तुक है। तुझे मिला क्या, कुछ भी नहीं। वही छोटी सी नौकरी, वही तन्खवाह। कुछ किताबो में लिख पढ़ कर छप गया। बस और क्या? तू जहाँ था, वही पर खड़ा है देव। क्या खोया और क्या पाया, कभी हिसाब किताब लगाया है तूने ? सिफर! ए बिग जीरो! और कुछ भी नहीं। अबे; मुझे कहता है, पुश्तैनी घर के बारे में, अरे तूने क्या कर लिया, तू तो अपने नाम का एक घर भी नहीं बना सका। पड़ा हुआ है साले अपने पुराने घर में। और मुझे ज्ञान देता है। इतना कहकर वो हांफने लगा!

मैंने उसकी सारी बाते सुनी। सच्ची बात थी, पर कडवी थी।

मैंने कहा, व्यापारी तो तू है अमित। हिसाब किताब करना तू जाने। ज़िन्दगी भर तो वही करते आया है न। खरीदना और सिर्फ खरीदना। नहीं? वो चुप रहा।

उसके चेहरे पर एक रंग आ रहा था और एक रंग जा रहा था।

२५ बरस पुरानी दुश्मनी अब हम दोनों के जुबान में आ गयी थी।

मैंने आगे कहा, और फिर मुझे किसके लिए घर बनाकर रखना है, मैं तब भी अकेला ही था अब भी अकेला ही हूँ और अकेला ही जाऊँगा। मेरे तो आगे पीछे कोई नहीं; और रही बात मेरे जीरो होने की। तो ठीक है न। जो हूँ, उसमे खुश हूँ। मेरे हिसाब किताब में वो सब कुछ नहीं है, जो तेरी बैलेंस शीट में है। हाँ, एक रिश्ता मैंने बुना था, दोस्ती का तुझसे ! और..............!

अमित ने हँसते कहा, और एक रिश्ता बुना मोहब्बत का निर्मल से! जो तेरी न बन सकी। उसने मुझे चुना था देव। वो भी आज से २५ साल पहले। तू तब भी मुझसे हारा था और आज भी तू मुझसे कही पीछे, बहुत ज्यादा पीछे है।

मैंने कहा, हां। ये सही है अमित। मैं न दोस्ती जीत सका और न ही मोहब्बत। दोनों रिश्ते मैं हार गया था शायद। पर ज़िन्दगी का हिसाब किताब मुझे तेरी तरह नहीं आता है अमित। देख ले आज तू और निर्मल दोनों ही मेरी यादो में है। जबकि तूने दोबारा मुड़कर नहीं देखा , न ही मुझे और न ही इस शहर को ! हाँ, दोस्ती और मोहब्बत के अलावा भी एक रिश्ता बुना है मैंने। शब्दों से। शब्दों की तासीर से। शब्दों की परछाईयो से। शब्दों की दीवानगी से और शब्दों में धडकती ज़िन्दगी की छाँव से। और अब वही मेरी पहचान है। किताबे मेरी साथी बन गयी है । अमित, मैं अपना अकेलापन शब्दों से भरता हूँ और जीवित रखता हूँ खुद को। लिखना पढना ही अब मेरी पहचान है और वही शायद मेरे संग जायेंगी ! मेरे लिए रिश्ते तेरे व्यापार से कहीं बहुत ज्यादा और बहुत ऊपर है मेरे दोस्त ! अब मैं हांफने लग गया था। मैं थक गया था !

अमित ने मुझे पकड़कर बिठाया। मैं आँखे बंद करके बहुत देर तक अमित का हाथ पकड़कर बैठा रहा। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। एक अजीब सी ख़ुशी मन में आ रही थी। मेरे सबसे अच्छे दोस्त का हाथ था।

हम दोनों बहुत देर तक बैठे रहे। मेरे हाथ में उसका हाथ था और उसके हाथ में मेरा हाथ! हम दोस्त थे। बचपन के। भला उस दोस्ती की महक कैसे चली जाती। मेरी आँखों में बीते दिनों की याद आंसू ले आई। मैंने उठकर उसे अपने गले लगा लिया। बहुत देर तक हम यूँ ही एक दुसरे के गले लगे रहे। फिर मुझे लगा कि मेरा कन्धा उसके आंसुओ से भीग रहा है। मैंने उसे धीरे से अपने से अलग किया, देखा तो उसकी भी आँखे भीगी थी और मेरी भी। हम एक दुसरे को बहुत देर तक देखते रहे। एक पूरा जीवन हमने साथ जिया था। बरसो के पहले के चित्र बंद आँखों के सामने से गुजर गए। एक पूरी ज़िन्दगी आँखों में से गुजर गयी।

मैंने उससे कहा कि वो जाकर निर्मल और बच्ची को ले आये।

उसने हामी में सर हिलाया और जाने लगा ।

मैंने पुछा, बच्ची का नाम क्या है अमित ।

वो जाते जाते लौटा और मुस्कराया और मुझसे कहने लगा, यहाँ मैं तुझसे फिर जीत गया हूँ देव। तूने और निर्मल ने सोचा था कि तुम्हारी संतान होंगी और अगर वो बेटी हुई तो उसका नाम तुम अपेक्षा रखोंगे। जब हमें बेटी हुई तो निर्मल ने मुझसे इस नाम की रिक्वेस्ट की और मैं मान गया। मेरी बेटी का नाम तेरे सपनो की बेटी का है। अपेक्षा!

मैं अवाक था। मेरी आँखे और भीग गयी, मैं कुछ न कह सका और उसकी ओर देखकर मैंने अपनी बांहे फैला दी। उसने मुझे देखा और बिना मेरी बांहों में आये घर से बाहर चला गया ।

मैं फिर अपने आराम कुर्सी पर बैठ गया। मैं काँप रहा था। ज़िन्दगी भी क्या क्या रूप दिखाती है। मैं एक निशब्द एकांत के साए में चला गया। और बीते हुए समय की परतो में पता नहीं क्या तलाश करने लगा।

 

२५ बरस पहले..............

/// एक ///

बरसो पहले हम दोनों की दोस्ती सारे इलाहाबाद शहर में मशहूर थी। एक ही साइकिल पर घूमना, साथ साथ रहना, पढना और खाना पीना तक साथ-साथ । कभी मैं उसके घर रुक जाता, कभी वो मेरे घर रुक जाता। दोनों के घरवालो में सिर्फ पिता ही बचे थे। ज़िन्दगी अपनी गति से भाग रही थी। समय जैसे पलक झपकते ही बदल जाता था। स्कूल से कॉलेज तक का सफ़र और फिर नौकरी लगने तक का सफ़र। सब कुछ साथ साथ ही रहा। रोज सुबह संगम के तट पर भागना और फिर हनुमान जी के मंदिर की आरती में शामिल होना और फिर अपना दिन शुरू करना। ज़िन्दगी बहुत ही खूबसूरत थी । फिर उसके पिता नहीं रहे। वो हमारे संग ही रहने लगा। फिर मेरे पिता भी नहीं रहे। हम फिर भी साथ ही रहे। कभी मैं उसके घर तो कभी वो मेरे घर। हर दिन सिर्फ हमारी दोस्ती को बढाता ही था। मेरी नौकरी लगी एक कॉलेज में शिक्षक की, जो कि मेरे मन की थी। अमित को नौकरी पसंद नहीं थी। वो छोटे मोटे काम करते रहा। फिर उसने मसालों का व्यापार शुरू किया। धीरे धीरे उसने उस व्यापार में अपने पैर जमाने शुरू किया। मैं अपनी नौकरी में खुश और वो अपने व्यापार में खुश। कुछ भी हो जाए हम साथ में रात का खाना जरुर खाते थे।

सब कुछ ठीक ही था जब तक कि, निर्मल से मेरी मुलाकात नहीं हुई।

निर्मल मेरे ही कॉलेज में लेक्चरर बनकर आई और पहले ही दिन मैं उस से प्रेम कर बैठा। मैं हिंदी पढाता था और वो भी हिंदी ही की लेक्चरर थी। बस धीरे धीरे मुलाकाते हुई और प्रगाढ़ता बढ़ी। वो मुझे पसंद करती थी और मैं उसे चाहता था। हम दोनों में कितनी बाते एक जैसी ही थी। ...........हिंदी...कविता...प्रेम....जीवन को मुक्तता से जीना और दोनों का ही शिक्षण के क्षेत्र में होना। सब कुछ कितना अच्छा था। मेरा तो आगे पीछे कोई नहीं था। पर उसके घर में उसके माता पिता थे। वो एक मिडिल क्लास फॅमिली से थी। और उसके सपने थे। ज़िन्दगी की शुरुवात में जो गरीबी उसने देखी थी, उससे वो बाहर आना चाहती थी। बस इस एक विषय पर हम अलग थे। मैं सपने ज्यादा देखता नहीं था और अगर सोचता भी था तो सिर्फ एक मामूली ज़िन्दगी के बारे में ही सोचता था। गरीबी मैंने भी देखी थी पर मैं बहुत संतोषी था। निर्मल को संतोष नहीं था। उसके सपने बहुत बड़े थे। और मुझे ये बात बुरी नहीं लगती थी। सब मेरी तरह साधू तो नहीं थे न! मैं उसके परिवार से मिला। उन्हें मैं अच्छा लगा और मुझे वो सब। मैंने सोच लिया था कि निर्मल से ही शादी करके घर बसाऊंगा। मैंने निर्मल से शादी की बाते की। उसने हां कह दिया!

मैंने अमित को निर्मल के बारे में बताया। वो भी मिलना चाहता था। पर उन दिनों वो अपने व्यापार के सिलसिले में केरल, गोवा तथा अन्य जगहों पर जाता था और धीरे धीरे एक्सपोर्ट्स के बारे में सोच रहा था।

/// दो ///

दिवाली के दिन थे, जब वो वापस आया। आते ही मुझसे लिपट गया और कहने लगा, अबे देव, मुझे एक्सपोर्ट का लाइसेंस और परमिशन मिल गया है और बहुत जल्दी ही मैं अपना काम दुसरे देशो में स्टार्ट करूँगा, तू ये नौकरी छोड़ और मेरे साथ आ जा। मैंने हँसते हुए कहा, अरे, ये धंधा तुझे ही मुबारक हो, मैं यही ठीक हूँ। हां; तू आगे बढ़, मुझे इससे ज्यादा ख़ुशी क्या होंगी

उसने हँसते हुए कहा, तू नहीं बदलेंगा रे। अच्छा ये सब छोड़, मुझे बता तू मुझे निर्मल से कब मिला रहा है।

मैंने कहा, आज दिवाली है, शाम को उसके घर चलते है

हम शाम को तैयार हुए । वो तब भी मुझसे खुबसूरत ही था और अब कुछ नए कपडे भी खरीद लिया था। मेरे लिए भी कपडे लाया था। मैंने उसका लाया हुआ कुरता पहना और उसने कोट पैंट। मैंने कहा, तू तो यार और अच्छा लग रहा है। वो हंस दिया। हम दोनों निर्मल के घर चले। उसने कई उपहार खरीद रखे थे निर्मल के लिए, उसने वो सब ले लिए, मैंने कुछ मिठाई खरीदी और हम दोनों रिक्शे में बैठकर उसके घर पहुंचे।

निर्मल इलाहाबाद के मीरगंज इलाके में रहती थी। मैंने अमित को उसका घर दिखाया। घर दियो से सजा हुआ था। मैंने कहा, अमित यहाँ से चलकर तेरे घर में भी दिए जलाना है। अमित ने कहा, ठीक है न यार। बस यहाँ से चलते है थोड़ी देर में।

मैंने निर्मल का दरवाजा खटखटाया। निर्मल ने दरवाजा खोला। वो बहुत सुन्दर लग रही थी। उसने मेरे मनपसंद रंग गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी। अमित उसे देखते ही रह गया। मैंने उन दोनों का परिचय एक दुसरे से कराया। अमित ने धीरे से मुझे कुहनी मार कर कहा, अबे ये तो बहुत सुन्दर है। तुझ जैसे बन्दर को कहाँ से मिल गयी। मैंने हंसकर कहा, अपने अपने नसीब है रे, कभी कभी हम जैसे लंगूर को हूर मिल जाती है ये सुनकर निर्मल शरमा गयी और हम सब हंस पड़े।

हम सब उसके परिवार से घुल मिल गए। अमित का रंग निर्मल के परिवार पर कुछ ज्यादा ही जमा हुआ था। निर्मल के पिता उससे काफी प्रभावित हुए। मुझे लग रहा था कि निर्मल को मिले हुए सपने उसके पिता के सपनो का ही एक्सटेंशन है। खैर हमने पूजा की और फटाके फोड़े। निर्मल और अमित ने खूब फटाके फोड़े। अमित के लाये हुए उपहार सभी को पसंद आये। हम वापस चल पड़े ।

अमित ने राह में मुझसे कहा, अबे तेरी तो सच में किस्मत खुल गयी है। मैं मुस्करा दिया। अमित ने कहा, यार मुझे भी निर्मल पसंद है; यदि तेरा शादी का मन न बने तो मुझे कह देना, मैं शादी कर लूँगा। पूरी शाम में बस उसकी यही बात मुझे अच्छी न लगी। मैं चुप रह गया।

हम अमित के घर गए, वहां दिए जलाए, पूजा की और मेरे घर की ओर चल पड़े।

रात में, अमित अपने कुछ नए व्यापारी मित्रो से मिलने चला गया। और मैं अपने घर में दियो की रौशनी में अपने भविष्य के सपनो को बुनता रहा।

फिर मेरा विचलित मन न माना तो मैंने निर्मल को फ़ोन किया। उससे बाते की। मैंने उससे पुछा कि क्या वो मेरे घर आ सकती है। उसने थोडा सोचकर कहा हां, मैं आती हूँ।

करीब एक घंटे बाद वो आई। उसी नीली साड़ी में। घर में उसके आते ही जैसे उजाला हो गया। मैंने धीरे से उसका हाथ थामकर उससे कहा, मेरी हो जाओ निम्मो। मैं उसे प्यार से निम्मो कहता था।

उसने कहा, मैं तुम्हारी ही हूँ देव! मैंने उसे अपनी बांहों में ले लिया. उसने मेरा चेहरा अपने हाथो में ले लिया और मेरे माथे पर एक छुअन के साथ धीमे से कहा, फिर से दिवाली की ढेर सारी शुभकामनाये।

हम दोनों बहुत देर तक वैसे ही खड़े रहे। मैंने उसका चेहरा अपने हाथ में लेकर कहा, निम्मो हम जल्दी से शादी कर लेते है और अपना घर बसा लेते है।

उसने कहा, हाँ पर थोडा रुक जाओ, अगले साल शादी कर लेते है, मेरे घर में शादी के इंतजाम के लिए पैसे नहीं है। मैं अकेली लड़की हूँ, माँ बाबू जी के सपने है। थोडा रुक जाओ। सब ठीक हो जायेंगा

मैं उसे अपने घर की छत पर ले आया, हम बहुत देर तक शहर की रोशनियों को देखते रहे। बहुत अच्छा लग रहा था। मैंने उसका हाथ पकड़ रखा था। मैंने उससे कहा, निम्मो मैं चाहता हूँ कि हमारी पहली संतान एक बेटी हो उसका नाम अपेक्षा रखेंगे।

निर्मल ने पुछा, अपेक्षा क्यों भला !

मैंने कहा, क्योंकि वो हम दोनों की अपेक्षा होंगी। इसलिए !

हम दोनों हंस पड़े। मैंने उसे फिर अपनी बांहों में ले लिया। बहुत देर तक रात ऐसे ही ठहरी रही।

फिर नीचे से अचानक आवाज़ आई, देव कहाँ है रे ?

वो अमित की आवाज़ थी।

हम दोनों नीचे चल पड़े। अमित ने हम दोनों को देखा तो चौंक गया और कहने लगा, अरे निर्मल, तुम यहाँ कब आई? अगर मुझे पता रहता तो मैं बाहर जाता ही नहीं। तुम कितनी खूबसूरत लग रही हो। ये नीली साड़ी तुम पर कितनी अच्छी लग रही है।

मैंने कहा, अरे रुक जा भाई तू तो एक दिन में इतनी तारीफ कर रहा है, जितनी मैंने अब तक नहीं की होंगी।

अमित ने कहा, अबे, ये मेरा स्टाइल है मैं तेरे जैसा old fashioned नहीं हूँ ।

निर्मल ने कहा, अमित बहुत अच्छा दोस्त है न। मुझे तो अमित और उसकी बाते बहुत पसंद है। अमित जोर से हंस पड़ा, लेकिन पता नहीं क्यों ; मुझे निर्मल की ये बात अच्छी नहीं लगी ।

हम तीनो बहुत देर तक फिर से छत पर जाकर बैठे रहे, रोशनियाँ देखते रहे। फटाको का शोर सुनते रहे।

मैं तो खैर चुप ही था, वो दोनों बहुत सारी बाते करते रहे।

इतने में निर्मल के पिताजी का फ़ोन आया। उन्होंने उसे वापस भेजने को कहा।

अमित ने कहा कि वो निर्मल को छोड़ आयेंगा। मैं ने उन दोनों को विदा किया।

/// तीन ///

दिन गुजरते रहे। ज़िन्दगी अब कुछ और तेज हो गयी थी।

हम तीनो की जिंदगियां एक साथ होकर भी अब अलग-अलग हो रही थी। मुझे कुछ आभास हो रहा था कि अमित; निर्मल और उसके परिवार में कुछ ज्यादा ही शामिल हो गया था। मुझसे कहीं ज्यादा। स्वभाव तो अमित का अच्छा ही था ऊपर से उसका व्यापार और उसकी महत्वकांक्षाए।

मुझे लगने लगा था कि एक साथ मैं बहुत कुछ, बहुत ज्यादा बाजियां हारने वाला हूँ।

मैं अब निर्मल को बार बार शादी के लिए कहने लगा। वो शादी की बात को टाल जाती थी। मैं ये भी जानता था कि वो और अमित अब कुछ ज्यादा ही मिलने लगे थे।

अमित अब मुझसे ज्यादा बाते न करता था और अक्सर मुझसे आँखे चुराने लगा था। निर्मल भी अब ज्यादातर समय चुप ही रहती थी।

फिर एक दिन अमित ने मुझसे कहा, देव, मुझे एक्सपोर्ट के सिलसिले में विदेश जाना है, मैं लंदन जा रहा हूँ वहाँ पर अपना पहला ऑफिस खोलना है। तू चल मेरे साथ। मुझे बहुत ख़ुशी होंगी।

मुझे भी ये सुनकर बहुत अच्छा लगा। मैंने कहा, यार मेरे पास तो पासपोर्ट भी नहीं है। तू जा, मेरी शुभकामनाये तेरे साथ है। ज़िन्दगी में आगे बढ़। तू बहुत सफल होंगा।

उसने मुझे गले लगा लिया और फिर धीरे से कहा, क्या मैं निर्मल को अपने साथ ले जा सकता हूँ

मैं ये सुनकर अवाक रह गया, फिर मैंने धीरे से कहा, अगर वो जाना चाहती है तो ले जा। लेकिन क्या उसके पास पासपोर्ट और वीसा है ?

अमित ने बिना मेरी ओर देखे कहा, हां मैंने बनवा दिया था उसका भी और उसके माँ बाबु का भी।

मैंने ये सुना तो क्रोध से पागल सा हो गया। मैंने उसका कॉलर पकड़कर कहा, साले, मेरे बारे में नहीं सोचा, उनका पासपोर्ट और वीसा बनवा लिया. यही तेरी दोस्ती है ? तुझे हो क्या गया है बोल तो।

उसने बिना मेरी ओर देखे कहा, देव, मैं भी निर्मल से प्रेम करने लगा हूँ बस !

मैं ने उससे कहा, तूने ये क्या कह दिया यार। मैं तेरा दोस्त हूँ। तुझे मेरी दोस्ती का ख्याल नहीं आया।

उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, देव मैं तुझसे माफ़ी मांगने के काबिल भी नहीं हूँ। पर ये दिल की बात है , मैं ये भी कहना चाहूँगा कि निर्मल तेरे साथ कभी खुश नहीं रह पाती। उसकी अपनी महत्वकांक्षाए है जो कि तू कभी पूरी नहीं कर पाता।

मेरी आँखों में आंसू आ गए। मैंने कहा, लेकिन प्रेम; वो तो सबसे ऊपर है।

अमित ने कहा, ज़िन्दगी सबसे ऊपर है देव। प्रेम सिर्फ सपनो में जीने की चीज है। तू अपने आपको बदल। चाहता तो मैं था कि तू मेरे साथ ही रह, लेकिन तू नहीं रह पायेंगा।

मैं क्रोध में पागल हो रहा था, मेरे संवेदनशील मन को यह सब कुछ सहन नहीं हो पा रहा था . मैंने उसे धक्का देते हुए कहा, निकल जा मेरे घर से अमित, आज के बाद तू मुझे अपनी सूरत मत दिखा। तूने जो धोखा दिया है, उसके लिए ईश्वर भी तुझे माफ़ नहीं करेंगा। तू कभी सुख से नहीं जी पायेंगा।

अमित ने कहा, यार बददुआ तो मत दे, मैं एक नयी ज़िन्दगी शुरू कर रहा हूँ। तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त है। ठीक है, मैं तेरे प्यार को तुझ से छीन रहा हूँ; लेकिन उससे हमारी दोस्ती तो ख़त्म नहीं हो जाती न !

मैंने हिकारत से कहा, तू और दोस्ती।

गुस्से में मैंने उसके मुंह पर थूक दिया और कहा, दूर हो जा साले; नहीं तो मैं तेरी जान ले लूँगा।

उसने मुझे देखा और अपने आंसू जो कि अपमान और दोस्ती के टूटने की वजह से थे, पोंछते हुए मेरे घर से चला गया। हमेशा के लिए.............!

मैं बहुत देर तक रोते हुए बैठा रहा। फिर गुस्से में निर्मल के घर गया। वहां पर अमित पहले से ही था, मैंने निर्मल को पकड़ा और उसे एक थप्पड़ मारा वो चुपचाप खड़ी रही। मुझसे गुस्सा सहन नहीं हो रहा था। निर्मल के बाबू जी मुझे रोकने आये। अमित ने उनका हाथ पकड़कर रोक लिया और कहा, उसे अपना गुस्सा निकाल लेने दीजिये बाबू जी।

मैं निर्मल को घर के बाहर लेकर आया और उसे पुछा, ये तूने क्या किया निम्मो, मेरे प्यार में क्या कमी थी ?

मैं रोने लगा था ।

निर्मल चुपचाप थी। उसने मेरे आंसू पोंछे और कहा, देव; ये प्रेम की कमी के बारे में नहीं है, मेरे अपने सपने है, जो प्रेम से बड़े है, और उन सपनो की पूर्ती तुम नहीं कर सकते थे। तुम्हारा mindset उतना, मेरे महत्वकांक्षाओ जितना बड़ा नहीं है हम साथ रहकर भी साथ नहीं जी पाते। प्रेम का बुखार कुछ दिन में ख़तम हो जाता है। ज़िन्दगी की अपनी दौड़ होती है। जीवन की गति, प्रेम को बहुत पीछे छोड़ देती है। मैंने बहुत सोचकर ही फैसला किया है, तुम एक प्रेमिका के रूप में मुझे हमेशा खुश रखते , पर एक पत्नी के रूप में तुम मेरे सपनो को पूरा नहीं कर पाते देव। मैंने बहुत गरीबी देखी हुई है, मुझे अब जीवन के सुख चाहिए ।

मैंने कहा, किसी भी कीमत पर निम्मो ?

उसने धीरे से कहा, हाँ देव !

मैंने कहा, और मेरा प्यार, उसका क्या ?

उसने कहा, प्यार तो हमेशा ही जीवित रहता है देव। हाँ जीवन के रास्ते अलग-अलग हो जाते है। मुझे माफ़ कर दो देव !

मैंने कहा, नहीं निम्मो तुम माफ़ी के काबिल नहीं। तुमने और अमित ने मुझे छला है। तुम दोनों को मैं कभी माफ़ नहीं करूँगा

मैं वापस चला आया।

/// चार ///

कुछ दिनों के बाद पता चला कि अमित ने अपना और निर्मल का घर बेच दिया है और हमेशा के लिए विदेश जा रहा है।

मुझसे नहीं रहा गया; मैं आखरी बार उन दोनों से मिलने पहुँचा। निर्मल का परिवार और वो दोनों विदेश जाने की तैयारियां कर रहे थे। मैं पहुंचा। मुझे देखकर अमित और निर्मल दोनों ठहर से गए। समय भी ठहर सा गया, मैंने बहुत प्यार और बहुत प्यास से दोनों को देखा। दोनों मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा थे और अब दोनों ही अलग हो रहे थे। शायद हमेशा के लिए ।

मुझे रोना आ गया। अपनी हार पर। अपनी बेबसी पर और जो कुछ मैं खो रहा था उस पर!

वो दोनों मुझे देख रहे थे। चुपचाप। भरी हुई आँखों से। निर्मल और अमित दोनों की आंखे भी बह रही थी। एक दोष का भाव था उनके चेहरे पर और आँखों पर और शायद अंतरात्मा पर भी।

मैंने रोते हुए कहा, जाओ खुश रहो। मैं अब तुम दोनों से जीवन में कभी नहीं मिलना चाहूँगा !

निर्मल ने कुछ कहना चाहा पर उसका गला रुंध गया मैं वापस लौट पड़ा।

वो सब चले गए !

 

/// पांच ///

मेरी ज़िन्दगी में एक अजनबी सा एकांत आ गया था। मुझे कभी कभी आत्महत्या कर लेने का मन हो जाता था। एक बार मैंने संगम में कूदकर जान देने की कोशिश भी की, पर लोगो ने बचा लिया। मुझे शायद जीना था इसी दुःख के साथ। यही मेरी नियति थी।

मैंने जीने के लिए सिगरेट और किताबो का सहारा लिया। किताबे मुझे हमेशा से ही प्रिय थी। धीरे धीरे समय बीतता रहा। मैं कहानी और कविता लिखने लगा। ज़िन्दगी में कोई चाह नहीं रही। सिगरेट के धुएं ने मेरी सारी चाहतो को एक विराम सा दे दिया था ।

कई साल बाद जब मुझे पता चल कि अमित का घर फिर से बिकने वाला है तो मैंने उसे अपने प्रोविडेंट फण्ड के पैसो और अपनी जिंदगी भर की कमाई लगाकर खरीद लिया। पता नहीं मेरे मन में उस वक़्त क्या विचार थे। पर हर दिवाली को मैं अपने और अमित के घर में जाकर दिए जला दिया करता था।

समय बीतता रहा। और फिर कुछ महीनो पहले मुझे पता चला कि मुझे कैंसर हो गया है और अब ज्यादा दिनो की ज़िन्दगी शेष नहीं रही थी। मैंने वकील के साथ मिलकर कुछ कागजात तैयार किये।

वसीयत के कागजात! अपनी सम्पति की वसीयत! अपनी ज़िन्दगी की वसीयत! अपने शब्दों की वसीयत!

और एक दिन मैंने निर्मल और अमित को उनकी बच्ची के साथ अपने घर बुला लिया, ताकि एक आखरी बार उन्हें देख लूं और अपना सब कुछ उन्हें दे सकू!

अचानक मुझे जोरो से खांसी आई और मैं यादो के सफ़र से वापस आज के इस पल में लौट पड़ा!

 

आज दोपहर..............!

 

मैंने फ़ोन करके अपने वकील मित्र को बुला लिया और उसे कुछ और कागज़ जल्दी से तैयार करके लाने को कहा।

मैंने सोचा इन सभी को क्या खिलाऊं। फिर मैं मुस्करा उठा। अमित को मेरे हाथो की बनी हुई खिचड़ी बहुत पसंद थी। उन दिनों, पैसो की कमी के कारण मैं दाल, चावल, कुछ सब्जियां सब मिलाकर खिचड़ी बना लेता था। और उसे मैं और अमित, आचार के साथ बड़े चाव से खाते थे। हर जगह हमारी ये बम्बाट खिचड़ी मशहूर थी। मैंने ये खिचड़ी निम्मो को भी खिलाया था, उसे भी बहुत पसंद आई थी. उसने कहा था, शादी के बाद तुम मेरे लिए रोज़ ये खिचड़ी बनाया करना।

शादी के बाद...........!!!

मैंने बड़े अवसाद में सर हिलाया। मेरी ज़िन्दगी भी क्या सर्कस के जोकर की तरह हो गयी थी। मेरी आँखे भीग गयी।

मैंने खिचड़ी बनायी। घर ठीक किया। कुछ पुराने गानों के कैसेट थे, उन्हें बहुत दिनों से नहीं सुना था। हम तीनो को गुलाम अली के ग़ज़ल बहुत पसंद थे। उनकी गजलो की कैसेट ढूंढ कर प्लेयर पर चला दिया। घर भर में गुलाम अली की आवाज गूंजने लगी। मन को कुछ अच्छा लगने लगा था।

अचानक घर की घंटी बजी, मैंने बड़ी उम्मीद से दरवाजा खोला, ये सोचकर कि निम्मो आई होंगी, पर दरवाजे पर मेरा वकील मित्र था। उसने मुझे कागजात दिए और गले से लगा लिया। जाते जाते वो मुड़ा और मुझे एक सलाम किया। मैं भी मुस्करा उठा!

मैं अपनी आरामकुर्सी पर बैठ गया और यादो में खो गया। शाम होने की थी; अब तक वो लोग नहीं आये थे।

गुलाम अली की नयी ग़ज़ल शुरू हो गयी थी किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह..............!

मेरी आँखे भीग गयी। कितना चाहा था मैंने निर्मल को और अमित को भी। पर क्या मिला मुझे! एक नितांत एकांत! पर अब ठीक है। अब ज़िन्दगी बची ही कितनी है।

इतने में दरवाजे पर आहट हुई। मैंने मुड़कर देखा। अमित दरवाजे पर था। मैं उठा। दरवाजे तक गया अपना चश्मा पहना और बाहर की ओर देखा।

अमित के पीछे निर्मल खड़ी थी। मेरी निम्मो! मैंने एक आह सी भरी! जो मेरी हो सकती थी, वो आज किसी और की थी। मेरे दोस्त की! वो आज भी अच्छी लगती थी। मैं ने सबको भीतर आने का इशारा किया और भीतर आने के लिए मुड़ा। अचानक मेरे कदम ठहर से गए। मेरी आँखों में कुछ कौध सा गया था। मैंने फिर मुड़कर दरवाजे के बाहर देखा।

निर्मल के पीछे उसकी बेटी खड़ी थी। नीली साड़ी पहने हुए। निम्मो की दिवाली वाली नीली साड़ी। बेटी को देखा तो आँखों से आंसू बह उठे। मुझे किसी शायर की बात याद आ गयी :

एक पल में जी लिए पूरे बरस पच्चीस हम,

आज बिटिया जब दिखी साड़ी तेरी पहनी हुई !

मैंने उसे अपनी ओर बुलाया। वो हिचकती हुई मेरे पास आकर खड़ी हो गयी। वो पूरी तरह से निम्मो सी ही दिखती थी। हाँ उसका बड़ा माथा अमित पर गया था। अमित के नाक नक्श भी उसे हासिल हो गए थे। मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा। मेरी आँखे बहती रही। फिर मैंने उसका हाथ पकड़ कर भीतर ले आया और अपनी आराम कुर्सी के पास की कुर्सी पर बिठा दिया। और उसे देखने लगा। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैं उठा और घर के भीतर जाकर थोडा सा गुड- चना ले आया। उसे दिया और कहा, बेटी, खा ले, तू पहली बार अपने घर आई है और इस घर की परंपरा है कि जब कोई पहली बार आता है तो उसे हम गुड-चना खिलाते है। उसने अपनी माँ की ओर देखा। निम्मो ने सर हिलाकर हामी दी। अमित ने कहा, खा ले बेटा। उसने धीरे धीरे खाया।

मैंने उन सभी को बैठने को कहा और खिचड़ी ले आया। सबको परोसा और अपेक्षा को मेरे पास ही बिठाकर उसे खिचड़ी खिलाया। सब चुपचाप खा रहे थे। अपेक्षा को खिचड़ी खाना नहीं हो पा रहा था, उसके लिए ये एक नया भोजन था। मैंने कहा, बेटा जितना होता है ,उतना खा ले! तेरे माता पिता को तो ये बहुत पसंद थी। देखो कैसे ठूंस ठूंस कर खा रहे है। वो हंस पड़ी। मुझे उसकी हंसी बहुत प्यारी लगी। अपनी माँ की तरह हंसती थी! निम्मो की तरह..............!!!!

सबने खाना खा लिया था और अब मेरे करीब ही बैठ गए थे।

 

आज शाम......!!!

 

मैं उठा। मैंने अपेक्षा को भी उठने को कहा। मैंने उससे कहा, चलो बेटी,संध्या हो गयी है, पूजा कर लेते है। उसने और मैंने मिलकर सारे घर में अलग- अलग कोनो में दिए लगाए। फिर मैंने कुछ सोचा और फिर घर में जितने भी दिए थे, उन्हें हर ओर लगा दिया। अब लग रहा था कि दिवाली आज ही है। मैं ये सोच ही रहा था कि अमित ने कहा, आज ही इतने बरसो की दिवाली एक साथ मना ले रहा है रे!

मुझे बरसो पहले की वो दिवाली की रात याद आ गयी। मैंने कुछ नहीं कहा ।

मैं अपेक्षा का हाथ पकड कर भीतर आया और अपनी आराम कुर्सी पर बैठ गया।

मैंने अमित को देखा वो मुझे ही देख रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि जो गलती उसने उस वक़्त की थी। उसका असर अब मुझ पर इस बुढापे में और भी ज्यादा हो रहा था।

मैंने निर्मल को देखा। मेरी निम्मो! कितना चाहा था मैंने इसे। वो रह-रहकर मुझे देख लेती थी। उसकी नजरो में एक ऐसा गिल्ट फील था जो कि कभी भी उसकी आत्मा से नहीं मिटने वाला था।

मैंने अपेक्षा को देखा। वो मुझे ही देख रही थी। बहुत शांत नज़रो से। उसके आसपास एक पवित्रता सी थी। एक बुद्ध की शान्ति थी। उसने मुझे अपनी ओर देखते हुए देखा तो मुस्करा दी। उसने पहली बार मुझसे कहा, आप बहुत ग्रेसफुल दिखते है। मुझे उसकी ये बात बहुत प्यारी लगी !

मैंने सभी को अपने करीब बैठने को कहा और कहने लगा, मैंने तुम सभी को इसलिए यहाँ बुलाया है, क्योंकि मैं एक बार तुम सभी को जी भर कर देखना चाह रहा था! बहुत बरस बीत गए है तुम्हे देखे हुए। करीब २५ बरस! जीवन इन पच्चीस बरसो में कभी बहुत धीमे तो कभी बहुत तेज गति से गुजरा है।

मैं थोड़ी देर के लिए रुका और फिर उन तीनो को देखते हुए कहा, मुझे कैंसर हो गया है, अब ज्यादा दिन नहीं है मेरे पास! इसलिए एक आखरी बार मैं तुम सभी को देखना चाहता था !

ये सुन कर निर्मल रोने लगी। अमित फटी फटी आँखों से मुझे देखते रहा गया। अपेक्षा की आँखे भीग गयी, उसने मुझसे कहा, आप हमारे साथ चलिए, हम लन्दन में आपका इलाज करायेंगे !

ये सुनकर अब मेरी आंखे भीग उठी। मैंने अमित से कहा, तुझे याद है रे, तूने बरसो पहले साथ चलने को कहा था, आज तेरी बेटी भी वही कह रही है। अमित ने सर हिलाया। उसकी आँखों से आंसू टपक पड़े।

मैंने आगे कहा, बीते बरसो में ज़िन्दगी ने मुझे बहुत कुछ सीखाया और मैं तुम दोनों से अपने उस बुरे व्यवहार के लिए माफ़ी मांगता हूँ , जो मैंने तुम्हारे साथ गुस्से में २५ बरस पहले किया था। खासकर मेरे अमित से !

निर्मल ने कहा, नहीं देव; तुम क्यों माफ़ी मांग रहे हो। माफ़ी तो हमने मांगी चाहिए थी और सच कहो तो हम माफ़ी के भी काबिल नहीं है। हो सके तो हमें माफ़ कर दो !"

मैंने कहा, नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। ज़िन्दगी में तो ये सब होते ही रहता है। मुझे अब किसी से कोई शिकायत नहीं है ! मैं तो अब नौकरी छोड़ चूका हूँ, लेकिन ख़ुशी है कि अमित अब भी काम कर रहा है। भगवान उसे और तरक्की दे। मैं तो यही चाहूँगा कि अमित तू और आगे बढे । तुझे सारी दुनिया की खुशियाँ मिले।

अमित ने धीरे भीगे स्वर में कहा, जिस दुनिया में तू नहीं, उस दुनिया की खुशियों का क्या करना है। सच तो यही है कि इतने बरसो में मैंने कभी तुझे फ़ोन नहीं किया। न ही कोई ख़त लिखा। लेकिन मैं अक्सर तेरे बारे में पढ़ता था और मुझे ख़ुशी भी होती थी कि तू इतना अच्छा लिखता है और तेरे जाने की कल्पना मैंने कभी नहीं की।

मैंने कहा, हम सभी को एक दिन जाना है अमित। बस अपने कर्म अच्छे रहे यही कोशिश करते रहना चाहिए !

मैं अब थक गया था। मैं उठा और पानी पिया और घर के भीतर गया। अंदर से तीन लिफ़ाफ़े ले आया।

मैंने अमित को पास में बुलाया उसे एक लिफाफा दिया, मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, घर तेरे पास बहुत होंगे, लेकिन तेरे बचपन का घर नहीं है तेरे पास। तूने उसे बेच जो दिया था, इन नए घरो के लिए! मैं तुझे तेरे बचपन का घर वापस कर रहा हूँ। अबकी दिवाली में वहां दिया जलाना! ये ले उस घर के कागजात,मैंने उसे खरीद लिया था और अब उसे तेरे नाम कर दिया है! ये कहकर मैंने उसके हाथ में एक लिफाफा रखा!

अमित मुझे देखते ही रह गया। उसका गला रुंध गया, बस उसके आँखों से आंसू बह रहे थे।

मैंने निर्मल को करीब बुलाया। उसे बहुत देर तक देखता रहा। मैंने धीरे से कहा। निम्मो, मैंने तुझे बहुत बरस पहले अपना सबसे अच्छा दोस्त दे दिया था, उसके बाद मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ भी न रहा, लेकिन तुम हमेशा ही मेरी यादो में रही। मैं तुम्हारे नाम से कविताएं लिखता था और अपनी कहानियों में तुम्हारा ज़िक्र करता था। ऐसी ही एक कविता तुम्हे सुनाता हूँ, ये मेरी आखरी कविता है जो मैंने लिखी है :

तुम अपने हाथो की मेहँदी में

मेरा नाम लिखती थी

और मैं अपनी नज्मो में

तुझे पुकारता था ;

ये हमारी मोहब्बत थी

लेकिन मोहब्बत की बाते अक्सर किताबी होती है

जिनके अक्षर वक्त की आग में जल जाते है

किस्मत की दरिया में बह जाते है ;

तेरे हाथो की मेंहदी से मेरा नाम मिट गया,

वो तेरी मोहब्बत थी!

लेकिन मुझे तेरी मोहब्बत की कसम,

मैं अपने नज्मो से तुझे जाने न दूंगा।।।

ये मेरी मोहब्बत है !!

 

ये सुनाकर मैंने उससे पुछा कैसी है कविता। कोई कुछ न बोला। सब स्तब्ध खड़े थे।

निर्मल मुझे खामोश देख रही थी। उसकी आंखे भरी हुई थी। मैंने उसके हाथ में एक बड़ा सा लिफाफा रखा। मैंने कहा, निम्मो, मैं अपना सारा लेखन तुझे देता हूँ। मेरी कविताएं, मेरी कहानिया सब कुछ अब तेरा, अब और कुछ मेरे पास तुझे देने के लिए नहीं रहा! तू खुश रहे हमेशा, बस यही एक सच्ची दुआ है मेरे मन में!

अमित ने मुझे दखते हुए कहा, आज तू फिर जीत गया देव ! वाकई तू देव ही है। तुझ जैसा कोई और क्या होंगा इस दुनिया में। हम तो किस्मत वाले थे, जो तू हमें मिला, पर हम तेरे देवत्व को, तेरे प्यार को संभाल नहीं सके !

मैनें कहा, कहीं कोई हार जीत नहीं है अमित। प्रेम में कोई हारता नहीं है। और न ही कोई जीतता है। न तू जीता और न मैं हारा। मैंने शादी नहीं की पर निर्मल मेरे साथ हमेशा है। ये मेरे प्यार की जीत है। निर्मल ने पूरे २५ बरस तेरे साथ गुजारे, तेरे बच्ची की माँ बनी, कभी तो उसने एक औरत के किसी न किसी रूप में तुझसे प्रेम किया होंगा। ये तेरे उस प्रेम की जीत है, जो तूने निर्मल से किया है। निर्मल ने तुझसे शादी करने के बाद एक बार भी मुझे न कोई ख़त लिखा ना मुझसे मिलने आई, वो पूरी तरह तेरी हो गयी। हाँ, उसने अपनी बेटी का नाम, हमारे सपनो की नींव पर रखा, ये उसके प्रेम की जीत है, जो उसने मुझसे किया है। अब तू बता, जहां हर तरह, हम सब की किसी न किसी तरह जीत है तो हारने का सवाल ही नहीं उठता है। प्रेम सबसे ऊंचा है अमित !

अमीत और निर्मल की आँखों से आंसू बह रहे थे, अपेक्षा चुपचाप खड़ी थी। मेरी आँखे भीग गयी।

मैंने उसे अपने पास बुलाया, उसके सर पर हाथ रखा और फिर तीसरा लिफाफा उसे दे दिया। मैंने कहा, बेटी, मेरे पास जो कुछ भी था वो मैंने तेरे माँ बाप को दे दिया है, बस मेरा ये पुरखो का घर है, इसे मैंने तेरे नाम कर दिया है, मेरी इच्छा है कि मेरे मरने के बाद तू कभी कभी यहाँ आकर रहे। मेरे मरने के बाद तू इसमें कभी कभी त्यौहार के दिए जलाना। मेरे कृष्ण की पूजा कर लिया करना। घर के आँगन में एक तुलसी है जिसे मेरी माँ ने बोया था, वो अब भी सदाबहार है, उसमे पानी डाल दिया करना। बस यही मेरी अंतिम ख़ुशी होंगी।

मैं कांपने लगा था। अमित और निर्मल ने मुझे बिठाया।

पता नहीं दोस्ती, प्यार और ज़िन्दगी का ये कैसा चौराहा था, जिस पर हम चारो के आंसू बह रहे थे।

अपेक्षा मेरे पैरो के पास बैठ गयी। मैंने बहुत प्यार से उसके सर को सहलाया। उसे पूरे दिल से आशीर्वाद दिया।

अपेक्षा ने धीरे से कहा, आपने हम सभी को बहुत कुछ दिया है। आज मैं आपको कुछ देना चाहती हूँ, क्या मैं आपको अब से हमेशा बड़े पापा जी कह सकती हूँ।

मेरा गला रुंध गया और आंसू बह निकले। मुझे बिना मांगे बहुत कुछ मिल गया था और अब कुछ नहीं चाहिए था।

मैंने उसे, अमित और निर्मल को एक साथ अपने गले लगा लिया!

दामिनी के नाम

(Nawal Kishor Kumar)

हर रोज जन्मती और दम तोड़ती है

कहीं न कहीं एक या फ़िर अनेक दामिनी

कभी कहीं कोई जबरन उसकी अस्मत लूटता है

कानून अपने पन्ने फ़ड़फ़ड़ाता है

थाना वाले दामिनी की लाश से

वारदात का पूरा हाल पूछते हैं

देश का राजा मुंछों पर ताव दे

अखबारों में अपना नाम छपवाता है।

 

दामिनी तब भी न कुछ बोली थी

अब भी कहां कुछ बोलती है

समाज कहीं उसे तिरस्कृत न कर दे

न्यूज चैनलों पर चोरी छुपके कहती है

समाज दोनों कान के परदे नहीं गिराता

झट से चैनल चेंज कर लेता है

दामिनी की बात आने पार कभी कभी

मोमबत्तियां ले समाजसेवा के शौक आजमाता है।

 

दामिनी फ़िर आज और कल

और शायद हर दिन अवतरित होगी

कहीं किसी झाड़ी में फ़ेंकी हुई उसकी लाश मिलेगी

कभी किसी ट्रेन या बस या फ़िर किसी होटल के लिफ़्ट में

अपने आपको सम्भालते कातर निगाहों से देखेगी

समाज फ़िर उसे ही दामिनी कह उसका तिरस्कार करेगा

लेकिन दामिनी समाज के लिए

अपना मुंह बंद रखेगी

अखबारों में उसकी खबरें पढ

समाज की आंखें नहीं चुंधियायेंगी

वह तो टी विद न्यूज के मजे लेगा

जरुरत पड़ने कर कभी-कभी चर्चे भी करेगा

हां भाई एक दामिनी थी

आज ही के दिन बेचारी।

संस्मरण - टिड्डे की अंतिम यात्रा 

- Punam Shukla

बात छठी कक्षा की हैमैं बहुत छोटी और नासमझ थी। हाँ छठी कक्षा में हम नासमझ ही हुआ करते थे। आज तो पहली कक्षा के बच्चे भी बहुत परिपक्व लगते हैं। तब हमलोग बेगूसराय जिले के बरौनी फर्टिलाइज़र की कालोनी में रहते थे। दोपहर का समय था। सभी भोजन के बाद आराम फरमा रहे थे, पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैंने धीरे से वहाँ से सरक जाना ही ठीक समझा। बरामदे में एक दरवाजा था और व आँगन में खुलता था।

मैंने धीरे से बिना आहट के दरवाजा खोला और आँगन में खेलने लगी। हमारे क्वार्टर के बाद ही एक फेन्सिंग थी और फिर उसके बाद मेन रोड जो सीधे बीहट बाजार की ओर चली जाती थी। सड़क हमेशा व्यस्त रहती थी। सड़क वहाँ की जीवंतता को हमेशा दर्शाया करती थी। दिन भर ट्रक ,जीप और कार की तो लाइन लगी ही रहती, कभी-कभी जानवरों का झुंड भी सड़क पर उमड़ता रहता। वहाँ की बसें तो देखने लायक होती थीं बसें इस तरह खचाखच भरी होतीं कि जिसका अगला-पिछला, ऊपर-नीचे कुछ भी न दिखेचारों तरफ सिर्फ आदमी ही आदमी लटके रहते। सड़क सीधे बाबा वैद्यनाथ धाम को जाती थी अब आप खुद ही अंदाजा लगा लीजिए कि सावन में वो सड़क कितनी जीवंत हो जाती होगी। रात दिन कांरियों की कतार लगी रहती थी। बोल बम की आवाज गूँजती रहतीसबकी दौड़ने की अलग-अलग स्टाइल होतीउनके पहनावे भी लुभावने होते। जो पैदल चलने में असमर्थ होते ट्रकों में भरकर गीत गाते, तेज लाउडस्पीकर बजाते जाते। पर साथ ही दिन भर में आठ-दस राम नाम सत्य है के नारे भी सुनाई दे जाता था। किसी की अर्थी पर सफेद कपड़ा होता तो किसी पर लाल। किसी अर्थी के साथ लोग रोते हुए जाते तो किसी के साथ गाजे बाजे की धु होती।

उस समय मेरी लंबाई कम थी और आँगन में ऊँची दीवारमैं आँगन में कुर्सी लगाकर उस पर चढ़ जाती और सड़क देखती। उस सड़क पर मुझे हर तरह के नज़ारे नज़र जाते - जीवन ,मृत्यु, त्योहार,उल्लास और गम। धीरे-धीरे व सड़क मेरे जीवन का हिस्सा बनती जा रही थी और मुझे कुछ सीखा रही थी।

अरे, बात तो वहीं रह गई। सभी सो रहे थे और मैं बिना शोर किए धीरे-धीरे खेल रही थी। खेलते-खेलते मुझे एक कीड़ा मिला। कीड़ा क्या एक टिड्डा थारे रंग का छोटा सा टिड्दा, जो मर चुका था और कुछ चींटियाँ उसे खींच कर ले जा रही थीं। मरे टिड्डे की ऐसी हालत देखकर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा। मैंने सभी चींटियों को वहाँ से भगा दिया और फिर देर तक उसे आत्मीयता से निहारती रही। ऐसे ही लगभग दस मिनट बीत गए। तभी एकाएक राम नाम सत्य है की आवाज़ सड़क से आनी शुरू हो गई। किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा जा रही थी। एकाएक मेरे दिमाग में भी कुछ कौंधा और मैंने ठान लिया कि मैं भी इस टिड्डे का अंतिम संस्कार करुँगी। मैं फटाफट झाडू में से कुछ सींकें निकाल लाई और संयोग से धागा भी मिल गया। सींकों को तोड़ कर मैंने छोटे-छोटे टुकड़े कर लिए और बड़ी सफाई से धागे से बाँध कर टिड्डे के लिए मैंनें अर्थी तैयार कर ली।

चिता बनाने के लिए आँगन से कुछ सूखी लकड़ियाँ भी ले लाई। रसोईघर से माचिस भी मिल गई। पहले मैंने टिड्डे को धीरे से अर्थी पर लेटाया फिर कफन के रूप में एक बड़ा पत्ता उसके शरीर पर डाल दिया। अब अर्थी को उठाकर चिता तक ले जाना था। दृश्य तो दिन में दस बार सड़क पर ही दिख जाता था सो उसमें कोई परेशानी नहीं हुई। बिना शोर किए धीरे-धीरे राम नाम सत्य के आठ-दस नारे गाए ताकि कोई जग न जाए ओर फिर धीरे-धीरे अर्थी को चिता के पास ले गई।

अब उसका अंतिम संस्कार करना था। कुछ देर तक और टिड्डे को देखने का मन किया और फिर अलविदा कहते हुए मैंने उसे बटोरी हुई सूखी लकड़ियों पर रख दिया। ऊपर से दो तीन और लकड़ियाँ रख दीं और फिर चिता में माचिस से आग लगा दी। जलने की बदबू धीरे-धीरे पूरे घर में फैलने लगी। अम्मा को लगा कि शायद कुछ किचन में जल रहा है सो व जोर से दौड़ी पर वहाँ तो सब ठीक था। फिर उनकी निगाह मुझपर पड़ी।

अच्छा तो जलने की बदबू यहाँ से आ रही हैं। तुम कर क्या रही हो ? अम्मा ने कहा। कुछ नहीं बस इस टिड्डे का अंतिम संस्कार। मेरी आवाज में दर्द और मासूमियत का मिश्रण था। तब तक पिताजी भी वहाँ पहुँच गए और टिड्डे की अंतिम यात्रा देख कर हँसे बिना ना रह सके। उस घटना का अर्थ आज समझ में आता है। उस सड़क की आत्मीयता आज समझ में आती है जो धीरे-धीरे मेरे संस्कारों में परत पर परत चढ़ा रही थी ।

राष्ट्रपिता ज्योतिराव की जयंती पर विशेष - तब धरती तुम्हारी रखैल न होगी

तुम हर रोज कहते हो

मैं हर रोज सुनता हूं

कभी तुम्हारे लिखे अल्फाज देख

जीवन के सपने संजोता हूं

कभी अल्फाजों के पीछे की सच्चाई देख

खुद बंदूकों की फसलें बोता हूं

 

तुम कहते हो हम गलत हैं

हमने भी कब कहा

हम तुम्हारी तरह जय हिन्द कहने वाले

वंदे मातरम का नारा लगाने वाले

भारत माता के सच्चे बेटे हैं

हम तो वही हैं

जो तुमने हमें अबतक कहा है

जो गालियां दी तुमने सदियों से

वह सब अबतक सहा है

 

हां एक अंतर है

अब हमारे भी अपने अल्फाज हैं

अपनी वर्णमाला और अपने प्रतीक हैं

अभी तुम्हें इनकी गूंज सुनाई नहीं देगी

अभी तो तुम्हारे कानों में वेद के मंत्र गूंज रहे हैं

जिस दिन तुम्हारे कान भी गर्म शीशे का रस पियेंगे

तब तुम हमारी आवाज सुनोगे

 

धैर्य रखो, वह समय भी बहुत दूर नहीं

जब तुम भी कहोगे

हम शुद्र दलित या हरिजन नहीं

तुम्हारी तरह ही इंसान हैं

तब हमारे बच्चे भी भूख से बिलबिलायेंगे नहीं

न ही धरती तुम्हारी रखैल होगी

पुस्तक मेले में स्थान तलाश रही ऊर्दू, सहमा सहमा नजर आ रहा ऊर्दू अकादमी

पटना(अपना बिहार, 21 नवंबर 2013) पटना पुस्तक मेले में इस बार ऊर्दू साहित्य अपने अस्तित्व को लेकर संघर्षरत है। संघर्षरत इस मायने में कि मेले में इस बार भी करीब आधा दर्जन प्रकाशकों के द्वारा धर्म व मजहब पर आधारित पुस्तकों का जलवा है और ऊर्दू साहित्य का कोई नामलेवा तक नहीं है। बिहार ऊर्दू अकादमी द्वारा औपचारिकता निर्वाह के तर्ज पर स्टॉल लगाया गया है। शेल्फों की संख्या कम होने के कारण आधी से अधिक किताबें जमीन पर पड़ी हैं। इसके अलावा पिछले सात वर्षों के दौरान कोई नयी किताब का प्रकाशन नहीं होने के कारण भी अकादमी की किताबों की डिमांड नहीं है। दस वर्ष पहले सैयद बदरूद्दीन अहमद द्वारा प्राचीन पटना के इतिहास पर आधारित किताब हकीकत भी, कहानी भी का प्रकाशन किया गया था।

बिहार ऊर्दू अकादमी के स्टॉल पर कार्यरत नियाज अहमद ने बताया कि कुछ पुरानी किताबें ही पाठकों को खरीदने पर मजबूर कर रही हैं। इसमें सबसे अधिक कमरूंनिसा बेगम द्वारा बच्चों के लिए लिखित हमारा समाज शामिल है। यह किताब बच्चों में बहुत लोकप्रिय है। इसकी वजह यह है कि इसमें बच्चों को सरल भाषा में समाज के विभिन्न पहलूओं की जानकारी दी गयी है। इसके अलावा कई और किताबें हैं जो चर्चा में हैं और लोग उलट पुलटकर देखते तो हैं लेकिन खरीदते नहीं हैं। इनमें मो हुसैन आाजाद की किताब नैरंग-ए-ख्याल, कलीम उद्दीन अहमद की अपनी तलाश में, अब्दुल कवी देसनवी की पुस्तक यादगार-ए-सुलैमान आदि शामिल हैं।

वहीं पुस्तक मेले में पीस फाऊंडेशन एवं अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष प्रकाशकों द्वारा ऐसे किताबों को बड़े पैमाने पर परोसा गया है जिनमें इस्लाम के अधिक उदार होने की बात कही गयी है। इसके अलावा पांच से दस रुपए में हिंदी में अनुवादित कुरआन भी बड़ी संख्या में पसंद की जा रही है। वहीं पाठकों का कहना है कि ऊर्दू साहित्य की पुस्तकों को जानबुझकर प्रकाशकों द्वारा मेले में नहीं लाया जा रहा है। जबकि पटना में इन पुस्तकों की अच्छी डिमांड है।

बिहार के रचनाकार : कलीम अजीज के नज्मों से गुलजार हो रहा अजीमाबाद

पटना(अपना बिहार, 21 नवंबर 2013) अपनी उम्दा और बेबाक शायरी के लिए पटना के अदबी महफिल के सरताज कहे जाने वाले कलीम अजीज उन चंद शायरों में से एक हैं जिनके कारण अजीमाबाद यानी पटना की प्राचीन अदबी संस्कृति सजीव है। इनकी कई रचनायें इस बार पटना के पुस्तक मेले में उन पाठकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं जो गंभीर और विचारपरक शायरी का शौक फरमाते हैं। इन्हें पसंद करने वालों में पटना के मैंगो मैन यानी आम आदमी से लेकर बड़े-बड़े राजनेता तक शुमार हैं। हालांकि कई इस बात से खफा भी हैं कि उनकी नयी किताब इस बार केवल देवनागरी लिपि में लायी जा रही है। लोगों के खफा होने की वजह यह है कि इस बार उनकी मशहूर रचनायें जो मूल रूप से ऊर्दू में हैं मेले में उपलब्ध नहीं हैं।

मूल रूप से पटना के ऊर्दू साहित्यकार कलीम अजीज की अबतक डेढ़ दर्जन किताबें बाजार में उतारी जा चुकी हैं। सूबे के जाने माने कवि पद्मश्री अरूण कमल के अनुसार कलीम अजीज की न केवल शायरी बल्कि उनकी शख्सियत भी अनुकरणीय है। उन्होंने ऊर्दू जुबां को जहां एक ओर अपनी रचनाओं से रौशन किया वहीं दूसरी ओर उन्होंने हिंदी से भी अपना संबंध बनाये रखा। हिंदी साहित्य जगत में भी वे उतने ही सम्मानित हैं जितने कि ऊर्दू साहित्य जगत में। उनकी रचनाओं की खासियत यह होती है कि उनमें जिंदगी की तल्ख्ी और रूमानियत दोनों अपनी-अपनी हैसियत के हिसाब से एक साथ खड़े नजर आते हैं। पुस्तक मेले के आयोजन मंडल के सदस्य और साहित्यकार रत्नेश्वर सिंह के अनुसार कलीम अजीज को पढ़ने पर लगता है कि वह जो लिख रहे हैं वह फैज अहमद फैज की रचनाओं का नया विस्तार है। उनकी रचनाओं में जिंदगी की बू और इंसानियत की खुश्बू एक साथ मिलती है। यही कलीम अजीज की असल खासियत है।

बहरहाल, कलीम अजीज की पुस्तकों के बारे में वाणी प्रकाशन के विक्रय प्रतिनिधि ने बताया कि फैज अहमद फैज और मिर्जा गालिब की रचनाओं के बाद शायरी और नज्मों की सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में कलीम अजीम की रचनायें शामिल हैं। इसकी वजह यह है कि इसे पढ़ने वाले केवल ऊर्दू जानने एवं समझने वाले लोग ही नहीं करते बल्कि इनकी शैली और शब्दों के मामले में उदारवारी रवैये के कारण हिंदी पाठक भी उनके साथ अपना रिश्ता जोड़ लेते हैं।

बिहार के रचनाकार : वंचितों के साहित्यिक हस्ताक्षर बने दिवाकर

पटना(अपना बिहार, 19 नवंबर 2013) बिहार में वंचितों के साहित्यिक हस्ताक्षर के रूप में प्रसिद्ध कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर मूल रूप से ग्रामीण परिवेश पर आधारित कहानियां लिखने के लिए जाने जाते हैं। वे साहित्य के क्षेत्र में वंचितों का प्रतिनिधित्व करते हैं तो वे कहानियों के जरिए इस वर्ग के विकास का मार्ग भी तलाशते हैं। इनकी साहित्यिक साधना का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि गाँव के गतिशील यथार्थ को उसके प्रत्येक रग-रेशे को इनकी कहानियाँ कहीं हल्के स्पर्श से तो कहीं-गहरी रेखाओं से उकेरती हैं।

समाज की वास्तवित तस्वीर प्रस्तुत करने वाली इनकी कहानियों के पात्र अपने माटी-पानी की उपज होते हैं, इस कारण अलग से उनको अलग से पेंट कर चरित्र बनाने या गढ़ने की कोशिश इनमें नहीं मिलती। कोई शिल्पगत चमत्कार और विषय-वस्तु की व्यूह-रचना भी ये नहीं करते। इनकी कहानियों में एक तरह की अनुरागात्मक सहजता है। मानवीय संबंध और संवेदन जहाँ भी आहत होते हैं, ठीक उन्हीं केंद्रों से इनकी कहानियाँ जन्म लेती हैं और अंत में कुछ सवाल और बहुतेरे जवाब छोड़ जाती हैंं।

वर्तमान में पटनावासी रामधारी सिंह दिवाकर की प्रकाशित रचनाओं में मखान पोखर, धरातल, वर्णाश्रम, अकाल संध्या और रामधारी सिंह दिवाकर की दस प्रतिनिधि कहानियां शामिल हैं। इसके अलावा इनके द्वारा रचित उपन्यास आग, पानी और आकाश और हाल ही में प्रकाशित टूटते दायरे भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित हुई है। श्री दिवाकर देश के उन साहित्यकारों में एक हैं जिनके उपर हंस के संपादक रहे राजेंद्र यादव ने विशेष आलेख लिखा।

दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मिकी के निधन पर शोक

पटना(अपना बिहार, 18 नवंबर 2013) देश के जाने माने दलित साहित्यकार ओमप्रकाश बाल्मिकी के निधन पर पटना पुस्तक मेले में शोक सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पा्रख्यात साहित्यकार राजेंद्र प्रसाद सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि स्व वाल्मिकी ने दलित साहित्य लेखन में नये आयामों को जन्म दिया। उनकी खासियत यह थी कि उन्होंने अपनी रचनाओं में जहां एक ओर दलितों का शोषण और उनका सच दिखाया वहीं दूसरी ओर उन्हें अपने कल को बेहतर बनाने का संदेश भी दिया। इस अवसर पर साहित्यकार संतोष यादव ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में अभिवंचित वर्ग के संघर्ष का केवल वह पक्ष परिलक्षित होता था जो सामंती तबके को प्रिय था। जबकि अभिवंचित वर्ग के असली दर्द को इतिहास में केंन्द्रीय विषय बनाने का काम ओमप्रकाश वाल्मिकी और राजेंद्र यादव जैसे साहित्यकारों ने किया। शोकसभा संचालन साहित्यकार अरूण नारायण ने किया।

ओम प्रकाश वाल्मिकी की एक कविता

शब्द झूठ नहीं बोलते

मेरा विश्वास है

तुम्हारी तमाम कोशिशों के बाद भी

शब्द जिन्दा रहेंगे

समय की सीढियों पर

अपने पांव के निशान

गोदने के लिए

बदल देने के लिए

हवाओं का रुख

 

स्वर्णमंडित सिंहासन पर

आध्यात्मिक प्रवचनों में

या फिर संसद के गलियारॉं में

अखबारों की बदलती प्रतिबद्धताओं में

टीवी और सिनेमा की कल्पनाओं में

कसमसाता शब्द

जब आयेगा बाहर

मुक्त होकर

सुनाई पडेंगे असंख्य धमाके

विखण्डित होकर

फिर फिर जुडने के

 

बंद कमरों में भले ही

न सुनाई पडे

शब्द के चारों ओर कसी

सांकल के टूटने की आवाज़

 

खेत खलिहान

कच्चे घर

बाढ में डूबती फसलें

आत्महत्या करते किसान

उत्पीडित जनों की सिसकियों में

फिर भी शब्द की चीख

गूंजती रहती है हर वक्त

 

गहरी नींद में सोए

अलसाये भी जाग जाते हैं

जब शब्द आग बनकर

उतरता है उनकी सांसों में

 

मौज-मस्ती में डूबे लोग

सहम जाते हैं

 

थके हारे मजदूरों की फुसफुसाहटों में

बामन की दुत्कार सहते

दो घूंट पानी के लिए मिन्नते करते

पीडितजनों की आह में

जिन्दा रहते हैं शब्द

जो कभी नहीं मरते

खडे रहते हैं

सच को सच कहने के लिए

 

क्योंकि,

शब्द कभी झूठ नहीं बोलते !

बिहार के रचनाकार : रंग ला रही है दीनानाथ की खोज

पटना(अपना बिहार, 18 नवंबर 2013) दीनानाथ साहनी मूल रूप से पत्रकार हैं। इसके बावजूद उन्होंने आर्यभट्ट के गणितीय सूत्रों को नये तरीके से बोधगम्य भाषा में आविष्कृत किया है। पटना पुस्तक मेले में इस बार उनकी पुस्तक आर्यभट्ट रंग ला रही है। प्रभात प्रकाशन के प्रतिनिधि के अनुसार बिहार के नये रचनाकारों में दीनानाथ साहनी सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। इसकी वजह यह है कि आर्यभट्ट के जरिए उन्होंने न केवल आर्यभट्ट के गणितीय सूत्रों की पुर्नव्याख्या की है बल्कि आर्यभट्ट से जुड़े इतिहास को भी नये अंदाज में परोसा है। आर्यभट्ट के अलावा श्री साहनी दो अन्य पुस्तकें नाट्य शास्त्र और रंगमंच और मां की लोरियां खासा चर्चा में हैं।

अपनी रचनाओं के बारे में दीनानाथ साहनी ने बताया कि अभीतक उन्होंने करीब एक दर्जन से अधिक रचनाओं का सृजन किया है। इनमें कहानी, कविताओं के अलावा शोध पर आधारित रिपोर्ट शामिल हैं। आर्यभट्ट के बारे में पूछे जाने पर श्री साहनी ने बताया कि इस पुस्तक को लिखने से पहले उन्होंने चार वर्षों तक आर्यभट्ट के गूढ रहस्यों को समझने का प्रयास किया। फिर उनसे जुड़े तमाम तथ्यों का संग्रहण किया। आर्यभट्ट द्वारा प्रतिपादित अधिकांश सिद्धांत संस्कृत श्लोकों को रूप में दर्ज है, जिन्हें आम आदमी आसानी से नहीं समझ सकता है। इसी कारण से उन्होंने आर्यभट्ट की रचना की। उन्होंने कहा कि आर्यभट्ट ने केवल जीरो का ही आविष्कार नहीं किया था। वे अपने जमाने के सबसे बड़े खगोलशास्त्री थे।

बहरहाल, दीनानाथ साहनी का मानना है कि पत्रकारिता और साहित्य सृजन दोनों लगभग एक जैसा ही कार्य है लेकिन दोनों में मौलिक अंतर यह है कि साहित्य सृजन के तहत विषयों को अधिकतम विस्तार देते हुए जनसामान्य के बीच उपलब्ध कराया जा सकता है। जबकि पत्रकारिता की अपनी कुछ सीमायें होती हैं।

पारंपरिक मीडिया पर उठ रहा सवाल : दिलीप मंडल

पटना(अपना बिहार, 18 नवंबर 2013) तकनीक के कारण लोगों के पास आज देश में समाचार पाने के विकल्प बढे हैं। असल सवाल पारंपरिक मीडिया की साख का है। उससे जुड़े पत्रकारों और संपादकों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहा है। देश के जाने माने पत्रकार दिलीप मंडल ने कल गांधी मैदान में पुस्तक मेले में जनसंवाद कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि अब मीडिया में जनहस्तक्षेप बढा है। लोगों को अन्य माध्यमों के जरिए सूचनायें मिल रही हैं। अब पारंपरिक मीडिया को बदलना ही होगा। अब जनता को वास्तविक खबर से वंचित नहीं रखा जा सकता है। इस अवसर पर प्राख्यात पत्रकार कमलेश ने भी अपने विचार व्यक्त किया। जनसंवाद कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी अनीश अंकुर ने किया।

गीताश्री को समर्पित नवल की एक कविता

(गीताश्री का जन्मथल मुजफ़्फ़रपुर है। एक सीनियर पत्रकार होने के साथ-साथ उन्होंने अपने लेखनी के जरिए साहित्य जगत में स्त्री विमर्श को नयी परिभाषा दी है। उनकी रचनाओं में स्त्रियां बंधनों के गांठ खोलती हैं, समाज से विद्रोह करती हैं और उमुक्तता की अपनी परिभाषा गढती हैं। उनकी रचनायें बहुत कुछ कहती हैं। एक अदम्य साहसी और स्त्री विमर्श को बुलंद करने वाली गीताश्री को समर्पित मेरी एक कविता - नवल किशोर कुमार)

हर कहानी के बाद

खाली पड़े हिस्से में

रक्तबीज के वेश में सवाल रक्तपात मचाते हैं

कहीं कोई अपने कपड़े ठीक कर रही होती है

तो कोई जीतने का भ्रम पाल

अपनी मुंछों पर ताव देता है

कुछ रुदालियां रोती हैं

कुछ लाशें जमीन पर बीती रात का सच बताती हैं।

अखबारों के पन्नों में भी कभी कभार

किसी कहानी के बाद की कहानी छप जाती है

और कोने में खून की कुछ बुंदें या फ़िर कभी

फ़ुलों का गुच्छा लिये गजगामिनी की तस्वीर

आंखों के सामने कहानी का अंत बताने का प्रयास करती है

लेकिन कहानियां तो कहानियां ही हैं

उनका आदि क्या और अंत क्या

यह सच वह भी जानती हैं

समझती हैं इसलिए मौन हैं

एक बुत के जैसे किताब के शक्ल में

या फ़िर रंग बिरंगे अखबारों के पन्नों में

जैसे कोई खुबसूरत सी टिकुली

ललाट के जगह रुम्पा के गालों को चूम रही हों

चौपाल की नायिका भी बन्द गली के आखिरी मकान के पास

रुकती है और देखती है उन सभी को

जिनके लिए एक हसरत है वो

वह रचना बने या फ़िर प्रार्थना

दुनिया से ताल ठोककर सवाल करती है

सोन पुष्प लाने गये राजा की कहानी

बहुत कुछ कहना चाहती है

लेकिन अलफ़ाज तब कहां उसे इसकी इजाजत देते हैं

दुनियावी दस्तूर भी तो नहीं है ऐसा

हर कहानी के खत्म होने के बाद

एक नयी कहानी की परंपरा निभानी ही पड़ती है।

ओबीसी साहित्य के प्रवर्तक राजेंद्र प्रसाद सिंह , 95 भाषाओं का शब्दकोष बना विश्व रिकार्ड बनाने की तैयारी

पटना(अपना बिहार, 16 नवंबर 2013) बनारस के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अब लेकर वर्तमान में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में अध्यापन करने वाले प्रो राजेंद्र प्रसाद सिंह बिहार के उन रचनाकारों में शामिल हैं जिन्होंने मुख्यधारा के विपरीत चलकर भी अपना स्थान सुनिश्चित किया है। करीब दो दर्जन पुस्तकों के रचयिता प्रो सिंह ने ही सबसे पहले हिन्दी साहित्य का सलाल्टर्न इतिहास लिखा। यह हिन्दी साहित्य के आकलन का नया तरीका साबित हुआ। उन्होंने मुख्यधारा का हिन्दी साहित्य और उसके समानांतर दलित साहित्य से इतर ओबीसी साहित्य को अवतरित किया। पहली बार उन्होंने हिन्दी साहित्यसर्जकों को बताया कि कबीर और भिखारी ठाकुर ने जो रचनायें रचीं, वे न तो हिन्दी का मुख्य साहित्य है और न ही दलित साहित्य। यह असल में ओबीसी साहित्य है।

प्रो सिंह की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे वर्तमान में दुनिया भर के 95 भाषाओं का एक शब्दकोष बना रहे हैं। उनका कहना है कि भाषा विज्ञानी के रूप में उनका यह कार्य सबसे अनूठा होगा। उनके द्वारा रचित पुस्तकों में राजकमल प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित भाषा का समाजशास्त्र, भारत में नाग परिवार की भाषायें, हिन्दी की लंबी कविताओं का आलोचना पक्ष, भोजपुरी भाषा का व्याकरण और रचना शामिल हैं। इसके अलावा प्रो सिंह ने जानकी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कहानी के सौ साल, सन्मार्ग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हिन्दी पत्रकारिता : एक परिदृश्य और राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित काव्यतारा आदि पुस्तकों का संपादन किया है।

इनके बारे में जेएनयू के शोधार्थी डा अरूण कुमार ने बताया कि प्रो सिंह की मूल खासियत इनकी मौलिकता है। ये अन्य लेखकों या बुद्धिजीवियों के जैसे पूर्व से प्रकाशित तथ्यों के आधार पर नहीं लिखते हैं। बल्कि हर बार वे समाज के बीच रहकर उस पक्ष को दुनिया के सामने लाने का प्रयास करते हैं जो या तो छुट गया है या फिर जानबुझकर छोड़ दिया गया है।

घर त्याग गीताश्री ने रच डाला इतिहास

पटना(अपना बिहार, 15 नवंबर 2013) गीताश्री का जन्मथल मुजफ़्फ़रपुर है। एक सीनियर पत्रकार होने के साथ-साथ उन्होंने अपने लेखनी के जरिए साहित्य जगत में स्त्री विमर्श को नयी परिभाषा दी है। उनकी रचनाओं में स्त्रियां बंधनों के गांठ खोलती हैं, समाज से विद्रोह करती हैं और उमुक्तता की अपनी परिभाषा गढती हैं। सपनों की मंडी उनकी बहुचर्चित किताब है जिसमें उन्होंने तस्करी कर मेट्रो शहरों में पहुंचायी गयी आदिवासी लड़कियों के जीवन का सजीव वर्णन किया है। इसके अलावा 23 लेखिकायें और राजेंद्र यादव नामक पुस्तक लिखकर हंस के संपादक और कालजयी साहित्य सर्जक राजेंद्र यादव की स्त्री विषयक सोच को पूरी दुनिया के सामने रखा। यह साबित करने का प्रयास किया कि अगर भारतीय साहित्य में किसी ने भी स्त्री को केंद्रीय विषय बनाया तो वह केवल राजेंद्र यादव थे।

खैर, गीताश्री की अपनी सफ़लता भी कम दिलचस्प नहीं है। शुरुआत से ही विद्रोही गीताश्री ने घर् को त्याग दिया गयीं। उनके पिता ने इसकी सूचना पुलिस को देने के बजाय देश भर के अखबारों को खंगालने में जुट गये। इसकी वजह यह रही कि वे जानते थे कि गीताश्री जहां कहीं जायेंगी, खामोश नहीं बैठेंगी। यही हुआ भी। घर से भागकर गीताश्री ने सफ़लता के नये कीर्तिमान रचा। वाणी प्रकाशन के मालिक की बेटी अदिति माहेश्वरी का कहना है कि गीताश्री के लिए अलग से किसी प्रकार का विशेषण इस्तेमाल करने की जरुरत नहीं है। वजह यह है कि गीताश्री स्वयं एक विशेषण हैं। उनकी रचनाओं में स्त्री विमर्श महज एक मुद्दा मात्र नहीं है। उनकी रचनाओं में नारी पूरे अधिकार के साथ विचरण करती है और समाज की दकियानुसी परंपराओं को तोड़कर अपने लिये खुद नये मार्ग तलाशती है।

हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े जाने माने पत्रकार धर्मेंद्र सुशांत का कहना है कि गीताश्री आज के रचनाकारों की सूची में वह नाम है जिसने अपने बूते अपनी सफ़लता को सुनिश्चित किया है। उन्होंने बताया कि गीताश्री मूल रुप से घुम-घुमकर अपनी आंखों से देखी हुई बातें लिखने के लिए जानी जाती हैं। वह जहां जाती हैं रचनायें उनकी हमराह होती हैं।

गांधी तानाशाह और जिन्ना धर्मनिरपेक्ष

पटना(अपना बिहार, 15 नवंबर 2013) कल पटना के पुस्तक मेला प्रांगण में प्राख्यात गांधीवादी डा रजी अहमद की पुस्तक भारतीय उपमहाद्वीप की त्रासदी : सत्ता, सांप्रदायिकता और विभाजन को लेकर परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर जाने माने अर्थशास्त्री गंगाधर खान ने यह कहकर नये सवालों को जन्म दे दिया कि असल में महात्मा गांधी तानाशाह थे और जिन्ना जिन्हें भारत-पाक विभाजन का सबसे बड़ा खलनायक कहा जाता है, वे सबसे बड़े धर्म निरपेक्ष थे। उन्होंने कहा कि जब इस देश में सर सैयद अहमद ने अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की तब उन्हें अलगाववादी कहा गया। लेकिन जब पंडित मदन मोहन मालवीय ने बनारस में हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की तो उन्हें महामानव की उपाधि दी गयी। श्री खान ने बताया कि जिन दिनों मुसलमानों को भारतीय राजनीति में हाशिए पर ढकेला जा रहा था तब महात्मा गांधी ने भी मुसलमानों के पक्ष में आवाज उठाने से परहेज किया। यह कांग्रेस की सत्तालोलूपता ही थी जिसने देश को विभाजन के कगार पर ला दिया। अगर कांग्रेस के नेताओं की ओर से मुसलमानों को अधिकार देने की बात मान ली जाती तब विभाजन की नौबत ही नहीं आती।

इस अवसर पर बिहार के जाने माने पत्रकार श्रीकांत ने कहा कि डा रजी अहमद ने अपनी किताब के जरिए जिस दर्द को बयां किया है, वह दरअसल न्याय व्यवस्था के कारण उपजा दर्द है। यह दर्द अतीत में भी कई लोगों ने सहा है और वर्तमान में भी सह रहे हैं। इसका उदाहरण देते हुए श्रीकांत ने कहा कि जब लाखोचक में सैंकड़ों यादवों को जनेऊ आंदोलन के दौरान एक जमींदार शिवाजी सिंह द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया तब उनके खिलाफ़ अंग्रेजी हुकूमत ने कोई कार्रवाई नहीं की। वर्ष 1930 में पटना के मसौढी अनुमंडल के तारेगना स्टेशन पर दिनदहाड़े एक साथ सैंकड़ों मुसलमानों को काटा गया, तब भी न तो अंग्रेजी हुकूमत ने कोई कार्रवाई किया और न ही कांग्रेस के नेताओं ने इसका विरोध किया। वर्तमान में हाल के दिनों में न्यायपालिका ने नरसंहारों से जुड़े पांच मामलों में सभी दोषियों को निर्दोष करार दे दिया है।

परिचर्चा में जाने माने साहित्यकार शफ़ी मसहदी, पत्रकार धर्मेंद्र सुशांत और जदयू के राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी ने भी भाग लिया। इस अवसर पर डा रजी अहमद ने कहा कि उन्होंने मुल्क की बेहतरी के लिए इतिहास का वह सच सामने रखा है जिसे अबतक छुपाने की कोशिश की गयी है। उन्होंने यह भी कहा कि यह देश जितना हिन्दुओं का है उतना ही मुसलमानों का भी है। परिचर्चा का संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी अनीश अंकुर ने किया तथा अतिथियों का स्वागत अदिति महेश्वरी ने किया।

रोज बनती है आलोक धन्वा की दुनिया

पटना(अपना बिहार, 14 नवंबर 2013) जहां नदिया समुद्र से मिलती हैं, वहां मेरा क्या है? मैं नहीं जानता, लेकिन एक दिन जाना है उधर, उस ओर किसी को जाते हुए देखते, कैसी हसरत भड़कती है। अपने काव्यगायिकी से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले राज्य के मुर्धन्य कवि आलोक धन्वा सुप्रसिद्ध कवि नागार्जुन के बाद जनवादी कविताओं के मामले में बिहार के हस्ताक्षर पुरूष माने जाते हैं। खास बात यह है कि आलोक धन्वा ने अपने 4 दशकों के काव्य जीवन में केवल एक कविता संग्रह को प्रकाशित कराया है। वर्ष 1998 में प्रकाशित रोज बनती है दुनिया पुस्तक के रूप में प्रकाशित उनकी एकमात्र कविता संग्रह है। तब इसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया था और तब से लेकर आजतक इसके सात संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। राजकमल प्रकाशन के प्रतिनिधि विजय शर्मा के अनुसार आलोक जी की एकमात्र किताब ही काफी है। उनकी इस एक किताब ने समकालीन रचनाकारों के प्रकाशित अनेक पुस्तकों के मुकाबले कहीं अधिक व्यवसाय किया है।

मुंगेर में जन्में आलोक धन्वा को वामपंथी विचारधारा का कवि होने का सम्मान प्राप्त है। इस संबंध में कहानीकार रत्नेश्वर सिंह का मानना है कि आलोक जी एक काव्यगायिकी के सरताज हैं। लोगों को उनकी कवितायें पढ़ने से अधिक सुनने में आनंद आता है। स्वयं आलोक जी भी कविताओं को मुक्त रखने के हिमायती रहे हैं। श्री सिंह ने कहा कि यह इसलिए भी दिलचस्प है कि आलोक जी की कवितायें तुकान्त नहीं होती हैं और इस कारण उन्हें संगीतमयी सुरों में लयबद्ध नहीं किया जा सकता है। लेकिन आलोक जी की अपनी कविताओं को पढ़ने की अपनी शैली है और लोगों को यह पसंद आया है।

पटना पुस्तक मेले में बिहार के रचनाकार - जिंदा होने का सबूत दे रही हैं जाबिर हुसेन की रचनायें

पटना(अपना बिहार, 13 नवंबर 2013) इस बार पटना के पुस्तक मेले में बिहार के साहित्यकारों की रचनायें भी पाठकों को आकर्षित कर रही हैं। इनमें पूर्व राज्यसभा सांसद व विधान परिषद के पूर्व सभापति जाबिर हुसेन की नवीनतम रचना जिंदा होने का सबूत भी शामिल हैं। श्री हुसेन की खासियत यह है कि वे न केवल परिपक्व और सुलझे हुए राजनेता के रूप में मशहूर हैं बल्कि बतौर साहित्यकार भी उन्हें समान रूप से प्रसिद्धी प्राप्त है।

अपनी नवीनतम पुस्तक जिंदा होने का सबूत में श्री हुसेन ने वर्तमान में राजनीतिक गिरावट और उथल पुथल के दौर में भी लोकतंत्र के जीवित होने के अहसासों की बयां किया है। हालांकि अपनी पुस्तक में उन्होंने साहित्य के जरिए ही सही मौजूदा राजनीति पर करारा प्रहार किया है। इस पुस्तक को प्रकाशित करने वाले राजकमल प्रकाशन के प्रतिनिधि विजय शर्मा ने बताया कि जाबिर साहब की पुस्तक इस बार उन किताबों में शुमार है जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है।

उल्लेखनीय है कि जाबिर हुसेन बिहार की एकमात्र मुकम्मिल साहित्यिक पत्रिका दोआबा के संपादक के रूप में पूरे देश में स्थापित हैं। इसके अलावा उनकी कई रचनाओं ने देश के हिन्दी साहित्य संसार में बिहार की उपस्थिति को स्थापित किया है। इन रचनाओं में लोंगा, जो आगे है, डोला बीबी का मजार, अतीत का चेहरा, आलोम लाजावा, सुन ऐ कातिब, एक नदी रेत भरी और रेत रेत लहू शामिल है।

बिहार के रचनाकार : धूम मचा रही रत्नेश्वर सिंह की जीत का जादू

पटना(अपना बिहार, 12 नवंबर 2013) लखीसराय जिले के बड़हिया के मूल निवासी रत्नेश्वर सिंह सूबे के उन रचनाकारों में शुमार हैं जिन्होंने कम आयु में ही सफलता का नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इनकी नवीनतम पुस्तक जीत का जादू अब बेस्ट सेलर किताबों की श्रेणी में शामिल हो चुका है। श्री सिंह के अनुसार यह पुस्तक उन किताबों में शामिल हो चुकी है जिसे मूल रूप से हिन्दी में लिखी गयी और बाद में इसे अंग्रेजी में अनुवादित किया जा रहा है। यह पुस्तक इसी वर्ष मार्च महीने में बाजार में आयी और अब यह प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तकों में शामिल हो गयी है। पटना के गांधी मैदान में चल रहे पुस्तक मेले में भी यह पुस्तक सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तकों में एक है।

श्री सिंह के अनुसार साहित्य के क्षेत्र में उन्हें पहचान वर्ष 1988 में मिली जब उनकी कहानी मैं जयचंद नहीं प्रकाशित हुई। बाद में दो वर्षों के बाद इनकी पहली कहानी संग्रह दिशा प्रकाशित हुई। उन्होंने बताया कि अबतक उनकी सोलह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। श्री संह ने बताया कि वर्तमान में वे अपनी नयी किताब मीडिया लाइव लिख रहे हैं। इस किताब के जरिए वे इलेक्ट्रानिक मीडिया की कार्यप्रणाली के संबंध में जानकारी देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी यह पुस्तक अगले साल फरवरी में दिल्ली में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में लोकार्पित की जाएगी।

बहरहाल, रत्नेश्वर सिंह उन रचनाकारों में हैं जिन्होंने साहित्य के साथ-साथ समकालीन निबंध लेखन में भी समानांतर सफलता हासिल किया है। समाचार एक दृष्टि के लिए उन्हें भारत सरकार की ओर से भारतेंदू हरिश्चंद्र पुरस्कार भी दिया गया है। उनके द्वारा लिखित कहानी लेफ्टिनेंट हडसन जिसमें उन्होंने वर्ष 1857 में बिहारी मजदूरों के उपर अंग्रेजों के द्वारा किये गये जुल्म का विवरण पेश किया है, प्रकाशन से पूर्व ही चर्चा का विषय बन चुका है।

इरोम और लालू को समर्पित नवल की एक कविता

दोस्तों, इरोम चानू शर्मिला पिछले 13 वर्षों से भारतीय सेना की निगाहेबानी में भूख हड़ताल कर रही हैं। वह आर्म्स फ़ोर्सेस स्पेशल एक्ट का विरोध कर रही हैं। उनका यह आंदोलन मणिपुर में मनोरमा देवी कांड के बाद शुरु हुआ, जिसमें भारतीय सैनिकों ने हैवानियत की सारी सीमायें पार कर दिया था। उधर बिहार में दलितों और पिछड़ों के महानायक लालू प्रसाद सामंती ताकतों और पक्षपाती न्यायिक व्यवस्था के कारण जेल में हैं। इन दोनों ने दलितों और वंचितों के अधिकारों को लेकर अबतक संघर्ष किया है। आज की कविता इन दोनों के समर्थन में है। - नवल किशोर कुमार

इरोम और लालू का अस्तित्व

तुम अभी नहीं स्वीकार कर सकते

वह सब जो तुम्हारी आंखों के सामने

रोज घटित हो रहा है

तुम्हारे कान सुन रहे हैं जो गर्जना

तुम अभी चाहो तो नजरअंदाज कर सकते हो

गांडीव थामे अर्जुन का शव देख

अपने महान आर्य वंश पर नाज कर सकते हो

अपना रक्तरंजित इतिहास पढकर

तुम चाहो तो अब भी अपनी वीरता के कारनामे

जबरदस्ती हमें पढने को मजबूर कर सकते हो

तुम चाहो तो वंदे मातरम या जय हिन्द न कहने पर

हमारा सिर कलम करवा सकते हो

आखिर सेना तुम्हारी है

और आज का वर्तमान भी तुम्हारा ही है

लेकिन हमेशा वैसा ही होगा

जो अबतक होता आया है

यह जरुरी नहीं

कोई एकलव्य अब अपना अंगुठा काटेगा

या फ़िर कोई शम्बूक चुपचाप मनुवेदी पर बलि चढ जाएगा

अगर तुम समझते हो कि

अब भी वैसा ही होगा जैसा

तुम्हारे इतिहास के पन्नों में दर्ज है

तो यह तुम्हारी भूल होगी

फ़टने वाले हैं तुम्हारे कानों के परदे

आंखें फ़ाड़ देखते रह जायेंगे तुम्हारे देवी-देवता

तुम्हारा इतिहास तुम्हारे सामने ही नेस्तनाबुद हो जाएगा

अभी तो तुमने एक इरोम और

एक आम्बेदकर और ज्योतिबा को देखा है

एक लालू के सामने अपना सिर नवाया है

धैर्य रखो और इत्मिनान से जी लो अंतिम दिन अपने

बहुत जल्द तुम्हारा अस्तित्व मिटने वाला है।

श्रद्धांजलि : बाबा अभी भी मुस्करा रहे हैं

- नवल किशोर कुमार

दोस्तों, आज बाबा नागार्जुन यानी बैद्यनाथ मिश्र की पांचवीं पुण्यतिथि है। आज से ठीक पांच वर्ष पहले बाबा ने अपनी माटी को अलविदा कहा था। सादा जीवन और रचनायें ऐसी कि सारा भारत उनके अल्फ़ाज में जी भरकर सांसें लेता। कभी उनके शब्द बालक भारत की घुच्ची सी आंखों का सुनहरा भविष्य बताते तो कभी वरूण के बेटों के घर में पिछवाड़े में सेंध लगा झांकते। कभी कभार तो उनके शब्द ऐसे होते कि सामने वाले का कलेजा फ़ट जाय। बाबा की खासियत यही थी कि उनके शब्द कभी विचलित नहीं होते। उनके शब्दों का मतलब भी कभी एक जैसा नहीं रहा। ठीक वैसे ही जैसे बाबा के अनेक रुप हैं। उनका व्यक्तित्व कभी नामरूपी संज्ञा के आसरे नहीं रहा। बाबा ने जब चाहा, जैसा चाहा और अपनी मर्जी से संज्ञाओं को धारण किया। यह उनकी महानता ही थी कि वे ब्राहम्ण कुल के होने के बावजूद कभी ब्राहम्ण नहीं रहे। उनकी लेखनी ने सबसे अधिक वार किया तो वह था ब्राह्म्णवाद। बाबा इंसान को हमेशा इंसान मानते थे। न कोई छोटा और न कोई बड़ा। न कोई अमीर न कोई गरीब और न कोई बुद्धिमान न कोई बेवकूफ़। उनकी नजरों में सब एक जैसा। बिल्कुल वैसे ही जैसे सूरज की रोशनी सभी पर एक जैसे पड़ती है।

बात बहुत पहले की है। अखबार पढने का बहुत शौक रहा करता था उन दिनों। देश-दुनिया की खबरों के जरिए खुद को इस दुनिया का हिस्सा समझने का भ्रम पालने का मेरा प्रयास तब सर चढकर बोलता था। बाबा से जुड़ाव का कारण भी मेरा यही जुनून रहा। वर्ष 1993-94 में जब मैं 7वीं कक्षा का विद्यार्थी रहा होऊंगा। एक अखबार के पन्ने पर बाबा की कविता छपी थी। वही मेरा पहला जुड़ाव था। बाद के दिनों में अपनी कोर्स की किताबों के साथ-साथ बाबा मेरे जीवन का अहम हिस्सा थे। कुछ और लोग तब मेरे जीवन में महत्वपूर्ण थे। मसलन प्रेमचंद और महादेवी वर्मा की कहानियां और उपन्यास और नामवर सिंह की आलोचनायें। सब पढा करता था। राजेंद्र यादव जी का हंस तब मेरी आदत में शुमार न था। वजह यह कि तब मैं स्वयं को एक पाठक महसूस करता था। हंस की कहानियां सोचने पर मजबूर करती थीं। लेकिन तबतक मैं बिहार को नहीं समझ सका था फ़िर भारत तो मेरे लिए दूर की बात थी।

कई लोगों ने मुझे बताया और बाद में मैंने स्वयं इस बात को महसूस किया कि बाबा की रचनाओं में पक्षपात जैसी कुछ बात तो है। लेकिन हर बाबा की रचना इन घुच्ची सी आंखों में और वरूण के बेटे ने मुझे बाबा से जोड़े रखा। उनके साथ मेरी अंतिम बातचीत 2003 में हुई थी। तब पटना में डा कुमार विमल ने बाबा से मेरा परिचय कराया था। माथे पर मुरेठा, खिचड़ी सी उजली दाढी और एक झोला लिए बाबा को देख तब मन ने यही कहा था कि जनकवि की छवि इससे बेहतर और क्या हो सकती है। वैसे बाबा ने अपने बारे में खुद ही लिखा था।

 

मेरा क्षुद्र व्यक्तित्व,

रुद्ध है, सीमित है

आटा-दाल-लकड़ी-नमक के जुगाड़ में,

पत्नी और पुत्र में,

सेठ के हुकुम में,

कलम ही मेरा हल है, कुदाल है,

बहुत बुरा हाल है

 

वह तो बाबा थे, जो इतनी साफ़गोई से अपनी कह जाते थे। वर्ना कोई और होता तो न जाने कितनी उपमाओं का बोध करा जाता। बाबा की सरलता कैसी थी, उसे जानने के लिये किसी फ़ोटो युक्त साक्ष्य की आवश्यकता नहीं, केवल उनके शब्द ही काफ़ी हैं। अब जरा इन पंक्तियों को देखिये।

 

कहो कि कैसे झुठ बोलना सीखूं और सिखलाऊं,

कहो कि अच्छा-ही-अच्छा सब कुछ कैसे दिखलाऊं,

कहो कि कैसे सरकंडे से स्वर्ण किरण लिख लाऊं,

तुम्ही बताओ मीत कि मैं कैसे अमरित बरसाऊं।

 

मेरे हिसाब से बाबा न तो कम्युनिस्ट थे और न ही समाजवादी। वे तो मानववादी थे। इंसानियत के पुजारी। इसलिये आजीवन लड़ते रहे। समाज की बूरी परंपराओं से लड़ते थे। वे उन शासकों से भी लड़ते थे, जो शासन के नाम पर गरीबों का खून चुसते थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि बाबा जो उस वक्त लिखते थे, आज सब सच हो रहा है। एक बानगी आप स्वयं देखें। हालांकि इस सच्चाई को जान लेना आवश्यक है कि पिछले 8 सालों से सूबे में जो लोग शासक बने बैठे है, स्वयं को सबसे ईमानदार कहकर न्याय के साथ विकास का ढोल पीटते हैं। बाबा ने बहुत पहले ही आज के वर्तमान की एक सच्ची तस्वीर प्र्स्तुत किया था। बाबा ने बहुत पहले ही लिखा था

 

मरो भूख से, फ़ौरन आ धमकेगा धानेदार

लिखवा लेगा घरवालों से वह तो था बीमार

अगर भूख की बातों से तुम कर न सके इन्कार

फ़िर तो खायेंगे घरवाले हाकिम से फ़टकार

ले भागेगी जीप लाश को सात समुंदर पार

अंग अंग की चीड़-फ़ाड़ होगी फ़िर बारंबार

मरी भूख को मारेंगे फ़िर सर्जन के औजार

जो चाहेगी लिखवा लेगी डाक्टर से सरकार।

 

बाबा कितने स्पष्टवादी थे, इसकी व्याख्या शब्दों में नहीं की जा सकती है। उनके शब्द और भावों की गूढता अतुलनीय थी। बड़ी-बड़ी बातें वे युं कह जाते थे मानों वे सोयी हुई आत्माओं को हौले से बिना उन्हें हिलाये-डुलाये जगा रहे हों। और सदियों जंजीरो में कैद आत्मायें अचानक से उनकी आवाज सुन उठ जाती थीं। जरा इस कविता को देखिये। इसके शब्द अतुलनीय हैं।

 

यह तो नई-नई दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो

एक बात कह दूं मलका, थोड़ी सी लाज उधार लो

बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उधार लो

जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

रफ़ू करेंगे फ़टे-पुराने जाल की!

यही हुई है राय जवाहर लाल की!

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

 

बाबा को किसी परिमिति में नहीं बांधा जा सकता। वे असीमित थे। उनकी सहृदयता विशाल थी। उनका व्यक्तित्व, उनकी सादगी, उनका तेज और उनकी कविताओं के शब्द सब के सब प्रेरणादायी हैं। अफ़सोस यह कि बाबा के शब्दों से निकली चिंगारी अनवरत जल रही है, लेकिन वैश्वीकरण के मेघों ने भ्रष्टाचार रुपी जल की इतनी वर्षा कर दी है, कि बाबा की लगाई आग थोड़ी मंद पड़ गई है। नतीजा हमारे सामने है। जमीन बेचे जा रहे हैं और आसमानों की भी दलाली हो रही है। कभी आजादी का संदेश देने वाले अखबार आजकल शासकों के इशारे पर गुलामी का संदेश दे रहे हैं और हम हिंदवासी मजबूर हैं। परंतु, यह भी एक सच्चाई है कि काले मेघों की उम्र इतनी अधिक नहीं, न ही उसके जलधार में इतना जल प्रवाह है कि वह भारत के बुनियाद को हिला सके। तभी तो बाबा के शब्द आज भी जीवित हैं और ध्यान से देखो तो बाबा अभी भी मुस्करा रहे हैं।

कहानी - सांस लेने वाली परछाइयां

- नवल किशोर कुमार

मधु, मधु। मेरी बात सुनो। मैं दो दिनों के लिए पटना जा रहा हूं। वहां युथ हास्टल में रहूंगा। किसी को कुछ भी बताने की जरुरत नहीं है। कोई पूछे तो कह देना कि मैं कोलकाता गया हूं माल खरीदने। तीन-चार दिनों में आऊंगा।

लेकिन तुम पटना क्यों जाना चाहते हो। जबकि तुम जानते हो कि वहां पापा होंगे और कोई न कोई तुम्हारे बारे में उन्हें बता ही देगा। मत जाओ। यही रहो। प्लीज। तुम्हें नहीं पता है। जब तुम जाते हो तो यह घर काटने को दौड़ता है। बाहर झांकने से भी डर सा लगता है।

मेरी जान, घबराओ मत। मैं एक अच्छे काम के लिए जा रहा हूं। वहां पापा की खरीदी हुई एक प्रोपर्टी है। उसकी अच्छी कीमत मिल रही है। उसे बेचकर यही मुजफ़्फ़रपुर में ही एक छोटा सा घर बना लेंगे। वैसे भी पटना से जो मुझे चाहिए था, वह तो मुझे मिल ही चुका है।

मतलब! तुम्हें क्या मिल गया है पटना से? मधु ने राममनोहर से पूछा।

अरी पगली, पटना में मुझे तुम मिली और तुम मेरी जिंदगी हो। अब पटना ने जिंदगी तो दे ही दिया न। इससे अधिक और क्या चाहिए मुझे। यह कहते हुए राममनोहर ने मधु के होंठों को चुम लिया। मधु ने खुद को छुड़ाने का अभिनय करते हुए कहा। चलो, छोड़ो। सब केवल बनाने की बातें हैं। लेकिन मैं कह रही हूं न। तुम नहीं जाओगे तो नहीं जाओगे। वैसे भी बाबूजी की खरीदी हुई जमीन है। तुम्हें उसे बेचने की ज्ररुरत क्या है। अभी जमीन का भाव आसमान छू रहा है। यहां रहने के लिए गांव में घर है न। और अभी तो हम केवल एक ही हैं। फ़िर किसी और चीज की जरुरत क्यों। मधु ने अपने पति देवता के हाथों को सहलाते हुए कहा।

ओह। क्या हुआ? मधु ने पूछा।

राममनोहर इससे पहले कि कुछ कहता दरवाजे के बाहर किसी के आने की आहट सुनाई दी। दोनों अलग-अलग हो चुके थे।

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राम अवधेश बाबू बिहार सरकार के एक आला पदाधिकारी हैं। भुमिहार जाति के हैं इसलिए आजकल पूरे सचिवालय में उनकी रौब भी है। रौब की एक वजह यह भी है कि सत्ता के शिखर तक उनकी डायरेक्ट पहूंच है। लेकिन पिछले दो महीनों से बेचारे परेशान से रहते हैं। बोलते बतियाते तो पहले के जैसे ही हैं। लेकिन आजकल बदल से गये हैं। लोग तरह-तरह की बातें करते हैं। मुंह पर कोई कुछ नहीं कहता। सब पीठ पीछे कहते हैं। और पढाइये बेटी को। भाग गयी न कुजात के जोरे।

राम अवधेश बाबू सब जानते हैं। वैसे भी वे जिस कुर्सी पर बैठे हैं वहां केवल दीवारों के ही कान नहीं बल्कि कुर्सियों की आंखें भी होती हैं। लेकिन मन मसोसकर रह जाते हैं। सोचते हैं कि जब अपनी बेटी ने लाज नहीं रखा तो दुनिया वाले तो बोलेंगे ही। इतना क्या कम है कि कोई मुंह पर बोलने की हिम्मत नहीं करता। लेकिन पीठ पीछे तो करते हैं सब स्साले।

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राम मनोहर, एक बात कहूं। हां बोलो। नहीं पहले वादा करो कि मेरा कहा मानोगे। मधु ने राममनोहर के कठोर से लगने वाले बाहों को चूमते हुए कहा।

हां पक्का मेरी जान्। मैं तुम्हारा कहा मानूंगा। वैसे भी इस पोज में तुमसे ना कहने की गुस्ताखी कैसे कर सकता हूं। राम मनोहर ने कहा।

अरे नहीं। मैं सीरियस हूं। मैं चाहती हूं कि क्यों न हमें एक बच्चे की प्लानिंग कर लेनी चाहिए। अच्छा लगेगा। वैसे भी शादी के पहले मां और तुम्हारे कारण दो बार मुझे सूर्या क्लीनिक जाना पड़ा था। अब तो हम पति पत्नी हैं और फ़िर घर में एक बच्चे की जरुरत भी है। जब तुम दुकान जाओगे तब वह मेरा दिल लगाया करेगा। मधु ने राम मनोहर के हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा।

जान, मुझे कोई प्रोब्लेम नहीं है। लेकिन सोचता हूं कि पहले दुकान जम जाये और फ़िर तुम्हारे पापा का गुस्सा शांत हो जाये तब प्लान करेंगे। खजुराहो जाकर। जानती हो वहां जाकर सेक्स करने पर सर्वोत्तम संतान की प्राप्ति होती है। राम मनोहर ने कहा।

अच्छा! अब तुमसे यह किसने कह दिया? मधु ने अपनी बाहें राममनोहर के गले में डालते हुए कहा।

अरे वही तुम्हारे पापा के मित्र वे उमानाथ अंकल हैं न। वही कह रहे थे तुम्हारे पापा से उस दिन्। मैं उनके बगल से गुजर रहा था। वे कह रहे थे कि हर तीर्थ का अपना महत्व होता है। जैसे काशी का जीवन की मुक्ति और हरिद्वार का संबंध शांति से है। गया का संबंध पूर्वजों से है। वैसे ही खजुराहो का महत्व संतानोत्पत्ति से जुड़ा है। राममनोहर ने मधु के हुक खोलते हुए कहा।

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सुशांत सिंह विधायक नहीं गुंडा है साला। उसे ऐसा वैसा मत समझो मेरे भाई। उसने जमीन मांगी है तो दे दो। मीनाबाजार में बजाजी दुकान चलाने वाले मधेश्वर यादव ने राम मनोहर से कहा।

हां यार। मैं भी यही सोच रहा हूं। मैंने फ़ोन कर दिया है। उसका एक आदमी कल मुजफ़्फ़रपुर आयेगा। मैंने तो सोच लिया है कि चाहे जो कीमत मिले जमीन बेच ही दूंगा। यहां दुकान है ही। फ़िर कौन मुसीबत मोल लेने जाए इन गुंडों से। सरकार का मुखिया तक उसके आगे खड़े-खड़े कर देता है। राम मनोहर ने कहा। लेकिन यार, रेट बहुत कम दे रहा है। बोरिंग रोड इलाके में 4 कट्ठा जमीन है। डेढ करोड़ के हिसाब से कम से कम 6 करोड़ बनता है। लेकिन साला खाली 2 करोड़ देने की बात कर रहा है। गुंडा है इसलिए मैं तैयार भी हूं और वो मधु के पापा भी तो उसी के साथ हैं। वे तो सीधे सीधे मुझसे मधु का बदला ले रहे हैं।

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पुरुषोत्तम पांडेय राम अवधेश बाबू का चपरासी है। इस बात का उसे खूब गुमान है। हर फ़ाइल पर उसका कमीशन भी बंधा हुआ है। 10 परसेंट आफ़िशियल और बाहर बंगाली के रसगुल्ला और पकौड़े का खर्चा अलग से। उस दिन पुरुषोत्तम पांडेय ने राम अवधेश से अकेले में कहा था। भूल जाइये बेटी को। जितना याद रखिएगा, उतना ही दिल भारी होगा। अब आप भी एक वियाह कर लिजीये। अभी उमर क्या हुई है। 48-49 में जिंदगी थोड़े न खतम हो जाता है और वैसे भी बिटिया की जिम्मेवारी तो अब है भी नहीं।

एक बारगी तो राम अवधेश बाबू भी सोच में पड़ गये थे उस दिन्। बोले कुछ भी बन रहा था। लेकिन इस उमर में शादी। दुनिया क्या कहेगी? पहले बेटी और अब बाप ने। नहीं पुरुषोत्तम। ई ठीक नहीं होगा। तुम नहीं जानते बड़ी हंसारत होगी। राम अवधेश बाबू ने नोटों की गड्डी अपने दराज से अपने सुटकेस में डालते हुए कहा।

लेकिन सर, जिंदगी कैसे जियेंगे आप और फ़िर इतना पैसा क्या करेंगे आप? सर, गीता में भी लिखा है। गृहस्थ जीवन सबसे अच्छा जीवन है। अच्छा आप कहिए तो मैं आपकी बात चलाऊं। पुरुषोत्तम की इस बात का जवाब नहीं दिया राम अवधेश बाबू ने।

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मधु घर में अकेले थी। उसने अपना मोबाइल देखा। पापा का मैसेज अब भी सेव करके रखा है उसने। हैप्पी बर्थ डे बेटा।

उसकी आंखें सजल हो गयीं। फ़िर हाथों ने दिमाग का आदेश सुने बिना काल बटन दबा दिया। ओम भ्रुर्भुर्व स का मंत्र लंबी देर तक बजता रहा। जब कोई आवाज नहीं मिला तो उसने मोबाइल को दूर रखकर सोचने बिस्तर पर लेट गयी। फ़िर कलर टीवी पर बिग बास देखने लगी। यह प्रत्युषा तो बिल्कुल पहचान में ही नहीं आती है। कहां वह आनंदी और कहां यह प्रत्युषा। समझ में नहीं आता यह असली या फ़िर वह असली। लेकिन एक बात है। आनंदी का स्टाइल कितना अच्छा है।

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बाबू, हमरा एही सब कुछ हे। अब कैसहूं एकर बियाह हो जाये त हम गंगा नहा लीं। दानापुर के बड़का मंदिर में पुजारी शंकर ओझा ने पुरुषोत्तम पांडेय ने कहा।

हां हां बाबा काहे घबरा रहे हैं आप। कहिएगा तो आपको पैसा वगैरह भी मिल जाएगा। फ़िर चल जाइएगा आराम से बेगूसराय। पुरुषोत्तम ने कहा।

आप कह रहे हैं तो ठीक ही होगा। आजकल ब्राह्म्ण समाज की यही हालत हो गयी है। खेत जमीन तो है नहीं कि खेत बेचकर बेटी के अच्छा घर में बियाह करें। ई तो एसपी साहब के कृपा है कि मंदिर का पुजारी हूं। लेकिन यहां से कमाई भी नहीं होती। इसलिए तो बालटी में दीया लेकर पूरा दानापुर बाजार घुमता हूं। तब जाकर घर में दो वक्त खाना नसीब हो पाता है।

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घर में दोपहर में बिन बच्चे की औरत को समय काटने दौड़ता है। मन करे भी तो क्या करे। मधु का मन भी कुछ करना चाह रहा था। लेकिन क्या करे। बिजली गये हुए भी दो घंटा से अधिक समय बीत चुका है। जाने कब बिजली आएगी। पलंग पर लेटकर अपने पापा के बारे में सोचने लगी। कितने अच्छे थे उसके पापा। कालेज तक तो सब ठीक ठाक ही था।

क्या बिगड़ जाता पापा का अगर राममनोहर को मान लेते। साथ मे रहते तो कम से कम बेटी होने का कर्ज तो चुका देती। और नहीं कुछ होता तो कम से कम घर का खाना तो उनको मिलता। मां के बाद तो बेचारे कभी घर में खाना खा ही नहीं सके।

उसके मन में भी आया कि पापा शादी कर लें तो कितना अच्छा हो। ठीक है सौतेली मां होगी, लेकिन इससे उसे क्या। उसे तो केवल अपना राम मनोहर चाहिए। धन संपत्ति से क्या लेना देना। जितना है उससे जिंदगी अभी पीढियों की भी कट जाएगी।

सोचते-सोचते मधु सो गयी। जब आंख खुली तो घड़ी के तीनों टांग एक सीध में खड़े थे। बारह बज गया था। उसने अभी नहाया भी नहीं है और दोपहर में राम मनोहर आने वाले हैं।

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अवधेश बाबू पुरुषोत्तम चपरासी की बात समझ चुके थे। उन्हें दानापुर के बड़का मंदिर के पुजारी बेटी भा गयी थी। फ़ोटो मे ही दिख रहा था। थोड़ा खा लेगी तो ठीक हो जाएगी। अब भी कोई कम थोड़े न है। सोचकर अवधेश बाबू का मन हरियर हो रहा था। उन्होंने पुरुषोत्तम को कहा कि आज ही चलो मिल आते हैं पुजारी जी से। देखें तो ई फ़ोटो वाली असलियत में कैसी है।

पुरुषोत्तम बोला सर आप कहां जाइयेगा। आप कहिए तो आज डेरा पर लेके आते हैं। वहीं देख लिजीयेगा। और कया। वहां जाइयेगा तो लोग दस गो सवाल करेंगे। और आपको तो सब कोई जानता है। मीडिया से लेके सिपाही तक।

हां, तुमने यह बात ठीक कही। यह लो कुछ पैसे जाकर पुजारी को दे देना। कुछ बढिया से कपड़े में लेकर आये अपनी बेटी को। लेकिन देखना ई बात किसी और को जानकारी नहीं मिलनी चाहिए। समझ गये न?

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राम मनोहर का मन उचटा था। उसने आगे बढने की बात तो कह दी थी लेकिन सुशांत सिंहवा एकदम पकका भुमिहार है साला। कहीं बुरा न मान ले। लेकिन फ़िर विश्वास हुआ कि उसकी जमीन खरीदे बगैर उसका नक्सा जमीन पर उतरवे नहीं करेगा।

अपने कमरे में बैठा-बैठा यही सब सोच रहा था। मधु आ गयी। उसे देख राम मनोहर का दिल मुस्कराया। सचमुच कमाल की है मधु। खुली जुल्फ़ों में तो उसका कोई मुकाबला ही नहीं कर सकता।

क्या सोच रहे हो। चलो खाना खा लो। सोचने का काम बाद में कर लेना। मुझे भी भूख लगी है। मधु ने कहा। लेकिन राम मनोहर तो ठान चुका था। उसने जिद की तो मधु भी भूख भुल गयी। थोड़ी देर के बाद तुफ़ान थम चुका था।

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पुजारी खुश था। खाली देखने के लिए 10 हजार। कोई दे सकता है क्या। फ़िर उसने बेटी को 2 हजार रुपए देते हुए कहा कि जाओ जाकर श्रृंगार पेटार सब ले आओ और एगो सुंदर साड़ी ले लेना। आज तुम्हें कहीं ले जाना है। जाओ बाजार जाओ। (क्रमशः जारी)

कहानी दुर्गी छिनार नहीं रही

(दोस्तों, मैं माफ़ी चाहता हूं सभी सुधि पाठकों से क्योंकि महिलाओं के लिए ऐसे शब्दों का इसतेमाल जनजीवन में किये जाते हैं, मैंने कुछ शब्दों का इस्तेमाल सकारात्मक अर्थों में किया है। फ़िर भी अगर आप में से किसी को मेरा यह प्रयोग बुरा लगे तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं। साहित्यिक क्षेत्र में ये शब्द बहुत पहले से स्वीकृत हो चुके हैं। लेकिन मैं कोई दलील नही दे रहा। - नवल)

दुर्गी सचमुच पूरे गांव की दुर्गा है। तीखे नैन नक्श, उन्न्त उरोज और मांसल बाहें कुदरत का दिया सब कुछ तो है उसके पास। नहीं है तो केवल वह जिसके साथ बियाह के बाद वह भोजपुर से मगध के इस गांव में आयी थी। दुर्गी किसी को कुछ नहीं कहती न ही रोना रोती है। पूछने पर अपने हाथ में पड़े घट्ठे दिखाते हुए कहती है कि मरद नहीं है तो का हुआ, हम हैं। कोई निस्तनिया हमरा हाथ लगा के त दिखाये। अक्सर गांव के पुरबारी टोला के भुमिहार के लौंडे ताना मारते हैं। दुर्गी हसिया दिखाकर नपुंसक बना देने वाली गाली देती है।

सुबह् से लेकर रात तक खटना और जीना यही तो कहानी है दुर्गी की। वैसे दुर्गी की कहानी यही नहीं है कि उसका मरद परदेश में है। दो साल पहले वह आरा के इटारहा के ब्रह्मबाबा के पास गयी थी। जाते समय बखोरापुर की काली माई का आशीर्वाद भी लिया था दुर्गी ने। इटाहरा के ब्रह्मबाबा ने कहा था उसका मरद एक दिन जरुर लौटेगा। वहीं ब्रहमबाबा के पेड़ के पास सिंदूर चढाने के बाद भर मांग लगाकर लौटी थी दुर्गी। तब बगल वाले नारायण चमार की मां ने उसे ताना भी मारा था।

का हे रमेशवा बहु, बाबा कुछ कहलथुन कि कहिया ले लौटतव तोर दुलहवा। दुर्गी ने कुछ नहीं कहा चुपचाप अपने घर चली गयी। ऐसे मौकों पर दुर्गी किसी से कुछ भी नहीं कहती। का जाने किसी की नजर लग जाये। वैसे भी ई जीवन में उसे कुछ तो मिला नहीं। फ़िर भी जिए जा रही है बेचारी। लेकिन दुर्गी खुद को बेचारी नहीं मानती।

और वो माने भी क्यों। आखिर धर्मनाथ मिसिर की पोती और आरा के जाने माने पंडित सिद्धेश्वर मिसिर की बेटी इतनी जल्दी हार माने भी तो क्यों और कैसे। उसे आज भी याद है जब उसने रमेश यादव को पहली बार देखा था। सांवला सा रंग बिल्कुल रामचंदर या फ़िर किशन भगवान के जैसन। सिद्धनाथ मिसिर ने उसे अपने घर में नौकरी दी थी। जहां जाते रमेश को साथ ले जाते। खूब मेहनत करता था रमेश। पंडित जी भी खूब खुश रहते।

रमेश की खासियत थी। जब कोई काम न होता, पंडित जी के घर के बाहर बथानी में पड़ा रहता। एक बार तो दुर्गी ने उसे गौमाता के साथ बात करते पकड़ लिया था। वह कोई बिरहा गा रहा था और जवाब में गौमाता भी उसका साथ दे रही थी। उस दिन पहली बार रमेश ने दुर्गी को देखा था। एकदम सचमुच की मिस्टर इंडिया वाली श्रीदेवी के जैसी लग रही थी दुर्गी। बाद में मैट्रिक की परीक्षा के दौरान रमेश ने दुर्गी की खूब मदद की। दुर्गी का मौसेरा भाई चिट बनाता और रमेश उसे पहूंचाने स्कूल की चाहरदीवारी छड़पता। यही से शुरु हुई दुर्गी और रमेश की प्रेम कहानी।

दुर्गी को आज भी याद है वह दिन जब पहली बार उसने रमेश को छुआ था। उस दिन भुमिहार टोले के लोगों से सिद्धेश्वर मिसिर की भिड़ंत हो गयी थी। मामला जमीन का था। लाठी पैना भी खूब चला था। मिसिर जी को तो कुछ नहीं हुआ रमेश जख्मी हो गया था। बाहर बथानी में सोया था माथा में मुरेठा बांध के। दुर्गी तब उसके पास पहूंची थी। बोली, दवाई ले लिए हो कि नहीं। रमेश ने कहा कि नहीं लेकिन सब ठीक हो जाएगा। हाथ से खून बह रहा था। दुर्गी तब दौड़कर घर के अंदर गयी और नाखून पालिश ले आयी। नाखून पालिश का रंग रमेश के बदन पर खिल रहा था। तब पहली बार रमेश ने दुर्गी का हाथ हौले से दबाया था।

दुर्गी तब खूब घुमक्कड़ थी। उसने जिद ठान ली थी कि इस बार पूजा करने आरणय मंदिर ही जाएगी। मिसिर जी और मिसिराइन समझाकर हार गये तब उन्होंने रमेश के साथ जाने की इजाजत दी। वही आरण्य देवी से दुर्गी ने रमेश को मांग लिया और जब लौटी तो पूरे गांव में बवाल मच गया।

अरे सुनते हो मिसिर जी की बेटी ने रमेशवा से बियाह कर लिया। कौन रमेशवा? अरे वही कोईलवर के रामधनी गोप के बेटवा। आजकत मिसिर जी के यहां बेगारी करता है। बेगारी करते-करते बेटिये को पटा लिया। मिसिर जी को पहले ही खबर मिल चुकी थी। गांव की सीमा पर खड़े हो गये दोनाली बंदूक लेकर। गांव के भुमिहारों के लड़के भी बड़े ताव में थी। साली पंडिताइन होके गोवार से कैसे बियाह कर लेगी। भुमिहार-बाभन में ओकरा मन लाइक कोई नहीं मिला।

दुर्गी जानती थी कि ऐसा ही कुछ होने वाला है। इसलिए रमेश के साथ सीधे वह पटना आयी और फ़िर रमेश के घर गयी। रमेश के परिवार में केवल बाबूजी थे। पहले एमसीसी के साथ थे, लेकिन रमेश को उससे कोई मतलब नहीं होता था। रामधनी गोप बहु को देखकर खुश हुए और घर के दरवाजे पर चार नाल बंदूक खड़ी कर दी। दुर्गी को अब भी याद है अकेले उसके ससुर ने 100 राऊंड फ़ायरिंग की थी तब जाकर उसका घर बसा था। पति के साथ सेज सुख उठाते-उठाते दुर्गी दो बार गर्भवती भी हुई। लेकिन किस्मत को मंजूर नहीं था। पहली बार 4 महीना और दूसरी बार तो डेढ महीने में ही धुलैया कराना पड़ा था। फ़िर इसी बीच रमेश कमाने दिल्ली चला गया। जाना तो दुर्गी भी चाहती थी कि दिल्ली जाये और खूब घुमे। रमेश की भी यही तमन्ना थी। लेकिन तब दुर्गी उम्मीद से थी। इसलिए अकेले जाना मजबूरी ही थी।

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आज दुर्गापूजा है। दुर्गी भी नौ दिनों का व्रत रखती है। कलश स्थापना वाले दिन गणेश पंडित के यहां से कलश और दीया लेकर आयी। बिहटा स्टेशन के पास लगे बाजार से उसने पूजा का समान भी खरीदा और साथ में पकाने के लिए 2 सेर चावल, पाव भर दाल और दस रुपए का करुआ तेल। बाजार से शकरकंद भी लिया था उसने। रास्ते में शिवचंद्र बहु मिल गयी। देखते ही उसने दुर्गी को टोका। दीदी, कोई चिट्ठी पत्री आई दिल्ली से? दुर्गी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह जल्दी से जल्दी घर जाना चाहती थी,

दरवाजे पर गोबर की गंध ताजी थी, लेकिन कुत्तों ने अपने पांव के निशान बना दिया था। दुर्गी के मुंह से निकला मोचकबरा कुत्तवन सब के खाली इहें देखल है। सामान अपनी घर के पूजा वाले कमरे में दुर्गा माता के चरणों में रखकर दुर्गी फ़िर से दरवाजा और आंगन लीपने लगी। पंडित जी आने वाले थे और दुर्गी को अभी मुंह धोना और नहाना बाकी था।

बाबा जी आ गये तब कलश स्थापना का कार्यक्रम शुर हो गया। बगल के भोला गोप, हरलाखी रजक, कायथ टोला वाले श्रीवास्तव जी सब पहूंच चुके थे। दुर्गी भी नहाकर और एकरंगा कपड़ा पहनकर पूजा के लिए तैयार हो गयी थी। लेकिन उसे लाज भी आ रही थी। बिना ब्लाउज और साया के साड़ी पहनना और गांव के बड़े-बुजुर्ग के सामने होने में लाज तो आयेगी ही। फ़िर सोची धर्म का काम है, इसमें कैसी लाज। पूजा के बीच ही भुमिहार टोला के लौंडे आ गये। एक ने दुर्गी की ओर इशारा किया और कहा कि छिनार सब का यही काम है। संयोग ही था कि उस समय पूजा चल रहा था और वहां बैठे लोग चुप रहे।

दुर्गी को इन सबकी आदत हो गयी थी। गाय और भैंस के लिये चारा लाने के दौरान कई बार उसपर आरोप लगे। मिथिलेश यादव के साथ उसकी कहानी आज भी गांव में लोग चटखारे लेकर सुनाते हैं। महिलायें भी कहती है कि गांव के बाहर स्कूल वाले खंडहर में दोनों ने खूब गुलछर्रे उड़ाये। देखो तो कैसी साधुआइन बनी फ़िरती है। साबून से चेहरा चमका लेने से मन के अंदर का मैल थोड़े न साफ़ होता है। जबसे रमेश दिल्ली गया है दुर्गी तो एकदम छिनार हो गयी है।

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कूरियर कंपनी का मालिक फ़ेड्रिक डिसूजा गोवा का होने के बावजूद हिन्दी और बिहार की भोजपुरी अच्छे तरीके से बोल लेता है। रमेश डिसूजा का दाहिना हाथ बन गया है। पगार 8 हजार हर महीने मिल जाती है। उसी में वह 4 हजार अपने उपर खर्च करता है और शेष पैसे वह दुर्गी को भेज देता है। उसे केवल एक बात का मलाल है। दुर्गी दिल्ली नहीं आना चाहती है। जाने क्यों गांव में ही पड़ी रहती है।

पिछले साल सावन में जब रमेश गांव आया था तब गांव वालों ने दुर्गी के त्रिया चरित्र के बारे में खूब बताया था। रमेश का मन खट्टा हो गया था। लेकिन वह दुर्गी से प्यार भी करता है। इसलिए कुछ कह नहीं सकता। घर में माला डी का टेबलेट देख उसका माथा भी ठनका था। लेकिन उसने दुर्गी से कुछ भी नहीं पूछा। रक्षाबंधन के एक दिन बाद अचानक ही रमेश ने थैला लिया और आरा स्टेशन पहूंच गया। रास्ते में गांव के लक्ष्मण सिंह मिल गये तो उनसे कहलवा दिया कि हम दिल्ली वापस जा रहे हैं।

दुर्गी जब घास का गट्ठर लिए घर आयी। उसे विश्वास था कि रमेश आज की रात तो उसके मन की प्यास जरूर मिटायेगा। बहुत दिन हुए उसकी छाती से लगकर सोये हुए। उसकी मुंछें दुर्गी को तकलीफ़ नहीं देती थी। वह तो खुद कहती थी कि जिसके मुंछ नहीं है वह कैसा मरद।

पड़ोस की एतवारी फ़ुआ ने उसे रमेश के चले जाने की सूचना दी। दुर्गी के सारे सपने पल भर में बिखर गये। धम्म से बैठ गयी धरती पर। थोड़ी देर बाद घर के अंदर गयी। खटिया पर जाकर लेट गयी। आंखों से आंसू की धार बह रही थी। सोचने लगी रमेश अब पहले जैसा नहीं रहा। वह चाहे तो मुझे भूल सकता है लेकिन मैं कैसे भूल जाऊं। वही तो मेरी जिंदगी है।

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गांव के मधेसर सिंह सबसे अमीर आदमी थे। पूरे इलाके में उनकी इज्जत थी। दुर्गी भी उन्हें बाप जैसा मानती थी। उस दिन मधेसर सिंह ने दुर्गी को बुलवाया था। मुड़िकटवा पईन के पास वाली जमीन बेच दो। मैं अच्छे पैसे दे दूंगा और फ़िर तुम चाहो तो मैं एक पक्का मकान भी दे सकता हूं। यह कहते कहते मधेसर सिंह उसके करीब आ गये। उसने दुर्गी के कंधे पर हाथ रखकर कहा अगर मंजूर हो तो शाम में चली आना। मेरा बेटा बैरिस्टर है। कागजात बना देगा।

दुर्गी के मन में अफ़सोस हुआ कि वह अपना हंसिया क्यों भूल गयी। अगर होता तो साले की गर्दन काट देती। मन मसोसकर चली गयी। घर जाकर उसने रमेश की तस्वीर से कहा कि जमीन नहीं बेचूंगी। फ़िर चाहे कुछ भी हो जाये।

दीया-बाती की बेला हो रही थी। दुर्गी ने एक ढिबरी बाहर के बथानी में जलाया। तभी मधेसर सिंह आता दिखा। उसका मन जोर से धड़का। अंदर गयी और अपना हंसिया, कुदारी और बरछी निकालकर कमरे में एक जगह छिपा दिया। मधेसर सिंह के साथ कुछ लोग और थे। वे बाहर ही रहे। दुर्गी समझ चुकी थी। मधेसर सिंह जबरदस्ती करेगा। इसलिए पहले से तैयार थी।

गांव में हल्ला हो गया। दुर्गी ने मधेसर सिंह का औजारे काट दिया। थाना के लोग पहूंचे। मधेसर सिंह दुर्गी के कमरे में छटपटा रहा था। दुर्गी एक कोने में हाथ में हंसिया लिये खड़ी थी। दारोगा विश्वजीत सिंह ने दुर्गी से कुछ भी नहीं कहा। मधेसर सिंह को उठाया और अस्पताल भेज दिया।

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मधेसर सिंह के नपूंसक होने की जानकारी रमेश को भी मिल गयी। वह जल्द से जलद अपने घर आना चाहता था। उसके मालिक डिसूजा ने एडवांस देते हुए सलाह दिया कि अपनी वाइफ़ को दिल्ली ले अए। रहने का इंतजाम मैं करवा दूंगा।

पूर्वा एक्सप्रेस में वह जैसे-तैसे चढ गया। पूरी रात जेनरल बोगी के बाथरुम के बाहर बैठा रहा रमेश। सुबह पांच बजे के करीब आरा स्टेशन पर वह उतरा। उसके पैर घर जाना नहीं चाहते थे। सोच रहा था कि वह गांव वालों को क्या मुंह दिखायेगा। पुलिस उससे जाने कैसे-कैसे सवाल करेगी। रास्ते में भुमिहार टोला का नवेन्दू मिल गया। उसी की मोटरसाइकिल पर बैठ वह गांव पहूंचा। जानकारी मिली कि दुर्गी को थाना ले जाया गया है।

रमेश को देख दुर्गी का चेहरा खिल उठा था। उसे विश्वास था कि रमेश उसे यहां से जरुर ले जाएगा। लेकिन दारोगा जिद पर अड़ा था। इसने गांव के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का औजार काटा है, इसकी सजा तो उसे मिलेगी। फ़िर बात हुई कि 20 हजार रुपए दिये जाने पर मामले को दूसरे तरीके से लिखा जा सकता है कि मधेसर सिंह ने पीड़िता के घर मे घुसकर इज्जत लूटने की कोशिश की और बचाव में पीड़िता ने उसका औजार काट लिया। पैसे नहीं दिये जाने की स्थिति में केस पहले से तैयार था। दुर्गी कलंकिनी है। पहले तो मधेसर सिंह को प्यार में फ़ंसाया और फ़िर ब्लैकमेल करने लगी। पैसे नहीं दिये जाने पर उसने उसे हमेशा-हमेशा के लिए नामर्द बना दिया।

रमेश ने बटुआ में देखा तो कुल 4000 रुपए थे। सब निकाल वह दारोगा के पैरों में लोट गया। दुर्गी यह सब अपनी आंखों से देख रही थी। बाद में दारोगा ने दुर्गी को जाने की इजाजत दे दी। दोनों लौट रहे थे। थाना के बाहर एक रिक्शा पर एक साथ। दुर्गी रमेश के हाथो को जोर से पकड़ना चाहती थी वही रमेश मारे शर्म के धरती में धंसा जा रहा था।

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सिधेसर मिसिर भी परेशान थे। दो बेटियों की शादी नहीं हो रही थी। दुर्गी के कारण पूरे इलाके में उनकी नाक पहले ही कट चुकी थी। फ़िर नये मामले के कारण तो वे किसी से आंख मिलाकर बात भी नहीं कर पाते थे। मिस्रिराइन ने तो घर के बाहर निकलना ही बंद कर दिया। दोनों बेटियां सुलक्षणा और सुपर्णा ने भी कालेज जाना छोड़ दिया था। आखिर कितना सुन सकती थी कि इनकी बहन ने एक भुमिहार का औजार काट लिया है।

लेकिन मन ही मन मिसिर जी खुश भी थे। उन्हें गर्व था कि उनकी बेटी ने सचमुच दुर्गा का अवतार लिया है। वे चाहते थे कि दुर्गी घर आकर रहे। रमेश भी रहे। लेकिन फ़िर डरते कि सुलक्षणा और सुपर्णा की शादी कैसे हो पायेगी। इसलिए मन मसोसकर रह गये।

उस दिन पहली बार मिसिर जी ने गांव के दो लौंडों भरपेट मारा। दोनों ने मिसिर जी की बेटी को छेड़ा था। हालांकि बाद में पंचायत में मामला शांत हुआ। लेकिन मिसिर जी ने ठान लिया था कि अब जीवन ऐसे नहीं जिया जा सकता। लोहा को लोहा ही काटता है। भुमिहार सब कुत्ते की पूंछ की तरह हैं। ये कभी नहीं सुधरेंगे। उस दिन पहली बार लाल झंडे के लोग रात में उसके घर आये थे।

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रमेश ने अपना फ़ैसला सुना दिया था। इस बार वह अकेले नहीं जाएगा। मामला शांत होते ही दुर्गी भी दिल्ली जायेगी। घर में माला डी वाली बात का उसने जिक्र तक नहीं किया। दुर्गी दो राहे पर खड़ी थी। घर छोड़ेगी तब भुमिहार टोला के लोग सब जमीन हड़प लेंगे और नहीं गयी तब जीना हराम करते रहेंगे।

दुर्गी ने रमेश से कहा मुझे अपने साथ ले चलो, लेकिन पहले यहां की सारी जमीन संपत्ति बेच दो। इनके रहते घर छोड़ना मुमकिन नहीं है। रमेश को यह सलाह अच्छी लगी। लेकिन सवाल यही था कि उसकी जमीन कौन खरीदेगा।

दुर्गी ने जवाब दिया कि मिथिलेश यादव बड़े पैसा वाला है। वह खरीद लेगा और वह मुंहजोर भी है। भुमिहार टोला के लोग केवल उसी से डरते हैं। मिथिलेश यादव का नाम सुन रमेश का मन खट्टा हो गया था। लेकिन वह दुर्गी पर इल्जाम लगाये भी तो कैसे। कहीं अगर बात झुठ निकली तब दुर्गी क्या सोचेगी। हो सकता है माला डी की गोली उस समय की हो जब शुरु-शुरु में उसने लाकर दिये थे। आखिर उसने भी तो प्यार के लिए अपने मां-बाप और जाति समाज सबको छोड़ा था।

रात में दुर्गी और रमेश एक-दूसरे के साथ थे। दुर्गी के बदन की गर्मी रमेश को मोहित कर रही थी। खटिया बेकार साबित हो रहा था इसलिए दोनों जमीन पर आ गये और फ़िर सारी रात दोनों ने सब भुलाकर एक दूसरे में समाये थे।

सुबह होते ही रमेश मिथिलेश यादव के घर पहूंचा। दुआ सलाम के बाद तय हुआ कि पूरी जमीन और घर के बदले वह 4 लाख रुपए दे सकता है। रमेश जानता था कि जमीन का भाव आसमान छू रहा है और मिथिलेश आधा से अधिक कीमत दे रहा है। दुर्गी को इससे ऐतराज नहीं था। उसका कहना था कि चार लाख रुपए में दिल्ली में रहने के लिए एक मुट्ठी जमीन तो मिल ही जाएगी।

उस दिन आरा कलेट्रीयट में दुर्गी और रमेश दोनों भूमिहीन हो गये थे। पैसे बैंक में जमा हो चुके थे। मिथिलेश यादव ने एक महीने का समय दिया था।

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दुर्गी के हाथ के कुछ बकाये शेष थे। उन्हें चुकाने के बाद दोनों ने तय किया कि अगली पूर्णिमा वाले दिन वे गांव को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ देंगे। इस बीच दोनों ने निर्णय लिया कि दिल्ली जाने से पहले मिसिर जी के घर जाया जाए। फ़िर मालूम नहीं कब मुलाकात हो न हो।

संदूक से चमचम लाल साड़ी, भर हाथ चुड़ी और भर मांग सिंदूर सजा जब दुर्गी रमेश के साथ बाहर निकली तो देखने वालों की आंखें फ़टी की फ़टी रह गयी। गांव से बाहर निकलने पर एक टेम्पो रिजर्व कराया रमेश ने। वह भी पूरे 300 रुपए में। दुर्गी को यह अच्छा नहीं लगा। अगर ऐसे ही पैसे खर्च हो गये तब दिल्ली में जमीन कैसे खरीदा जा सकेगा।

टेम्पो पर सवार हो दुर्गी अपने दुल्हा के साथ पहली बार नैहर जा रही थी। दो सेर सिरनी लिया था रमेश ने अपने ससुराल के लिए। नैहर में नजर पड़ते ही मिसिर जी घर से बाहर निकल गये। मिसिराइन कोने में बैठकर रोने लगी। दुर्गी की आंखों से आंसू बह निकले। लंबे समय के बाद मिसिराइन ने उसे गले लगाया था।

बाहर बथानी में रमेश चौकी पर आंखें मुंद मानों खतरे के टल जाने के सपने देख रहा था। उसकी आंखों के सामने मधेसर का चेहरा और दुर्गी का साहस पीपड़ वाले भूत के जैसे नंगा नाच कर रहा था। थोड़ी देर बाद मिसिर जी आये। रमेश ने पांव छूकर आशीर्वाद लिया जाना चाहा। मिसिर जी भी अपने दामाद को गले लगाना चाहते थे। लेकिन कुजात का ख्याल आते ही रुक गये। सुलक्षणा और सुपर्णा भी बहनोई के साथ ठिठोली करना चाहती थीं, लेकिन शायद इसके लिए मौका अनुकूल नहीं था।

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मधेसर सिंह की नामर्दगी और दुर्गी की वीरता पटना में चर्चा का विष्य बन चुका था। अखबारों ने दुर्गी को दुर्गा का अवतार माना था। टेलीविजन चैनल पर बार-बार खबरें आ रही थीं। दलितों पिछड़ों की राजनीति करने वाले एक नेता ने दुर्गी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन भी किया था। अब तो जागो बहनों नामक संस्था की पूरी टीम दुर्गी से मिलना चाहता था।

उधर दुर्गी इन सबसे बेखबर रमेश की बाहों में थी। दोनों हैरान-परेशान। दुर्गी को लाज भी आ रही थी। पहली बार नैहर में अपने भतार के साथ थी। पता नहीं सुबह मां और बाबूजी के सामने कैसे जाउंगी। फ़िर दिल्ली जाने की चिंता में दोनों ने पलक तक नहीं झपकाया।

अहले सुबह मिसिर जी ने रमेश को समझाया। देखो मेरी बेटी ने तुमसे बियाह कर जो किया है उसका दंश हम झेल रहे हैं। सुलक्षणा और सुपर्णा के लिए वर ढुंढना मुश्किल हो गया है। अब मधेसर सिंह की घटना से पूरा समाज थू-थू कर रहा है। तुम ही बताओ मैं क्या करूं। तुम दोनों घर छोड़कर चले जाओ। वर्ना इस उमर में जाति समाज से अलग होकर नहीं जी सकता। मेरे पास कुछ रुपए हैं। उन्हें रखो।

दरवाजे की ओट से दुर्गी तब सब सुन रही थी। उसने वहीं से कहा कि बाबू पैसा रहने दिजीये। हम लोग चले जायेंगे। रमेश तब खामोश ही रहा। फ़िर थोड़ी देर बाद दुर्गी दरवाजे के बाहर खड़ी थी। रमेश के हाथों में हाथ डाले सबके सामने। मिसिर जी और मिसिराइन सहित पूरा गांव देख रहा था। गांव की औरतें बोल रही थीं कुजात आदमी से बियाह के बाद सचमुच छिनार हो गयी है दुर्गी। अब उसे तो तनिक भी लाज नहीं आती।

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घर और जमीन की राजिस्ट्री हो चुकी थी। दुर्गी और रमेश कल की सुबह हमेशा-हमेशा के लिए गांव छोड़कर चले जायेंगे। भुमिहार टोले में कई लड़के बात कर रहे थे। मधेसर बाबू का बदला कैसे लिया जाय। कल तो वह छिनार चली जाएगी। आज की रात ही धावा बोलना होगा। मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र भी खूब ताव में था। वह अपने घर दोनाली बंदूक ले आया। कोई कट्टा तो कोई भाला। कुल 9 लोग थे। योजना यह थी कि दुर्गी के सामने ही उसके भतार के पिछवाड़े गोली मारेंगे। फ़िर बाद में योजना यह बनी कि पहले उस छिनार को मजा चखायेंगे।

सब निकल पड़े। गांव का पूल पार करने के समय ही गांव की महिलाओं ने उन्हें देख लिया। वे सब शौच के लिये पईन पर आयी थीं। चन्द्रदीप यादव की मेहरारु लगभग दौड़ते हुए दुर्गी के घर गयी। रमेश ने हिम्मत से काम लिया। मिथिलेश यादव और उसके अन्य साथी भी गांव की सड़क पर हरवे हथियार से लैस खड़े थे। मिथिलेश ने रमेश को कहा कि तु लोग गांव से चल जा। हमनी सब देख लेम उ ससुरन के। दुर्गी भी यही चाहती थी लेकिन रमेश के माथे पर तो खून सवार था।

गांव में हड़कंप मचा था। भुमिहार टोले के लौंडों को इस बात का गुमान था कि हथियार केवल उनके पास ही हैं और कोई मारे डर के बोलेगा नहीं। इसलिए गांव की सीमा में पहूंचते ही सबने राम इकबाल पासी की दुकान पर बैठकर पहले दारू पिया और फ़िर पैसे मांगने पर राम इकबाल के सामने ही दो फ़ायरिंग किया। राम इकबाल कुछ न बोल सका। मन तो उसका कर रहा था कि गला हसूलिये से उतार दें साले की। लेकिन सब संख्या में 20 से अधिक थे।

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उधर दुर्गी अपना सामान बांध रही थी। उसे जल्दी थी। बहुत दिनों के बाद उसने रमेश को फ़िर से पाया था। वह उसे खोना नहीं चाहती थी। लेकिन रमेश गांव वालों के साथ मैदान में कूद चुका था। सामने से भुमिहार टोले के हमलावर आते दिखायी दिये। पहली फ़ायरिंग भुमिहारों ने किया। जवाब में रमेश ने एक साथ 4-4 हवाई फ़ायरिंग की। भुमिहार सहम गये। तबतक गांव के दलित टोले के लोगों ने गांव को घेर लिया था।

आवाज आयी, मारो स्सालों को। गोलियां चलने लगीं। मिथिलेश यादव ने 3 को मौत के घाट उतारा था वही रमेश ने भी 2 लोगों को गोली मारी थी। इस लड़ाई में यादव टोला का एक नौजवान भी मारा गया। थोड़ी ही देर में लाशों का ढेर लग गया था। दलित टोले के 4 लोगों को गोलियां लगी थीं, लेकिन वे जिंदा थे। दो भुमिहार भी जीवित ही थे। यादवों ने योजना बनायी कि सबको मार दिया जाय और लाशों को यही पईन में पत्थर बांध कर बहा दिया जाय।

लेकिन ऐसा नहीं हो सका। दारोगा विश्वजीत सिंह पूरे पलटन के साथ गांव में आ चुका था। पूरे इलाके में खबर आग की तरह फ़ैली कि यादवों ने एक साथ 18 भुमिहारों को मार गिराया है। खबर मिलते ही आरा से पुलिस की पांच गाड़ियां पहूंच गयीं। फ़िर अगले दिन प्राथमिकी दर्ज करायी गयी। एक प्राथमिकी मधेसर सिंह की पत्नी की ओर से तो दूसरी प्राथमिकी दुर्गी ने कराया था।

मामले को लेकर राजनीति उफ़ान पर थी। प्रदेश के बड़े-बड़े भुमिहार और दलितों एव पिछड़ों के नेता गांव पहूंचे। दुर्गी रमेश के बगैर फ़िर अकेली हो गयी थी। मधेसर सिंह की जोरु ने उसे मुख्य अभियुक्त बनाया था। मिथिलेश सिंह भी जेल में था। पूरा यादव टोला खाली पड़ा था।

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अनहोनी की संभावना को देख सिधेसर मिसिर बेटी को लाने पहूंचे। बहुत समझाया दुर्गी को लेकिन वह नहीं मानी। कहने लगी कि अब तो यहां मेरी अर्थी ही जाएगी। गांव वालों ने भी खूब समझाया॥ लेकिन सब बेकार। चन्द्रदीप यादव की पत्नी ने लाज त्यागते हुए मिसिर जी के सामने कहा कि कनिया अभी चल जा, जब समय ठीक होई त फ़िर चल अईह। मिसिर जी ने भी कहा कि अब हम तुम्हें कोई ताना नहीं देंगे। तुम हमारी बेटी हो, तुम्हारा यहां रहना ठीक नहीं है।

दुर्गी को नहीं जाना था, वह नहीं गयी। वह अपने घर में हसिया, बरछी और रमेश के बाबू जी की बंदूक हमेशा अपने साथ रखती थी। वह हर शाम तूफ़ान के आने का इंतजार करती और फ़िर जागी आंखों में सारी रात गुजार देती।

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उस दिन रात करीब साढे ग्यारह बजे किसी ने दुर्गी का दरवाजा खटखटाया। दुर्गी ने कोठा पर चढकर देखा। कुछ पुलिस वाले खड़े थे। उपर से ही बोली क्या बात है? आप लोग इतनी रात क्यों आये हैं? दारोगा विश्वजीत सिंह ने आवाज दिया कि दरवाजा खोलो। हमें जानकारी मिली है कि तुम्हारे घर में उग्रवादी छुपे बैठे हैं। दुर्गी ने कहा कि यहां उसके अलावा कोई और नहीं है। मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी।

विश्वजीत सिंह के कहने पर पुलिस वालों दुर्गी के घर का दरवाजा तोड़ डाला। इससे पहले कि दुर्गी कुछ करती विश्वजीत सिंह ने उसे पकड़ लिया और जबरन जीप में डाल दिया। थाना में उसे एक कमरे में रखा गया। थोड़ी देर बाद विश्वजीत सिंह और मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र सिंह कमरे में दाखिल हुए। दुर्गी ने विरोध किया। लेकिन भूखे लोमड़ियों का मुकाबला वह अकेले कैसे कर पाती।

सुबह-सुबह उसे छोड़ दिया गया। घर गयी। किसी से कुछ नहीं कहा। दिन भर पड़ी रही और रात के खौफ़नाक मंजय को याद करती रही। कहां एक ये भुमिहार और ब्राह्म्ण जो कहते हैं नारी को देवी शक्ति मानते हैं और दूसरी ओर उसकी इज्जत भी लूटते हैं। इन सबसे अच्छे तो दलित और पिछड़े हैं जो कम से कम अपनी मां-बेटियों की इज्जत करना तो जानते हैं।

दो दिनों बाद दारोगा विश्वजीत सिंह फ़िर दुर्गी के घर पहूंचा। इस बार दुर्गी ने कोई विरोध नहीं किया। दारोगा भी खुश था। उसे अपनी मर्दानगी पर नाज हो रहा था। स्साली एक बार में ही दीवानी हो गयी है। दुर्गी कमरे में एक मचिया पर बैठ गयी। दारोगा उसे बाहों में जकड़ना चाहता था। दुर्गी ने भी उसे मना नहीं किया और न ही कोई विरोध। दारोगा दुर्गी के उपर था और तभी दुर्गी ने हसिये से वार किया। दारोगा का गर्दन आधे पर लटक गया। फ़िर दुर्गी ने उसके गर्दन को पूरी तरह से अलग किया।

दुर्गी हाथ में दारोगा का सिर लिए चली जा रही थी। गांव वाले बदहवास थे। भुमिहार टोले के लोग भी खामोश। इस बार किसी ने भी नहीं कहा, दुर्गी छिनार जा रही है

फादर कामिल बुल्के का अपमान

पटना (अपना बिहार, 19 सितंबर 2013) - राज्य सरकार ने बिहार के दत्तक पुत्र रहे फादर कामिल बुल्के का अपमान किया है। अपमान इस मायने में कि पूर्व में पटना स्थित बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी में उनकी स्मृति में एक सभागार का निर्माण किया गया था, अब राज्य सरकार ने इस सभागार का नामकरण फणीश्वर नाथ रेणु कर दिया है। हालांकि इस संबंध में बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी के निदेशक व शिक्षा विभाग में उच्च शिक्षा के निदेशक सीताराम सिंह का कहना है कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि अकादमी में फादर कामिल बुल्के की स्मृति में कोई सभागार था।

अपना बिहार के साथ बातचीत में श्री सिंह ने बताया कि जबसे उन्होंने अकादमी का जिम्मा संभाला है, उसके पहले से ही अकादमी में फणीश्वर नाथ रेणु सभागार है। श्री सिंह ने यह भी कहा कि अब अंग्रेज चले गए हैं, इसलिए उन्हें अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। जबकि फणीश्वरनाथ रेणु बिहार के सबसे लोकप्रिय साहित्यकार थे। उनके कारण देश-विदेश में बिहार का नाम है। उन्होंने यह सवाल भी खड़ा किया कि अगर बिहार सरकार रेणु को सम्मानित कर रही है तो इसमें गलत क्या है।

बताते चलें कि फादर कामिल बुल्के मूल रूप से बेल्ज्यिम के निवासी थे। वे 1935 में बिहार आये और यही के होकर रह गये। उन्होंने हिन्दी के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 26 जनवरी 1950 को भारतीय नागरिकता प्रदान किया। वहीं बिहार सरकार ने उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का सदस्य बनाया। उनकी हत्या संयुक्त बिहार के सिमडेगा में एक सांप्रदायिक दंगे के दौरान कर दी गयी थी।

इस संबंध में प्राख्यात साहित्यकार श्रीकांत व्यास ने कहा कि फादर कामिल बुल्के विदेशी होने के बावजूद वे बिहार के दत्तक पुत्र थे। उन्होंने आजीवन हिन्दी की सेवा की। उनके द्वारा बनाया गया अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोष आज भी एक मानक है। इसके अलावा उन्होंने रामायण एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। श्री व्यास ने कहा कि सरकार को अगर फणीश्वरनाथ रेणु को सम्मानित ही करना है तो रेणु की स्मृति में वह नये बहुमंजिली इमारत बनवाये। पूर्व से बने हुए संरचनाओं को रेणु के नाम करने से महापुरूषों का अपमान होता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार रेणु के नाम पर संस्थाओं का नामकरण केवल इसलिए कर रही है क्योंकि फणीश्वरनाथ रेणु जाति के कुर्मी थे।

वहीं इस संबंध में प्रसिद्ध गांधीवादी डा रजी अहमद ने कहा कि फादर कामिल बुल्के ने हिन्दी की जितनी सेवा की, वह एक उदाहरण ही है। उनका नाम हटाकर सभागार का नाम फणीश्वरनाथ रेणु के नाम पर करना एक निंदनीय कदम है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को इस निर्णय पर फिर से विचार करना चाहिए। इस प्रकार के कदम से नयी पीढी में गलत संदेश जाएगा।

बहरहाल, बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी में सभागार का नामकरण फादर कामिल बुल्के के बदले फणीश्वरनाथ रेणु किये जाने के मामले में अकादमी में मौजूद पदाधिकारी कुछ भी कहने से इनकार करते हैं। सभी का यही कहना है कि ऐसा उपर से आये आदेश के तहत किया गया है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब फणीश्वर नाथ रेणु के नाम पर किसी संस्थान का नामकरण किया गया है। स्थानीय छज्जुबाग स्थित हिन्दी भवन जिसका निर्माण तत्कालीन राज्यसभा सांसद जाबिर हुसेन के एमपी फंड से कराया गया था उसका नामकरण भी नीतीश स्रकार ने फणीश्वर नाथ रेणु के नाम पर किया था।

ब्राह्म्णवादी व्यवस्था के विरोध का प्रतीक है हिन्दी

यह लेख श्रद्धांजलि है बिहार के प्रखर साहित्यकार व समालोचक डा कुमार विमल को। इस लेख में लिखे गये विचार मूल रुप से उनके हैं, जो उन्होंने अपने जीवन काल में मुझसे साझा किया था नवल किशोर कुमार

दोस्तों, आर्यों की धरती पर हिंदी का विकास इस बात का सबूत है कि इस देश में ब्राह्म्णवादी शक्तियां कमजोर हो रही हैं। हिंदी से पहले इस देश के बुद्धिजीवी संस्कृत जैसी जटिल भाषा का इस्तेमाल करते थे। यह वह कालखंड था जब वेद सुनने पर शुद्रों के कानों में गर्म शीशा घोलकर डाल देने की प्रथा थी। जाहिर तौर पर संस्कृत आमजनों की भाषा कभी नहीं रही होगी। कहने का आशय यह कि शुद्रों की अपनी भाषा रही होगी, जिसका अबतक विस्तार और विकास ही आज हिंदी है।

असल में हिंदी को समझने के लिए भारत की सामाजिक व्यवस्था के भूत, वर्तमान और भविष्य को समझने की आवश्यकता है। दूसरे देशों से आये हमलावरों ने जब यहां शासन करना शुरु किया तब भाषा के रुप में उनके पास सबसे बेहतर विकल्प वह था जो शुद्र बोला करते थे। वह संस्कृत से कम जटिल था और सबसे अधिक बोला जाता है। वजह यह कि उस समय भी बहुसंख्यक आबादी मूलनिवासी शुद्रों की थी। शासकों द्वारा उपयोग किये जाने पर ब्राह्म्णों को अपनी भाषा के विलुप्त होने का खतरा नजर आया। तब उन्होंने अपनी भाषा के प्रति उदारता लाते हुए शुद्रों के शब्दों को भी विष वमन के जैसे ही सही स्वीकार किया। अतीत पर नजर डालें तो हिंदी के विकास के क्रम में ब्राह्म्णों की यह मजबूरी समझ में आती है।

किशोरावस्था के दौरान कई बार यह सवाल जेहन में आया कि आखिर क्या वजह रही होगी तुलसीदास के सामने रामायण को अवधी में सृजित करने की। यह गुत्थी बहुत बाद में सुलझी। असल में मुगलों का शासन आते-आते ब्राह्म्णों की अपनी भाषा केवल पूजा-पाठ की भाषा बनकर रह गयी थी। समाज में संस्कृत बोलने वाले गिने-चुने लोग रह गये थे। यह वह समय भी था जब भारत में धर्मांतरण के जरिए बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम को स्वीकार किया था। अपने धर्म को बचाने के लिए ब्राह्म्णों ने अपनी भाषा की कुर्बानी दी। इसका असर हुआ। तुलसीदास का रामायण बहुत पोपुलर हुआ और इसने हिन्दू धर्म को नेस्तनाबुद होने से बचाया। आज भी इसका असर देखा जा सकता है।

खैर, वर्तमान में हिन्दी अब बाजार की भाषा बन गयी है। यह सत्ता की भाषा पहले ही बन चुकी है। जो लोग यह कहकर अपनी भड़ास मिटाते हैं कि हिन्दी अब बाजार की छिनार या फ़िर दिनों दिन इसका अवमूल्यन होता जा रहा है, वे इस सच से इन्कार करना चाहते हैं कि हिन्दी मजबूत हो रही है क्योंकि भारत में शुद्र मजबूत हो रहे हैं। बाजार और सत्ता में उनका प्रभुत्व बढा है। उनके प्रभुत्व के बढने का ही प्रमाण है हिन्दी की बढती लोकप्रियता। अब तो अमेरिका और चीन जैसे महाशक्तिशाली राष्ट्रों को भी हिन्दी का महत्व समझ में आने लगा है।

बहस तलब : कुर्मी रेणु को पढते हुए

- नवल किशोर कुमार

यह एक विवादित विषय है कि लेखकों की जाति होती है या नहीं या फ़िर उन्हें उनकी जातिगत पहचान के साथ संबोधित किया जाय अथवा नहीं। लेकिन इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जाति एक अभीतक एक अभेद्य दीवार के रुप में सामने आयी है। साहित्य जगत में भी इसके अस्तित्व के प्रमाण अबतक मिलते आये हैं। हालांकि उच्च आय वर्ग और उच्च मध्यम आय वर्ग में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं या इन वर्गों के लोगों ने जातिगत अंतर को समाप्त करने का साहस दिखाया है। मैं जब फ़णीश्वरनाथ रेणु को कुर्मी रेणु कहने का साहस कर रहा हूं तो ऐसा कर मैं उनका अपमान नहीं कर रहा। असल में रेणु का साहित्य ही ओबीसी साहित्य के अस्तित्व में आने का पहला प्रमाण है। स्वयं रेणु भी अपनी रचनाओं में इस सच्चाई से इन्कार नहीं करते हैं।

उनकी रचनायें पढने का मौका तब मिला जब भादो की बरसात ने मुझे भिगो दिया और बीमार पड़ गया। दो दिनों तक अपने स्टडी रुम में पड़े-पड़े जो कुछ मिला पढता गया। इसी दौरान मैंने रेणु जी की कई रचनायें पढी। जब मैं उनकी कालजयी रचना मैला आंचल पढ रहा था तब मुझे स्व राम बुझावन सिंह की याद आयी। राम बुझावन बाबू कुर्मी जाति के थे। वे पटना विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष रह चुके थे। इसी पद पर कभी नलिन विलोचन शर्मा भी थे जिन्होंने रेणु जी की रचना को हिंदी साहित्य जगत की सबसे अनूठी रचना करार दिया था। रामबुझावन बाबू को अपने जीवन के अंतिम वर्षों में राष्ट्रभाषा परिषद का अध्यक्ष बनने का अवसर मिला। इस पद से उन्हें मुक्ति मरणोपरांत ही मिली। इस बात को अतिश्योक्ति नहीं कहा जाना चाहिए कि जिस उम्र में रामबुझावन बाबू को आराम करना चाहिए था उस उम्र में राष्ट्रभाषा की जिम्मेवारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केवल इसलिए दे दी कि वे स्वयं भी कुर्मी जाति के हैं।

रामबुझावन बाबू से जब मैं आखिरी बार मिला था तब उन्होंने यह बात मुझसे कही थी। संभवतः यह बात सर्वविदित है कि फ़णीश्वरनाथ रेणु ने अपनी बेटियों की शादी कुर्मी समाज में की। आपातकाल के दौरान रेणु जी भूमिगत हो गये थे और पारिवारिक जिम्मेवारियों से एक तरह से अलग ही हो चुके थे। उन्हीं दिनों उन्होंने रामबुझावन बाबू को अपनी छोटी बेटी की शादी की जिम्मेवारी दे दी। रामबुझावन बाबू ने यह जिम्मेवारी बखूबी निभायी। रेणु जी की बेटी की शादी एक खाते-पीते अच्छे संस्कार वाले कुर्मी परिवार में हुई।

यह प्रसंग इसलिए क्योंकि रेणु जी कुर्मी थे और उन्होंने स्वयं इसकी एक सीमा बांध रखी थी। परिवार के बाहर वे स्वयं को जाति की अवधारणा से अलग रखा था। वे हर बार अपनी जाति छुपाने का प्रयास करते थे। उन्होंने यह प्रयास अपने बेटे के नामकरण के समय भी किया। कहना गलत नहीं होगा कि रेणु जी ने साहित्यजगत में अपनी जात छुपाने की यथाशक्ति चेष्टा की। लेकिन उनकी रचनाओं ने वह सब कह दिया जो वे नहीं कहना चाहते थे। एक प्रसंग है मैला आंचल का।

गाँव में यह खबर बिजली की तरह फैल गई-मलेटरी ने बहरा चेथरू को गिरफ्तार कर लिया है और लोबिनलाल के कुँए से बाल्टी खोलकर ले गए हैं।

यद्यपि 1942 के जन-आन्दोलन के समय इस गाँव में न तो फौजियों का कोई उत्पात हुआ था और न आन्दोलन के समय इस गाँव तक पहुँच पाई थी।... किन्तु जिले-भर की घटनाओं की खबर अफवाहों के रूप में यहाँ तक आकर जरूर पहुँची थी। ....मोगलाही टीशन पर गोरा सिपाही एक मोदी की बेटी को उठाकर ले गए। इसी को लेकर सिख और गोरे सिपाहियों में लड़ाई हो गई, गोली चल गई। ढोलबाजा में पूरे गाँव को घेरकर आग लगा दी गई,

एक बच्चा नहीं निकल सका। मुसहरू के ससुर ने अपनी आँखों से देखा था- ठीक आग में भूनी गई मछलियों की तरह लोगों की लाशें महीनों पड़ी रहीं, कौआ भी नहीं खा सकता था; मलेटरी का पहरा था। मुसहरू के ससुर का भतीजा फारबिन का खानसामा है; वह झूठ बोलेगा ? पूरे चार साल के बाद अब इस गाँव की बारी आई है। दुहाई माँ काली माँ काली ! दुहाई बाबा लरसिंह !

रेणु जी इस मामले में अनोखे हैं क्योंकि उन्होंने अपनी इस कालजयी रचना में स्पष्ट तौर पर स्वीकार करते हैं कि वह समाज जिसे हम अपना कहते हैं, एक नहीं है। वह कई जातियों में बंटा है। जातियों के हिसाब से ही संसाधनों और संस्कृतियों का बंटवारा भी होता है। मैला आंचल का ही एक प्रसंग यह भी देखिये।

यह सब गुअरटोली के बलिया की बदौलत हो रहा है।

बिरंचीदास ने हिम्मत से काम लिया; आँगन से निकलकर चारों ओर देखा और मालिकटोला की ओर दौड़ा। मालिक तहसीलदार विश्वनाथप्रसाद भी सुनकर घबड़ा गए, लोबिन बाल्टी कहाँ से लाया था ? जरूर चोरी की बाल्टी होगी ! साले सब चोरी करेंगे। और गाँव को बदनाम करेंगे।

मालिकटोले से यह खबर राजपूतटोली पहुँची-कायस्थटोली के विश्वनाथप्रसाद और ततमाटोली के बिरंची को मलेटरी के सिपाही पकड़कर ले गए हैं। ठाकुर रामकिशन सिंह बोले, इस बार तहसीलदारी का मजा निकलेगा। जरूर जमींदार लगान वसूल कर खा गया है। अब बड़े-घर की हवा खाएँगे बच्चू !

यादवटोली के लोगों ने खबर सुनते ही बलिया उर्फ बालदेव को गिरफ्तार कर लिया। भागने न पाए ! रस्सी से बाँधी ! पहले ही कहा था कि यह एक दिन सारे गाँव को बँधवाएगा।

ओबीसी होने के कारण समाज में शोषण झेल झुके फ़णीश्वरनाथ रेणु ने इस बात को अच्छे से समझ लिया था कि जातिवाद के बंधनों को तोड़े बगैर समाज प्रगतिशील नहीं बन सकता और न ही इसके लिए किसी भी प्रकार के हिंसात्मक आंदोलन की दरकार है। रेणु जी के साहस का एक अंश यह भी देखिए।

तहसीलदार विश्वनाथप्रसाद एक सेर घी, पाँच सेर बासमती चावल और एक खस्सी लेकर डरते हुए मलेटरीवालों को डाली पहुँचाने चले, बिरंची को साथ ले लिया। बोले, हिसाब लगाकर देख लो, पूरे पचास रुपए का सामान है। यह रुपया एक हफ्ता के अन्दर ही अपने टोले और लेबिन के टोले से वसूल कर जमा कर देना। तुम लोगों के चलते...।

तहसीलदार साहब फिर एक बार सलाम करके बैठ गए। बिरंची हाथ जोड़े खड़ा रहा। राजपूतटोली के रामकिरपालसिंह जब कोठी के बगीचे में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि बगीचे के पच्छिमवाली जमीन की पैमाइश हो रही है; कुछ लोग जरीब की कड़ी खींच रहे हैं, टोपावाले एक साहब तहसीलदार साहब से हँस-हँसकर बातचीत कर रहे हैं।

असल में रेणु जी ने मैला आंचल के बहाने समाज का वह सच सामने लाने की कोशिश की थी जिसे वे आजीवन झेलते रहे। उनकी मशहूर कहानी मारे गये गुलफ़ाम में भी यह बात सामने आती है। कहानी का नायक हीरामन एक शूद्र के रुप में समाज की सारी सच्चाईयों को कहता नजर आता है। दुर्भाग्य यह है कि आजीवन जिस पहचान के संकट से रेणु जुझते रहे उसीसे उन्हें मरणोपरांत भी जुझना पड़ रहा है। आज भी उन्हें एक मुक्क्मल साहित्यकार मानने में तथाकथित महान साहित्यकारों और आलोचकों की जान निकलती है।

अरूण दास जी की कविता

मैं खड़ा हूं

अपने कांपते कमजोर पैरों पर

शोलों व सर्द ह्वाओं में

खुबसूरत कालीन के गर्द गुबारों में

मैं वहां खड़ा हूं

जहां मजबूत व सधे कदमों से

जान में उसे भी डर लगा

जिसे दुनिया विकास कहती है।

सबने कह रखा है

तुम अधबोले हो

कि तुम अधनंगे हो

तुम्हारे लिए योजना दर योजना बन रही है

सभा दर सभा हो रही है

कानून दर कानून बन रहे हैं

तुम प्रतीक्षा करो

अपने विकास के लिए प्रतीक्षा करो।

सदिया गुजर गयीं

विकास दर विकास गुजर गये

सभा दर सभा गुजर गयी

कानून दर कानून गुजर गये

लेकिन मैंने देखा

मैं आज भी वहीं हूं

शोलों व सर्द हवाओं में

खुबसूरत कालीन के गर्द गुबारों में।

तभी मेरे पांव थरथराने लगे

कि वे टूटने लगे

तभी मैंने एक फ़ैसला लिया

अपने विकास के लिए

विकास अधिकारी से मिलता हूं।

विकास अधिकारी से मिला- उसने कहा

शिक्षा अधिकारी से मिलो

शिक्षा अधिकारी से मिला उसने कहा

आवास अधिकारी से मिलो

आवास अधिकारी से मिला- उसने कहा

चिकित्सा अधिकारी से मिलो

सबसे मिला

और यह जाना

कि अधिकारियों के अधिकार में

हैं मेरे तमाम अधिकार

कि उनके सरोकार में है

मेरे लिए बना समाज

और मेरे लिए बना परिवार।

बंधनों के ऐसे तोरण द्वारा

करते हैं मेरा स्वागत

रचते हैं मेरे लिए कवितायें

गाते हैं मेरे लिए बने गीत

नहीं चाहिए स्वागत, फ़ूल, कवितायें और गीत

भूले हुए हैं

ये सब सलीके और रीत

मुझे चाहिए बजट योजनाओं पर पहला अधिकार

खेत खलिहानों पर पहला अधिकार

और चाहिए विकास की खिड़की पर

एक पत्थर फ़ेंकने का मनमौजी पन।

कौन मुझे देगा?

तुम मुझे दोगे?

अपनी बात : हम हैं नये, फ़िर साहित्य लेखन का अंदाज क्यों हो पुराना?

श्रीकांत सौरभ

साथियों, चाहे क्षेत्र कला का हो या... साहित्य का, बाजार में बिकता कंटेंट ही है. कुछ नयेपन की तलाश में कब कौन सी रचना खरीदार के दिल को छू जाए, कौन सा कंटेंट हिट हो जाए, कहना मुश्किल है! लेकिन अहम सवाल यह है कि हिंदी पर आधारित फिल्मों, न्यूज़ चैनलों, अखबारों व गीतों की मांग चरम पर है. फिर, अंग्रेजी की तुलना में हिंदी साहित्य क्यों पिछड़ जाता है? क्या वजह है कि हिंदी भाषी लेखक भी अंग्रेजी में खिलंदड़े तरीके से लिखकर 'बेस्ट सेलर' का ख़िताब पा लेता है. एक सफल किताब से अंग्रेजी लेखक करोड़ों रूपए बटोर लेता है. जबकि कई सारी प्रतिभाएं हिंदी में उम्दा लिखते हुए भी फांका-कस्सी करने को मजबूर हैं. अपना सब कुछ न्योछावर करने के बावजूद भी अपेक्षित सफलता नहीं मिलती देख, उनकी सृजन क्षमता असमय दम तोड़ देती है. हालात ऐसे बन गए है, मानो हिंदी में छपे उपन्यास या कहानी पढ़ना पाठकों की मजबूरी है. जबकि अंग्रेजी की किताबें चाहे उनका कंटेंट उच्छ्रंख्ल ही क्यों ना हो, उन्हें पढ़ना युवाओं के बीच 'पैशन' या 'स्टेटस सिम्बल' बन गया है.

मेरे एक मित्र प्रबंधन में स्नातक कर गुड़गांव के एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं. मैं उनके घर जब भी जाता हूं, वे बड़ी शान से अंग्रेजी की 'बेस्ट सेलर' उपन्यासों को दिखाते हैं. 'ये देखो- सलमान रश्दी का 'मिडनाइटस चिल्ड्रेन', चेतन भगत का 'टू स्टेट्स', 'वन नाईट एट कॉल सेंटर', रोबिन शर्मा का 'द मौंक हू सेल हिज फेरारी'. ... अरे हां, ये वाला तो दिखाया ही नहीं असीम त्रिपाठी का 'वायुपुत्राज', हाल ही में आया है. क्या लिखता है बनारस का यह बंदा, मैं तो इसका फैन ही हो गया हूं.' मैंने पूछा- 'यार, एक बात बताओ हिंदी भाषी लोग भी अंग्रेजी साहित्य में ही मनोरंजन क्यों ढूंढते हैं. जबकि हिंदी लेखकों की इतनी सारी बेजोड़ किताबें बाजार में हैं कि पूरी जिंदगी में भी कोई उन्हें नहीं पढ़ पाए'.

तो उसने छूटते ही कहा- 'भाई, सच कहूं तो मैं अंग्रेजी के नए-नए शब्दों की जानकारी के लिए इस तरह की पुस्तके पढ़ता हूं. क्योंकि जिस दफ्तर में हूं, वहां के सहकर्मियों पर प्रभाव जमाने के लिए जान-बूझकर अंग्रेजी झाड़नी पड़ती है. ' फिर उसने जो कुछ बताया वह निश्चय ही गहन मंथन का विषय बनता है. कहा- 'जहां तक मैं समझता हूं, तीन कारणों से हिंदी प्रदेश के लोग अंग्रेजी की किताबे पढ़ते है. पहले वाले वे हैं जिन्हें अंग्रेजी की अच्छी समझ है, और खुद को एलिट दिखाने व बेड रूम की शोभा बढ़ाने के लिए ऐसी किताबे खरीदते हैं. दूसरा, वे जो मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन व अन्य तकनीकी विषयों के छात्र हैं. और अंग्रेजी भाषा सीखने, इस पर पकड़ बनाने के लिए पढ़ते है. तीसरा, वैसे लोग जिन्हें ना ठीक से हिंदी ही समझ में आती ही ताकि साहित्य का रस्वादन कर सकें, ना ही अंग्रेजी.' कहना चाहूंगा कि तीसरी तरह की पाठकों की संख्या सबसे ज्यादा है, जो महज दिखावे के लिए पढ़ते हैं.

इसके बावजूद भी चंद ऐसे सवाल हैं, जो हर हिंदी भाषी के जेहन में खटकते रहते है- क्या हिंदी में कंटेंट की कमी है, जिससे कि किताबें बाजार में जगह नहीं बना पातीं? या प्रकाशन संस्थानों की उदासीनता व लेखकों के शोषण करने की गंदी लॉबी आदि इसके जिम्मेवार हैं? जिसके तहत नई प्रतिभाओं को घुसने नहीं दिया जाता या उनकी रोयल्टी मार ली जाती है. या फिर साहित्य के मठाधीशों ने विद्वता का लबादा ओढ़ लेखन की भाषा को इतना क्लिष्ट व जटिल बना दिया है, जोकि आम पाठकों के पल्ले नहीं पड़ती. हो सकता इन सभी कारणों के साथ कुछ और भी दुश्वारियां इस राह में हों. कितना आश्चर्य होता यह जानकर कि चाईनीज भाषा में लिखने वाले उपन्यासकार को विश्व का सबसे प्रतिष्ठित 'नोवल पुरस्कार' मिल जाता है. ...और कुछ दुःख भी कि विश्व की तीसरी बड़ी भाषा के रखवैया हम 50 करोड़ हिंदी वाले अभी तक उपेक्षित हैं.

क्या अब वह समय नहीं आ गया है, कि चिड़ियों, परियों, देश की कथा आदि छद्दं नामों से साहित्यिक उड़ान भर रहे, माकानाका की खोल में छुपे इन पंडों की लेखन शैली का भाषाई श्राद्ध करा दिया जाए? हिंदी लेखन में अरसे से चली आ रही भाषाई आडम्बर को दूर करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाई जाए? साथ ही इसे एक नया आयाम देते हुए कंटेंट को इतना सुगम व मनोरंजक बनाया जाए कि सबके जेहन में आसानी से रच-बस जाए? कुछ इस तरह कि विश्व के किसी भी कोने में रह रहा हिंदी भाषी युवक किताब को देखते ही लपक ले. जब अंग्रेजी में यह फंडा चल निकला है तो हिंदी में इसका प्रयोग क्यों नहीं हो? आखिर हम नए ज़माने के कलमची हैं और 'जेन एम' के लिए लिख रहे हैं.

आज के ग्लोबल दौर में पहनावा, खान-पान, बोल-चाल, कहें तो सब कुछ कॉकटेल हो चला है. तो फिर हम क्यों बाबा आदम के समय वाले थीम व भाषा को ढोएं. इतिहास की थोड़ी सी भी जानकारी रखने वाले इस तथ्य से अच्छी तरह मुखातिब होंगे कि जब भारत में 'बौध धर्म' का व्यापक प्रभुत्व बढ़ने लगा तो ब्राह्मणों ने हिन्दू धर्म का अस्तित्व बचाए रखने के लिए इसको बेहद सरल बना दिया. क्योंकि तब वक्त की यही मांग थी. इससे एक बड़ी सीख यह मिलती है कि समय के साथ जो नहीं बदलते वे गुमनामी की अथाह गर्त में खो जाते हैं.

एक बात पर गौर फ़रमाएंगे कि हिंदी लेखन को सरल बनाने की वकालत करने का मेरा मतलब भाषा के सस्तेपन नहीं, बल्कि नएपन से हैं. हिंदी साहित्य को कुछ ऐसा कंटेंट दें जो रोचकता की चाशनी में डूबे होने के साथ-साथ जमीन से भी जुड़ा हो. निरंतर प्रयास करने व नवीनता लाने से ही किसी चीज का ग्लैमर बढ़ता है. सूचना तकनीकी के तौर पर इन्टरनेट व सोशल साइट्स देवनागरी के लिए 'भागीरथी वरदान हैं.' जिनकी बदौलत आनेवाला वक्त हिंदी का ही होगा, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. वह दिन भी दूर नहीं जब पूरे संसार में हिंदी का डंका बजेगा. ...और हम इसके साक्षी बनेंगे.लेखक श्रीकांत सौरभ पूर्वी चंपारण से हैं. वे सरोकारी पत्रकारिता व रचनात्मक लेखन के पक्षधर हैं. यह आलेख उनके ब्लॉग 'मेघवाणी' से साभार है.

ज से जेल, ज से जिजीविषा

आठवीं पास साहित्यकार मनोरंजन व्यापारी से खास बातचीत

नवल किशोर कुमार

आमतौर पर पढ़ाई की शुरूआत ककहरे से होती है। ककहरा यानी क से कबूतर, ख से खरगोश। लेकिन कुछ लोग अपवाद होते हैं। हालांकि हम जिनकी चर्चा कर रहे हैं वे अपवाद यूं ही नहीं बने, इसकी लंबी कहानी है। इन्होंने अपना ककहरा ज से जेल और ज से जिजीविषा से शुरू की। जेल इसलिए कि उन्होंने पढ़ाई जेल में शुरू की। जेल के जिस कमरे में रहते थे, उसी कमरे की खिड़की से सेंट्रल लाइब्रेरी, कोलकाता का परिसर दिखता था। जेल अवधि में ही किताबें पढ़ना सीखा। जेल से बाहर आने पर रिक्शा चलाने लगे। इसी दौरान एक दिन महाश्वेता देवी इनके रिक्शे पर बैठीं और फिर एक छोटे से सवाल ने जीवन की राह आसान कर दी।

सवाल था कि जिजीविषा का मतलब क्या होता है। महाश्वेता देवी अनपढ़ रिक्शाचालक के मुंह से यह शब्द सुनकर चौंकी और जवाब देने के बाद अपनी पत्रिका व्रतिका के लिए लिखने को कहा। जेल से निकलकर रिक्शाचालक, रिक्शाचालक से साहित्यकार और अब ख्यातिलब्ध साहित्यकार एवं एक स्कूल में दिहाड़ी मजदूर के रूप में रोजाना खाना पकाने वाले मनोरंजन व्यापारी मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं और चांडाल जाति से संबंध रखते हैं।

पटना लिटरेचर फेस्टीवल में दलित साहित्य का यथार्थ और स्वरूप विषय पर अपना व्याख्यान देने पटना आये मनोरंजन व्यापारी ने विशेष बातचीत में कहा कि वे लिखते इसलिए हैं कि अब मार नहीं सकते हैं। उन्होंने कहा कि बचपन में पश्चिम बंगाल सरकार ने दंडकारण्य जाने का हुक्म दिया था। पिता ने सरकारी हुक्म नहीं माना तो बचपन चाय की दुकानों पर जुठे बरतन साफ करने में बीता। थोड़ा बड़ा हुआ तो सीपीएम के आंदोलन से जुड़ गया। जुड़ने के पीछे लालसा यह थी कि शायद जीने के लिए कुछ जुगाड़ हो जाय। एकदिन एक मित्र ने सीपीआई एम के बाद दीवार एल जोड़ दिया। दलित होने पर दोष मेरे उपर मढ़ दिया गया। बाद में पुलिस ने नक्सलवादी कहकर जेल भेज दिया और फिर जेल से नये जीवन की शुरूआत हुई, जिसमें मार्गदर्शन महाश्वेता देवी ने किया।

श्री व्यापारी ने बताया कि समाज में अब पहले से अधिक जटिलता है। पहले तो केवल जातिवाद के कारण भेदभाव हुआ करता था, लेकिन अब समाज वर्गों में भी बंट गया है। यह पूछे जाने पर कि इसका विकल्प क्या है, श्री व्यापारी ने कहा कि विकल्प एक नहीं, बल्कि सभी वादों का समुच्चय है। देश में मार्क्सवाद और आम्बेदकरवाद दोनों की आवश्यकता है। यहां तक कि अन्य वादों यथा लोहियावाद और गांधीवाद की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

बहरहाल, श्री व्यापारी बताते हैं कि वे एक सरकारी स्कूल में रसोइया का काम करते हैं। सुबह और शाम में खाना बनाने के बदले उन्हें तीन सौ रुपए रोजाना मिलता है। इस काम से उनका दैनिक खर्च तो निकल जाता है, लेकिन लिखने-पढ़ने का समय नहीं मिलता है। कोई और इंतजाम हो जाय तो वे अपना पूरा समय सिर्फ लिखने के लिए देना चाहते हैं।

तमाशा मेरे आगे : पटना लिटरेचर फ़ेस्टीवल सवालों के घेरे में रहा अन्य

दोस्तों, पटना लिटरेचर फ़ेस्टीवल निजी तौर पर मेरे लिए इसका कोई महत्व नहीं था। महत्व नहीं होने का एक कारण यह कि आयोजन के चार दिन पहले मेरे एक मित्र ने इसके कार्यक्रमों की सूची दे दी थी। सूची में ही आयोजकों का वर्णन था। आयोजकों का नाम देख मन ने पहले ही कहा था कि ब्लैक मनी को व्हाईट बनाने का यह सरकारी जुगाड़ है। फ़िर जब विभिन्न सत्रों के शीर्षक देखा तब एक बात की पुष्टि हो गयी कि सवर्णवाद यहां भी खूब चलेगा। चुंकि अल्पसंख्यक वोटों पर राज्य सरकार की नजर है, इसलिए सवर्ण-मुस्लिम प्रेम का मुजायरा भी किया जाएगा। इन सबके बीच मुझे एक विश्वास था कि नकल ही सही, यह एक नयी शुरुआत है और इसकी सराहना की जानी चाहिए।

पहले दिन तो जो हुआ उसका वर्णन तो आप पढ ही चुके हैं। (जो नहीं पढ सके हैं वे यहां क्लिक करें)। मेरे लिए दूसरा दिन महत्व का था। वजह यह कि सवर्ण बुद्धिजीवी अन्य के लेखन पर चर्चा करने वाले थे। बजाप्ता आयोजकों दूसरे दिन के प्रथम सत्र को अन्य का लेखन : यथार्थ और स्वरुप शीर्षक दे रखा था। मैं यह समझ नहीं पा रहा था कि मुट्ठी भर ये सवर्ण बहुसंख्यक दलितों और पिछड़ों के लिए अन्य शब्द का उपयोग कैसे कर सकते हैं। लेकिन चुंकि वे सवर्ण हैं इसलिए ऐसा कर सकते हैं। सच्चाई से मुंह चुराना सवर्ण बुद्धिजीवियों की परंपरा रही है। ऐसे में बाबा नागार्जुन जैसे कुछ लोग अपवाद भी हुए हैं। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

खैर, दूसरे दिन जैसे ही सभास्थल पर पहूंचा। मंच पर तीन लोग विराजमान थे। जाने माने कथाकार असगर वजाहत, पश्चिम बंगाल के दलित लेखक मनोरंजन व्यापारी और सवर्ण साहित्य के ध्वजवाहक बजरंग बिहारी तिवारी। मनोरंजन व्यापारी के नाम को स्पष्ट कर देना बेहतर है। ये मूलतः चांडाल जाति से आते हैं। बजरंग तिवारी बोल रहे थे। बोल क्या सवाल कर रहे थे मनोरंजन व्यापारी से कि वे अपने दलित साहित्य में पात्रों का चयन कैसे करते हैं।

मनोरंजन व्यापारी ने पहले तो अपना परिचय दिया और बताया कि उनके लेखन की यात्रा कैसे शुरु हुई। उन्होंने बताया कि वे जो लिखते हैं उसके हर किरदार में मैं ही हूं। मैं ही अपनी कहानियों में मजदूर भी हूं। खेतों में काम करने वाला भूमिहीन किसान भी मैं ही हूं। वह जो चोरी के आरोप में जेल जाता है वह भी मैं ही हूं। व्यापारी बोल रहे थे कि साहित्य जगत में चोरी चमारी शब्द का प्रचलन है। जबकि चमार तो एक जाति है और उसका पेशा चमड़े का व्यवसाय है। उसके अस्तित्व को कैसे अपमानित किया जा सकता है। व्यापारी बोल रहे थे कि जब कोई उंची जाति का आदमी पानी पीने पर दलित का हाथ काट लेता है या फ़िर दलितों की बहु बेटियों की अस्मत लूट लेता है तब जी में आता है कि उसका खून कर दूं। लेकिन ऐसा नहीं कर सकता। वजह यह कि अब जेल जाने की उमर नहीं रही। पुलिस की लाठी खाने लायक देह नहीं रहा। मार नहीं सकता इसलिए लिखता हूं।

व्यापारी की बेबाकी ने सभा में मौजूद सभी सवर्णों को खामोश रहने पर मजबूर कर दिया था। बात-बात में ताली बजाने वाली भीड़ पत्थर बन चुकी थी। बाद में बजरंग तिवारी ने उनसे अपनी आत्मकथा इतिवृति चांडाल कथा का अंश सुनाने को कहा। व्यापारी सुनाने लगे। पहले हिंदी में अंश का मतलब सम्झाया और फ़िर बांग्ला में पढकर सुनाया। जब वे बांग्ला में बोल रहे थे तब आयोजकों की ओर से उसका हिन्दी अनुवाद करने के लिए उदय नारायण सिंह को बुलाया गया। लेकिन श्री सिंह रहस्यमयी तरीके से दबे पांव वापिस लौट आये।

बहरहाल, मनोरंजन व्यापारी ने कार्यक्रम में अन्य को सार्थक कर दिया था। सवर्णों की भीड़ में एक मटमैला कुर्ता-पजामा पहने व्यक्ति ने बाह्मणवादी और पूंजीवादी व्यवस्था की चूलें हिला दी थी। बजरंग तिवारी से यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होंने सभा में जानकारी दी कि राजस्थान में एक शोध किया जा रहा है कि ब्राह्म्णों द्वारा शूद्रों को अपमानित करने के लिए कितने अपशब्द इस्तेमाल किये जाते हैं और फ़िर शूद्रों द्वारा ब्राह्म्णों को कैसे अपमानित किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर शुद्रों ने ब्राह्म्णों के लिए अपशब्द बनाए तो ब्राह्म्णों ने भी ऐसे शब्दों का आविष्कार किया है। बजरंग तिवारी के इस कथन के बाद सभास्थल में तालियों की गूंज लंबे समय तक बनी रही। वैसे भी सवर्ण बुद्धिजीवियों के पास अन्य के रुप में मनोरंजन व्यापारी के सवालों का न तो कोई जवाब था और न ही कोई तर्क। कुतर्कों के कारण ही तो उनका साहित्य आज भी अजर-अमर बना हुआ है।

विशेष रिपोर्ट सवर्णी चमचोत्स्व साबित हुआ पटना लिटरेचर फ़ेस्टीवल का पहला दिन

दोस्तों, पटना में इन दिनों एक साथ कई प्रकार के मेले चल रहे हैं। खासकर सरकारी मेलों में जहां एक ओर अलका याज्ञनिक, सोनू निगम और दिलेर मेहंदी जैसे मुंबइया कलाकार बिहारवासियों को सुशासन का संदेश दे रहे हैं। वहीं आम पटनावासियों को भी अपने मनपसंद सितारों को अपनी धरती पर देखने का मौका मिल रहा है। पटना में साहित्य के नामपर एक और फ़ेस्टीवल चल रहा है। देश के अन्य हिस्सों में आयोजित होने लिटरेचल फ़ेस्टीवल के तर्ज पर इसका नाम भी पटना लिटरेचर फ़ेस्टीवल। वैसे मूल बात यह है कि आयोजन के पहले दिन साहित्य उत्सव असल में चमचोत्सव साबित हुआ।

पहले दिन सबसे अधिक चमचागिरी का प्रदर्शन किया मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सांस्कृतिक सलाहकार पवन कुमार वर्मा और गुलजार ने। दोनों एक-दूसरे को सराहते नजर आये। जहां एक ओर गुलजार ने पवन कुमार वर्मा की पुस्तक युद्धिष्ठिर एंड द्रौपदी की सराहना में चमचागिरी के सारे रिकार्ड तोड़ दिये। वही दूसरी ओर श्री वर्मा ने यह जताने की कोशिश की कि मुख्यमंत्री द्वारा उन्हें सांस्कृतिक सलाहकार बनाया जाने से बिहार को सांस्कृतिक पहचान मिलेगी।

बिहार दिवस के अवसर नीतीश सरकार ने गुलजार को अल्पसंख्यक चेहरे के रुप में इस्तेमाल किया। वैसे विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार गुलजार को इसके लिए बिहार सरकार की ओर से 2 करोड़ रुपए की राशि दी गई है। गुलजार ने इसके बदले जमकर नीतीश कुमार की शान में कसीदे पढे। हालांकि इन सबके बावजूद वे अपनी रचनाधर्मिता का अस्तित्व बचाने में कामयाब भी रहे।

पटना लिटरेचर फ़ेस्टीवल सवर्ण बुद्धिजीवियों का जमावड़ा साबित हुआ। फ़िल्मों पर आधारित एक सत्र के दौरान तथाकथित सवर्ण बुद्धिजीवियों ने हिन्दी सिनेमा में हिन्दी भाषी राज्यों की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त करने के बहाने यह रोष प्रकट किया कि आखिर बिहार में लोगों को अपराध ही क्यों नजर आता है। सत्र में भाग लेने वाले फ़िल्मकार संजय चौहान, डा चंद्र प्रकाश द्विवेदी और सुभाष कपूर अपनी-अपनी फ़िल्मों की ब्रांडिंग करते नजर आये। वहीं फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम की यह चिंता नीतीश सरकार के प्रति चमचागिरी का पर्याय साबित हुई कि बदल रहा बिहार फ़िल्मों का विषय क्यों नहीं है? इस सत्र से पहले एक और सत्र का आयोजन हुआ। सत्र का विषय था बोली खड़ी बाजार में। वक्ता में सब सवर्ण ही थे सो सवर्ण हित सर्वोपरि था। भोजपुरी की वकालत अरूणेश निरन और मैथिली की लड़ाई उदय प्रकाश सिंह लड़ रहे थे। अरूणेश ने भोजपुरी के बारे में खुशखबरी देते हुए कहा कि मारीशस सरकार ने भोजपुरी को तीसरे सरकारी भाषा के रुप में स्वीकार कर लिया है। इन्होंने यह भी कहा कि भोजपुरी के सर्वांगीण विकास के लिए शब्दकोष, व्याकरण और इतिहास लेखन का कार्य विश्व भोजपुरी सम्मेलन द्वारा कराया जा रहा है। हालांकि अरूणेश ने भोजपुरी के इतिहास में कबीर और भिखारी ठाकुर के योगदान पर चर्चा में कंजूसी बरतते हुए बाजार को भोजपुरी की बदहाली के लिए जिम्मेवार माना।

वही मैथिली वाले उदय प्रकाश सिन्हा ने यह कहकर अपनी भड़ास और श्रेष्ठता साबित करने का प्रयास किया कि यदि भोजपुरी के पास बाजार की ताकत है तो मैथिली के सरकार की ताकत है। वही इसी सत्र में यह बात भी निकलकर सामने आयी कि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने को लेकर बिहार के साहित्यकारों के विचारों में एकरुपता नहीं है। मैथिली पर चर्चा के दौरान ही यह बात सामने आयी कि आंचलिक भाषाओं में प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि संवाद होना चाहिए।

बहरहाल लिटरेचर फ़ेस्टीवल में जब किस्सागोयी की परंपरा पर विचार विमर्श किया जा रहा था तब मंच पर बैठे असगर वजाहत, निलय उपाध्याय और उषाकिरण खान की साझा सोच रही कि बाजार ने किस्सागोयी की परंपरा को प्रभावित किया। लेकिन बाजार के खिलाफ़ बोलने में अपनी अक्षमता जाहिर की। सब ने स्वीकार किया कि साहित्य के प्रति अपठनीयता बढी है। सत्ता का साहित्य पर असर और इसके कारण आयी अपठनीयता संबंधी मेरे सवाल पर असगर ने इतना जरुर कहा कि साहित्य हमेशा सत्ता का प्रतिरोधी होता है।

गुलजार ने सुनाया, बुढिया रे

पटना(अपना बिहार, 24 मार्च 2013) पटना लिटरेचर फ़ेस्टीवल के पहले दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सांस्कृतिक सलाहकार पवन कुमार वर्मा के विशेष अनुरोध पर देश के प्राख्यात गीतकार गुलजार ने अपनी प्रसिद्ध रचना बुढिया रे सुनाया।

बुढ़िया, तेरे साथ तो मैंने,

जीने की हर शह बाँटी है!

दाना पानी, कपड़ा लत्ता, नींदें और जगराते सारे,

औलादों के जनने से बसने तक, और बिछड़ने तक!

उम्र का हर हिस्सा बाँटा है ----

तेरे साथ जुदाई बाँटी, रूठ, सुलह, तन्हाई भी,

सारी कारस्तानियाँ बाँटी, झूठ भी और सच भी,

मेरे दर्द सहे हैं तूने,

तेरी सारी पीड़ें मेरे पोरों में से गुज़री हैं,

साथ जिये हैं ----

साथ मरें ये कैसे मुमकिन हो सकता है ?

दोनों में से एक को इक दिन,

दूजे को शम्शान पे छोड़ के,

तन्हा वापिस लौटना होगा ।

बुढिया रे!

सरकार करेगी लिटरेचर फेस्टीवल का आयोजन : सीएम

पटना(अपना बिहार, 24 मार्च 2013) अतीत में पटना ज्ञान-विज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र था। अब एक बार फिर से बिहार में आबोहवा बदलने लगी है। पटना में लिटरेचर फेस्टीवल का आयोजना होना इसी का परिचायक है। ये बातें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्थानीय इंदिरा गांधी तारामंडल के सभागार में आयोजित दो दिवसीय पटना लिटरेचर फेस्टीवल के उद्घाटन संबोधन में कहीं। उन्होंने कहा कि साहित्य के विषय पर केंद्रित इस तरह के आयोजन का होना राज्य के हित में है। इससे युवाओं को साहित्य को जानने और समझने में आसानी मिलेगी। श्री कुमार ने यह भी कहा कि इस तरह का आयोजन संस्थागत तरीके कराया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगली बार से राज्य सरकार ऐसा साहित्य उत्सव अपने स्तर पर करायेगी।

इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि बिहार बदल रहा है। पूर्ववर्ती सरकार के कारण पहले बिहार की छवि अच्छी नहीं थी, लेकिन अब पूरे परिदृश्य में बदलाव आया है। अब बिहारवासियों को पूरे देश में सम्मान के साथ देखा जा सकता है। वही इस अवसर पर देश के जाने-माने गीतकार गुलजार ने कहा कि बिहार ऐसे ही आगे बढ़ता रहे। बिहार के लोगों को शुभकामनायें देते हुए गुलजार ने कहा कि बिहार के साथ उनका पुराना रिश्ता रहा है। चाहे वह रामधारी सिंह दिनकर हों या फणीश्वरनाथ रेणु या फिर बाबा नागार्जुन सबने उन्हें प्रभावित किया है।

बिहारवासियों में पाठकता की चर्चा करते हुए श्री गुलजार ने कहा कि देश के किसी भी हिस्से में आयोजित होने वाले पुस्तक मेलों और साहित्य सभाओं में इस तरह की भीड़ नहीं दिखायी देती है। यह इस बात का सबूत है कि बिहारवासियों में पाठकता अभी भी बरकरार है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सांस्कृतिक सलाहकार पवन कुमार वर्मा ने कहा कि बिहार की साहित्यिक विरासत पूरे देश में सर्वमान्य है।

चमनलाल की मौत

विजय कुमार

चमनलाल मर गए। वैसे तो एक दिन उन्हें मरना ही था। हर कोई मर  जाता है । इस फानी दुनिया का और जीवन का यही दस्तूर है , सो जैसे सब एक न एक दिन मर जाते है , वैसे ही वो भी एक दिन मर गए।  वैसे कोई ख़ास बात तो नहीं थी उनके मरने में | वो एक औसत और आम आदमी थे। उन्होंने एक औसत और आम आदमी की  तरह ही  जीवन जिया और करीब 80 साल की  उम्र में मर गए। वैसे शायद उनकी  उम्र 65  की  ही थी  | लेकिन अपने जीवन की कठिनाईयों की  वजह से वो समय से पहले ही बूढ़े दिखते  थे। सच कहा जाए तो  जब वो 40 -45 के थे तब ही वो बूढ़े से नज़र आने लगे थे। 

 

कल रात को वो मर गए। रात को सोये तो सुबह नहीं उठे। लोग ऐसा कह रहे थे- भगवान सबको ऐसी ही मौत दे।  कोई ये नहीं सोचता है कि  इंसान का मन ही कुछ ऐसा है कि  वो अंत समय तक नहीं मरना चाहता । 

 

उनकी नौकरानी रमा रोज सुबह  आ जाती थी |  रोज चमनलाल सुबह उठकर  तैयार  हो  जाते थे।  जब से उन्होंने होश संभाला है , सुबह  उठकर स्नान करना और फिर पूजा करके दिनचर्या में शामिल हो जाना उनकी पुरानी आदत थी। उनकी  नौकरानी उनके घर की  सर्वे-सर्वा यानी कि  आल इन वन थी , साफ़ सफाई और खाना बनाना, थोड़े बहुत कपडे धोना इत्यादि सब उसके ही काम थे|  चमनलाल अकेले ही रहते  थे।  रमा रोज सुबह आ जाती थी , तो चमनलाल को वो खाना बना देती थी और फिर घर के सारे काम करके जो कि कोई विशेष नहीं थे, कर जाती थी | खाने में चावल  और दाल बना जाती थी। यही चावल  और दाल चमनलाल दिन में तीन बार खा कर  जीवन जी रहे थे। शाम के वक़्त यही दाल- भात कभी नींद की  गोली के साथ तो कभी थोड़ी सी शराब के साथ खा लेते थे |

 

आज भी जब रमा घर आई देखा तो घर का दरवाजा खुला ही था। अमूनन वो बंद ही रहता था। जब वो अन्दर गयी , तो देखा कि चमनलाल अपनी आराम कुर्सी पर लेटे  हुए थे और उनकी  गोद में एक फोटो एल्बम था जो कि उनका फॅमिली अल्बम  था; जो कि  खुला हुआ था . जो पेज खुला हुआ था उसमे उनके बच्चो और दोस्तों की तस्वीरे लगी हुई थी .उनके हाथो  में उनकी  पत्नी का एक अच्छा सा बड़ा सा फोटो था जो कि पिछले साल ही गुजर गयी थी | चमनलाल की  आँखे मुंदी  हुई थी और उनके चेहरे पर एक असीम सा  संतोष था; जैसे कह रहे हो कि सावित्री  अब मैं भी तेरे पास आ रहा हूँ ; तुम अकेली नहीं हो। 

 

नौकरानी ने पहले समझा कि वो सो रहे है | क्योंकि वो अक्सर नींद की  गोलियों का सहारा लेकर सोते थे। उन्हें  बहुत आवाज  दी जोर से पर वो न उठे। उन्हें हिलाया पर उनकी  आँखे न खुली , तब नौकरानी को समझा कि शायद कुछ गलत हो गया है | वो दौड़कर पडोसी चोपड़ा जी  के घर  गयी , उन्हें  बुलाया , वो जब आये तो देख कर ही समझ  गए कि चमनलाल  नहीं रहे। उन्होंने फिर भी दुसरे दोस्त मिश्रा जी को बुलाया , उन्होंने भी देखकर सर हिलाया और कहा कि , "अब चमन नहीं रहा |"  सो मोहल्ले के और लोगो को भी बुलाया गया | सब ने अंतिम यात्रा की  तैयारी शुरू कर दी | 

 

चमनलाल को हालांकि  कई तकलीफे थी , शारीरिक रूप से कमजोर थे। कमर में हमेशा ही दर्द रहा करता था। हाथ पैर भी दर्द में तकलीफ देते रहते थे। अब चूंकि उनका मन पहले ही खराब हो  गया था  सो शरीर तो खराब होना ही था। सो एक तो बुढापा  ऊपर से ढेर सारी बीमारियाँ और एक अनंत एकांत | पता नहीं किस सोच  में डूबे रहते थे। कभी कभी हंस देते थे। और कभी तो बस चुप चाप रहते थे। ज़िन्दगी भर शरीर और मन की  तकलीफे   रही  | कभी कराहे तो कभी रोये , पर जब मौत आई तो शायद नींद में ही चुपचाप चल बसे | पर आज उनके चेहरे पर एक परम शान्ति थी |

 

नौकरानी का रोना रुक ही नहीं रहा था। उसे चमनलाल अपनी बेटी की तरह ही  देखते थे। चोपड़ा ने चमनलाल की एक डायरी को ढूंढा , उन्हें पता था कि  चमनलाल अपनी कुछ बाते जो कि महत्वपूर्ण हो, उसमे लिखा करते थे।  उसमे उनके तीनो बच्चो  और दुसरे परिजनों तथा दोस्तों  के नाम और पते लिखे हुए थे। और एक कागज़ पर छोटी सी वसीयत लिखी हुई थी | चमनलाल ने अपना सबकुछ [ वैसे भी अब कुछ बचा ही नहीं था | ये घर भर बच  गया था उनकी  पत्नी की  मेहरबानी से ; वरना ये भी चला जाता था दुनिया को बांटने  में . चमनलाल ने जीवन भर सबको बांटा ही जो था  ] तीनो बच्चो में बाँट दिया गया था | और कुछ रुपया इस नौकरानी को दे देने की बात थी | चोपड़ा ने तीनो बच्चो को और चमन के दो दोस्तों को और चमनलाल के भाई बहन को फ़ोन कर के इस मृत्यु की  सूचना दे दी और उन्हें तुरंत  आने  को कहा | बड़ा लड़का तो ये सुनकर ही सुन्न हो गया , उसने कहा कि जब तक वो न पहुंचे | दाह  संस्कार न करे। और बाकी  के कार्यकर्म को यथोविधि पूरा करे ,वो पहुँच रहा है | चोपड़ा ने हामी भर दी | वो बड़े लड़के का चमनलाल से प्रेम जानते थे। चमनलाल के बच्चो में ये बड़ा लड़का ही था , जिसका बहुत अनुराग था अपने पिता के लिए। 

 

मिश्रा जी ने कुछ और लोगो के साथ मिलकर चमनलाल के शव को कुर्सी से नीचे उतारा । मिश्रा जी ने कुछ लोगो से घास और पुआल मंगवाया और उस पर एक चादर बिछा कर शव को रख दिया | शव के सर के पास एक  दिया जला दिया गया | मोहल्ले के कुछ लोग अंत्येष्टि का सामान खरीदने चले गए | मिश्रा जी ने उन्हें खास  तौर से  दो बांस , खपच्चियाँ , सफ़ेद  कपडा ,मटकी  , रस्सी , जौ, कंडे, कपूर ,काला तिल , गुलाल तथा अन्य जरुरत की चीजे लाने को कहा | मिश्राजी ने अपने एक पंडित मित्र को बुला लिया  जो कि अंतिम संस्कार की  विधि करवाते थे। घर में अब अंतिम संस्कार की विधि को पूर्ण किया जाने लगा | 

 

चमनलाल के तीन बच्चे थे। जो उनके और उनकि पत्नी के जीवनकाल में ही उनसे अलग हो गए थे। शादियाँ हो गयी थी , सबकी  अपनी अपनी नौकरी थी। अपना अपना  जीवन था। कभी नौकरी के बहाने और कभी साथ न निभने के बहाने से सब अलग हो गए थे। चमनलाल  खुश रहना जानते थे। उनकी  पत्नी सावित्री को ये सब [ बच्चो का अलग होना और साथ न देना  ] न भाया और वो इस दुःख को न सहकर भगवान के पास चली गयी | अंतिम समय में उसने बहुत दुःख झेले , बुढापा अपने आप में दुखदायी होता है | वो हमेशा ही बीमार रहती थी , कुछ और बीमारियों ने अंत समय में उसका दामन पकड़ लिया | अंत समय में चमनलाल उसका हाथ पकड़कर बैठे ही रह गए और वो परमात्मा के पास चली गयी | 

 

मिश्रा और चोपड़ा ने मिलकर कुछ और मोहल्ले वालो के साथ अंतिम यात्रा की तैयारिया शुरू कर दी। चोपड़ा ने जाकर पास वाले शमशान घाट में जाकर सारी औपचारिकताये पूरी करके आ गए , शाम को दिवगंत चमनलाल  को ले जाना तय हुआ | मिश्रा ने कहा कि सूरज के डूबने के पहले ही अग्नि देनी होंगी | मोहल्ले के लोग जमा होने शुरू हो गए थे। 

 

चमनलाल के बच्चे न तब आते थे और न ही अब| | एक बेटी थी जो कि शादी के बाद हमेशा अपने धन की  कमी को रोती रहती थी  | जो हमेशा ही ये सोचती थी उसे दहेज़ में कुछ मिला ही नहीं | जब भी समय मिलता , और जब भी वो इस घर में आती , कुछ न कुछ सामान जरुर ले जाती | चमनलाल कभी न रोकते | बस घर खाली होता गया | दरअसल बेटी को पिता से गुस्सा था । चमनलाल उसे अपने ही एक दोस्त के घर ब्याह करवाना चाहते थे पर  बेटी ने  प्रेम विवाह  किया ।  चमन ने मना किया , पर उसने एक न सुनी और जब से ब्याह हुआ है , कुछ न कुछ मांगकर ले जाती थी, ये कहकर कि  उसे दहेज़ नहीं मिला, उसका भी हक है इस घर पर । चमन ये समझ नहीं पाए आज तक कि  वो खुद से होकर ये सब मांगती थी या उसके ससुराल वाले उसे भेजते थे  ।  बड़ा बेटा  जरुर मदद करता था । लेकिन उसकी  पत्नी लड़ाकू स्वभाव की थी  | बस फिर क्या था , उन्हें  तो अलग ही  होना था। वो फिर भी अपनी पत्नी को न बताकर चमनलाल की   हर महीने कुछ मदद जरुर कर देता |  छोटा बेटा सोचता था  कि उसके साथ अन्याय हुआ है , उसे ठीक से पढाया लिखाया नहीं गया ,क्योंकि उसे विदेश में भेजने के लिए  चमनलाल के पास पैसे नहीं बचे थे। | इसलिए वो गुस्से में अलग हो गया । पर हाँ , छोटे की बीबी , जब भी घर आती तो पति की  नज़र बचाकर कुछ रुपये चमनलाल के पास छोड़ जाती| उसे चमनलाल में अपने पिता की  सूरत दिखायी देती थी | उसके खुद के पिता के भी यही हाल है ...क्या करे भई , ये तो घर घर की कहानी है ....वो भी बड़े बेटे की ही तरह चुपचाप चमनलाल की  मदद करती जाती| जो भी हो , चमनलाल ने कभी किसी से कुछ नहीं  माँगा , बस जो मिला उसी में खुश हो गए |

 

मिश्रा जी ; चोपड़ा और मोहल्ले के दुसरे लोगो को कह रहे थे : जातसंस्कारैणेमं लोकमभिजयति मृतसंस्कारैणामुं लोकम्। अर्थात जातकर्म आदि संस्कारोæ