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अपनी बात : दलित साहित्य की दशा और दिशा

- नवल किशोर कुमार

दोस्तों, इक्कीसवीं सदी के भारत में खासकर हिन्दी साहित्य में जिस तरह के उठापटक के दृश्य सामने आ रहे हैं, वैसा अतीत में भी रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। कहना गलत नहीं होगा कि आज का हिन्दी साहित्य अतीत के हिन्दी साहित्य से पूर्ण रूपेण पृथक है। खासकर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जिस तरह से हिन्दी साहित्य में अभिनव प्रयोग किये गये हैं और राजनीति ने साहित्य को प्रभावित किया है, अब आबोहवा बदलने लगी है। कभी सामंतों का चरित्र चित्रण करने वाला हिन्दी साहित्य अब तमाम तरह के विमर्श को जगह देता है। बतौर उदाहरण अब हिन्दी साहित्य में महिलायें खुलेआम यौनेच्छा से लेकर यौन स्वतंत्रता की बात करती हैं। दलित एवं अभिवंचित समाज के साहित्यकार खुलकर अपने-अपने समाज का पक्ष रखते नजर आते हैं लेकिन समाज अब वैसा विरोध दर्ज नहीं करता है जैसाकि पूर्व में कभी हुआ करता था।

 

कहना अतिशेक्ति नहीं है कि साहित्य सामाजिक परिवर्तन में भूमिका निभाता है। भारत ही नहीं, विश्वस्तर पर यह देखा गया है कि जिस तरह का साहित्य होता है, उसी तरह का समाज निर्मित होता है। आज के समय में भारत जैसे विशाल देश में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण बहुत जरूरी है। आज भी हमारा समाज धर्मांधता में डूबा हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस धर्मांधता को खत्म कर वैज्ञानिक समाज बनाने के बजाय अंधविश्वासों को ही बढ़ावा दिया है। सैकड़ों चैनलों पर पाखंडी बाबाओं के प्रवचन चलते रहते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद दुनिया बहुत खतरनाक स्टेज में पहुंच गई है। अब लोग किताबें नहीं पढ़ते हैं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर न्यूज और विश्लेषण सुनकर जनमत बना रहे हैं। खबरों के अलावा धारावाहिक और फिल्मों के रूप में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक अलग तरह का साहित्य आ रहा है जो बाजारोन्मुखी है। इसके चलते प्रगतिशील साहित्य पिछड़ रहा है। ऐसी स्थिति में सही लेखन, जो धर्मांधता से प्रभावित न हो, तार्किक हो, बुद्धिवादी हो- ऐसे साहित्य की बहुत आवश्यकता है।

 

साहित्य का कम पढ़ा जाना या न पढ़ा जाना चिंता का विषय है। पश्चिमी देशों के विद्वान इसके कारणों को परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी दृष्टि में भूमंडलीकरण की वजह से पूरी दुनिया में ड्रीम इंडस्ट्री का उदय हुआ है। ड्रीम इंडस्ट्री के उदाहरण के तौर पर अगर हम आधुनिक पश्चिमी स्टूडियो को ले सकते हैं, जिसकी वजह से चमत्कारिक चीजों को घटित होते हुए दिखाना संभव हुआ है। चूंकि भारत कपोल कल्पित कहानियों और मिथकों का देश रहा है, इसलिए इस पर इन ड्रीम इंडस्ट्री का असर बहुत तेजी के साथ पड़ा है। उदाहरण के लिए यह एक मिथक है कि राम ने वानरों की मदद से श्रीलंका जाने के लिए समुद्र पर पुल बांध दिया।

 

ड्रीम इंडस्ट्री या वेस्टर्न स्टूडियो या मॉडर्न स्टूडियो की मदद से यह संभव कर दिया कि वे पुल को बांधते हुए दिख रहे हैं। बंधा हुआ पुल भी दिखाई दे रहे हैं। यह चमत्कार इस ड्रीम इंडस्ट्री की वजह से हुआ है। इस तरह जो चीजें पहले कपोल कल्पना या मिथकीय रूप में थीं, वे आमूर्त रूप से सामने आ गईं। आधुनिक तकनीक ने सब बदल दिया। पहले लोग पढ़ते थे तो मिथकों के बारे में खूब सवाल करते थे। लंबी-लंबी और गंभीर बहसें हुआ करती थीं। जैसे हनुमान ने सूरज को अपनी कांख में दबा लिया, इस पर सवाल खड़े किए जाते थे। अब मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने इसे कर दिखाया। परदे पर इसे दिखाना बहुत आसान है। इससे मिथकों में ज्यादा लोगों का विश्वास हो रहा है। इस तरह ज्ञान के क्षेत्र में दो क्रियाओं का परिवर्तन हो गया है। पहले लोग पढ़कर ज्ञान इकठ्ठा करते थे, अब देखकर ज्ञान इकठ्ठा कर रहे हैं। पढ?े और देखने में बड़ा भारी फर्क है। दिखाया वही जा रहा है जो मीडिया के मालिक दिखाना चाहते हैं। लोगों की रुचियां बदल रही हैं। पूरा देश और समाज एक खतरनाक दौर से गुजर रहा है। इसके चलते किताबों का महत्व दिन-प्रतिदिन घट रहा है। दर्शनीय चीजें महत्वपूर्ण होती जा रही हैं।

 

ऐसे नाजुक दौर में हम मुक्तिकामी साहित्य, विशेषतौर पर दलित साहित्य को उम्मीद की दृष्टि से देख सकते हैं। दलित साहित्य की एक महत्वपूर्ण भूमिका यह होने जा रही है कि वर्णव्यवस्था (जो कि धर्मजनित है) के विरोध और बुद्धिवादी विचारों पर आधारित होने के कारण यह साहित्य में आए रुचिहीनता के संकट का सामना करने को तैयार है। इसकी वजह यही है कि दलित साहित्य तार्किक है। ठीक वैसे ही जैसे दुनिया के स्तर पर अश्वेत साहित्य, आदिवासी साहित्य और नारीवादी साहित्य है। साहित्य में आई यह रेशनलिटी साहित्य को बाजारवाद से आई विकृतियों से लड?े में मदद कर रही है। इस संदर्भ में भारत में दलित साहित्य की भूमिका बहुत ही ऐतिहासिक होने जा रही है।

 

दलित साहित्य से जुड़ी एक बड़ी समस्या यह है कि इससे कुछ ऐसे लोग जुड़े हैं जो दलित साहित्य को जातिवादी साहित्य बताने और बनाने में लगे हैं। यह उन्हीं की धारणा है कि दलित साहित्य केवल दलित ही लिख सकता है। ये तो वैसे ही जैसे कोई कहे कि दलित राजनीति केवल दलित ही कर सकता है। यह बहुत ही हास्यास्पद स्थिति है। हिंदी क्षेत्र के दलित आंदोलन में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के उदय के बाद प्रखरता और आक्रामकता आई है, उसका प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा है, इसी की वजह से हिंदी के दलित साहित्य में आक्रामकता आई है। इसके चलते अलग-अलग विचार दलितों के अंदर भी उभरकर आए हैं और इसी प्रक्रिया में तमाम अंतर्विरोध उभरकर सामने आ रहे हैं। दलित साहित्य का मतलब जातिवादी साहित्य नहीं है, बल्कि यह जाति व्यवस्था के विरोध का साहित्य है। इसमें वे तमाम साहित्यकार जो वर्ण व्यवस्था के विरोध में रचना कर रहे हैं, वह सारा दलित साहित्य के अंदर आता है। मैं हमेशा से मानता रहा हूं कि दलित साहित्य का उद्गम बौद्ध साहित्य से हुआ है क्योंकि बौद्धों ने सबसे पहले वर्ण व्यवस्था का बहुत सशक्त विरोध किया था। तमाम बौद्ध दार्शनिकों ने वर्ण व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। इसी के चलते बौद्धों का सर्वनाश किया गया, बौद्ध मठों को तोड़ा गया तथा फिर से जाति व्यवस्था कायम की गई और उसे बड़ी कड़ाई से लागू किया गया। खासकर शंकराचार्य के उदय के बाद 9वीं सदी में यह तेजी से हुआ।

 

बौद्धस्थलियों को हिंदू स्थलियों में बदला गया। यह वर्ण व्यवस्था के विरोध का ही परिणाम था। अगर हम यह कहें कि दलित ही दलित साहित्य लिख सकता है तो हम उन तमाम लोगों का अपमान करेंगे जिन्होंने गैर-दलित होते हुए भी जाति व्यवस्था के विरोध और दलितों के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया। इस परंपरा में एक-दो नहीं, हजारों नाम गिनाए जा सकते हैं।

 

एक और ऐतिहासिक सत्य है इस देश में- जाति व्यवस्था को जहां ब्राह्मणों ने बनाया, वहीं इसका विरोध करने वाले भी सबसे पहले ब्राह्मणों के अंदर से ही निकले। इस बात को हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दलितों के अंदर भी जातिवाद और ब्राह्मणवाद हो सकता है, इसलिए दलितों के लिखे को ही दलित साहित्य मानने के तर्क से सहमत नहीं हुआ जा सकता। इस तरह की धारणाएं दलित साहित्य को संकुचित बनाती हैं, उसकी सार्वभौमिकता को नष्ट करती है और समाज से दलित साहित्य को काटकर रखती हैं, जो कि बहुत खतरनाक है। दलित साहित्य एक सामाजिक कल्याण की विचारधारा है। इसलिए संकुचित विचारों के लिए इसमें कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

प्रासंगिक आलेख : कृष्ण ( डा. राममनोहर लोहिया )

कृष्ण की सभी चीजें दो हैं : दो मां, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएं या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृत या सामाजिक है, वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गई है। यों कृष्ण देवकीनंदन भी हैं, लेकिन यशोदानंदन अधिक। ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली मां, पेट-मां का नाम न जानते हों, लेकिन बाद वाली दूध वाली, यशोदा का नाम न जानने वाला कोई निराला ही होगा। उसी तरह, वसुदेव कुछ हारे हुए से हैं, और नंद को असली बाप से कुछ बढ़कर ही रुतबा मिल गया है। द्वारिका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहीं, क्योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है। किंतु यदि कृष्ण की चले, तो द्वारिका और द्वारिकाधीश, मथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहे। मथुरा से तो बाललीला और यौवन-क्रीड़ा की दृष्टि से, वृंदावन और वरसाना वगैरह अधिक महत्वपूर्ण हैं। प्रेमिकाओं का प्रश्न जरा उलझा हुआ है। किसकी तुलना की जाए, रुक्मिणी और सत्यभामा की, राधा और रुक्मिणी की या राधा और द्रौपदी की। प्रेमिका शब्द का अर्थ संकुचित न कर सखा-सखी भाव को ले के चलना होगा। अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरू की है। जो हो, अभी तो राधा ही बड़भागिनी है कि तीन लोक का स्वामी उसके चरणों का दास है। समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह तक पहुंचाए, लेकिन इतना संभव नहीं लगता। हर हालत में, रुक्मिणी राधा से टक्कर कभी नहीं ले सकेगी।

 

मनुष्य की शारीरिक सीमा उसका चमड़ा और नख हैं। यह शारीरिक सीमा, उसे अपना एक दोस्त, एक मां, एक बाप, एक दर्शन वगैरह देती रहती है। किंतु समय हमेशा इस सीमा से बाहर उछलने की कोशिश करता रहता है, मन ही के द्वारा उछल सकता है। कृष्ण उसी तत्व और महान प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्त सीमाओं से उलांघता-उलांघता सबमें मिला देता है, किसी से भी अलग नहीं रखता। क्योंकि कृष्ण तो घटनाक्रमों वाली मनुष्य-लीला है, केवल सिद्धांतों और तत्वों का विवेचन नहीं, इसलिए उसकी सभी चीजें अपनी और एक की सीमा में न रहकर दो और निरापनी हो गई हैं। यों दोनों में ही कृष्ण का तो निरापना है, किंतु लीला के तौर पर अपनी मां, बीवी और नगरी से पराई बढ़ गई है। पराई को अपनी से बढ़ने देना भी तो एक मानी में अपनेपन को खत्म करना है। मथुरा का एकाधिपत्य खत्म करती है द्वारिका, लेकिन उस क्रम में द्वारिका अपना श्रेष्ठतत्व जैसा कायम कर लेती है।

 

भारतीय साहित्य में मां है यशोदा और लला है कृष्ण। मां-लला का इनसे बढ़कर मुझे तो कोई संबंध मालूम नहीं, किंतु श्रेष्ठत्व भर ही तो कायम होता है। मथुरा हटती नहीं और न रुक्मिणी, जो मगध के जरांसध से लेकर शिशुपाल होती हुई हस्तिनापुर की द्रौपदी और पांच पांडवों तक एक-रूपता बनाए रखती है। परकीया स्वकीया से बढ़कर उसे खत्म तो करता नहीं, केवल अपने और पराए की दीवारों को ढहा देता है। लोभ, मोह, ईषर््या, भय इत्यादि की चहारदीवारी से अपना या स्वकीय छुटकरा पा जाता है। सब अपना और, अपना सब हो जाता है। बड़ी रसीली लीला है कृष्ण की, इस राधा-कृष्ण या द्रौपदी-सखा ओर रुक्मिणी-रमण की कहीं चर्म सीमित शरीर में, प्रेमांनंद और खून की गर्मी और तेजी में, कमी नहीं। लेकिन यह सब रहते हुए भी कैसा निरापना।

 

कृष्ण है कौन? गिरधर, गिरधर गोपाल! वैसे तो मुरलीधर और चक्रधर भी है, लेकिन कृष्ण का गुह्यतम रूप तो गिरधर गोपाल में ही निखरता है। कान्हा को गोवर्धन पर्वत अपनी कानी उंगली पर क्यों उठाना पड़ा था? इसलिए न कि उसने इंद्र की पूजा बंद करवा दी और इंद्र का भोग खुद खा गया, और भी खाता रहा। इंद्र ने नाराज होकर पानी, ओला, पत्थर बरसाना शुरू किया, तभी तो कृष्ण को गोवर्धन उठाकर अपने गो और गोपालों की रक्षा करनी पड़ी। कृष्ण ने इंद्र का भोग खुद क्?यों खाना चाहा? यशोदा और कृष्ण का इस संबंध में गु्हय विवाद है। मां इंद्र को भोग लगाना चाहती है, क्योंकि वह बड़ा देवता है, सिर्फ वास से ही तृप्त हो जाता है, और उसकी बड़ी शक्ति है, प्रसन्न होने पर बहुत वर देता है और नाराज होने पर तकलीफ। बेटा कहता है कि वह इंद्र से भी बड़ा देवता है, क्योंकि वह तो वास से तृप्त नहीं होता और बहुत खा सकता है, और उसके खाने की कोई सीमा नहीं। यही है कृष्ण-लीला का गुह्य रहस्य। वास लेने वाले देवताओं से खाने वाले देवताओं तक की भारत-यात्रा ही कृष्ण-लीला है।

 

कृष्ण के पहले, भारतीय देव, आसमान के देवता हैं। निस्संदेह अवतार कृष्ण के पहले से शुरू हो गए। किंतु त्रेता का राम ऐसा मनुष्य है जो निरंतर देव बनने की कोशिश करता रहा। इसीलिए उसमें आसमान के देवता का अंश कुछ अधिक है। द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है जो निरंतर मनुष्य बनने की कोशिश करता रहा। उसमें उसे संपूर्ण सफलता मिली। कृष्ण संपूर्ण अबोध मनुष्य है, खूब खाया-खिलाया, खूब प्यार किया और प्यार सिखाया, जनगण की रक्षा की और उसे रास्ता बताया, निर्लिप्त भोग का महान त्यागी और योगी बना।

 

इस प्रसंग में यह प्रश्न बेमतलब है कि मनुष्य के लिए, विशेषकर राजकीय मनुष्य के लिए, राम का रास्ता सुकर और उचित है या कृष्ण का। मतलब की बात तो यह है कि कृष्ण देव होता हुआ निरंतर मनुष्य बनता रहा। देव और नि:स्व और असीमित होने के नाते कृष्ण में जो असंभव मनुष्यताएं हैं, जैसे झूठ, धोखा और हत्या, उनकी नकल करने वाले लोग मूर्ख हैं, उसमें कृष्ण का क्या दोष। कृष्ण की संभव और पूर्ण मनुष्यताओं पर ध्यान देना ही उचित है, और एकाग्र ध्यान। कृष्ण ने इंद्र को हराया, वास लेने वाले देवों को भगाया, खाने वाले देवों को प्रतिष्ठित किया, हाड़, खून, मांस वाले मनुष्?य को देव बनाया, जन-गण में भावना जाग्रत की कि देव को आसमान में मत खोजो, खोजो यहीं अपने बीच, पृथ्वी पर। पृथ्?वी वाला देव खाता है, प्यार करता है, मिलकर रक्षा करता है।

 

कृष्ण जो कुछ करता था, जमकर करता था, खाता था जमकर, प्यार करता था जमकर, रक्षा भी जमकर करता था : पूर्ण भोग, पूर्ण प्यार, पूर्ण रक्षा। कृष्ण की सभी क्रियाएं उसकी शक्ति के पूर इस्तेमाल से ओत-प्रोत रहती थीं, शक्ति का कोई अंश बचाकर नहीं रखता था, कंजूस बिल्कूल नहीं था, ऐसा दिलफेंक, ऐसा शरीरफेंक चाहे मनुष्यों से संभव न हो, लेकिन मनुष्?य ही हो सकता है, मनुष्य का आदर्श, चाहे जिसके पहुंचने तक हमेशा एक सीढ़ी पहले रुक जाना पड़ता हो। कृष्ण ने, खुद गीत गया है स्थितप्रज्ञ का, ऐसे मनुष्य का जो अपनी शक्ति का पूरा और जमकर इस्तेमाल करता हो। 'कूमोर्गानीव' बताया है ऐसे मनुष्य को। कछुए की तरह यह मनुष्य अपने अंगों को बटोरता है, अपनी इंद्रियों पर इतना संपूर्ण प्रभुत्?व है इसका कि इंद्रियार्थों से उन्हें पूरी तरह हटा लेता है, कुछ लोग कहेंगे कि यह तो भोग का उल्टा हुआ। ऐसी बात नहीं। जो करना, जमकर - भोग भी, त्याग भी। जमा हुआ भोगी कृष्ण, जमा हुआ योगी तो था ही। शायद दोनों में विशेष अंतर नहीं। फिर भी, कृष्ण ने एकांगी परिभाषा दी, अचल स्थितप्रज्ञ की, चल स्थितप्रज्ञ की नहीं। उसकी परिभाषा तो दी तो इंद्रियार्थों में लपेटकर, घोलकर। कृष्ण खुद तो दोनों था, परिभाषा में एकांगी रह गया। जो काम जिस समय कृष्ण करता था, उसमें अपने समग्र अंगों का एकाग्र प्रयोग करता था, अपने लिए कुछ भी नहीं बचता था। अपना तो था ही नहीं कुछ उसमें। 'कूमोर्गानीव' के साथ-साथ 'समग्र-अंग-एकाग्री' भी परिभाषा में शामिल होना चाहिए था। जो काम करो, जमकर करो, अपना पूरा मन और शरीर उसमें फेंककर। देवता बनने की कोशिश में मनुष्य कुछ कृपण हो गया है, पूर्ण आत्मसमर्पण वह कुछ भूल-सा गया है। जरूरी नहीं है कि वह अपने-आपको किसी दूसरे के समर्पण करे। अपने ही कामों में पूरा आत्?मसमर्पण करे। झाड़ू लगाए तो जमकर, या अपनी इंद्रियों का पूरा प्रयोग कर युद्ध में रथ चलाए तो जमकर, श्यामा मालिन बनकर राधा को फूल बेचने जाए तो जमकर, अपनी शक्ति का दर्शन ढूंढ़े और गाए तो जमकर। कृष्ण ललकारता है मनुष्य को अकृपण बनने के लिए, अपनी शक्ति को पूरी तरह ओर एकाग्र उछालने के लिए। मनुष्य करता कुछ है, ध्यान कुछ दूसरी तरफ रहता है। झाड़ू देता है फिर भी कूड़ा कोनों में पड़ा रहता है। एकाग्र ध्यान न हो तो सब इंद्रियों का अकृपण प्रयोग कैसे हो। 'कूमोर्गानीव' और 'समग्र-अंग-एकाग्री' मनुष्य को बनना है। यही तो देवता की मनुष्य बनने की कोशिश है। देखो, मां, इंद्र खाली वास लेता है, मैं तो खाता हूं।

 

आसमान के देवताओं को जो भगाए उसे बड़े पराक्रम और तकलीफ के लिए तैयार रहना चाहिए, तभी कृष्ण को पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी छोटी उंगली पर उठाना पड़ा। इंद्र को वह नाराज कर देता और अपनी गउओं की रक्षा न करता, तो ऐसा कृष्ण किस काम का। फिर कृष्ण के रक्षा-युग का आरंभ होने वाला था। एक तरह से बाल और युवा-लीला का शेष ही गिरिधर लीला है। कालिया-दहन और कंस वध उसके आसपास के हैं। गोवर्धन उठाने में कृष्ण की उंगली दु:खी होगी, अपने गोपों और सखाओं को कुछ झुंझला कर सहारा देने को कहा होगा। मां को कुछ इतरा कर उंगली दुखने की शिकायत की होगी। गोपियों से आंख लड़ाते हुए अपनी मुस्कान द्वारा कहा होगा। उसके पराक्रम पर अचरज करने के लिए राधा और कृष्ण की तो आपस में गंभीर और प्रफल्लित मुद्रा रही होगी। कहना कठिन है कि किसकी ओर कृष्ण ने अधिक निहारा होगा, मां की ओर इतरा कर, या राधा की ओर प्रफुल्ल होकर। उंगली बेचारे की दुख रही थी। अब तक दुख रही है, गोवर्धन में तो यही लगता है। वहीं पर मानस गंगा है। जब कृष्ण ने गऊ वंश रूपी दानव को मारा था, राधा बिगड़ पड़ी और इस पाप से बचने के लिए उसने उसी स्थल पर कृष्ण से गंगा मांगी। बेचारे कृष्ण को कौन-कौन-से असंभव काम करने पड़े हैं। हर समय वह कुछ न कुछ करता रहा है दूसरों को सुखी बनाने के लिए। उसकी उंगली दुख रही है। चलो, उसको सहारा दें।

 

गोवर्धन में सड़क चलते कुछ लोगों ने, जिनमें पंडे होते ही हैं, प्रश्न किया कि मैं कहां का हूं? मैंने छेड़ते हुए उत्?तर दिया, राम की अयोध्या का। पंडों ने जवाब दिया, सब माया एक है। जब मेरी छेड़ चलती रही तो एक ने कहा कि आखिर सत्?तू वाले राम से गोवर्धन वासियों का नेह कैसे चल सकता है। उनका दिल तो माखन-मिसरी वाले कृष्ण से लगा है।

 

माखन-मिसरी वाला कृष्ण, सत्तू वाला राम कुछ सही है, पर उसकी अपनी उंगली अब तक दुख रही है।

 

एक बार मथुरा में सड़क चलते एक पंडे से मेरी बातचीत हुई। पंडों की साधारण कसौटी से उस बातचीत का कोई नतीजा न निकला, न निकलने वाला था। लेकिन क्या मीठी मुस्कान से उस पंडे ने कहा कि जीवन में दो मीठी बात ही तो सब कुछ है। कृष्ण मीठी बात करना सिखा गया है। आसमान वाले देवताओं को भगा गया है, माखन-मिसरी वाले देवों की प्रतिष्?ठा कर गया है। लेकिन उसका अपना कौन-कौन-सा अंग अब तक दुख रहा है।

 

कृष्ण की तरह एक और देवता हो गया है जिसने मनुष्य बनने की कोशिश की। उसका राज्य संसार में अधिक फैला। शायद इसलिए कि वह गरीब बढ़ई का बेटा था और उसकी अपनी जिंदगी में वैभव और ऐश न था। शायद इसलिए कि जन-रक्षा का उसका अंतिम काम ऐसा था कि उसकी उंगली सिर्फ न दुखी, उसके शरीर का रोम-रोम सिहरा और अंग-अंग टूटकर वह मरा। अब तक लोग उसका ध्यान करके अपने सीमा बांधने वाले चमड़े से बाहर उछलते हैं। हो सकता है कि ईसू मसीह दुनिया में केवल इसलिए फैल गया है कि उसका विरोध उन रोमियों से था जो आज की मालिक सभ्यता के पुरखे हैं। ईसू रोमियों पर चढ़ा। रोमी आज के यूरोपियों पर चढ़े। शायद एक कारण यह भी हो कि कृष्ण-लीला का मजा ब्रज और भारतभूमि के कण-कण से इतना लिपटा है कि कृष्ण की नियति कठिन है। जो भी हो, कृष्ण और क्रिस्टोस दोनों ने आसमान के देवताओं को भगाया। दोनों के नाम और कहानी में भी कहीं-कहीं सादृश्य है। कभी दो महाजनों की तुलना नहीं करनी चाहिए। दोनों अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ हैं। फिर भी, क्रिस्टोस प्रेम के आत्मोसर्गी अंग के लिए बेजोड़ और कृष्ण संपूर्ण मनुष्य-लीला के लिए। कभी कृष्ण के वंशज भारतीय शक्तिशाली बनेंगे, तो संभव है उसकी लीला दुनिया-भर में रस फैलाए।

 

कृष्ण बहुत अधिक हिंदुस्तान ने साथ जुड़ा हुआ है। हिंदुस्तान के ज्यादातर देव और अवतार अपनी मिट्टी के साथ सने हुए हैं। मिट्टी से अलग करने पर वे बहुत कुछ निष्प्राण हो जाते हैं। त्रेता का राम हिंदुस्तान की उत्तर-दक्षिण एकता का देव है। द्वापर का कृष्ण देश की पूर्व-पश्चिम एकता का देव है। राम उत्तर-दक्षिण और कृष्ण पूर्व-पश्चिम धुरी पर घूमे। कभी-कभी तो ऐसा लगता कि देश को उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम एक करना ही राम और कृष्ण का धर्म था। यों सभी धर्मों की उत्?पत्ति राजनीति से है, बिखरे हुए स्वजनों को इकठ्ठा करना, कलह मिटाना, सुलह कराना और हो सके तो अपनी और सबकी सीमा को ढहाना। साथ-साथ जीवन को कुछ ऊंचा उठाना, सदाचार की दृष्टि से और आत्म-चिंतन की भी।

 

देश की एकता और समाज के शुद्धि संबंधी कारणों और आवश्यकताओं से संसार के सभी महान धर्मों की उत्पत्ति हुई है। अलबत्ता, धर्म इन आवश्यकताओं से ऊपर उठकर, मनुष्य को पूर्ण करने की भी चेष्टा करता है। किंतु भारतीय धर्म इन आवश्यकताओं से जितना ओत-प्रोत है, उतना और कोई धर्म नहीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि राम और कृष्ण के किस्से तो मनगढ़ंत गाथाएं हैं, जिनमें एक अद्वितीय उद्देश्य हासिल करना था, इतने बड़े देश के उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम को एक रूप में बांधना था। इस विलक्षण उद्देश्य के अनुरूप ही ये विलक्षण किस्से बने। मेरा मतलब यह नहीं कि सब के सब किस्से झूठे हैं। गोवर्धन पर्वत का किस्सा जिस रूप में प्रचलित है उस रूप में झूठा तो है ही, साथ-साथ न जाने कितने और किस्से, जो कितने और आदमियों के रहे हों, एक कृष्ण अथवा राम के साथ जुड़ गए हैं। जोड़ने वालों को कमाल हासिल हुआ। यह भी हो सकता है कि कोई न कोई चमत्कारिक पुरुष राम और कृष्ण के नाम हुए हों। चमत्कार भी उनका संसार के इतिहास में अनहोना रहा हो। लेकिन उन गाथाकारों का यह कम अनहोना चमत्कार नहीं है, जिन्होंने राम और कृष्ण के जीवन की घटनाओं को इस सिलसिले और तफसील में बांधा है कि इतिहास भी उसके सामने लजा गया है। आज के हिंदुस्तानी राम और कृष्ण की गाथाओं की एक-एक तफसील को चाव से और सप्रमाण जानते हैं, जबकि ऐतिहासिक बुद्ध और अशोक उनके लिए धुंधली स्मृति-मात्र रह गए हैं।

 

महाभारत हिंदुस्तान की पूर्व-पश्चिम यात्रा है, जिस तरह रामायण उत्तर-दक्षिण यात्रा है। पूर्व-पश्चिम यात्रा का नायक कृष्ण है, जिस तरह उत्तर-दक्षिण यात्रा का नायक राम है। मणिपुर से द्वारिका तक कृष्ण या उसके सहचरों का पराक्रम हुआ है, जैसे जनकपुर में श्रीलंका तक राम या उसके सहचरों का। राम का काम अपेक्षाकृत सहज था। कम से कम उस काम में एकरसता अधिक थी। राम का मुकाबला या दोस्ती हुई भील, किरात, किन्नर, राक्षस इत्यादि से, जो उसकी अपनी सभ्?यता से अलग थे। राम का काम था इनको अपने में शामिल करना और उनको अपनी सभ्यता में ढाल देना, चाहे हराए बिना या हराने के बाद।

 

कृष्ण को वास्ता पड़ा अपने ही लोगों से। एक ही सभ्यता के दो अंगों में से एक को लेकर भारत की पूर्व-पश्चिम एकता कृष्ण को स्थापित करनी पड़ी। इस काम में पेंच ज्यादा थे। तरह-तरह की संधि और विग्रह का क्रम चला। न जाने कितनी चालकियां और धूर्तताएं भी हुईं। राजनीति का निचोड़ भी सामने आया - ऐसा छनकर जैसा फिर और न हुआ। अनेकों ऊंचाइयां भी छुई गईं। दिलचस्प किस्से भी खूब हुए। जैसी पूर्व-पश्चिम राजनीति जटिल थी, वैसे ही मनुष्यों के आपसी संबंध भी, खासकर मर्द-औरत के। अर्जुन की मणिपुर वाली चित्रागंदा, भीम की हिडंबा, और पांचाली को तो कहना ही क्?या। कृष्ण की बुआ कुंती का एक बेटा था अर्जुन, दूसरा कर्ण, दोनों अलग-अलग बापों से, और कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण का छल-वध करने के लिए उकसाया। फिर भी, क्यों जीवन का निचोड़ छनकर आया? क्योंकि कृष्ण जैसा निस्व मनुष्य न कभी हुआ और उससे बढ़कर तो कभी होना भी असंभव है। राम उत्तर-दक्षिण एकता का न सिर्फ नायक बना, राजा भी हुआ। कृष्ण तो अपनी मुरली बजाता रहा। महाभारत की नायिका द्रौपदी से महाभारत के नायक कृष्ण ने कभी कुछ लिया नहीं, दिया ही।

 

पूर्व-पश्चिम एकता की दो धुरियां स्पष्ट ही कृष्ण-काल में थीं। एक पटना-गया की मगध-धुरी और दूसरी हस्तिनापुर-इंद्रप्रस्थ की कुरु-धुरी। मगध-धुरी का भी फैलाव स्वयं कृष्ण की मथुरा तक था जहां मगध-नरेश जरासंध का दामाद कंस राज्य करता था। बीच में शिशुपाल आदि मगध के आश्रित-मित्र थे। मगध-धुरी के खिलाफ कुरु-धुरी का सशक्?त निमार्ता कृष्ण था। कितना बड़ा फैलाव किया कृष्ण ने इस धुरी का। पूर्व में मणिपुर से लेकर पश्चिम में द्वारिका तक इस कुरु-धुरी में समावेश किया। देश की दोनों सीमाओं, पूर्व की पहाड़ी सीमा और पश्चिम की समुद्री सीमा को फांसा और बांधा। इस धुरी को कायम ओर शक्तिशाली करने के लिए कृष्ण को कितनी मेहनत और कितने पराक्रम करने पड़े, और कितनी लंबी सूझ सोचनी पड़ी। उसने पहला वार अपने ही घर मथुरा में मगधराज के दामाद पर किया। उस समय सारे हिंदुस्तान में यह वार गूंजा होगा। कृष्ण की यह पहली ललकार थी। वाणी द्वारा नहीं, उसने कर्म द्वारा रण-भेरी बजाई। कौन अनसुनी कर सकता था। सबको निमंत्रण हो गया यह सोचने के लिए कि मगध राजा को अथवा जिसे कृष्ण कहे उसे सम्राट के रूप में चुनो। अंतिम चुनाव भी कृष्ण ने बड़े छली रूप में रखा। कुरु-वंश में ही न्याय-अन्याय के आधार पर दो टुकड़े हुए और उनमें अन्?यायी टुकड़ी के साथ मगध-धुरी को जुड़वा दिया। कृष्ण संसार ने सोचा होगा कि वह तो कुरुवंश का अंदरूनी और आपसी झगड़ा है। कृष्ण जानता था कि वह तो इंद्रप्रस्थ-हस्तिनापुर की कुरु-धुरी और राजगिरि की मगध-धुरी का झगड़ा है।

 

राजगिरि राज्?य कंस-वध पर तिलमिला उठा होगा। कृष्ण ने पहले ही वार में मगध की पश्चिमी शक्ति को खत्म-सा कर दिया। लेकिन अभी तो ताकत बहुत ज्यादा बटोरनी और बढ़ानी थी। यह तो सिर्फ आरंभ था। आरंभ अच्छा हुआ। सारे संसार को मालूम हो गया। लेकिन कृष्ण कोई बुद्धू थोड़े ही था जो आरंभ की लड़ाई को अंत की बना देता। उसके पास अभी इतनी ताकत तो थी नहीं जो कंस के ससुर और उसकी पूरे हिंदुस्तान की शक्ति से जूझ बैठता। वार करके, संसार को डंका सुना के कृष्ण भाग गया। भागा भी बड़ी दूर, द्वारिका में। तभी से उसका नाम रणछोड़दास पड़ा। गुजरात में आज भी हजारों लोग, शायद एक लाख से भी अधिक लोग होंगे, जिनका नाम रणछोड़दास है। पहले मैं इस नाम पर हंसा करता था, मुस्?काना तो कभी न छोडूंगा। यों, हिंदुस्तान में और भी देवता हैं जिन्होंने अपना पराक्रम भागकर दिखाया जैसे ज्ञानवापी के शिव ने। यह पुराना देश है। लड़ते-लड़ते थकी हड्डियों को भगाने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन कृष्ण थकी पिंडलियों के कारण नहीं भागा। वह भागा जवानी की बढ़ती हुई हड्डियों के कारण। अभी हड्डियों को बढ़ाने और फैलाने का मौका चाहिए था। कृष्ण की पहली लड़ाई तो आज तक की छापामार लड़ाई की तरह थी, वार करो और भागो। अफसोस यही है कि कुछ भक्त लोग भागने ही में मजा लेते हैं।

 

द्वारिका मथुरा से सीधे फासले पर करीब 700 मील है। वर्तमान सड़कों की यदि दूरी नापी जाए तो करीब 1,050 मील होती है। बिचली दूरी इस तरह करीब 850 मील होती है। कृष्ण अपने शत्रु से बड़ी दूर तो निकल ही गया, साथ ही साथ देश की पूर्व-पश्चिम एकता हासिल करने के लिए उसने पश्चिम के आखिरी नाके को बांध लिया। बाद में, पांचों पांडवों के बनवास युग में अर्जुन की चित्रांगदा और भीम की हिडंबा के जरिए उसने पूर्व के आखिरी नाके को भी बांधा। इन फासलों को नापने के लिए मथुरा से अयोध्या, अयोध्या से राजमहल और राजमहल से इम्फाल की दूरी जानना जरूरी है। यही रहे होंगे उस समय के महान राजमार्ग। मथुरा से अयोध्या की बिचली दूरी करीब 300 मील है। अयोध्या से राजमहल करीब 470 मील है। राजमहल से इम्फाल की बिचली दूरी करीब सवा पांच सौ मील हो, यों वर्तमान सड़कों से फासला करीब 850 मील और सीधा फासला करीब 380 मील है। इस तरह मथुरा से इम्फाल का फासला उस समय के राजमार्ग द्वारा करीब 1,600 मील रहा होगा। कुरु-धुरी के केंद्र पर कब्जा करने और उसे सशक्त बनाने के पहले कृष्ण केंद्र से 800 मील दूर भागा और अपने सहचरों और चेलों को उसने 1,600 मील दूर तक घुमाया। पूर्व-पश्चिम की पूरी भारत यात्रा हो गई। उस समय की भारतीय राजनीति को समझने के लिए कुछ दूरियां और जानना जरूरी है। मथुरा से बनारस का फासला करीब 370 मील और मथुरा से पटना करीब 500 मील है। दिल्ली से, जो तब इंद्रप्रस्थ थी, मथुरा का फासला करीब 90 मील है। पटने से कलकत्?ते का फासला करीब सवा तीन सौ मील है। कलकत्ते के फासले का कोई विशेष तात्पर्य नहीं, सिर्फ इतना ही कि कलकत्?ता भी कुछ समय तक हिंदुस्तान की राजधानी रहा है, चाहे गुलाम हिंदुस्तान की। मगध-धुरी का पुनर्जन्म एक अर्थ में कलकत्ते में हुआ। जिस तरह कृष्ण-कालीन मगध-धुरी के लिए राजगिरि केंद्र है, उसी तरह ऐतिहासिक मगध-धुरी के लिए पटना या पाटलिपुत्र केंद्र है, और इन दोनों का फासला करीब 40 मील है। पटना-राजगिरि केंद्र का पुनर्जन्म कलकत्ते में होता है, इसका इतिहास के विद्यार्थी अध्ययन करें, चाहे अध्ययन करते समय संतापपूर्ण विवेचन करें कि यह काम विदेशी तत्वावधान में क्यों हुआ।

 

कृष्ण ने मगध-धुरी का नाश करके कुरु-धुरी की क्यों प्रतिष्ठा करनी चाही? इसका एक उत्तर तो साफ है, भारतीय जागरण का बाहुल्य उस समय उत्तर और पश्चिम में था जो राजगिरि और पटना से बहुत दूर पड़ जाता था। उसके अलावा मगध-धुरी कुछ पुरानी बन चुकी थी, शक्तिशाली थी, किंतु उसका फैलाव संकुचित था। कुरु-धुरी नई थी और कृष्ण इसकी शक्ति और इसके फैलाव दोनों का ही सर्वशक्तिसंपन्न निर्माता था, मगध-धुरी को जिस तरह चाहता शायद न मोड़ सकता, कुरु-धुरी को अपनी इच्छा के अनुसार मोड़ और फैला सकता था। सारे देश को बांधना जो था उसे। कृष्ण त्रिकालदर्शी था। उसने देख लिया होगा कि उत्तर-पश्चिम में आगे चलकर यूनानियों, हूणों, पठानों, मुगलों आदि के आक्रमण होंगे इ?सलिए भारतीय एकता की धुरी का केंद्र कहीं वहीं रचना चाहिए, जो इन आक्रमणों का सशक्त मुकाबला कर सके। लेकिन त्रिकालदर्शी क्यों न देख पाया कि इन विदेशी आक्रमणों के पहले ही देशी मगध-धुरी बदला चुकाएगी और सैकड़ों वर्ष तक भारत पर अपना प्रभुत्व कायम करेगी और आक्रमण के समय तक कृष्ण की भूमि के नजदीक यानी कन्नौज और उज्?जैन तक खिसक चुकी होगी, किंतु अशक्त अवस्?था में। त्रिकालदर्शी ने देखा शायद यह सब कुछ हो, लेकिन कुछ न कर सका हो। वह हमेशा के लिए अपने देशवासियों को कैसे ज्ञानी और साधु दोनों बनाता। वह तो केवल रास्?ता दिखा सकता था। रास्ते में भी शायद त्रुटि थी। त्रिकालदर्शी को यह भी देखना चाहिए था कि उसके रास्ते पर ज्ञानी ही नहीं, अनाड़ी भी चलेंगे और वे कितना भारी नुकसान उठाएंगे। राम के रास्ते चलकर अनाड़ी का भी अधिक नहीं बिगड़ता, चाहे बनना भी कम होता है। अनाड़ी ने कुरु-पांचाल संधि का क्या किया?

 

कुरु-धुरी की आधार-शिला थी कुरु-पांचाल संधि। आसपास के इन दोनों इलाकों का वज्र समान एका कायम करना था जो कृष्ण ने उन लीलाओं के द्वारा किया, जिनसे पांचाली का विवाह पांचों पांडवों से हो गया। यह पांचाली भी अद्भुत नारी थी। द्रौपदी से बढ़कर, भारत की कोई प्रखर-मुखी और ज्ञानी नारी नहीं। कैसे कुरु सभा को उत्तर देने के लिए ललकारती है कि जो आदमी अपने को हार चुका है क्या दूसरे को दांव पर रखने की उसमें स्?वतंत्र सत्?ता है?

 

पांचों पांडव और अर्जुन भी उसके सामने फीके थे। यह कृष्णा तो कृष्ण के ही लायक थी। महाभारत का नायक कृष्ण, नायिका कृष्णा। कृष्णा और कृष्ण का संबंध भी विश्व-साहित्य में बेमिसाल है। दोनों सखा-सखी का संबंध पूर्ण रूप से मन की देन थी या उसमें कुरु-धुरी के निर्माण और फैलाव का अंश था? जो हो, कृष्णा और कृष्ण का यह संबंध राधा और कृष्ण के संबंध से कम नहीं, लेकिन साहित्यिकों और भक्तों की नजर इस ओर कम पड़ी है। हो सकता है कि भारत की पूर्व-पश्चिम एकता के इस निमार्ता को अपनी ही सीख के अनुसार केवल कर्म, न कि कर्मफल का अधिकारी होना पड़ा, शायद इसलिए कि यदि वह व्यस्क कर्मफल-हेतु बन जाता, तो इतना अनहोना निमार्ता हो ही नहीं सकता था। उसने कभी लालच न की कि अपनी मथुरा को ही धुरी-केंद्र बनाए, उसके लिए दूसरों का इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर ही अच्छा रहा। उसी तरह कृष्णा को भी सखी रूप में रखा, जिसे संसारी अपनी कहता है, वैसी न बनाया। कौन जाने कृष्ण के लिए यह सहज था या इसमें भी उसका दिल दुखा था।

 

कृष्णा अपने नाम के अनुरूप सांवली थी, महान सुंदरी रही होगी। उसकी बुद्धि का तेज, उसकी चकित-हरिणी आंखों में चमकता रहा होगा। गोरी की अपेक्षा सुंदर सांवली, नखशिख और अंग में अधिक सुडौल होती है। राधा गोरी रही होगी। बालक और युवक कृष्ण राधा में एकरस रहा। प्रौढ़ कृष्ण के मन पर कृष्णा छाई रही होगी, राधा और कृष्ण तो एक थे ही। कृष्ण की संतानें कब तक उसकी भूल दोहराती रहेंगी। बेखबर जवानी में गोरी से उलझना और अधेड़ अवस्था में श्यामा को निहारना। कृष्ण-कृष्णा संबंध में और कुछ हो न हो, भारतीय मर्दों को श्यामा की तुलना में गोरी के प्रति अपने पक्षपात पर ममन करना चाहिए।

 

रामायण की नायिका गोरी है। महाभारत की नायिका कृष्णा है। गोरी की अपेक्षा सांवली अधिक सजीव है। जो भी हो, इसी कृष्ण-कृष्णा संबंध का अनाड़ी हाथों फिर पुनर्जन्म हुआ। न रहा उसमें कर्मफल और कर्मफल हेतु त्याग। कृष्णा पांचाल यानी कन्नौज के इलाके की थी, संयुक्ता भी। धुरी-केंद्र इंद्रप्रस्थ का अनाड़ी राजा पृथ्वीराज अपने पुरखे कृष्ण के रास्ते न चल सका। जिस पांचाली द्रौपदी के जरिए कुरु-धुरी की आधार-शिला रखी गई, उसी पांचाली संयुक्ता के जरिए दिल्ली-कन्नौज की होड़ जो विदेशियों के सफल आक्रमणों का कारण बना। कभी-कभी लगता है कि व्यक्ति का तो नहीं लेकिन इतिहास का पुनर्जन्म होता है, कभी फीका कभी रंगीला। कहां द्रौपदी और कहां संयुक्ता, कहां कृष्ण और कहां पृथ्?वीराज, यह सही है। फीका और मारात्मक पुनर्जन्म लेकिन पुनर्जन्म तो है ही।

 

कृष्ण की कुरु-धुरी के और भी रहस्य रहे होंगे। साफ है कि राम आदर्शवादी एकरूप एकत्व का निमार्ता और प्रतीक था। उसी तरह जरासंध भौतिकवादी एकत्व का निमार्ता था। आजकल कुछ लोग कृष्ण और जरासंध युद्ध को आदर्शवाद-भौतिकवाद का युद्ध मानने लगे हैं। वह सही जंचता है, किंतु अधूरा विवेचन। जरासंध भौतिकवादी एकरूप एकत्व का इच्?छुक था। बाद के मगधीय मौर्य और गुप्त राज्यों में कुछ हद तक इसी भौतिकवादी एकरूप एकत्व का प्रादुर्भाव हुआ और उसी के अनुरूप बौद्ध धर्म का। कृष्ण आदर्शवादी बहुरूप एकत्व का निर्माता था। जहां तक मुझे मालूम है, अभी तक भारत का निर्माण भौतिकवादी एकत्व के आधार पर कभी नहीं हुआ। चिर चमत्कार तो तब होगा जब आदर्शवाद और भौतिकवाद के मिले-जुले बहुरूप एकत्व के आधार पर भारत का निर्माण होगा। अभी तक तो कृष्ण का प्रयास ही सर्वाधिक मानवीय मालूम होता है, चाहे अनुकरणीय राम का एकरूप एकत्व ही हो। कृष्ण की बहुरूपता में वह त्रिकाल-जीवन है जो औरों में नहीं।

 

कृष्ण यादव-शिरोमणि था, केवल क्षत्रिय राजा ही नहीं, शायद क्षत्री उतना नहीं था, जितना अहीर। तभी तो अहीरिन राधा की जगह अडिग है, क्षत्राणी द्रौपदी उसे हटा न पाई। विराट् विश्व और त्रिकाल के उपयुक्त कृष्ण बहुरूप था। राम और जरासंध एकरूप थे, चाहे आदर्शवादी एकरूपता में केंद्रीयकरण और क्रूरता कम हो, लेकिन कुछ न कुछ केंद्रीयकरण तो दोनों में होता है। मौर्य और गुप्त राज्यों में कितना केंद्रीयकरण था, शायद क्रूरता भी।

 

बेचारे कृष्ण ने इतनी नि:स्वार्थ मेहनत की, लेकिन जन-मन में राम ही आगे रहा है। सिर्फ बंगाल में ही मुर्दे - 'बोल हरि, हरि बोल' के उच्चारण से - अपनी आखरी यात्रा पर निकाले जाते हैं, नहीं तो कुछ दक्षिण को छोड़कर सारे भारत में हिंदू मुर्दे 'राम नाम सत्य है' के साथ ही ले जाए जाते हैं। बंगाल के इतना तो नहीं, फिर भी उड़ीसा और असम में कृष्ण का स्?थान अच्छा है। कहना मुश्किल है कि राम और कृष्ण में कौन उन्नीस, कौन बीस है। सबसे आश्चर्य की बात है कि स्वयं ब्रज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहां एक-दूसरे को 'जैरामजी' से नमस्ते करते हैं। सड़क चलते अनजान लोगों को भी यह 'जैरामजी' बड़ा मीठा लगता है, शायद एक कारण यह भी हो।

 

राम त्रेता के मीठे, शांत और सुसंस्कृत युग का देव है। कृष्ण पके, जटिल, तीखे और प्रखर बुद्धि युग का देव है। राम गम्?य है, कृष्ण अगम्य है। कृष्ण ने इतनी अधिक मेहनत की कि उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैं, यदि बनाते भी हैं तो उसके मित्रभेद ओर कूटनीति की नकल करते हैं, उसका अथक निस्व उनके लिए असाध्?य रहता है। इसीलिए कृष्ण हिंदुस्तान में कर्म का देव न बन सका। कृष्ण ने कर्म राम से ज्यादा किए हैं। कितने संधि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी संबंधों के धागे उसे पलटने पड़ते थे। यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था। इसके यह मतलब नहीं कि प्रदेशों के आपसी संबंधों में कृष्णनीति अब भी चलाई जाए। कृष्ण जो पूर्व-पश्चिम की एकता दे गया, उसी के साथ-साथ उस नीति का औचित्य भी खत्म हो गया। बच गया कृष्ण का मन और उसकी वाणी। और बच गया राम का कर्म। अभी तक हिंदुस्?तानी इन दोनों का समन्वय नहीं कर पाए हैं। करें तो राम के कर्म में भी परिवर्तन आए। राम रोऊ है, इतना कि मयार्दा भंग होती है। कृष्ण कभी रोता नहीं। आंखें जरूर डबडबाती हैं उसकी, कुछ मौकों पर, जैसे जब किसी सखी या नारी को दुष्ट लोग नंगा करने की कोशिश करते हैं।

पुस्तक समीक्षा : कबीर की जाति और सवाल

- नवल किशोर कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमए, एमफ़िल और फ़िर पीएचडी करने वाले कमलेश वर्मा वाराणसी के राजकीय महिला महाविद्यालय, सेवापुरी में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हैं। इनसे मुलाकात तब हुई थी जब मैं दिल्ली में फ़ारवर्ड प्रेस नामक एक वैचारिक पत्रिका का उपसंपादक था। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज के सभागार में दलित-बहुजन साहित्य विषयक एक कार्यक्रम के दौरान श्री वर्मा से परिचय हुआ था। तकरीबन साढे तीन वर्षों के बाद कुछ दिनों पहले फ़ेसबुक के जरिए एक फ़िर से बातचीत शुरु हुई। उन्होंने मेरे घर का पता मांगा और अपनी एक किताब भेज दी। किताब कबीर पर केंद्रित है और शीर्षक है - जाति के प्रश्न पर कबीर।

 

पूरी किताब में कबीर की जाति को लेकर विवेचना की गयी है। यह साहसपूर्ण लेखन है। खासकर आजकल के बौद्धिक समाज में। कोई अपनी जाति नहीं बताना चाहता है। कुछ लोग अपने नाम के साथ अपनी जाति को जोड़ते जरुर हैं लेकिन अपनी रचनाओं में इससे इन्कार भी करते हैं। उदाहरण के तौर पर मशहूर साहित्यकार फ़णीश्वरनाथ रेणु ने आजीवन अपनी जाति से इन्कार किया। हालांकि उनमें इतनी इमानदारी जरुर रही कि अपनी कालजयी रचना मैला आंचल में उन्होंने सामंती और वर्ण व्यवस्था पर माकूल प्रहार किया। अपवाद के रुप में आप चाहें तो हंस के संपादक राजेन्द्र यादव और ओबीसी साहित्य को आगे बढाने वाले प्रो राजेन्द्र प्रसाद सिंह आदि का नाम लिया जा सकता है। इसी कड़ी में कमलेश वर्मा का नाम भी जोड़ा जा सकता है जिन्होंने जाति को लेकर जयघोष किया है।

 

अपनी किताब की शुरुआत में ही श्री वर्मा बेबाकी से लिखते हैं - कबीर को दलित बताए जाने का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि आज कबीर दलित बताए गए हैं और इसके पहले विधवा ब्राह्म्णी के पुत्र। आज एक बार फ़िर कबीर की जाति पर विचार करते हुए बताना जरुरी हो गया है कि कबीर जुलाहा थे- पिछड़ी जाति के मुसलमान। कबीर ने इस्लाम को अस्वीकार किया, हिंदू धर्म की आलोचना की - यह भिन्न बात है। मगर उनकी सामाजिक पहचान यही थी कि वे पिछड़ी जाति के थे।

 

अपने इस कथन के समर्थन में श्री वर्मा तर्क देते हैं। कबीर जुलाहा थे, फ़लतः मुसलमान थे - इस सीधी-सादी बात को विकृत करने की गलती/कोशिश बार-बार हुई है। विधवा ब्राह्म्णी के पुत्र होने की बात से लेकर दलित होने तक की बात को क्षेपक मान लिया जाना चाहिए। दलित होने की अनिवार्य शर्त है - अस्पृश्यता! "जुलाहा" पिछड़ी जाति है और मुसलमान है। "अस्पृश्यता" का संबंध हिन्दू धर्म से है। उपर्युक्त तथ्य को ध्यान में रखा जाय तो डा धर्मवीर की कबीर संबंधी आलोचना का बहुत बड़ा हिस्सा निरर्थक हो जाएगा तथा उनके चिंतन का मूलाधार ही खिसक जाएगा।

 

हालांकि अपने साहसपूर्ण लेखन में भी कमलेश वर्मा जी ने मध्यमार्ग अपनाने का प्रयास किया है जो मेरे विचार से आवश्यक नहीं जान पड़ता है। मसलन एक जगह उन्होंने लिखा है - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर मार्क्सवादी परंपरा तक ने कबीर को भूलवश/जानबुझकर दलित बनाया। जिस तरह से श्री वर्मा ने अपनी पुस्तक में वैज्ञानिक व साहित्यिक तरीके से कबीर की जाति और इसके पीछे षडयंत्र का खुलासा किया है, उसे देखते हुए "भूलवश" लिखने की आवश्यकता नहीं थी। वजह यह कि अपनी पुस्तक में ही वे इस बात का उल्लेख करते हैं कि किस तरह से डा धर्मवीर और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर नामवर सिंह तक ने कबीर को अपने-अपने हिसाब से गैर पिछड़ा साबित करने का प्रयास किया है। वे आजकल के दलित साहित्यकारों व समालोचकों की भी तथ्यपूर्ण तरीके से आलोचना करते हैं जो कबीर को दलित साबित करने पर तुले हैं।

 

श्री वर्मा लिखते हैं - कबीर को पिछड़ी जाति का बताने के पीछे ऐसी कोई मंशा नहीं है कि कबीर कविता का मूल्यांकन एकदम बदल दिया जाय। मगर इतना तो करना ही पड़ेगा कि कबीर को दलित मानकर जो आलोचनाएं लिखी गयी हैं, उन्हें खारिज करना पड़ेगा। कबीर की कवितायें यदि दलित विमर्श के अनुकूल हैं तो अच्छी बात है, मगर उन्हें दलित मान लेने के कारण यदि यह अनुकूलता बनायी गयी है तो इसे संशोधित करने की भी आवश्यकता है। श्री वर्मा द्वारा लिखी गयी समालोचनात्मक आलेखों की श्रृंखला के पहले लेख में ही "कबीर दलित नहीं थे" को पढकर थोड़ी हैरानी भी हुई और एक सकारात्मक ऊर्जा भी मिली। हैरानी इसलिए कि श्री वर्मा बड़ी मजबूती के साथ दलित साहित्य के ध्वजवाहकों पर करारा प्रहार करते हैं लेकिन इन ध्वजवाहकों के द्वारा कही गयी बातों को कहने से परहेज भी करते हैं। बेहतर तो यह होता कि कबीर को दलित साबित करने वाले साहित्यिक लेखों व समालोचनाओं को भी यथोचित सम्मान दिया जाता। सकारात्मक ऊर्जा मिलने से मेरा आशय यह है कि आज वंचितों का साहित्य जो मेरी नजर में दलित साहित्य और ओबीसी साहित्य का समुच्चय है, इक्कीसवीं सदी में नयी अंगड़ाई ले रहा है। खासकर कमलेश वर्मा जब नामवर सिंह के प्रगतिशील शैली पर सवाल उठाते हैं। वह भी पूरे प्रमाण के साथ।

 

वे लिखते हैं - कबीर को दलित विमर्श ने अपना प्रतीक बनाया है। अबतक डा धर्मवीर की कई पुस्तकें कबीर पर छप चुकी हैं, जो बड़े पैमाने पर पढी गई हैं तथा पाठकों को वैचारिक उत्तेजना प्रदान कर गई हैं। स्वयं नामवर जी डा धर्मवीर के कबीर-संबंधी लेखन को महत्वपूर्ण मानते हैं, "निश्चित रुप से बहुत बड़ा काम डा धर्मवीर ने किया है।" नामवर जी एक साक्षात्कार में डा धर्मवीर की कबीर-संबंधी आलोचना को दलित आलोचना की संज्ञा देते हैं तथा उनके इस दृष्टि की प्रशंसा भी करते हैं। अपनी किताब में कमलेश वर्मा "जुलाहा" और "कोरी" शब्द का उल्लेख करते हैं, जिनका जिक्र स्वयं कबीर ने अपनी जाति बतलाने के लिए किया है। वे तर्क देते हैं कि डा धर्मवीर कबीर को "कोरी" के रुप में स्वीकारते हैं जो जुलाहा का हिन्दू संस्करण था। वे जुलाहा को नकारते हैं।

 

श्री वर्मा की पुस्तक "जाति के प्रश्न पर कबीर" की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके आधे भाग में कबीर के उन दोहों और छंदों को संकलित किया गया है जिनके जरिए कबीर ने जाति के सवाल को खड़ा किया है। छंदों की संख्या करीब पौने तीन सौ है। एक छंद पर गौर करें।

बोलो साधो अमृत बानी, बरघै कम्बल भीजै पानी।

नौका डूबै शिल उतराय, मछली धर के बगुलहि खाय।

धरती बरषै सूर्य नहाय, ओंरियक पानि बरेड़िया जाय।

तर भौ घड़ा उपर पनिहारि, लड़का गोद खेले महतारि।

ठाढे डोम को फ़ारै बांस, बकरा बेचत चिक के मांस।

मूसे कूकर भूके चोर, चमरा के निकियावे ढोर।

यह ब्राह्म्ण के उलटा ज्ञान, मूते इन्द्रिय बांधे कान।

कहहिं कबीर सुनो नर लोई, यह पद बूझै बिरला कोई।

 

निश्चित तौर पर श्री वर्मा कबीर के इन छंदों के जरिए आज की पीढी को उस कबीर से साक्षात्कार करवा रहे हैं जो कबीर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह जैसे सवर्ण साहित्य समालोचकों के पक्षपातपूर्ण लेखन के कारण ओझल से हो गये थे। श्री वर्मा उस कबीर को प्रस्तुत करते हैं जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था की बुनियाद के रुप में उभरे थे और उनके काव्यात्मक संघर्ष के कारण तब से लेकर आजतक ब्राह्म्णवादी समाज की चूलें हिल रही हैं। कबीर का एक छंद यह भी देखें -

साधो हर में हरि को देखा।

आप माल और आप खजाना, आपे खरचन वाला।

आप गली गलि भिक्षा मांगे, लिये हाथ में प्याला।

आपही मदिरा आपे भाठी, आप चुलावन वाला।

आप सुराही आपे प्याला, आप फ़िरै मतवाला।

आपहि नैना आपहि सैना, आपहि कजरा वाला।

आप गोद में आप खेलावे, आपे मोहन माला।

ठाकुर द्वारे ब्राह्म्ण बैठा, मक्का में दरवेशा।

कहै कबीर सुनो भाई साधो! हरि जैसा को तैसा।

 

बहरहाल कमलेश वर्मा जी का प्रयास एक सराहनीय प्रयास है, जो कबीर की जाति को लेकर अबतक फ़ैलाये गये भ्रमजाल को तोड़ने का सफ़ल प्रयास सरीखा है। इस प्रकार कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि पुस्तक के जरिए श्री वर्मा ने कबीर को उनके वास्तविक स्वरुप में प्रस्तुत किया है। अपनी पूरी ईमानदारी और साहस के साथ।

समीक्षित पुस्तक : जाति के प्रश्न पर कबीर

लेखक : कमलेश वर्मा

प्रकाशक : पेरियार प्रकाशन, पटना

मूल्य : अजिल्द 149 रुपए, सजिल्द 249 रुपए

बहस-तलब : ओबीसी साहित्य की कसौटी पर प्रेमचंद साहित्य

दोस्तों, कई बार भ्रम की स्थिति रहती है कि ओबीसी साहित्य का दायरा महज कुछ आरक्षित वर्ग की जातियों तक सीमित है। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। ओबीसी में शामिल कई जातियां ऐसी हैं जो किसी एक राज्य में पिछड़ा वर्ग में शामिल है तो दूसरे राज्य में अनारक्षित वर्ग में। इसलिए ओबीसी विमर्श को एक श्रम आधारित सामाजिक व्यवस्था वाले समाज के साहित्यिक विमर्श से जोड़कर देखा जाना चाहिए। ठीक वैसा ही जैसा कभी प्रेमचंद ने किया था। उन्होंने अपने साहित्य में समाज के वंचित तबके को स्थान तो दिया था। लेकिन कई बार वे अपने जातिगत या फिर यूं कहें कि अपनी सामाजिक परिधि से बाहर निकल ही नहीं सके। इसके कई उदाहरण उनके द्वारा रचित पात्र प्रस्तुत करते हैं।

 

हिन्दी के तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य में वंचित समाज की पीड़ा और उसके अनुभव आदि की खोज एवं पात्रों की गतिविधियों के चित्रण एवं प्रतिस्थापन के प्रयास को समकालीन हिंदी साहित्य के विकास की विशिष्ट स्थिति मानी जानी चाहिए। ऐसे किसी भी प्रयास की यह मांग स्वभाविक है कि तथाकथित मुख्यधारा के साहित्यकोश में यदि किसी जाति-विशेष को लेकर कुत्सित प्रतिस्थापनाएं एवं दृष्टिकोण विद्यमान हैं तो उन्हें आलोचनात्मक ढंग से विश्लेषित किया जाये। ऐसे कुछ प्रयास किये भी जा रहे हैं। इनका हिन्दी के प्रतिष्ठित कथाकार एवं परिवर्तनकामी विचारक प्रेमचंद से जूझना भी काफी स्वभाविक सा है।

 

वजह यह कि प्रेमचंद हिन्दी साहित्य खासकर गद्य लेखन के मामले में सबसे अग्रणी रहे हैं। उनकी रचनाओं में व्यापक विभिन्नता थी और पूरा भारतीय परिवेश समावेशित था। मसलन हलकू में वे एक किसान की पीड़ा को बयां करते हैं तो उसी कहानी में मनुष्य व पशु के प्रेम को भी बखूबी दर्शाते हैं। हालांकि उनकी एक और मशहूर कहानी नमक का दारोगा एक और उदाहरण है जो हमें प्रेमचंद साहित्य की एक खास सीमा का अहसास कराता है। इस कहानी में प्रेमचंद अद्भूत तरीके से भ्रष्टाचार का महिमामंडन करते हैं। एक ईमानदार दारोगा जिसने एक भ्रष्ट आचरण करने वाले पंडित व्यापारी को पहले तो सलाखों के पीछे पहुंचाया, लेकिन बाद में वह उसी के चरणों में लोट गया।

 

हिन्दी साहित्य समालोचना के क्षेत्र में इन प्रयासों ने दो दृष्टिकोणों को हमारे सामने रखा है। एक दृष्टिकोण डा. धर्मवीर व अन्य के नेतृत्व में प्रेमचंद पर दलित पात्रों के-विशेषत: 'कफन कहानी (1935-36) का हवाला देते हुए-लम्पटीकरण और सामंती मूल्यों एवं वर्णव्यवस्था की पक्षधरता का आरोप लगाता है। तो दूसरा खेमा प्रेमचंद की कहानियों को यथार्थवादी और संभवत: प्राकृतिकवादी मानते हुए माधव एवं घीसू जैसे पात्रों के व्यवहार की ऐतिहासिक भौतिकवादी व्याख्या प्रस्तुत करता है। साथ ही यह आग्रह भी करता है कि अभिवंचितों के जीवन से जुड़ी प्रेमचंद की अन्य सराहनीय एवं अंतर्दृष्टिपूर्ण कहानियों को भी बहस का आधार बनाया जाए। राजीव रंजन गिरि के संपादन में आया 'घासवाली: प्रेमचंद की दलित जीवन से जुड़ी कहानियों का संकलन' इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

यह संकलन 'दलित' शब्द की वर्तमान जातीय पहचान एवं सरकारी अनुसूचिका में प्रस्तुत अर्थ पर आधारित दिखता है। इसके अनुसार सरकारी आंकड़े में अनुसूचित जाति शीर्षक से संकलित जातियां ही मात्र भारतीय समाज का 'दलित' समुदाय है। लेकिन हमारा सवाल इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि 'दलितों' का राजनीतिक-सामाजिक दर्शन शोषित, दमित और हाशियाकृत सामाजिक समूह की ओर इशारा करता है। उल्लेखनीय है कि 1960 के दशक में दलित शब्द अपने इसी अर्थ में भारतीय राजनीतिक संस्कृति से उत्पन्न हुआ था। अनुसूचित जाति में संकलित जातियों की सूची बनती-घटती-बढ़ती रही है। प्राय: 1950 एवं इसके बाद से। ऐसे में इस सवाल के जवाब का अभाव संपादकीय दृष्टि की एक कमी मालूम होती है। प्रस्तुत कहानियों के अध्ययन से प्रेमचंद में 1911 से 1936 के बीच दलितों के तीन अर्थों का विकास दिखता है। शुरूआती कहानियों में वे सिर्फ अछूतों को केन्द्र में रखते हैं। 1926-27 की 'कजाकी' और 'मंदिर' कहानियों से आगे कुछ गैर-अछूत शोषित-दमित और विभेदीकृत जातियां भी शामिल होती हैं। 1931 आते-आते उनकी 'लांछन' कहानी में बवुआइन देवीरानी जैसी महिला भी किसी दलित से भिन्न नहीं दिखती हैं। वस्तुत: इस कहानी में मुन्नु मेहतर की तुलना में देवीरानी 'दलित' जीवन की परिभाषा के कुछ ज्यादा अनुकूल दिखती है।

 

प्रेमचंद की कहानियों में 'दलित' के माने की खोज से जुड़ा दूसरा अहम सवाल है : उनकी कहानियों में दलित सवाल एवं समस्या क्या है? इस पर भी यह संकलन प्राय: चुप-सा दिखता है। हम देखते हैं कि उनकी शुरूआती कहानियों में महज छुआछूत जैसी हिंदू समाज की नैतिक बुराई 'दलित समस्या' है, और हिंदू समाज का सुधार एवं छुआछूत का अंत ही बड़ा दलित सवाल है। उल्लेखनीय है कि यह समस्या और सवाल इन कहानियों में विशिष्ट रूप से ऊंची जातियों के सुधारवादी आंदोलन के प्रश्न मात्र हैं। इन कहानियों के केन्द्रीय पात्र भी ऐसे ही व्यक्तित्व रहे हैं।

 

संकलन के सम्पादक ने सही ही कहा है कि प्रेमचंद के दलित पात्रों का वैचारिक विकास हुआ है। 'सद्गति' (1930-31) के 'दुखी' की तुलना में 'घासवाली' (1927), 'कफन' (1935-36) के पात्र शोषणकारी चक्र को समझते हैं, प्रतिरोध करते हैं और चुनौती देते हुए नजर आते हैं। जबकि, पुस्तक की प्रस्तावना में उस वैचारिक विकास-उभरते प्रतिरोधों एवं चुनौती देने के प्रयासों को अर्थार्त दलित मुक्ति संघर्ष की दिशा और स्वरूप के विश्लेषण का अभाव शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। वस्तुत: 'घासवाली' (1929) की मुलिया, 'ठाकुर का कुआं' (1931) की गंगी, 'दूध का दाम' (1934), 'कफन' (1935-36) के माधव और घीसू के प्रतिरोधों की दिशा और स्वरूप अलग-अलग दिखते हैं, वरन मुलिया का प्रतिरोध जहां सशक्त, चुनौतीपूर्ण ढंग से स्वतंत्र व सम्मानपूर्ण जीवन के लिए था, वहीं माधव और घीसू की चुनौती प्रतिगामी अल्पकालिक मस्ती भरे जीवन की राह की ओर ले जाता है और सम्पादक द्वारा ऐसे प्रतिरोध का उत्सवीकरण और इसे दलित जीवन के विशिष्ट अनुभव से जोड़ना शायद ही सराहनीय लगे।

 

प्रेमचंद साहित्य के संबंध में आज विद्वानों में अमूमन सहमति है कि प्रेमचंद का वैचारिक पक्ष शुरूआती दौर में 'विचारवाद' एवं 'व्यवहारवाद' के बेहद करीब था। कुछ लोग गलती से इसे प्रेमचंद का गांधीवादी चरण मानते हैं, क्योंकि 1911-13 की उनकी कहानियों पर शायद ही अमूर्त गांधीवादी सुधारवाद एवं विचारवाद का प्रभाव हो। इसके बाद की कहानियों में प्रेमचंद समाजवादी-संरचनावादी विचारक के रूप में विकसित होते हुए दिखते हैं। एक उदारण ठाकुर का कुआं कहानी है। कहना गलत नहीं होगा कि प्रेमचंद भारतीय समाज के आर्थिक संबंधों-व्यवस्था को सामाजिक-जातीय शोषण की धुरी भी समझने लगे थे।

 

यह भी अतिश्योक्ति नहीं मानी जानी चाहिए कि अपने विश्लेषण में प्रेमचंद समकालीन समाजवादी-साम्यवादी लोगों से एक मामले में आगे भी दिखाई देते हैं। इस समय के समाजवादी-साम्यवादी जहां 'आर्थिक नियतिवाद' की धारणा के शिकार थे, वहीं प्रेमचंद 1932 से 1936 के बीच की कहानियों में मानव का अपने भविष्य, इतिहास निर्माण के प्रयास और इन प्रयासों की सफलता-असफलता को भी मानव की जीवन दशा के लिए जिम्मेदार, स्वतंत्र और एकमात्र कारक के रूप में चिन्हित करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस दार्शनिक मत को 1960 के दशक में फ्रांसीसी संरचनावादी 'अलयूजर' के वरक्स ब्रिटिश इतिहासकार-सिद्धांतकार ई.पी. थाम्पसन ने रखा था (पॉवर्टी आॅफ थ्योरी- 'ई.पी. थाम्पसन)।

 

इस अंतर्दृष्टि के बावजूद प्रेमचंद के विश्लेषण एवं वैचारिक आधार की एक गंभीर सीमा भी इन कहानियों में मौजूद है। दलितों का तबका दोहरी गुलामी अंग्रेजी सत्ता और ब्राह्मणवाद झेल रहा था। लेकिन, वह इस बात पर मौन हैं कि किस प्रकार दोनों प्रकार की गुलामी के तंत्र एक-दूसरे से गुंथे थे या ब्राह्मणवादी गुलामी का राजनीतिक गठन कैसा था? औपनिवेशिक गुलामी किस प्रकार ब्राह्मणवादी गुलामी को संरक्षण प्रदान कर रहा था? क्या दोनों एक-दूसरे को मजबूती नहीं प्रदान कर रहे थे? संभवत: इन प्रश्नों के जवाब की अनुपस्थिति प्रेमचंद के दलित पात्रों की किसी राजनीतिक तैयारी की गैर मौजूदगी की ओर भी इशारा करता है। जबकि, हम जानते हैं कि 1930 के दशक के पूर्वार्ध में भी दक्षिण भारत और बिहार के सारण जिले में दलित राजनीतिक लामबंदी की ओर बढ़ रहे थे। ऐसे में कोई यदि यह आरोप लगाता है कि प्रेमचंद के तथाकथित विद्रोही दलित पात्र शायद ही मजबूत एवं प्रभावशाली विद्रोही एवं विचारक के रूप में नजर आते हैं, तो यह गलत नही लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि 1934 से 1936 की कहानियों में प्रेमचंद पूर्वी उत्तर प्रदेश के दलित समाज और किसान समाज के भीतर अपनी स्थिति में परिवर्तन के लिए किये जा रहे प्रयासों की खोज करते हैं, लेकिन उनकी 'निराशा' कफन में किसानों के 'विचार शून्य समूहै के उपर व्यंग्यात्मक टिप्पणी के रूप में सामने आती है।

परशुराम जयंती पर विशेष : ब्राह्म्ण या भुमिहार नहीं थे परशुराम !

दोस्तों, यह सर्वविदित है कि भारत एक धर्म प्रधान देश है। खासकर हिन्दू धर्म ग्रंथों के आधार पर भारत का मूल्यांकन करें तो हम पाते हैं कि धर्म ही इस देश का असली आधार है। वहीं धर्म वैसे तो महज एक जीवनशैली है जिसे संविधान में स्वीकारा गया है और हर किसी को अपने हिसाब से अपनी अभिरूचि के हिसाब से धर्म का आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि धर्म का एक इस्तेमाल सत्तात्मक वर्चस्व के लिए किया जाता रहा है। रही सही कसर ग्रंथकारों और इतिहासकारों ने पूर्ण कर दी है। परिणाम यह हुआ है कि आज धर्म को लेकर जितनी मतभिन्नतायें भारतीय समाज में हैं, उतनी मतभिन्नता किसी और देश में नहीं है। ऐसी ही मतभिन्नता परशुराम को लेकर है। बा्रह्म्णवादियों ने परशुराम को भगवान की उपाधि दी है। सबसे दिलचस्प यह है कि परशुराम की जो परिकल्पना ग्रंथों में की गयी है उसके अनुसार उनका मुख्य पेशा पांडित्य नहीं था, बल्कि वे एक श्रम आधारित उद्यमी थे। हिन्दु ग्रंथों में कई स्थानों पर उनके रथकार होने का उल्लेख मिलता है। रथकार यानी रथ बनाने वाले। संभवत: यही वजह रही कि परशुराम की परिकल्पना में उनके लिए जिस अस्त्र की कल्पना की गयी है, वह एक कुल्हाड़ी है, जिसका इस्तेमाल सामान्य तौर पर लकड़ी काटने के लिए किया जाता है। इससे भी दिलचस्प यह है कि बिहार के भुमिहार समाज के लोग उन्हें अपना अराध्य मानते हैं। वहीं दूसरी ओर विश्वकर्मा समाज के लोग अपने पुरोधा।

प्राचीन ग्रंथो उपनिषद एवं पुराण आदि का अवलोकन करें तो पायेगें कि आदि काल से ही विश्वकर्मा शिल्पी अपने विशिष्ट ज्ञान एवं विज्ञान के कारण ही न मात्र मानवों अपितु देवगणों द्वारा भी पूजित और वंदित है । भगवान विश्वकर्मा के आविष्कार एवं निर्माण कोर्यों के सन्दर्भ में इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी आदि का निर्माण इनके द्वारा किया गया है । पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोगी होनेवाले वस्तुएं भी इनके द्वारा ही बनाया गया है । कर्ण का कुण्डल, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान का त्रिशुल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है ।

भगवान विश्वकर्मा ने ब्रम्हाजी की उत्पत्ति करके उन्हे प्राणीमात्र का सृजन करने का वरदान दिया और उनके द्वारा 84 लाख योनियों को उत्पन्न किया । श्री विष्णु भगवान की उत्पत्ति कर उन्हे जगत में उत्पन्न सभी प्राणियों की रक्षा और भगण-पोषण का कार्य सौप दिया । प्रजा का ठीक सुचारु रुप से पालन और हुकुमत करने के लिये एक अत्यंत शक्तिशाली तिव्रगामी सुदर्शन चक्र प्रदान किया । बाद में संसार के प्रलय के लिये एक अत्यंत दयालु बाबा भोलेनाथ श्री शंकर भगवान की उत्पत्ति की । उन्हे डमरु, कमण्डल, त्रिशुल आदि प्रदान कर उनके ललाट पर प्रलयकारी तिसरा नेत्र भी प्रदान कर उन्हे प्रलय की शक्ति देकर शक्तिशाली बनाया । यथानुसार इनके साथ इनकी देवियां खजाने की अधिपति माँ लक्ष्मी, राग-रागिनी वाली वीणावादिनी माँ सरस्वती और माँ गौरी को देकर देंवों को सुशोभित किया।

हमारे धर्मशास्त्रो और ग्रथों में विश्वकर्मा के पाँच स्वरुपों और अवतारों का वर्णन प्राप्त होता है ।

विराट विश्वकर्मा - सृष्टि के रचेता

धर्मवंशी विश्वकर्मा - महान शिल्प विज्ञान विधाता प्रभात पुत्र

अंगिरावंशी विश्वकर्मा - आदि विज्ञान विधाता वसु पुत्र

सुधन्वा विश्वकर्म - महान शिल्पाचार्य विज्ञान जन्मदाता ऋशि अथवी के पात्र

भृंगुवंशी विश्वकर्मा - उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य (शुक्राचार्य के पौत्र )

देवगुरु बृहस्पति की भगिनी भुवना के पुत्र भौवन विश्वकर्मा की वंश परम्परा अत्यंत वृध्द है।सृष्टि के वृध्दि करने हेतु भगवान पंचमुख विष्वकर्मा के सघोजात नामवाले पूर्व मुख से सामना दूसरे वामदेव नामक दक्षिण मुख से सनातन, अघोर नामक पश्चिम मुख से अहिंमून, चौथे तत्पुरुष नामवाले उत्तर मुख से प्रत्न और पाँचवे ईशान नामक मध्य भागवाले मुख से सुपर्णा की उत्पत्ति शास्त्रो में वर्णित है। इन्ही सानग, सनातन, अहमन, प्रत्न और सुपर्ण नामक पाँच गोत्र प्रवर्तक ऋषियों से प्रत्येक के पच्चीस-पच्चीस सन्ताने उत्पन्न हुई जिससे विशाल विश्वकर्मा समाज का विस्तार हुआ है ।

शिल्पशास्त्रो के प्रणेता बने स्वंय भगवान विश्वकर्मा जो ऋषशि रुप में उपरोक्त सभी ज्ञानों का भण्डार है, शिल्पो कें आचार्य शिल्पी प्रजापति ने पदार्थ के आधार पर शिल्प विज्ञान को पाँच प्रमुख धाराओं में विभाजित करते हुए तथा मानव समाज को इनके ज्ञान से लाभान्वित करने के निर्मित पाणच प्रमुख शिल्पायार्च पुत्र को उत्पन्न किया जो अयस ,काष्ट, ताम्र, शिला एंव हिरण्य शिल्प के अधिषश्ठाता मनु, मय, त्वष्ठा, शिल्पी एंव दैवज्ञा के रुप में जाने गये । ये सभी ऋषि वेंदो में पारंगत थे ।

कन्दपुराण के नागर खण्ड में भगवान विश्वकर्मा के वशंजों की चर्चा की गई है । ब्रम्ह स्वरुप विराट श्री.विश्वकर्मा पंचमुख है । उनके पाँच मुख है जो पुर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऋषियों को मत्रों व्दारा उत्पन्न किये है । उनके नाम है झ्र मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ ।

ऋषि मनु विष्वकर्मा - ये "सानग गोत्र" के कहे जाते है । ये लोहे के कर्म के उध्दगाता है । इनके वशंज लोहकार के रुप मे जानें जाते है ।

सनातन ऋषि मय - ये सनातन गोत्र कें कहें जाते है । ये बढई के कर्म के उद्धगाता है। इनके वंशंज काष्टकार के रुप में जाने जाते है।

अहभून ऋषि त्वष्ठा - इनका दूसरा नाम त्वष्ठा है जिनका गोत्र अहंभन है । इनके वंशज ताम्रक के रूप में जाने जाते है ।

प्रयत्न ऋषि शिल्पी - इनका दूसरा नाम शिल्पी है जिनका गोत्र प्रयत्न है । इनके वशंज शिल्पकला के अधिष्ठाता है और इनके वंशज संगतराश भी कहलाते है इन्हें मुर्तिकार भी कहते हैं ।

देवज्ञ ऋषि - इनका गोत्र है सुर्पण । इनके वशंज स्वर्णकार के रूप में जाने जाते हैं । ये रजत, स्वर्ण धातु के शिल्पकर्म करते है, ।

परमेश्वर विश्वकर्मा के ये पाँच पुत्रं, मनु, मय, त्वष्ठा, शिल्पी और देवज्ञ शस्त्रादिक निर्माण करके संसार करते है । लोकहित के लिये अनेकानेक पदार्थ को उत्पन्न करते वाले तथा घर ,मंदिर एवं भवन, मुर्तिया आदि को बनाने वाले तथा अलंकारों की रचना करने वाले है । इनकी सारी रचनाये लोकहितकारणी हैं । इसलिए ये पाँचो एवं वन्दनीय ब्राम्हण है और यज्ञ कर्म करने वाले है । इनके बिना कोई भी यज्ञ नहीं हो सकता ।

मनु ऋषि ये भगनान विश्वकर्मा के सबसे बडे पुत्र थे । इनका विवाह अंगिरा ऋषि की कन्या कंचना के साथ हुआ था इन्होने मानव सृष्टि का निर्माण किया है । इनके कुल में अग्निगर्भ, सर्वतोमुख, ब्रम्ह आदि ऋषि उत्पन्न हुये है ।

भगवान विश्वकर्मा के दुसरे पुत्र मय महर्षि थे । इनका विवाह परासर ऋषि की कन्या सौम्या देवी के साथ हुआ था । इन्होने इन्द्रजाल सृष्टि की रचना किया है । इनके कुल में विष्णुवर्धन, सूर्यतन्त्री, तंखपान, ओज, महोज इत्यादि महर्षि पैदा हुए है ।

भगवान विश्वकर्मा के तिसरे पुत्र महर्षि त्वष्ठा थे । इनका विवाह कौषिक ऋषि की कन्या जयन्ती के साथ हुआ था । इनके कुल में लोक त्वष्ठा, तन्तु, वर्धन, हिरण्यगर्भ शुल्पी अमलायन ऋषि उत्पन्न हुये है । वे देवताओं में पूजित ऋषि थे ।

भगवान विश्वकर्मा के चौथे महर्षि शिल्पी पुत्र थे । इनका विवाह भृगु ऋषि की करूणाके साथ हुआ था । इनके कुल में बृध्दि, ध्रुन, हरितावश्व, मेधवाह नल, वस्तोष्यति, शवमुन्यु आदि ऋषि हुये है । इनकी कलाओं का वर्णन मानव जाति क्या देवगण भी नहीं कर पाये है ।

भगवान विश्वकर्मा के पाँचवे पुत्र महर्षि दैवज्ञ थे । इनका विवाह जैमिनी ऋषि की कन्या चर्न्दिका के साथ हुआ था । इनके कुल में सहस्त्रातु, हिरण्यम, सूर्यगोविन्द, लोकबान्धव, अर्कषली इत्यादी ऋषि हुये ।

इन पाँच पुत्रो के अपनी छीनी, हथौडी और अपनी उँगलीयों से निर्मित कलाये दर्शको को चकित कर देती है । उन्होन् अपने वशंजो को कार्य सौप कर अपनी कलाओं को सारे संसार मे फैलाया और आदि युग से आजलक अपने-अपने कार्य को सभालते चले आ रहे है ।

विश्वकर्मा वैदिक देवता के रूप में मान्य हैं, किंतु उनका पौराणिक स्वरूप अलग प्रतीत होता है। आरंभिक काल से ही विश्वकर्मा के प्रति सम्मान का भाव रहा है। उनको गृहस्थ जैसी संस्था के लिए आवश्यक सुविधाओं का निमार्ता और प्रवर्तक कहा माना गया है। वह सृष्टि के प्रथम सूत्रधार कहे गए हैं-

देवौ सौ सूत्रधार: जगदखिल हित: ध्यायते सर्वसत्वै।

वास्तु के 18 उपदेष्टाओं में विश्वकर्मा को प्रमुख माना गया है। उत्तर ही नहीं, दक्षिण भारत में भी, जहां मय के ग्रंथों की स्वीकृति रही है, विश्वकर्मा के मतों को सहज रूप में लोकमान्यता प्राप्त है। वराहमिहिर ने भी कई स्थानों पर विश्वकर्मा के मतों को उद्धृत किया है।

विष्णुपुराण के पहले अंश में विश्वकर्मा को देवताओं का वर्धकी या देव-बढ़ई कहा गया है तथा शिल्पावतार के रूप में सम्मान योग्य बताया गया है। यही मान्यता अनेक पुराणों में आई है, जबकि शिल्प के ग्रंथों में वह सृष्टिकर्ता भी कहे गए हैं। स्कंदपुराण में उन्हें देवायतनों का सृष्टा कहा गया है। कहा जाता है कि वह शिल्प के इतने ज्ञाता थे कि जल पर चल सकने योग्य खड़ाऊ तैयार करने में समर्थ थे।

सूर्य की मानव जीवन संहारक रश्मियों का संहार भी विश्वकर्मा ने ही किया। राजवल्लभ वास्तुशास्त्र में उनका जिक्र मिलता है। यह जिक्र अन्य ग्रंथों में भी मिलता है। विश्वकर्मा कंबासूत्र, जलपात्र, पुस्तक और ज्ञानसूत्र धारक हैं, हंस पर आरूढ़, सर्वदृष्टिधारक, शुभ मुकुट और वृद्धकाय हैं

कंबासूत्राम्बुपात्रं वहति करतले पुस्तकं ज्ञानसूत्रम्।

हंसारूढ़स्विनेत्रं शुभमुकुट शिर: सर्वतो वृद्धकाय:॥ उनका अष्टगंधादि से पूजन लाभदायक है।

विश्व के सबसे पहले तकनीकी ग्रंथ विश्वकर्मीय ग्रंथ ही माने गए हैं। विश्वकर्मीयम ग्रंथ इनमें बहुत प्राचीन माना गया है, जिसमें न केवल वास्तुविद्या, बल्कि रथादि वाहन व रत्नों पर विमर्श है। विश्वकर्माप्रकाश, जिसे वास्तुतंत्र भी कहा गया है, विश्वकर्मा के मतों का जीवंत ग्रंथ है। इसमें मानव और देववास्तु विद्या को गणित के कई सूत्रों के साथ बताया गया है, ये सब प्रामाणिक और प्रासंगिक हैं। मेवाड़ में लिखे गए अपराजितपृच्छा में अपराजित के प्रश्नों पर विश्वकर्मा द्वारा दिए उत्तर लगभग साढ़े सात हजार श्लोकों में दिए गए हैं। संयोग से यह ग्रंथ 239 सूत्रों तक ही मिल पाया है। इस ग्रंथ से यह भी पता चलता है कि विश्वकर्मा ने अपने तीन अन्य पुत्रों जय, विजय और सिद्धार्थ को भी ज्ञान दिया।

अब यदि परशुराम की बात करें तो हिन्दू ग्रंथों में एक कहानी का वर्णन है। कहानी यह कि प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्चात वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने श्वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करना और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन कर लेना। इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी। इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे।

भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली। समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे - रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस और परशुराम।

कथानक है कि हैहय वंशाधिपति कार्त्तवीर्यअर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश वन में आखेट करते वह जमदग्निमुनि के आश्रम जा पहुँचा और देवराज इन्द्र द्वारा उन्हें प्रदत्त कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर ले गया।

कुपित परशुराम ने फरसे के प्रहार से उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं व सिर को धड़ से पृथक कर दिया। तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस काण्ड से कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया। यही नहीं उन्होंने हैहय वंशी क्षत्रियों के रुधिर से स्थलत पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर भर दिये और पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से किया। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका।

इसके पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे।

 

सहस्त्रार्जुन एक चन्द्रवंशी राजा था जिसके पूर्वज थे महिष्मन्त। महिष्मन्त ने ही नर्मदा के किनारे महिष्मती नामक नगर बसाया था। इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरान्त कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को सम्हाला। भार्गव वंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे। भार्गव प्रमुख जमदग्नि ॠषि (परशुराम के पिता) से कृतवीर्य के मधुर सम्बन्ध थे। कृतवीर्य के पुत्र का नाम भी अर्जुन था। कृतवीर्य का पुत्र होने के कारण ही उन्हें कार्त्तवीर्यार्जुन भी कहा जाता है। कार्त्तवीर्यार्जुन ने अपनी अराधना से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया था। भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कार्त्तवीयार्जुन को हजार हाथों का बल प्राप्त करने का वरदान दिया था, जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन या सहस्रबाहु कहा जाने लगा। सहस्त्रार्जुन के पराक्रम से रावण भी घबराता था।

युद्ध का कारण: ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी। सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। युद्ध में सहस्त्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया।

तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि को मार डाला। परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-"मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा"। उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों से 21 बार युद्ध किया। क्रोधाग्नि में जलते हुए परशुराम ने सर्वप्रथम हैहयवंशियों की महिष्मती नगरी पर अधिकार किया तदुपरान्त कार्त्तवीर्यार्जुन का वध। कार्त्तवीर्यार्जुन के दिवंगत होने के बाद उनके पाँच पुत्र जयध्वज, शूरसेन, शूर, वृष और कृष्ण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे।

इसी प्रकार परशुराम को लेकर कई और हिन्दू ग्रंथों में कई अन्य उल्लेख भी मिलते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को "विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही" बताते हुए "बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये" और क्रोधान्ध हो "सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा" तक कह डाला। तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए "अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता" तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- "कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू"। असल सवाल यही खड़ा होता है कि परशुराम की भूमिका पूरे रामायण में महज इतनी ही क्यों रही।

परशुराम इसके बाद सीधे द्वापर युग में तब नजर आते हैं जब भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास आयी। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके। हालांकि इस बात का भी उल्लेख नहीं मिलता कि इस युद्ध का अंतिम परिणाम क्या हुआ। क्या भीष्म ने परशुराम का वध कर डाला था या फिर परशुराम जिन्हें भगवान की उपाधि हासिल थी, भगवान होकर भी हार गये। वह भी एक क्षत्रिय से।

महाभारत में ही एक और प्रसंग सामने आता है। प्रसंग द्रोणाचार्य से जुड़ा है। हालांकि इससे पहले कर्ण और परशुराम का प्रसंग सामने आता है। प्रसंग यह कि कर्ण ने फर्जी तरीके से स्वयं को गैर क्षत्रिय बताकर परशुराम से अस्त्र-शस्त्र की विद्या हासिल की। लेकिन परशुराम को जब यह जानकारी मिली तो उन्होंने कर्ण को शाप दिया। परिणाम यह हुआ कि अर्जुन के साथ युद्ध में कर्ण शस्त्रविहीन हो गये और मारे गये। वहीं एक और प्रसंग यह भी है कि परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे। किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे। तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा। तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों सहित चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा सके। परशुरामजी ने कहा-"एवमस्तु!" अर्थात् ऐसा ही हो। इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।

बहरहाल हिन्दू धर्म ग्रंथों के आधार पर किसी भी चरित्र अथवा लोक नायक की संपूर्ण एवं समग्र व्याख्या स्पष्ट तौर पर नहीं की जा सकती है। परंतु परशुराम की जो परिकल्पना अबतक सामने आती है, वह इतना तो स्पष्ट प्रमाण देती है कि सत्ता के वर्चस्व को लेकर आदिकाल से संघर्ष चलता आ रहा है। इस संघर्ष में केवल तथाकथित रूप से उच्च जातियों के लोग ही नहीं बल्कि शुद्र समझे जाने वाले लोग भी शामिल थे। वैसे यह दिलचस्प है कि जिन्हें हिन्दू ग्रंथों में शुद्र कहकर उपेक्षित किया गया, वे आज ब्राह्म्णवादियों की नजर में भगवान हैं। कहने का आशय यह कि शुद्रों के नायकत्व को हड़पने की साजिश शुरू से की जाती रही है, ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मणवादियों ने गौतम बुद्ध को भगवान बुद्ध कहा है।

हिन्दी साहित्य के बरक्स सामाजिक न्याय के महानायक लालू

- अरूण नारायण

सामाजिक न्याय और उस भाव-भूमि से आनेवाले सभी तरह के विचारों व व्यक्तियों के प्रति हिंदी लेखन की मुख्यधारा और इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया सभी के सभी अपादमस्तक जातीय दुराग्रह से पीड़ित रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि जिस आरक्षण पर लगभग सभी राजनीतिक दलों में स्वाभाविक सवार्नुमति है, वहीं साहित्य में एक हिकारत का भाव है। इस अंदाज में कि यह सीधे-सीधे दूसरे की हकमारी ही है उनकी नजर में। इससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि शाश्वत कहे जाने की दुहाई दिया जाने वाला हमारा साहित्य कहां खड़ा है? और उसकी बागडोर अंतत:

किस तरह की संकीर्ण शक्तियों के हाथों में है।

बिहार के लेखन की कुछ बानगियों के सहारे मंडल के प्रति उनके नजरिए क्या रहे हैं, इस विषय में आपसे कुछ कहना चाहूंगा। चूंकि मंडल भारतीय इतिहास का ऐसा कालखंड रहा है जिसने भारतीय जनमानस को कई रूपों में उद्वेलित करने का काम किया इसलिए भारतीय मीडिया ने उसे देश को जोड़ने वाली नहीं बल्कि तोड़ने वाली घटना के रूप में चित्रित किया। इतिहास के उस कालखंड को बिहार के उपन्यासकारों और नवजागरणकारों ने भी अपने लेखन का हिस्सा बनाया और उस मीडिया के स्टैंड का ही मुखर समर्थन किया। यह एक ऐसा काल था जिसने बहुजन समाज को पहली बार अपने अधिकारों के प्रति गोलबंद किया। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में द्विज जातियों की जो अघोषित किलेबंदी थी वह इस काल में ध्वस्त होनी शुरू हुई।

कमंडल की भगवाधारी शक्तियों की रीढ़ इसी मंडल ने तोड़ी। लेकिन बिहार के लेखकों को पढ़ें तो हमें मंडल के बारे में सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक बातें ही देखने को मिलती हैं। यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई गहरे निहितार्थ हैं ? इसके कारणों को संबंधित लेखकों के उद्धरण के साथ ही जानें तो तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होगी। कर्मेन्दु शिशिर खुद को रामविलास शर्मा स्कूल के नवजागरण अध्येता मानते हैं। मतवाला मंडल से लेकर

सारसुधानिधि का संपादन, राधामोहन गोकुल व सत्यभक्त की जीवनी के अतिरिक्त दो कहानी संकलन, एक उपन्यास, चार-पांच लेख संकलन व विदेश यात्राओं का भारी-भरकम प्रोफाइल है इनका। पेशे से प्राध्यापक हैं। मंडल दौर को पहले भी कई जगहों पर उन्होंने जंगलराज का पर्याय बतलाया। अपने एक लेख बिहार में नवजागरण की विडंबनाएं में वे लिखते हैं : " वस्तुत: त्रिवेणी संघ एक नई किसान संस्कृति को मूर्त करने वाला एक अभिनव उपक्रम था। सवर्ण स्वार्थ के वशीभूत ताकतों ने उसे जिस अनैतिक और अविचारित तरीके से रौंदा उसी का कुफल आगे चलकर

कबिलाई सत्ता के अभिशाप के रूप में बिहार को भुगतना पड़ा। अपने समय में त्रिवेणी संघ को देवव्रत शास्त्री ने देश को तोड़ने वाला संकीर्ण अवसरवादी संघ कहा था। लेकिन जब उस संघ के बारे में रिसर्च सामने आए तो उन्हीं की आधुनिक जमातें उसकी प्रशंसा में कसीदे काढ़ते नहीं अघाईं। लेकिन अपने वर्तमान में मंडल का 1990 का काल जिन कारणों से महत्व का अधिकारी होता उसकी अनदेखी कर उसे कबिलाई सत्ता के अभिशाप के रूप में व्याख्यायित करना बतलाता है कि सवर्णों के श्रेष्ठठताबोध ने मंडल शासन के इस उभार को कभी बर्दाश्त नहीं किया। कर्मेन्दु

शिशिर के इस उद्धरण का अर्थ स्पष्ट है। मतलब साफ है कि इनके इस नवजागरण में अतीत के त्रिवेणी संघ जैसे संगठनों के लिए तो बहुत आदर है, लेकिन वर्तमान मंडल जहां से देश और खासकर बिहार की राजनीति में पहली बार बहुजन आबादी की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हुई वह उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं। मंडल उभार के इस काल को कबिलाई सत्ता के अभिशाप के रूप में देखने की वकालत करने वाले शिशिर इसके कारणों में नहीं जाते। ले-देकर इनके पास भी ऐसा कहने के लिए भ्रष्टाचार, अपराध की बढ़ती हुई दर जैसे ही तर्क हैं, जो आम सवर्ण मीडिया का रहा है। शिशिर अपने लेख में यह नहीं बतलाते कि मंडल के जिस काल में अपराध का इतना बोलबाला था वह भारत के दूसरे राज्यों से कैसे ज्यादा था या पूर्ववर्ती शासन के आंकड़े कहां उससे भिन्न रहे हैं ?

शिशिर के इस लेख से बहुजन आबादी के साथ ही स्त्री विरोध की कुंठित मानसिकता का भी पता चलता है। जाहिर है जो बहुसंख्यक विरोधी होगा वह स्त्री विरोधी भी होगा ही। देखें इसकी एक बानगी-वाह मेरे यार! हिटलर के शहर में प्रेम रोपने का अद्भुत सत्कर्म कर तुमने सच्ची भारतीयता का परिचय दिया...; लो, हम भी घूम आए। यह उद्धरण स्त्री विरोधी सामंती कुत्सा का चरम है। प्रेम रोपने शब्द में ब्लंठ सामंती पुरुषवादी कुत्सा का चरम है। शंभुनाथ ने लिखा है, यौन तृप्ति सेक्स पाप नहीं है और जीवन में इसकी पूर्ति ठीक ढंग से नहीं होगी, तो विकृतियां पैदा होंगी।

शिशिर अपने इस उद्धरण में इस विकृति में आकंठ डूबे हुए हैं। प्रगतिशीलता और पिछड़ावाद की वे जितनी दुहाई दें लेकिन यह सच है कि उनके अंदर से पुरुषवाद और जातीय श्रेष्ठताबोध अभी गया नहीं है।

दूसरे लेखक हैं रमेशचंद्र सिन्हा। अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे हैं। इनके इलियड और ओडिसी के हिंदी अनुवाद की बड़ी ख्याति रही है। अपने पहले उपन्यास काक द्वीप, सोमा चरित के लिए बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का सम्मान इन्हें मिल चुका है। इनके उपन्यास अभय कथा में आजादी पूर्व से लेकर मंडल तक के समय का रेखांकन किया गया है। मंडल के समय के बारे में वे लिखते हैं : गाय थी कि इधर-उधर तेजी से भागकर पकड़ में नहीं आ रही थी बल्कि नजदीक जाने पर हुड़पेटती थी। यह देख चीफ मिनिस्टर चिल्लाकर बोला, बिना अक्किल के एकदम फालतू आदमी हो, मंगल भगत। एक गऊ को भी नहीं सरिया सकते। तुम्हारा अइसन बोका को बेकारे मंत्री बनाए हैं। तब उसने हांक लगाई, डीजी साहेब! कहां गया साला डीजी ? मर तो नहीं गया ? अरे अहमदवा, तनिका लपक के देखो कि डीजी सहेबवा कहां लापता हो गया। तब देखा कि पुलिसवर्दी में एक मोटा-झोंटा आदमी हाथ में काली रूल लिए उस मरखंडी गाय को पकड़ने बंगले से दौड़ता हुआ निकला। उसे देखते ही गाय का पारा और चढ़ गया और वह डीजीपी साहेब को ही खदेड़ने लगी। बेचारा जान लेकर भागा। इस पर चीफ मिनिस्टर ठठकर हंसा और बोला, देखा, चीफ मिनिस्टर का गऊ है कि ठठ्ठा! साले डीजी का हवा गुम कर दिया। ई ससुराली गऊ है। मेम साहब अपने कर से इसको किसमिस और मिसरीकंद खिलाती हैं। एह खातिर इसको मेरा सलवे ठीक करेगा।

स्पष्टत: यह प्रसंग द्विज कुंठा की उस शातिराना एप्रोच की कलई खोलता है जो हमेशा श्रेष्ठताबोध में जीने का अभ्यासी रहा है और जिसके लिए वामपंथ की कलगी प्रगतिशीलता का सबसे बड़ा सर्टिफिकेट साबित हुई है। मंडल के दौर में लालू के सत्तासीन होने के बाद यहां का द्विज नेतृत्व यही प्रचारित करता था कि गाय-भैंस चराने वाला बिहार का शासन नहीं चला पाएगा। लेकिन लालू ने इन तमाम भविष्यवाणियों पर न सिर्फ पलीता लगाया अपितु सत्ता में दलित-पिछड़े को भागीदार बनाया। भगवतिया जैसी हाशिए की मजदूरिन भी बिहार की सत्ता में हिस्सेदार बनीं। सवाल

उठता है कि जो लेखक किसी काल का धवल पक्ष नहीं देख सकता वह सही अर्थों में उसका स्याह भी वस्तुनिष्ठ होकर नहीं आंक सकता।

सिन्हा के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यही रही है। सच तो यह है कि 1990 के बाद के बिहारी समाज को देखने के लिए जिस तरह की नजर और संवेदना चाहिए वह बिहार के इन कथित वाम लेखकों के पास है ही नहीं। जातीय व्यवस्था बड़ी उत्पीड़नकारी रही है। इसके पहले सत्ता और संसाधन पर कुछ खास जातियों का वर्चस्व रहा। मंडल ने इस एकाधिकार को तोड़ा। लेकिन बिहार के द्विज लेखकों ने इसे कभी भी दिल से स्वीकार नहीं किया इसीलिए 90 के उस काल को वे बिहार के सबसे अंधकारमय काल के रूप में पिरोते रहे हैं। यह जाति व्यवस्था तभी खत्म होगी जब

उनका संबंध समानता और सम्मान पर आधारित हो। मंडल ने इसकी कोशिश की तो इन लेखकों का यह दायित्व था कि उसके इस धवल पक्ष को रेखांकित करते, क्योंकि मंडल इस जाति व्यवस्था के खिलाफ वर्षों से जो संघर्ष चल रहा था उन संघर्षों में मिल का पत्थर है। लेकिन बिहार के द्विज लेखकों ने इस ऐतिहासिक उभार को जैसे बदनाम करने का संकल्प ही ले लिया है। लालू के आरंभिक 5 सालों के कार्यकलापों को देखें तो वे एक बड़े विजनरी के तौर पर उभरते हैं तब आज की तरह रणचंडी पाठ, वंशवाद और सोनिया के पीछे चिपके मदारी नहीं हुए थे वे। उन्होंने

तब पूरी गवर्नेंस को जाति व्यवस्था के खिलाफ लगा दिया था।

90 के पहले बिहार की बहुजन आबादी जाति व्यवस्था में घुटन महसूस कर रही थी। ऐसे में उस पर करारा चोट इतिहास की जरूरत थी जिसका निवर्हन लालू प्रसाद ने किया। अक्सर गवर्नेंस की कसौटी पर इस शासन की विफ लता को रेखांकित किया जाता है। गवर्नेंस के लिहाज से लालू प्रसाद ही क्यों श्रीकृष्ण सिंह के जिस शासन को बिहार का स्वर्णयुग कहा जाता है वह किनके लिए था ? भूमिहार जमींदारों के लिए ही न। बहुजन आबादी बेतरह पिस रही थी। गवर्नेंस के लिहाज से उससे ज्यादा जंगलराज बिहार के इतिहास में कभी नहीं रहा। राजनीतिक भागीदारी तंत्र में

सवर्ण बहुलता जिस किसी कसौटी पर कसें वह बिहार की बहुजन आबादी के लिए सबसे अंधकारमय काल था। बल्कि क्या यह आवश्यक नहीं है कि लालू शासन के 15 साल और श्रीकृष्ण सिंह शासन के 15 सालों का तुलनात्मक अध्ययन हो ताकि जंगलराज का जो मिथ लालू शासन पर मढ़ा जाता रहा है उसकी हकीकत सामने आए ? सच तो यह है कि बिहार में अपराध, भ्रष्टाचार कांग्रेस शासन से ही था। कांग्रेस के चार मंत्रियों के घोटाले में संलिप्तता के कारण ही अय्यर कमेटी बनी थी जिसके कारण कई सरकारें असमय धराशायी हुईं। सच तो यह है कि श्रीकृष्ण सिंह के लंबे

जंगलराज के बाद लंबे अरसे तक अस्थायी सरकारों के कारण बिहार अरसे से तबाही और यथास्थितिवाद का शिकार रहा है। यह कभी भी विकास के मैप पर रहा ही नहीं।

यह मंडल के पहले शासनकाल को बदनाम करने के लिए सवर्ण पत्रकारों, अकादमिशयनों व बुद्धिजीवियों द्वारा गढ़ा गया मिथ है। जिसे बिहार के द्विज लेखकों ने और पुख्ता किया है। एक भगवाधारी नौकरशाह भगवतीशरण मिश्र ने बाजाब्ता अथ मुख्यमंत्री कथा नाम से एक उपन्यास ही लिख दिया जिसमें यह मिथ और कमाल का गढ़ा गया है। यह जातिवाद पुराने लेखकों में ही हो ऐसा नहीं। बल्कि नई सदी और तेज हो रही आधुनिकता में अपने को शुमार करने वाली नई पीढ़ी के लेखकों में और बेशर्म व आक्रामक रूपों में नजर आता है। राकेश रंजन कवि हैं। प्रयोगधर्मी कवि। इनका एक उपन्यास मल्लू मटफ नाम से प्रकाशन संस्थान से आया है। भाषा को बरतने की कमाल की मौलिक अदा है इनकी, लेकिन दृष्टिकोण वही सामंती। देखें यह प्रसंग : बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद अपनी जाति का मुख्यमंत्री बनने का रोब-दाब उसमें आठों समय ऐंठता रहता था जो बात-बेबात अक्सर हिंसक रूप में प्रकट होता था। किसी की मां बहन कर देना, किसी को सरेआम मार-मार कर फ्लैट कर देना उसके लिए आम बात

थी। किसी की जुर्रत नहीं थी कि उसका प्रतिकार करे, उसे मना करे। गालियां बकने में वह प्रयोगवादी था और मार कुटाई में परंपरावादी। परंपरावादी इस मायने में कि जूते और लाठी-फट्ठे उसके पसंदीदा हथियार थे। चूंकि मुहल्ले में यादवों की संख्या सबसे अधिक थी और इस कारण वे दबंग थे और जाहिर है कि वार्ड आयुक्त भी हर बार उन्हीं में से कोई न कोई चुना जाता था, इसलिए हरि राय को किसी से डरने की जरूरत नहीं थी, दबंगई और नंगई का वह सक्रिय और निर्विरोध प्रदर्शक था।

एक और लेखक हरे प्रकाश उपाध्याय की बखेड़ापुर नाम से एक उपन्यासिका छपी है। यह लेखक मंडल के बारे में अपनी राय इस तरह रखता है : वैसे यह ठीक वही समय था जब प्रदेश की कमान एक ऐसे बेबाक और सर्वहारा किस्म के नेता के हाथ में आ गई थी, जो जेपी मूवमेंट से निकला था। जिसने प्रदेश की जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाए थे, लोगों से उनकी भदेस जुबान में ही बातें करना और उन्हें ठेठ सर्वहारा अंदाज में संबोधित करना उनकी खास अदा थी। मगर प्रदेश में शासन की बागडोर संभालते ही उसने अपने तमाम लंपट और खूंखार गुर्गों को भरपूर मनमानी करने की अनौपचारिक छूट दे दी थी। चोरी और अपहरण का कारोबार काफ़ी तेजी से फैलने लगा था। प्रशासनिक अधिकारी चूं-चपड़ करने पर सरेआम मार खाने लगे थे। पूरे राज्य में नेताओं के अलावा सभी लोग दहशत में जीने लगे थे। प्रदेश से व्यापारी और उद्योगपति पलायन कर रहे थे। दबंगई को वैधता मिल गई थी। बड़ी संख्या में अपराधी विधायक बन गए थे। मुख्यमंत्री मंच पर आला अधिकारियों से खैनी बनवाता था। प्रदेश में ऐसे साहित्यकारों की एक जमात उभर आई थी, जो मुख्यमंत्री की तारीफ में किताबें, आरती या चालीसा आदि लिख रहे थे। ऐसी किताबों को धीरे-धीरे पाठ्यक्रमों में घुसाया जा रहा था।

लालू का खौफ द्विज जमात के लेखक-बौद्धिकों में इस कदर व्याप्त रहा है कि बिहार की सत्ता से पिछले दस सालों से बेदखल होने के बाद भी नए परिप्रेक्ष्य और परिस्थितियों के लिए जवाबदेह वे लालू को ही मानते हैं। उक्त उद्धरण इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण इस अर्थ में है कि लेखक ने खासतौर से शिक्षा व्यवस्था की रसातल में जा रही स्थिति को इसका आधार बनाया है। 2013 में वह इस सवाल को दर्ज कर रहा है और इसके लिए जबावदेह 90 के लालू प्रसाद को दिखला रहा है। उक्त प्रसंग को पढें तो जो सवाल पैदा होता है वह यह कि क्या किसी लेखक को सीधे-सीधे अपनी ओर से इस तरह के आरोपनुमा वक्तव्य देना चाहिए ? क्या यह बेहतर नहीं होता कि इसके लिए इस तरह की कथा स्थितियां बनाई जातीं और

पात्र ये बातें कहते ? फिर पिछले 14-15 सालों के इस पूरे परिप्रेक्ष्य का आज की शिक्षा व्यवस्था से क्या रिश्ता रहा है यह लेखक को रिलेट नहीं करता। सीधे-सीधे एक आम सवर्ण मंडल के बारे में जो राय रखता है वही इस लेखक का भी है। इस छोटे से उद्धरण में लेखक ने तीन अहम सवाल उठाए हैं। पहला है कि चोरी और अपहरण कारोबार का रूप ले चुके हैं, इसी का विस्तार वह बड़ी संख्या में अपराधियों के विधायक बनने और बिहार से उद्योगपतियों के पलायन को मानता है। दूसरा प्रशासनिक अधिकारियों की नकेल कसे जाने को और तीसरा लेखकों की एक जमात जो मुख्यमंत्री

की जीवनी लिख उसे पाठ्यक्रमों में शामिल करवा रहे हैं उसको।

सवाल यह कि यह सवाल 15 साल पहले के लालू शासन पर ही क्यों? वर्तमान शासन से क्यों नहीं? जितने सवाल लालू के संदर्भ में दर्ज किए गए हैं क्या वर्तमान शासन उससे अलग है? क्या इस शासन में दागी विधायक नहीं हैं ? ब्यूरोक्रेसी का भ्रष्टाचार और शिक्षा में मिड-डे-मिल से लेकर कांट्रेक्ट सिस्टम के लिए भी लालू ही जबावदेह हैं? उनके समय में शिक्षा का ऐसा बंटाधार तो नहीं हुआ फिर यह भी उनके ही मत्थे क्यों? यह पूरा देश जानता है कि ब्रह्मेश्वर मुखिया जैसा आदमी जो दर्जनों हत्याओं का आरोपी रहा है और उस हत्यारे की हत्या के बाद किस तरह बिहार में खुलेआम गुंडई का तांडव मचा और ऐसे मुजरिम को सरकार में शामिल मंत्री तक ने गांधीवादी का तगमा दिया लेकिन इस तरह की घटनाओं को उपन्यास में दर्ज करना इस लेखक को जरूरी नहीं लगा क्योंकि यह उसका जातीय मामला था। लालू के बाद के नेतृत्व में 30 कैबिनेट मंत्रियों में 14 पर आपराधिक मुकदमे के आरोप भी क्या झूठे थे ? जनता दल यूनाइटेड के 114 में से 58 विधायकों पर दर्ज आपराधिक मामले और 43 पर गंभीर आरोप क्या थे ? भाजपा के 90 विधायकों में 29 दागी होने की बात क्या झूठे रहे हैं ? इन सबकी अनदेखी कर कोई वर्तमान में भी

अतीत के मंडल को ही आरोपी सिद्ध करता है तो यह अकारण नहीं बल्कि इसकी जड़ें रूढ़ हो चुकीं बिहार की जाति व्यवस्था में जाती हैं। इस लेखक से सवाल किया जाना चाहिए कि लालू शासन के बाद कहां बिहार में उद्योग-धंधों का संजाल लग गया और यह भी कि क्यों और किस कारण बड़े-बड़े नामधारी बिहार विकास और विकास पुरुष की थिगलियां जोड़ बिहार को रसातल में भेजते रहे? इस काल का बिहार की राजनीति में सबसे अहम योगदान जिन वजहों से लालू का रहा वह पिछड़ों में सशक्तिकरण की उनकी कोशिशों के नाम रहा। जब उन्होंने जाति व्यवस्था और मीडिया के परंपरागत जातीय गठजोड़ पर चोट किया। इसे न तो जंगलराज और कबिलाई सत्ता जैसी सतही स्थापनाओं से समझा जा सकता है और न ही इन तथाकथित द्विजधारी लेखकों की जातीय अवधारणा में कैद होकर। इसके लिए उदार और व्यापक मानवीय दृष्टिकोण चाहिए जो इन आत्मग्रस्त लेखकों के पास नहीं है। (अरुण नारायण युवा आलोचक हैं)

शास्त्रीय नाट्यधर्म के बरक्स भिखारी ठाकुर का लौंडा नाच

- नवल दुर्गापति

दोस्तों, छपरा की धरती पर वंचित समाज के परिवार में जन्मे भिखारी ठाकुर की प्रासंगिकता आज भी निर्विवाद है। हालांकि बिहार में जिस तरह से राजनीति पर बहुसंख्यक वर्ग का कब्जा हुआ है, भिखारी ठाकुर का महत्व बढ़ा ही है। हालांकि यह स्थिति उस समय नहीं थी जब बिहार में उच्च जाति के लोगों का राज था। लेकिन सबसे दिलचस्प यह कि उन दिनों भी भिखारी ठाकुर बिहार के जन-जन के हृदय में बसते थे। अपने नाटकों के जरिए। इसके अलावा उस विपरी कालखंड में भी भिखारी ठाकुर और कृतियों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस होती थी, जिसके अपने सामाजिक आयाम और सीमायें थीं। हालांकि जमीनी स्तर पर तब भी उनके नाटकों को लौंडा नाच कहकर उपहास उड़ाया जाता था और दुर्भाग्यवश यही हाल आज भी है। खास बात यह है कि लोक जीवन से जुड़े होने और अति लोकप्रिय होने के कारण बौद्धिक वर्ग भी भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का शेक्सपीयर मानने से इन्कार नहीं करता है।

 

तमाम सामाजिक विसंगतियों के बावजूद यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि भारतीय लोकधर्मी नाट्य-परंपरा की प्राचीनता, विविधता, शक्ति व समृद्धि निर्विवाद है। आदिनाट्याचार्य भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में भी लोक के बुनियादी महत्त्व को रेखांकित किया गया है। अवश्य ही भरत के समक्ष नाट्य-प्रयोग की एक सुदृढ़ परंपरा रही होगी जो कि लोक-परंपरा के रूप में उपस्थित होगी। नाट्यशास्त्र में भरत ने इसी उपस्थित परंपरा को एक सुसंबद्ध व सर्वमान्य रूप प्रदान करने की चेष्टा की होगी। तभी उन्होंने नाट्यशास्त्र में स्थान-स्थान पर लोक के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में उसके समाधान हेतु लोक की ओर दृष्टि का निर्देश किया है। उनके अनुसार नाट्य में तीन प्रमाण माने गए हैं। लोक, वेद तथा अध्यात्म। नाट्य प्राय: वेद और अध्यात्म में प्रतिष्ठित है। वेद तथा अध्यात्म से युक्त तथा शब्द और छंद से समन्वित नाट्य लोकसिद्ध तथा लोकात्म होता है। इस स्थावर-जंगम (जड़-चेतन) लोक की भाव और चेष्टाओं का निर्णय शास्त्र से संभव नहीं। लोक में विभिन्न प्रकार के स्वभाव वाले लोग होते हैं और स्वभाव में ही नाट्य प्रतिष्ठित है। इसलिए नाट्य-प्रयोक्ता को लोक प्रमाण को स्वीकार करना चाहिए ।

 

लोक में प्रचलित नाट्य-परंपरा की दीर्घकालीनता पर प्रकाश डालते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, इसके (नाट्यशास्त्र के) पूर्व अनेक नाट्यग्रन्थ और नाटक लिखे गए होंगे और नृत्य, संगीत आदि सुकुमार विनोदों की बहुत पुरानी परंपरा रही होगी; क्योंकि नाट्यशास्त्र में सैकड़ों ऐसी नाट्यरुढियाँ बताई गई हैं जो बिना दीर्घकाल के परंपरा के बन ही नहीं सकतीं।

 

वहीं डॉ. शिवकुमार मधुर ने भी इसी लोक-परंपरा की महत्ता और प्राचीनता का उल्लेख करते हुए लिखा है- भरत का नाट्यशास्त्र कोई आकस्मिक उपज नहीं है, वरन पूर्व परंपरा को लेकर की गई एक सुनिश्चित योजना है। क्योंकि इतना तो स्पष्ट है कि भरत के नाट्यशास्त्र का आधार लोकनाट्य ही रहे होंगे। निश्चित ही भरत ने अपने समय में उपस्थित लोकधर्मी नाट्य-परंपरा का अध्ययन व चिंतन-मनन कर, इस प्रचलित कला-रूप को नाट्यशास्त्र में शास्त्रीय रूप देने का प्रावधान किया है। नाट्यशास्त्र में उन्होंने न केवल लोकधर्मी व नाट्यधर्मी परम्पराओं का उल्लेख-मात्र किया है, अपितु लोकधर्मी नाट्य-परंपरा का नाट्यधर्मी रूढ़ियों के विकास में अमूल्य योगदान को भी स्वीकारा है। भरत द्वारा परिभाषित लोकधर्मी अभिनय की वह शैली है जो स्वाभाविकता पर बल देती है। लोक अपने दैनंदिन जीवन में जैसा आचरण करते हैं जब वैसा ही मंच पर भी अभिनीत किया जाये तो वह लोकधर्मी अभिनय शैली के अंतर्गत आएगा। लोकधर्मी नाट्य-प्रयोग ताम-झाम रहित, शुद्ध-स्वाभाविक अभिनय पर आश्रित है। लोकवार्ता व लोकक्रिया इसके मूल आधार है न कि दृश्य-सज्जा, अलंकृतता व अन्य ताम-झाम।

 

जब अभिनय-प्रदर्शन लोक या जन-साधारण की परंपरा के अनुसार हो तो वह लोकधर्मी कहलाता है। यह तथ्यात्मक अपरिष्कृत या ग्राम्य विधि है जिसमें कि कृत्रिमता का परिहार व पूर्णतया सादगी पर बल रहता है। इसमें अतिरंजकता का समावेश नहीं होता। नाट्यधर्मी अभिनय शैली लोकधर्मी अभिनय शैली की अपेक्षा अधिक कल्पना-समृद्ध, वैचित्र्यपूर्ण व अनुरंजक होती है। इसमें सांकेतिक वाक्य, स्वगत या आकाशभाषित का प्रयोग मिलता है। इसके पात्र दिव्य और अदिव्य दोनों होते हैं। नृत्य व संगीत का शास्त्रीय रूप इसमें प्रस्तुत होता है। पात्रों की भूमिका में विपर्यय (पुरुष स्त्री-पात्र की भूमिका में व स्त्री पुरुष-पात्र की भूमिका में) नाट्यधर्मी अभिनय शैली के अंतर्गत आता है। मानवीय सुख दु:खादि को आंगिक अभिनय एवं वाद्यादी के संयोग से अतिरेक रूप में प्रस्तुत करना नाट्यधर्मी अभिनय की विशेषता है। लोकधर्मी विधा नाट्यधर्मी विधा का आधार है। लोकधर्मी की नींव पर ही नाट्यधर्मी का प्रासाद तैयार होता है। मौलिक तत्त्व लोकधर्मी व उसका परिष्कृत रूप नाट्यधर्मी होता है।

 

हम यह कह सकते हैं कि लोकधर्मी व नाट्यधर्मी के मध्य एक निश्चित विभाजक रेखा खींच पाना संभव नहीं है। दोनों की सीमाएँ घुली-मिली रहती हैं। किसी प्रयोग में किस शैली की प्रधानता है इस आधार पर हम उसे एक निश्चित शैली-विशेष के अंतर्गत डालते हैं। जब सहज लोक-जीवन के विविध पक्षों का चित्रण बिना ताम-झाम के, सादगीपूर्ण ढंग से लोक द्वारा, लोक के लिए प्रस्तुत हो तो हम उसे लोकधर्मी प्रयोग कहेंगे भले ही उसमे बीच-बीच में एकाधिक नाट्यधर्मी प्रयोग के चिन्ह मिले। यहाँ सुप्रसिद्ध पारंपरिक नाट्यकर्मी कावलम नारायण पणिक्कर को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा। संगीता गुन्देचा से भेंटवार्ता के दौरान लोकधर्मी और नाट्यधर्मी अभिनय शैली पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा है, जहाँ तक लोकधर्मी और नाट्यधर्मी का प्रश्न है, उनमें डिग्री का फर्क है। लोकधर्मी में भी नाट्यधर्मी के गुण होते हैं और नाट्यधर्मी में लोकधर्मी के।

 

लोक-प्रवृत्तियों से संवादी नाट्य लोकधर्मी तथा उसका सौन्दयार्धायक अंश नाट्यधर्मी। लोकनाटक का तंत्र और रचना-विधान शास्त्रीय नाटक के स्तर से कभी नहीं लिया जा सकता। इसमें शास्त्र के स्थान पर लोक-परंपरा और चिरविकसित नाट्यरूढियाँ मूल्यवान हैं। गीत, नृत्य, पुराण (मिथ) तथा यथार्थ जीवन-प्रसंग और लोककथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। लोकनाटक के कथानक और इतिवृत्त में एक के बाद एक दूसरी घटना, गीत और नृत्य के ताल-मेल से घुलती-मिलती हुई आगे बढती है, कभी व्यवस्थित ढंग से, कभी अव्यवस्थित ढंग से। तभी लोकनाटक को जीवन और प्रवृत्ति की सहज प्रतिछवि की संज्ञा मिली है। इसका मंच जीवन के बीच अपने आप रच उठता है। चारों ओर जन-परिधि में घिरकर कहीं भी,किसी स्थान पर नदी या रम्य मार्ग में, किसी वृक्ष तले इसका मंच अपने आप उभर आता है। न इसमें पट-परिवर्तन के प्रसाधन की अपेक्षा है, न दृश्य-परिवर्तन कि आवश्यकता।

 

लोकधर्मी नाट्य-परंपरा में भिखारी ठाकुर का विशिष्ट स्थान है। 18 दिसंबर 1887 ई. में बिहार के सारण जिला के अंतर्गत जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर का सम्पूर्ण जीवन अपने नाटकों के लिए समर्पित रहा है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इन्हें भोजपुरी का अनगढ़ हीरा कहा है। वहीँ अंग्रेजी के विद्वान डॉ. मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने इन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर की संज्ञा दी है। हालाँकि शेक्सपियर से भिखारी ठाकुर की समानता दोनों के नाटकों की पद्यात्मकता और लालित्य-कौशल को लेकर की जा सकती है, परन्तु जहाँ तक कथानक, भाषा, भावभूमि व निरूपण का क्षेत्र है दोनों में अत्यंत भिन्नताएँ हैं। शेक्सपियर के नाटक अभिजात और शास्त्रीय के अंतर्गत आते हैं जबकि भिखारी ठाकुर के नाटक शत-प्रतिशत लोक-जीवन से जुड़े हैं। भिखारी ठाकुर के नाटकों में लोकजीवन समग्रता से उभर कर आया है।

 

लोकधर्मी नाटक की तमाम विशेषताएँ (लोकजीवन का सम्यक चित्रण, सादगी पूर्ण दृश्य-विधान, गीत संगीत की प्रधानता, लचीलापन (सब कुछ शास्त्रीय नियम सम्मत न होकर इम्प्रोवाइजेशन की पूरी गुंजाइश) - ये सब भिखारी ठाकुर के नाटकों में मिलते हैं। अपने नाटकों में उन्होंने तत्कालीन स्थानीय समस्याओं का निरूपण अत्यंत कुशलता व कलात्मकता के साथ किया है, जिससे कि वे मार्मिकता के साथ साथ मनोरंजकता की नई ऊँचाईयाँ छूने में सफल रहे। जहाँ कहीं दर्शक-वर्ग उनके नाटकों में आये करुणापूर्ण दृश्यों के साथ तादात्म्य स्थापित कर अश्रुधारा प्रवाहित करने लगता वहीं बटोहिया या विदूषक तुरंत विषय परिवर्तन कर अपनी वाकपटुता से माहौल को हल्का बना देता। उनके नाटकों में दर्शक और कलाकारों के मध्य का सम्बन्ध कृत्रिम न होकर सहज-स्वाभाविक होता। दोनों के मध्य सीधा संवाद स्थापित होता था। साथ ही उनके नाटकों के पात्रों में विशिष्टीकरण का अभाव मिलता है। इनके हर पात्र बहुआयामी होते हैं। क्षणभर पहले जो पात्र बटोहिया या बिदेसिया की भूमिका में नजर आता दूसरे ही क्षण अपनी भूमिका निर्वाह के पश्चात मंच पर ही वह खंजरी, ढोलक बजाने वालों के मध्य शामिल हो जाता। जो लोग अलगाववाद की सिद्धांत रूप में अवधारणा को ब्रेख्त या पश्चिम की देन मानते हैं, उनका यह भ्रम भिखारी ठाकुर के नाटकों से परिचय के पश्चात बखूबी समाप्त हो जाता है।

 

हालाँकि भिखारी ठाकुर ने अनेक नाटक रचे व खेले हैं, परन्तु बिदेसिया नाटक उनकी विशेष पहचान बन चुका है। कहा जाता है कि बिदेसिया नाटक उनकी पहली नाट्य-रचना है। अपने गाँव कुतुबपुर में जब उन्होंने रामलीला मंच की स्थापना की थी तो उसी पर इस नाटक को पहली बार अभिनीत किया गया था। यह नाटक इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि आने वाले समय में भिखारी ठाकुर और बिदेसिया एक दूसरे के पर्याय से बन गए और उनके सभी नाटकों को बिदेसिया रंगमंच के अंतर्गत ही गिना जाने लगा। बिदेसिया के अलावा उनके अन्य नाटकों में राधेश्याम बहार नाटक, द्रौपदी पुकार नाटक, गंगा-स्नान, सूरदास, भाई-विरोध, बेटी-वियोग, विधवा-विलाप, ननद-भौजाई संवाद, पुत्र-वध आदि उल्लेखनीय है। नाटक के नामों के शीर्षक से ही इनके विषय-वस्तु के अंतर्गत आने वाली समस्याओं व स्थितियों का पता चल जाता है।

 

लोकमानस प्राय: धर्म के प्रति अनुरागी हुआ करता है। लोकजीवन के कलाकार होने के कारण भिखारी ठाकुर के नाटकों में राम, कृष्ण, गंगा आदि से सम्बंधित प्रसंग प्रमुख स्थान प्राप्त करते हैं। भिखारी ने प्रसिद्ध रामायण कथा व कृष्ण कथा के विराट विस्तार में से लोकजीवन में प्रचलित अंशों को चुनकर अपने गीति-नाट्यों को सजाया। किन्तु इस अंतर के साथ कि इन कथाओं के नायक व इनमे प्रचलित धार्मिक-सामाजिक अनुष्ठान पर भिखारी भोजपुरी क्षेत्र की संस्कृति को आरोपित कर देते हैं। उदाहरणार्थ- भिखारी द्वारा वर्णित राम की बारात रामचरितमानस के अयोध्या की बारात से बिलकुल भिन्न भोजपुर की बारात मालूम पड़ती है। परिछावन, गुरहत्थी, लावाछिंटाई, पाणिग्रहण आदि विधियों से लेकर बारातियों के आपसी नोक-झोंक का अत्यंत विस्तार से वर्णन उनके नाटकों में मिल जाता है। कृष्णलीला सम्बन्धी भिखारी के पदों की विशेषता उनका दो रूपों में प्रयोग है। प्राय: हर पद या गाना एक ओर पद या गाना है तो दूसरी ओर संवाद का सहज रूप। यह भिखारी के नाटकीय कौशल का प्रमाण है। भिखारी के नाटकों के सामाजिक संदर्भ व परिवेश के सफल चित्रण में उनके पात्रों के नाम-चयन भी अत्यंत उपयुक्त हैं, जैसे - गबर, उपकारी, उपदर, उजागर, प्यारी, दुलारी, मलेछु, गलीच, झांटुल, उद्वास, चटक, लोमा, उत्पातो आदि। नामों की सूची में प्राय: हर नाम नागरिकता व प्रबुद्धता से दूर ग्राम्यता या भदेसपन के निकट है।

 

लोकधर्मी नाटक की सार्थकता उसके मंचन में ही निहित है। ये नाटक खेले जाने के लिए ही रचे जाते हैं। इनके लिखित पाठ से महत्त्वपूर्ण इनका मंचन होता है। स्थान की उपलब्धता व दर्शक के रुझान के अनुकूल इन्हें उसी समय छोटा बड़ा कर दिया जाता है। भिखारी ठाकुर के नाटक इस दृष्टि से एकदम खरे उतरते हैं। नाटकों के प्रति पूर्वाग्रह या कठोर अनुशासन के स्थान पर दर्शकों की रुचि उनकी प्राथमिकता रही है। अगर दर्शक किसी दृश्य-विशेष में रम रहे हैं तो आवश्यकतानुसार कल्पना का प्रयोग कर, नई बातें गढ़ कर पात्र दृश्य को बड़ा करते चलते हैं; और अगर दर्शक पक्ष से मनोनुकूल प्रतिक्रिया न मिल रही हो तो नाटक छोटा करने के लिए कुछ खण्डों को छोड़ भी दिया जा सकता है। इससे नाटक की पूरी कथा बाधित नहीं होती। जिस स्थान पर नाटक खेला जा रहा हो अगर वहाँ की कोई ज्वलंत समस्या हो तो भिखारी ठाकुर किसी न किसी बहाने उसकी चर्चा अपने नाटकों में करा देते। यह इम्प्रोवाईजेशन लोकधर्मी नाटकों में ही पाया जाता है। लचीलापन लोकधर्मी नाटकों की विशेषता है।

 

लोकधर्मी नाटकों में कथानक व पात्र अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं न कि मंच-व्यवस्था। सब कुछ मंच पर उपस्थित कराने का आग्रह न होकर बहुत कुछ दर्शकों की कल्पनाशक्ति पर भी छोड़ दिया जाता है। भिखारी ठाकुर की मंच-व्यवस्था में भी स्थानीय व सुलभ रूप में उपलब्ध हो पाने वाले साधनों का ही उपयोग होता था। मंच खुला व अत्यंत मामूली होता था। पीछे के भाग पर एक साधारण पर्दा टंगा होता था जिसके सामने वाद्य-यंत्र बजाने वाले मंच के एक कोने में बैठते थे। मंच पर पात्रों का आवागमन सीधे-सादे ढंग से नेपथ्य से या फिर कई अवसरों पर दर्शकों के मध्य से गुजर कर भी होता था। पात्रानुकूल वेशभूषा होती थी पर इसमें भी अनावश्यक ताम-झाम से परहेज किया जाता था। इन सबके बावजूद भिखारी ठाकुर के नाटकों की लोकप्रियता का रहस्य यही मालूम पड़ता है कि उनके प्रदर्शन दर्शकों के लिए इतने आत्मीय व विश्वसनीय इसीलिए हो जाते थे क्योंकि उनकी कथावस्तु का सम्बन्ध लोकजीवन के उस वर्ग से संबद्ध था जो कम से कम साधनों में जीने का अभ्यस्त था। उनके लिए बेमतलब के ताम-झाम व दृश्य-सज्जा का उतना महत्त्व नहीं होता जितना कि अभिनय व्यापार की सहजता व संप्रेषणीयता का। नाटक में प्रदर्शित स्थितियों व समस्याओं से दर्शक का सहज तदाकार हो जाता था। चाहे नौकरी की तलाश में नवविवाहिता पत्नी को छोड़ दूसरे देश नौकरी के लिए जाने की विवशता हो या पैसे के अभाव में बेमेल विवाह की कारुणिकता; वैधव्य के भयानक अभिशाप का चित्रण हो या संपत्ति के लालच में परिवार का बंटवारा; या फिर ननद-भौजाई की मीठी झडपें अथवा देवर-भाभी के बीच की समस्याएँ झ्र इन सारे के सारे प्रसंगों से लोक का जुडाव सहज-स्वाभाविक रूप में हो जाता।

 

लोकधर्मी नाट्य-परंपरा में गीत, संगीत व नृत्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भिखारी के नाटकों में पद्यात्मकता की प्रधानता इसी महत्ता का निर्वाह करती नजर आती है। लिखित पाठ पर बहुत अधिक जोर न होने के कारण पद्य रूप में संवाद सहज रूप में स्मरणीय व संप्रेषणीय होते हैं। भिखारी के नाटकों में पात्रों का कथोपकथन अधिकांश काव्य/पद्य रूप में ही मिलता है। संस्कृत नाट्य-परंपरा की तर्ज पर नाटकों की शुरूआत भी मंगलाचरण से होती है। वाद्य-यंत्र भी सारे के सारे प्रचलित होते थे, जैसे झ्र ढोलक, झाल, हारमोनियम, कंसी, सारंगी. करताल, झाँझ, खँजरी आदि।

 

भिखारी ठाकुर के नाटकों में नारी पात्रों की भूमिका पुरुष ही करते थे। स्वयं भिखारी ठाकुर सत्तर साल की उम्र में भी एक अल्हड गोपी की भूमिका इस प्रकार निभाते थे कि दर्शकों के लिए इस बात का अनुमान लगा पाना कठिन होता था कि षोडशी गोपी की भूमिका सत्तर साल का बूढ़ा निभा रहा है। यह विपर्यय नाट्यधर्मी शैली का अंग है, परन्तु भिखारी ठाकुर के नाटकों में शास्त्रीय नियमबद्धता के पालन के रूप में न आकर यह तत्कालीन समाज के नियमों के अनुकूल था जिसके अनुसार स्त्रियों का मंच पर सबके सामने अभिनय करना अच्छा नहीं माना जाता था। इसी करणवश स्त्री पात्रों की भूमिका भी पुरुष अभिनेता ही करते थे। संकलन-त्रय के प्रति भी बहुत आग्रह भिखारी के नाटकों में नहीं मिलता। अगर बिदेसिया को गाँव से कलकत्ता जाना है तो वह बजते गीत के लय पर झूमता मंच के एक दो चक्कर काटता और इस उक्ति के साथ कि लो भैया! पहुँच गए कलकत्ता, कलकत्ता पहुँच जाता। लोकधर्मी शैली में बल बिलकुल यथार्थवादी निरूपण पर न होकर सहज रूप से संप्रेषण पर होता है। इस सहज संप्रेषण में लोकधर्मी नाट्यधर्मी की रेखाएँ घुल मिल जाती हैं।

 

बहरहाल भिखारी ठाकुर के नाटकों की लोकग्राहिता ही इसका प्राण है। ये लोकधर्मी नाटक लोक द्वारा, लोक के लिए, लोक का जीवंत, यथातथ्य व मनभावन चित्रण है। बिना पाठ में लगे ये लोकधर्मी नाटक आज भी लोगों के मन में रचे बसे हैं ये इनकी जीवंतता व लोकप्रियता का सहज प्रमाण है।

आज के संदर्भ में वंचितों का साहित्य

- नवल किशोर कुमार

कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है। हालांकि यह दर्पण एकआयामी नहीं बल्कि बहुआयामी होता है बिल्कुल हमारे समाज के जैसे। यह बात तोलोस्तोय एवं गोर्की के साहित्य में भी दिखता है और बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के साहित्य में भी। भारतीय साहित्यकारों में खासकर वे साहित्यकार जिनका संबंध वंचित समाज से रहा है, उनके साहित्य ने समाज के उस चेहरे को दिखाया है, जिसे अपना चेहरा मानने से भारत का कुलीन वर्ग इन्कार करता रहा है। लेकिन तारीफ़ करनी होगी राजेन्द्र यादव जैसे महान साहित्यकार सह संपादक को जिन्होंने वंचितों के साहित्य को न केवल मुख्य साहित्य के समानांतर ला खड़ा किया बल्कि उसे मुख्य साहित्य को पछाड़ने में अपनी महती भूमिका का निर्वहन किया। फ़िर चाहे वह ओमप्रकाश वाल्मीकि हों या कोई और।

 

यदि हम संपूर्ण भारतीय साहित्य का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि साहित्य जिसे हम जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिविम्ब कहते हैं उसमें से एक बहुत बड़ा वर्ग गायब है। उसके साहित्य को या तो नकार दिया गया है या उसे असंस्कृत या लोक धारा का नाम देकर विलग कर दिया गया है। यह विलगाव केवल साहित्यिक नहीं है, उसे भाषाई, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक रूप से पीछे धकेल दिया गया है। किंतु विगत कुछ दशकों से जैसे शिक्षा का प्रसार बढ़ा है, लोक या जन में भी जागरूकता आई है। आज साहित्य में मुख्यधारा का मिथक टूट रहा है। दलित, आदिवासी, स्त्री विषयक साहित्य ही समकालीन साहित्य में मुख्य धारा का साहित्य बन गया है। विगत दशकों में अस्मितावादी साहित्य ने व्यापक रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। मुख्यधारा के बरक्स हाशिये की धारा का भी अपना साहित्य, कला और लोक संस्कृति होती है। आदिवासी साहित्य और संस्कृति ने हाशिये की धारा से मुख्य धारा में आने का अनवरत प्रयास किया है।

 

हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली बार एक ऐसी युवा पीढ़ी आई है जिसमें बड़ी संख्या में दलित-आदिवासी रचनाकार शामिल हैं। दलित-आदिवासी कवियों में कई नाम तो ऐसे हैं जिनके बिना हिंदी की समकालीन कविता अधूरी प्रतीत होती है। कुछ खास जातीय समीक्षकों द्वारा हिंदी कविता में हमेंशा रुदाली का स्वर देखा देता है। कभी भाषा-छंद-अलंकार तो कभी अभिव्यक्ति के खोटेपन को लेकर। समय बदला है और समय के साथ साहित्य के प्रति लोगों की सोच भी बदली है। वे दिन और थे जब साहित्य को समाज के आगे चलने वाली मशाल के तौर पर देखा जाता था पर अब स्थितियां भिन्न हैं।आज साहित्य और समाज में मध्यवर्ग और हाशिये पर धकेल दी गई जातियों और समुदायों का उदय हो रहा है। यह हिंदी कविता के एक हजार वर्ष के इतिहास में अभूतपूर्व घटना है। समय का पहिया डोलता है और डोलने के साथ ही लंबी दूरी भी तय करता है। आज दलित आदिवासी कविता में ऐसे स्वर उभरे हैं जो सदियों से संतप्त थे। उन्हें अनपढ़ बनाये रखने की सामाजिक-धार्मिक कोशिशे थोथी हो रही थीं। अब दलित आदिवासी शिक्षित हो रहे हैं।

 

यदि आदिवासी साहित्य की बात की जाय तो प्रमुख रूप से तीन बिंदुओं पर ध्यान जाता है जिसके इर्द-गिर्द ही आदिवासी साहित्य विमर्श को केन्द्रित और संकुचित कर देने की कोशिशें की जा रही हैं। पहला, आदिवासी साहित्य लिखित नहीं है, यह लोक साहित्य है और अभी इसके शिष्ट साहित्य का प्रारंभिक दौर है। दूसरा, आदिवासी साहित्य और कलाएं अनगढ़ हैं जिन्हें भारतीय और विश्व साहित्य से सीखकर समन्वय बनाकर सुघड़ बनना है। यहां भारतीय से तात्पर्य हिंदी, बांग्ला, ओड़िया, तमिल आदि का विकसित साहित्य है। तीसरा और अंतिम बिंदु यह है कि आदिवासी साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है[1]। आज का आदिवासी रचनाकार इन स्थापनाओं का मुखर विरोध करता है। उन्होंने अपने प्रतिमान गढ़े हैं। अपने साहित्य और संस्कृति का मूल्यांकन भी किया है। पिछली साल दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले का केंद्रीय विषय था : देशज आवाजें- भारत के लोक और आदिवासी साहित्य का मानचित्रण और प्रकाशन। यह अकारण नहीं है इसकी प्रासंगिकता इस दौर में आदिवासी साहित्य, संस्कृति और जीवन की दशा-दिशा पर विचार करने का यह उपयुक्त अवसर है।

 

आज की प्राथमिक आवश्यकता है कि आदिवासी साहित्य की अवधारणा को मजबूती से रेखांकित किया जाय जिसमें व्यक्ति की बजाय सामूहिक जीवन-दर्शन की सनातन परंपरा रही है। उनके मिथक और ऐतिहासिक संदर्भों का अर्थ सिर्फ इन्सान और उसकी आत्मिक-भौतिक आवश्कतायें नहीं रहीं। यह शाश्वत सत्य है कि समाज और संस्कृति राजनीति का आधार होते हैं और जब समाज बदलता है तब राजनीति भी बदल जाती है। साहित्य इस समाज को बदलकर ही राजनीति से संघर्ष करता है। सातवें और आठवें दशक के बाद जब भारत में अस्मिता बोधी जमातों ने वर्चश्ववादी समुदाय को चुनौती देनी आरम्भ की राजनीति सहित सामाजिक संस्थानों में उनका दखल बढ़ा तभी से जातिवाद के द्वारा राजनीति और समाज के प्रदूषित होने का मिथ बनाया गया।उसने अस्मितावादी उभारों को चुनौती दी, मजेदार बात यह है कि उन्होंने खुद को यूथ फॉर एक्वालटी जैसे नामों से संबोधित किया या फिर आम आदमी पार्टी जैसे नए अवतारों में अवतरित हुए। भारतीय संदर्भों में यह धातव्य है कि द्विज विचारधारा या उसकी वाहक जातियां ऐसा व्यवहार करती हैं जैसे उनकी उपस्थिति संसार के कल्याण के लिए है। उसे चुनौती देने वाली विचारधाराएं या उसके वाहक समूह संकीर्ण और मानवता विरोधी हैं।वसुधैव कुटुम्बकम का उद्घोष करने वाले, बंधुत्व, स्वतंत्रता और समानता की बात करते हुए लोग उस परिवार में अपना हक़ मांगते हैं और खुद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।

 

मनुष्य ने मनुष्य को बहुत सताया है। स्त्री के रूप में आधी मानवता और दलितों के रूप में एक बड़ा वर्ग जीता जागता उदाहरण है हमारे सामने। वर्तमान में हिन्दी साहित्य में स्थापित और चर्चित आदिवासी रचनाकार नहीं हैं, यह स्थिति सचमुच भयावह है। एक भी आदिवासी लेखक की याद नहीं आती है, जो हमारी हिन्दी के पाठ्यक्रमों में हो। क्या कारण हैं कि आदिवासी रचनाकार साहित्यिक विधाओं में उच्चतर स्थिति में नहीं हैं? क्या लेखन नहीं हैं? क्या प्रकाशन की स्थितियां नहीं हैं या सही समय पर समुचित प्रोत्साहन का अभाव है? मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य के आदिवासी हिन्दी लेखकों के संदर्भ में उपर्युक्त स्थितियों को परखने पर जो दृश्य सामने आता है, वह बेहद उलझा हुआ है।जो जन-समूह विजेताओं की पकड़ से बाहर रहे, खदेड़ दिए गए या बच कर दूरदराज दुर्गम जंगलों और पहाड़ों में शरण लेने को विवश हुए, वे आज के आदिवासी कहे जा सकते हैं। वैश्वीकरण की यह समस्त प्रक्रिया सार्वजनिक और निजी दोनों ही क्षेत्रों में अपना बहुआयामी वर्चस्व कायम करने का मार्ग प्रशस्त करती है। यह सब कुछ अंतत: उसी चालाक भद्रलोक के हित में होता है जिसने अधिसंख्यक जन को हाशिये पर धकेलने की साजिशें कीं। और यही वर्तमान पूंजी-केंद्रित इस देश का धन, धर्म और सत्ता का- यथार्थ है, जहां राष्ट्र-समाज इंडिया बनाम भारत में विभाजित नज़र आता है!

 

आज आदिवासी साहित्य का दायरा बहुत बड़ा है। आज दसाधिक आदिवासी पत्रिकाएं आदिवासियों के मुद्दों को प्रमुख रूपों में उठा रही हैं। प्रजातंत्र के इस पैंसठ पड़ावों के बावजूद भी वह कौन से कारक हैं जो आदिवासियों को विद्रोही बना रहे हैं।वह कौन सा विकास है जो सिर्फ उनका शोषण ही नहीं कर रहा, उन्हें नष्ट भी कर रहा है। आज चाहे समाज हो या साहित्य उन्हें बड़ी हिकारत से देखा जा रहा है तो क्यों? आदिवासियों के संदर्भ को रेखांकित करने वाला पहल का यह वक्तव्य देखा जाये तो फिर आदिवासियों की सही स्थिति को जाना जा सकता है - मैं अपने वसीयतनामे में और बातें लिखना चाहता हूं, लेकिन मैं पस्त हो चुका हूं। मेरे शरीर की एक शिरा थक चुकी है। फिर मेरी हिंदी भी टुटपुंजिया है। मुझे अपने धर्म और देश के प्रति वफादार होना सिखाया गया था लेकिन अब तक मैं पूरा नास्तिक हो चुका हूं और अपने देश के खिलाफ मैंने हथियार उठा लिया है। अब मैं यह सोचता हूं कि यह रास्ता बरबादी की तरफ ले जायेगा, लेकिन मैं वापस नहीं लौट सकता। अगर यह बसीयत आप लोगों के हाथ लगे तो पढ़ियेगा और सोचियेगा कि आदिवासी लोग क्यों बागी हो रहे हैं।

 

गौर से अध्ययन करें तो पायेंगे कि जीवन के विविध पहलुओं से परिचय कराता आदिवासी विमर्श संघर्ष, उल्लास और आक्रमकता का साहित्य है। छल-कपट, भेद-भाव, ऊंच-नीच से रहित तथा सामाजिक न्याय का पक्षधर इस विमर्श का आधार आदिवासियों की संस्कृति, संघर्ष, भाषा, भूगोल तथा उसके जीवन की अनेक समस्यायें और प्रकृति के प्रति उनका आत्मिक लगाव है। हाल के वर्षों में हिंदी के जिन रचनाकारों ने आदिवासी जीवन-शैली और प्रतिरोध की संस्कृति को अपनी कृतियों, रचनाओं का आधार बनाया है उनमें प्रमुख रूप से संजीव, मैत्रेयी पुष्पा, श्री प्रकाश मिश्र, तेजिंदर, हबीब कैफ़ी, पुन्नी सिंह, मनमोहन पाठक, रणेंद्र, महुआ माजी, विनोद कुमार, पीटरपाल एक्का, वीर भारत तलवार, रमणिका गुप्ता, केदार प्रसाद मीणा, हरिराम मीणा, अश्विनी कुमार पंकज, रोज केरकेट्टा, प्रेम कुमार मणि और डा मुसाफ़िर बैठा आदि का नाम लिया जा सकता है। पर यहां पर हम आदिवासी कविता लेखन पर मुख्यतः बात करने जा रहे हैं।

 

यदि आज के संदर्भ की आदिवासी कविता की बात की जाय और इन दो नामों का जिक्र न किया जाय तो बात बहुत अधूरी होगी। निर्मला पुतुल और अनुज लुगुन जैसे कवि जिन्होंने हाशिये के लोगों के जीवन संघर्ष को उनसे जुड़ी प्रकृति और संस्कृति को कविता में जगह दिलाई है।

 

अनुज लुगुन हिंदी के कवि समाज के नए नागरिक हैं। उनकी नागरिकता अनेक दृष्टियों से रेखांकित किये जाने योग्य है। लगभग एक हजार साल की कवि परंपरा में वे पहले महत्वपूर्ण कवि हैं जो भारत के विस्तृत आदिवासी समाज के अनुभव लेकर कविता की दुनिया में आये हैं। उनकी कवि संवेदना मूलतः आदिवासी संवेदना है। आज के दलित आदिवासी कवियों में साफगोई और कलात्मकता का अद्भुत सम्मलेन दिखाई पड़ता है। परिधि का विस्तार नमक अपने एक आलेख में हिंदी के प्रतिष्ठित कवि विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं कि ध्यान देने की बात है कि हिंदी क्षेत्र में समाजवादी आन्दोलन शिथिल हुआ है लेकिन कविता के क्षेत्र में फिर भी श्रम, संघर्ष और सौन्दर्य है तो इनमें इन कवियों की भूमिका है। सीमांत से आने वाले इन युवा कवियों ने सच्चे अर्थों में कविता की भाव परिधि का विस्तार किया है। तत्सम से तद्भव का जो वर्चश्ववादी सिद्धांत ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने जबरन थोपा था उसके उलट तद्भव से तत्सम की प्रक्रिया ज्यादा प्रामाणिक और मजबूती से अपना स्थान बना रही है।

 

आदिवासी जीवन को लेकर जब कविता की बात की जाती है तो मौखिक परंपरा ही धरोहर के रूप में सामने आती है जो प्रमुख रूप से गेय परम्परा रही है। आधुनिक या समकालीन कविता की दृष्टि से आंचलिक भाषाओं में आबद्ध कविता के माध्यम से जीवन के विभिन्न पक्षों की अभिव्यक्ति होती रही है लेकिन हिन्दी भाषा में आदिवासी कविता अभी शुरूआती दौर में है। आदिवासी इलाको में बाहरी तत्वों की घुसपैठ सबसे बड़ी समस्या रही है। यहीं से आदिवासी जीवन की पवित्रता में प्रदूषण शुरू होता है और अंत में आदिवासी अस्तित्व का संकट। ग्रेस कुजूर की कविता के अंश- हे संगी क्यों घूमते हो/ झुलाते हुए खाली गुलेल/ क्या तुम्हें अपनी धरती की/ सेंधमारी सुनायी नहीं दे रही? सेंधमारी तो सुनाई देती है लेकिन गूंगे बहरे लोग न सुन पाते हैं न देख पाते हैं। इस्पातिका के आदिवासी विशेषांक में छपी मित्रेश्वर अग्निमित्र की कविता कुछ किरचे-कुछ कहन की एक बानगी यहां धातव्य है। कविता उस फलक को तोड़ती है जो आदिवासियों को पिछड़ा और जाहिल समझने की हिमाकत करत है। कविता कहती है कि सुनो रायसन/ कल इंसाफ का रास्ता जुड़ेगा जंगलों से/हस्तिनापुर से रोशनी चलकर उतरेगी/ सुवर्णरेखा तट के अमायनगर घाट पर/सीडब्लूजी की चकाचौंध में अंधी हुकूमत देख पायेगी/रोशनी के पार का अंधेरा, क्योंकि,/ सुनो रायसन भूख जाग रही है।

 

नये रचनाकारों में सत्ताईस साल के मुंडा आदिवासी कवि अनुज लुगुन हिंदी कविता का नया और युवा चेहरा हैं। बहुत कम समय में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले इस कवि की कविता यह संकेत करती है कि हिंदी की समकालीन कविता अब ऐसी जगहों में पैदा हो रही है जो सत्ता के केन्द्रों से दूर हैं और जहां जूझते-संघर्ष करते, मर्मान्तक अनुभवों के बीच रहने वाले शोषित-उत्पीड़ित लोग हैं। वर्तमान में संपूर्ण भारतीय समाज, राजनीति और साहित्य में उत्पीड़ित अस्मिताओं के मुक्तिकामी संघर्षों का दौर है। दलित, शोषित, आदिवासी, पिछड़ी जातियां अपने उत्थान के उपक्रम में लगी हुई हैं। बीसवीं सदी के आखिरी दशकों एवं इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में भारत में नए सामाजिक आंदोलनों का उभार हुआ है। आज हाशिए की शक्तियां उदीयमान हो रही हैं। स्त्रियों, किसानों, दलितों, आदिवासियों और जातीयताओं की नई एकजुटता में ऐसी मांगें और मुद्दे उठाए जा रहे हैं जो स्थापित सैद्घांतिक और राजनीतिक मुहावरों के माध्यम से आसानी से समझे और सुलझाए नहीं जा सके थे।

 

यदि हम आदिवासी महिला रचनाकारों के साहित्य का अवगाहन करें तो हम पाएंगे कि उनके साहित्य के तीन आधार हैं। स्त्री होने के कारण लैंगिक आधार, आदिवासी होने के कारण जातीय आधार है और जंगली होने के कारण उनका देशीय आधार भी है। आदिवासी कविता में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुकी रचनाकार निर्मला पुतुल का नाम याद आता है। हिंदी कविता में आज उनका नाम बहुत आदर से लिया जाता है। उतनी दूर मत ब्याहना बाबा, एक बार फिर, अपनी ज़मीन तलाशती बेचैन स्त्री, आदिवासी स्त्रियां, बिटिया मुर्मू के लिए, आदिवासी लड़कियों के बारे में, चुड़का सोरेन से, कुछ मत कहो सजोनी किस्कू आदि बहुत सी कवितायें हमारा ध्यान खींचती हैं। यदि हम निर्मला पुतुल की कविताओं को देखें तो पाएंगे कि अंतर्वस्तु के धरातल पर वे सदा प्रतिरोध करती दिखाई देती हैं। स्त्री संवेदना के धरातल पर निर्मला पुतुल की कवितायेँ अपनी जमीन, अपना घर, अपने होने का अर्थ तलाशती बेचैन स्त्री की दास्तां हैं।

 

दरअसल निर्मला की कविता का मानचित्र उनके देश-काल के भूगोल-इतिहास-राजनीति-अर्थनीति से मिलकर बना है। स्त्री संवेदना से इतर भी उनकी कविताओं का व्यापक धरातल है जो आज के संदर्भ में विचारणीय है। उनकी कविता ढेपचा के बाबू हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार तुलसीराम की आत्मकथा मुर्दहिया की पात्र किसनू भौजी की लिखाई गई चिट्ठी की याद दिला देती है जिनके बारे में स्वयं तुलसीराम का मानना था कि उनके अंदर दुखड़ा सुनाने की अद्भुत वर्णात्मक शैली थी। पुतुल की ढेपचा के बाबू को लिखी गई चिट्ठी अकाल में लिखाई गई किसनू भौजी की चिट्ठी की याद दिला देती है। दोनों में दुखों की प्रकृति की जो साम्यता है वह विस्मयकारी है। आजादी के चौंसठ साल बाद भी हाशिए के समाज को जीवन की आधारभूत सुविधाएं नहीं मिल पायीं हैं। दो जून की रोटी जब ठीक से मयस्सर न हो तो रोजगार के लिए पलायन के सिवा कोई दूसरा सहज विकल्प सामने नहीं रह जाता है। पलायन के उन अवसरों पर निर्मला पुतुल उन स्त्रियों के साथ होने वाली ज्यादतियों को रेखांकित करती हैं - पिछले साल धनकटी में खाली पेट बंगाल गई पड़ोस की बुधनी, किसका पेट सजाकर लौटी है गांव? निर्मला लिखती हैं और हां पहचानो/अपने ही बीच की उस कईकई ऊंची सैंडिल वाली/स्टेला कुजूर को भी/जो तुम्हारी भोली भाली बहनों की आंखों में सुनहरी जिंदगी का ख्वाब दिखाकर/दिल्ली की आया बनाने वाली फैक्ट्रियों में कर रहीं हैं कच्चे माल की सप्लाई।

 

यदि हम संपूर्ण भारतीय साहित्य का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि साहित्य जिसे हम जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिविम्ब कहते हैं, उसमें से एक बहुत बड़ा वर्ग गायब है। उसके साहित्य को या तो नकार दिया गया है या उसे असंस्कृत या लोक धारा का नाम देकर विलग कर दिया गया है। यह विलगाव केवल साहित्यिक नहीं है, उसे भाषाई, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक रूप से पीछे धकेल दिया गया है। किंतु विगत कुछ दशकों से जैसे शिक्षा का प्रसार बढ़ा है, लोक या जन में भी जागरूकता आई है। आज साहित्य में मुख्यधारा का मिथक टूट रहा है। दलित, आदिवासी, स्त्री विषयक साहित्य ही समकालीन साहित्य में मुख्य धारा का साहित्य बन गया है। साथ ही ओबीसी साहित्य भी अब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास कर रहा है। विगत दशकों में अस्मितावादी साहित्य ने व्यापक रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। यह सकारात्मक बदलाव है। सकारात्मक इसलिए कि इसने बहुसंख्यक आबादी को अपनी पहचान स्थापित करने का अवसर प्रदान किया है। अब वंचित समाज के पास अपना साहित्य है। यह बात उनके समाज प्रभावी होते उनके अस्तित्व का प्रमाण भी है। (साभार दैनिक तरुणमित्र, पटना)

कुंठाग्रस्त हैं ओबीसी साहित्य के विरोधी, ओबीसी साहित्य के विशेषज्ञ प्रो राजेंद्र प्रसाद सिंह से खास बातचीत

- साभार, दैनिक तरुणमित्र, पटना

पटना । देश के साहित्यिक जगत के लिए ओबीसी साहित्य कोई नया शब्द नहीं है। हालांकि इसकी स्वीकार्यता को लेकर पूरे देश में विवाद है। मुख्य धारा का साहित्य जिसे कई ओबीसी साहित्यकार द्विज साहित्य की संज्ञा देते हैं, वह ओबीसी साहित्य को अपनी परिधि में शामिल नहीं करता है। कबीर से लेकर अनूपलाल मंडल, निराला और फ़णीश्वरनाथ रेणु जैसे कई साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में समाज के इस वंचित तबको को अपना केंद्रीय विषय माना, लेकिन मुख्य धारा के साहित्यकार उन्हें ओबीसी साहित्यकार के रुप में मानने से परहेज करते हैं। इस प्रकार ओबीसी साहित्य, जिसके पास उदाहरणों की कोई कमी नहीं है, मुख्य धारा के ग्लैमर में अपने अस्तित्व को लेकर संघर्षरत है। आखिर क्यों है यह स्थिति और इसके लिए कौन-कौन अहम कारक हैं? इन सवालों के जवाब के लिए तरुणमित्र के समन्वय संपादक नवल किशोर कुमार ने ओबीसी साहित्य के मर्मज्ञ प्रो राजेंद्र प्रसाद सिंह से खास बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश -

 

आखिर क्या वजह है कि आज के दौर में वे साहित्यकार जो ओबीसी वर्ग से आते हैं, वे स्वयं को ओबीसी साहित्यकार कहलाने से बचना चाहते हैं?

देखिए, यह एक कुंठा मात्र है। वे पिछड़े समाज के होने के कारण इससे ग्रसित हैं। लेकिन यह स्मरण रखिए कि जिस तरह वर्तमान अतीत के छायावादी कवियों से सवाल करता है कि जब देश में आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तब उनकी रचनाओं में यह सवाल क्यों गौण था, उसी प्रकार भी आने वाला समय आज के उन साहित्यकारों से सवाल पूछेगा जो सामान्य तौर पर ओबीसी वर्ग में रहने का लाभ तो उठाते हैं, लेकिन स्वयं को ओबीसी साहित्यकार से परे होने की बात करते हैं। मेरा मानना है कि भारतीय हिन्दी साहित्य में अबतक जितने भी वाद सामने आये हैं, सभी की आयु औसतन दस-दस वर्ष ही रही है। यह भारतीय साहित्य की प्रगतिशीलता का प्रमाण भी है। जैसे हाल के वर्षों में दलित साहित्य ने मुख्य धारा के साहित्य के समानांतर खुद को स्थापित किया, वैसे ही ओबीसी साहित्य भी अपने आपको पूरी मजबूती के साथ स्थापित करेगा।

 

तथाकथित तौर पर मुख्य धारा के साहित्यकार और समालोचक ओबीसी के बारे में टिप्प्णी करते हैं कि जिनके पास काबलियत नहीं है, वे ही ओबीसी साहित्य की बात करते हैं?

देखिये, सबसे पहली बात तो यह है कि ओबीसी साहित्य पर उंगली उठाना भारतीय संविधान पर उंगली उठाना है। मेरी समझ से ओबीसी साहित्य ही एकमात्र साहित्य है जिसका आधार संविधान में वर्णित सामाजिक व्यवस्था पर आधारित है। कई बार लोग यह भी कहते हैं कि ओबीसी साहित्य की बात करने का मतलब जाति की बात करना है। लेकिन यह पूरी तरह गलत है। आदरणीय मंडल साहब ने अपनी रिपोर्ट में जिस ओबीसी की बात कही है, उसमें केवल कुर्मी, यादव और कोईरी ही शामिल नहीं है। बल्कि इसमें तो वे सभी शामिल हैं जो पिछड़े हुए हैं। मसलन देश के 10 राज्यों में राजपूत ओबीसी की परिधि में आते हैं। वहीं नौ राज्यों में ब्राह्म्ण भी ओबीसी में शामिल हैं। तीन प्रांतों में कायस्थ भी ओबीसी में शामिल हैं। इसलिए ओबीसी को जाति विशेष के साथ जोड़कर नहीं, बल्कि वर्ग विशेष के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। रही बात काबलियत की तो ओबीसी साहित्य का एक गौरवशाली अतीत रहा है। इनमें कबीर से लेकर फ़णीश्वरनाथ रेणु और आजकल प्रेम कुमार मणि एवं रामधारी सिंह दिवाकर आदि भी शामिल हैं।

 

अच्छा एक बात बताइये। जैसे संविधान में ओबीसी वर्ग के लोगों को आरक्षण का लाभ दिया गया है, तो क्या आप ओबीसी साहित्यकार होने के नाते यह मांग भी करेंगे कि साहित्य में भी ओबीसी को आरक्षण मिलना चाहिए?

बिल्कुल। मैं तो मानता हूं कि समाज के हर क्षेत्र में वंचित तबके को आरक्षण मिलना ही चाहिए। फ़िर वह क्षेत्र साहित्य का ही क्यों न हो। हम सरकार से मांग करते हैं कि जिस तरह से सरकारी पाठयक्रमों में मुख्य धारा के साहित्य को जगह दिया गया है, वैसे ही ओबीसी साहित्य को भी जगह मिलना चाहिए।

 

अब बात आपके बारे में। यह बताइये कि आपको ओबीसी साहित्य की प्रेरणा कैसे मिली?

आपने बड़ा अच्छा सवाल पूछा है। यह वर्ष 2002 या 2003 की घटना है। लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका हंस में स्व राजेंद्र यादव के एक संपादकीय पर प्रसिद्ध समालोचक नामवर सिंह ने टिप्प्णी की थी। इस टिप्पणी को राजेंद्र यादव जी ने हंस में प्रकाशित किया था। डा सिंह ने तब हंस को ओबीसी पत्रिका की संज्ञा दी थी और यह भी कहा था कि यादव जी, आजकल दूध में पानी खूब मिलाने लगे हैं। नामवर सिंह की इस टिप्प्णी ने बहुत प्रभावित किया और इस संबंध में मैंने श्रद्धेय राजेंद्र यादव जी के साथ विचार-विमर्श किया। उन्होंने इस संबंध में ओबीसी साहित्य को लेकर एक नया प्रयास शुरु करने का निर्देश दिया था।

 

आपकी नजर में ओबीसी साहित्य के अस्तित्व के समक्ष कैसी चुनौतियां हैं?

सबसे बड़ी चुनौती मान्यता की है। लोग इसे जाति के हिसाब से देखते हैं जो कि पूर्णतः गलत है। हकीकत यह है कि जिन जातियों को लेकर सवाल उठाया जाता है, राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्थिति विपरीत है। मसलन कुर्मी समाज अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग वर्गों में वर्गीकृत है। जैसे बिहार में इसे ओबीसी तो गुजरात में सवर्ण और झारखंड में अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है। इसी प्रकार राजपूतों वाली बात मैंने आपको बताया ही। अभी हाल ही में मैं मराठवाड़ा विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम में भाग लेने गया था। वहां एक शोधार्थी ने अपना शोध प्रस्तुत किया। शोध का विषय था - राजपूत भाषा का समाज शास्त्रीय अध्ययन। मैंने उससे उसके वर्ग के बारे में पूछा तो उसने कहा कि वह पिछड़ा वर्ग से संबंध रखता है और महाराणा प्रताप का वंशज है। आपने चुनौतियों की बात की है। मेरा मानना है चुनौतियां सकारात्मक हैं और ओबीसी साहित्य को आगे बढने से अब कोई नहीं रोक सकता है।

कहानी : दुर्गी छिनार नहीं रही

- नवल

दुर्गी सचमुच पूरे गांव की दुर्गा है। तीखे नैन नक्श, उन्न्त उरोज और मांसल बाहें कुदरत का दिया सब कुछ तो है उसके पास। नहीं है तो केवल वह जिसके साथ बियाह के बाद वह भोजपुर से मगध के इस गांव में आयी थी। दुर्गी किसी को कुछ नहीं कहती न ही रोना रोती है। पूछने पर अपने हाथ में पड़े घट्ठे दिखाते हुए कहती है कि मरद नहीं है तो का हुआ, हम हैं। कोई निस्तनिया हमरा हाथ लगा के त दिखाये। अक्सर गांव के पुरबारी टोला के भुमिहार के लौंडे ताना मारते हैं। दुर्गी हसिया दिखाकर नपुंसक बना देने वाली गाली देती है।

 

सुबह् से लेकर रात तक खटना और जीना यही तो कहानी है दुर्गी की। वैसे दुर्गी की कहानी यही नहीं है कि उसका मरद परदेश में है। दो साल पहले वह आरा के इटारहा के ब्रह्मबाबा के पास गयी थी। जाते समय बखोरापुर की काली माई का आशीर्वाद भी लिया था दुर्गी ने। इटाहरा के ब्रह्मबाबा ने कहा था उसका मरद एक दिन जरुर लौटेगा। वहीं ब्रहमबाबा के पेड़ के पास सिंदूर चढाने के बाद भर मांग लगाकर लौटी थी दुर्गी। तब बगल वाले नारायण चमार की मां ने उसे ताना भी मारा था।

 

का हे रमेशवा बहु, बाबा कुछ कहलथुन कि कहिया ले लौटतव तोर दुलहवा। दुर्गी ने कुछ नहीं कहा चुपचाप अपने घर चली गयी। ऐसे मौकों पर दुर्गी किसी से कुछ भी नहीं कहती। का जाने किसी की नजर लग जाये। वैसे भी ई जीवन में उसे कुछ तो मिला नहीं। फ़िर भी जिए जा रही है बेचारी। लेकिन दुर्गी खुद को बेचारी नहीं मानती।

 

और वो माने भी क्यों। आखिर धर्मनाथ मिसिर की पोती और आरा के जाने माने पंडित सिद्धेश्वर मिसिर की बेटी इतनी जल्दी हार माने भी तो क्यों और कैसे। उसे आज भी याद है जब उसने रमेश यादव को पहली बार देखा था। सांवला सा रंग बिल्कुल रामचंदर या फ़िर किशन भगवान के जैसन। सिद्धनाथ मिसिर ने उसे अपने घर में नौकरी दी थी। जहां जाते रमेश को साथ ले जाते। खूब मेहनत करता था रमेश। पंडित जी भी खूब खुश रहते।

 

रमेश की खासियत थी। जब कोई काम न होता, पंडित जी के घर के बाहर बथानी में पड़ा रहता। एक बार तो दुर्गी ने उसे गौमाता के साथ बात करते पकड़ लिया था। वह कोई बिरहा गा रहा था और जवाब में गौमाता भी उसका साथ दे रही थी। उस दिन पहली बार रमेश ने दुर्गी को देखा था। एकदम सचमुच की मिस्टर इंडिया वाली श्रीदेवी के जैसी लग रही थी दुर्गी। बाद में मैट्रिक की परीक्षा के दौरान रमेश ने दुर्गी की खूब मदद की। दुर्गी का मौसेरा भाई चिट बनाता और रमेश उसे पहूंचाने स्कूल की चाहरदीवारी छड़पता। यही से शुरु हुई दुर्गी और रमेश की प्रेम कहानी।

 

दुर्गी को आज भी याद है वह दिन जब पहली बार उसने रमेश को छुआ था। उस दिन भुमिहार टोले के लोगों से सिद्धेश्वर मिसिर की भिड़ंत हो गयी थी। मामला जमीन का था। लाठी पैना भी खूब चला था। मिसिर जी को तो कुछ नहीं हुआ रमेश जख्मी हो गया था। बाहर बथानी में सोया था माथा में मुरेठा बांध के। दुर्गी तब उसके पास पहूंची थी। बोली, दवाई ले लिए हो कि नहीं। रमेश ने कहा कि नहीं लेकिन सब ठीक हो जाएगा। हाथ से खून बह रहा था। दुर्गी तब दौड़कर घर के अंदर गयी और नाखून पालिश ले आयी। नाखून पालिश का रंग रमेश के बदन पर खिल रहा था। तब पहली बार रमेश ने दुर्गी का हाथ हौले से दबाया था।

 

दुर्गी तब खूब घुमक्कड़ थी। उसने जिद ठान ली थी कि इस बार पूजा करने आरणय मंदिर ही जाएगी। मिसिर जी और मिसिराइन समझाकर हार गये तब उन्होंने रमेश के साथ जाने की इजाजत दी। वही आरण्य देवी से दुर्गी ने रमेश को मांग लिया और जब लौटी तो पूरे गांव में बवाल मच गया।

 

अरे सुनते हो मिसिर जी की बेटी ने रमेशवा से बियाह कर लिया। कौन रमेशवा? अरे वही कोईलवर के रामधनी गोप के बेटवा। आजकत मिसिर जी के यहां बेगारी करता है। बेगारी करते-करते बेटिये को पटा लिया। मिसिर जी को पहले ही खबर मिल चुकी थी। गांव की सीमा पर खड़े हो गये दोनाली बंदूक लेकर। गांव के भुमिहारों के लड़के भी बड़े ताव में थी। साली पंडिताइन होके गोवार से कैसे बियाह कर लेगी। भुमिहार-बाभन में ओकरा मन लाइक कोई नहीं मिला।

 

दुर्गी जानती थी कि ऐसा ही कुछ होने वाला है। इसलिए रमेश के साथ सीधे वह पटना आयी और फ़िर रमेश के घर गयी। रमेश के परिवार में केवल बाबूजी थे। पहले एमसीसी के साथ थे, लेकिन रमेश को उससे कोई मतलब नहीं होता था। रामधनी गोप बहु को देखकर खुश हुए और घर के दरवाजे पर चार नाल बंदूक खड़ी कर दी। दुर्गी को अब भी याद है अकेले उसके ससुर ने 100 राऊंड फ़ायरिंग की थी तब जाकर उसका घर बसा था। पति के साथ सेज सुख उठाते-उठाते दुर्गी दो बार गर्भवती भी हुई। लेकिन किस्मत को मंजूर नहीं था। पहली बार 4 महीना और दूसरी बार तो डेढ महीने में ही धुलैया कराना पड़ा था। फ़िर इसी बीच रमेश कमाने दिल्ली चला गया। जाना तो दुर्गी भी चाहती थी कि दिल्ली जाये और खूब घुमे। रमेश की भी यही तमन्ना थी। लेकिन तब दुर्गी उम्मीद से थी। इसलिए अकेले जाना मजबूरी ही थी।

 

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आज दुर्गापूजा है। दुर्गी भी नौ दिनों का व्रत रखती है। कलश स्थापना वाले दिन गणेश पंडित के यहां से कलश और दीया लेकर आयी। बिहटा स्टेशन के पास लगे बाजार से उसने पूजा का समान भी खरीदा और साथ में पकाने के लिए 2 सेर चावल, पाव भर दाल और दस रुपए का करुआ तेल। बाजार से शकरकंद भी लिया था उसने। रास्ते में शिवचंद्र बहु मिल गयी। देखते ही उसने दुर्गी को टोका। दीदी, कोई चिट्ठी पत्री आई दिल्ली से? दुर्गी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह जल्दी से जल्दी घर जाना चाहती थी,

 

दरवाजे पर गोबर की गंध ताजी थी, लेकिन कुत्तों ने अपने पांव के निशान बना दिया था। दुर्गी के मुंह से निकला मोचकबरा कुत्तवन सब के खाली इहें देखल है। सामान अपनी घर के पूजा वाले कमरे में दुर्गा माता के चरणों में रखकर दुर्गी फ़िर से दरवाजा और आंगन लीपने लगी। पंडित जी आने वाले थे और दुर्गी को अभी मुंह धोना और नहाना बाकी था।

 

बाबा जी आ गये तब कलश स्थापना का कार्यक्रम शुर हो गया। बगल के भोला गोप, हरलाखी रजक, कायथ टोला वाले श्रीवास्तव जी सब पहूंच चुके थे। दुर्गी भी नहाकर और एकरंगा कपड़ा पहनकर पूजा के लिए तैयार हो गयी थी। लेकिन उसे लाज भी आ रही थी। बिना ब्लाउज और साया के साड़ी पहनना और गांव के बड़े-बुजुर्ग के सामने होने में लाज तो आयेगी ही। फ़िर सोची धर्म का काम है, इसमें कैसी लाज। पूजा के बीच ही भुमिहार टोला के लौंडे आ गये। एक ने दुर्गी की ओर इशारा किया और कहा कि छिनार सब का यही काम है। संयोग ही था कि उस समय पूजा चल रहा था और वहां बैठे लोग चुप रहे।

 

दुर्गी को इन सबकी आदत हो गयी थी। गाय और भैंस के लिये चारा लाने के दौरान कई बार उसपर आरोप लगे। मिथिलेश यादव के साथ उसकी कहानी आज भी गांव में लोग चटखारे लेकर सुनाते हैं। महिलायें भी कहती है कि गांव के बाहर स्कूल वाले खंडहर में दोनों ने खूब गुलछर्रे उड़ाये। देखो तो कैसी साधुआइन बनी फ़िरती है। साबून से चेहरा चमका लेने से मन के अंदर का मैल थोड़े न साफ़ होता है। जबसे रमेश दिल्ली गया है दुर्गी तो एकदम छिनार हो गयी है।

 

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कूरियर कंपनी का मालिक फ़ेड्रिक डिसूजा गोवा का होने के बावजूद हिन्दी और बिहार की भोजपुरी अच्छे तरीके से बोल लेता है। रमेश डिसूजा का दाहिना हाथ बन गया है। पगार 8 हजार हर महीने मिल जाती है। उसी में वह 4 हजार अपने उपर खर्च करता है और शेष पैसे वह दुर्गी को भेज देता है। उसे केवल एक बात का मलाल है। दुर्गी दिल्ली नहीं आना चाहती है। जाने क्यों गांव में ही पड़ी रहती है।

 

पिछले साल सावन में जब रमेश गांव आया था तब गांव वालों ने दुर्गी के त्रिया चरित्र के बारे में खूब बताया था। रमेश का मन खट्टा हो गया था। लेकिन वह दुर्गी से प्यार भी करता है। इसलिए कुछ कह नहीं सकता। घर में माला डी का टेबलेट देख उसका माथा भी ठनका था। लेकिन उसने दुर्गी से कुछ भी नहीं पूछा। रक्षाबंधन के एक दिन बाद अचानक ही रमेश ने थैला लिया और आरा स्टेशन पहूंच गया। रास्ते में गांव के लक्ष्मण सिंह मिल गये तो उनसे कहलवा दिया कि हम दिल्ली वापस जा रहे हैं।

 

दुर्गी जब घास का गट्ठर लिए घर आयी। उसे विश्वास था कि रमेश आज की रात तो उसके मन की प्यास जरूर मिटायेगा। बहुत दिन हुए उसकी छाती से लगकर सोये हुए। उसकी मुंछें दुर्गी को तकलीफ़ नहीं देती थी। वह तो खुद कहती थी कि जिसके मुंछ नहीं है वह कैसा मरद।

 

पड़ोस की एतवारी फ़ुआ ने उसे रमेश के चले जाने की सूचना दी। दुर्गी के सारे सपने पल भर में बिखर गये। धम्म से बैठ गयी धरती पर। थोड़ी देर बाद घर के अंदर गयी। खटिया पर जाकर लेट गयी। आंखों से आंसू की धार बह रही थी। सोचने लगी रमेश अब पहले जैसा नहीं रहा। वह चाहे तो मुझे भूल सकता है लेकिन मैं कैसे भूल जाऊं। वही तो मेरी जिंदगी है।

 

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गांव के मधेसर सिंह सबसे अमीर आदमी थे। पूरे इलाके में उनकी इज्जत थी। दुर्गी भी उन्हें बाप जैसा मानती थी। उस दिन मधेसर सिंह ने दुर्गी को बुलवाया था। मुड़िकटवा पईन के पास वाली जमीन बेच दो। मैं अच्छे पैसे दे दूंगा और फ़िर तुम चाहो तो मैं एक पक्का मकान भी दे सकता हूं। यह कहते कहते मधेसर सिंह उसके करीब आ गये। उसने दुर्गी के कंधे पर हाथ रखकर कहा अगर मंजूर हो तो शाम में चली आना। मेरा बेटा बैरिस्टर है। कागजात बना देगा।

 

दुर्गी के मन में अफ़सोस हुआ कि वह अपना हंसिया क्यों भूल गयी। अगर होता तो साले की गर्दन काट देती। मन मसोसकर चली गयी। घर जाकर उसने रमेश की तस्वीर से कहा कि जमीन नहीं बेचूंगी। फ़िर चाहे कुछ भी हो जाये।

 

दीया-बाती की बेला हो रही थी। दुर्गी ने एक ढिबरी बाहर के बथानी में जलाया। तभी मधेसर सिंह आता दिखा। उसका मन जोर से धड़का। अंदर गयी और अपना हंसिया, कुदारी और बरछी निकालकर कमरे में एक जगह छिपा दिया। मधेसर सिंह के साथ कुछ लोग और थे। वे बाहर ही रहे। दुर्गी समझ चुकी थी। मधेसर सिंह जबरदस्ती करेगा। इसलिए पहले से तैयार थी।

 

गांव में हल्ला हो गया। दुर्गी ने मधेसर सिंह का औजारे काट दिया। थाना के लोग पहूंचे। मधेसर सिंह दुर्गी के कमरे में छटपटा रहा था। दुर्गी एक कोने में हाथ में हंसिया लिये खड़ी थी। दारोगा विश्वजीत सिंह ने दुर्गी से कुछ भी नहीं कहा। मधेसर सिंह को उठाया और अस्पताल भेज दिया।

 

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मधेसर सिंह के नपूंसक होने की जानकारी रमेश को भी मिल गयी। वह जल्द से जलद अपने घर आना चाहता था। उसके मालिक डिसूजा ने एडवांस देते हुए सलाह दिया कि अपनी वाइफ़ को दिल्ली ले अए। रहने का इंतजाम मैं करवा दूंगा।

 

पूर्वा एक्सप्रेस में वह जैसे-तैसे चढ गया। पूरी रात जेनरल बोगी के बाथरुम के बाहर बैठा रहा रमेश। सुबह पांच बजे के करीब आरा स्टेशन पर वह उतरा। उसके पैर घर जाना नहीं चाहते थे। सोच रहा था कि वह गांव वालों को क्या मुंह दिखायेगा। पुलिस उससे जाने कैसे-कैसे सवाल करेगी। रास्ते में भुमिहार टोला का नवेन्दू मिल गया। उसी की मोटरसाइकिल पर बैठ वह गांव पहूंचा। जानकारी मिली कि दुर्गी को थाना ले जाया गया है।

 

रमेश को देख दुर्गी का चेहरा खिल उठा था। उसे विश्वास था कि रमेश उसे यहां से जरुर ले जाएगा। लेकिन दारोगा जिद पर अड़ा था। इसने गांव के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का औजार काटा है, इसकी सजा तो उसे मिलेगी। फ़िर बात हुई कि 20 हजार रुपए दिये जाने पर मामले को दूसरे तरीके से लिखा जा सकता है कि मधेसर सिंह ने पीड़िता के घर मे घुसकर इज्जत लूटने की कोशिश की और बचाव में पीड़िता ने उसका औजार काट लिया। पैसे नहीं दिये जाने की स्थिति में केस पहले से तैयार था। दुर्गी कलंकिनी है। पहले तो मधेसर सिंह को प्यार में फ़ंसाया और फ़िर ब्लैकमेल करने लगी। पैसे नहीं दिये जाने पर उसने उसे हमेशा-हमेशा के लिए नामर्द बना दिया।

 

रमेश ने बटुआ में देखा तो कुल 4000 रुपए थे। सब निकाल वह दारोगा के पैरों में लोट गया। दुर्गी यह सब अपनी आंखों से देख रही थी। बाद में दारोगा ने दुर्गी को जाने की इजाजत दे दी। दोनों लौट रहे थे। थाना के बाहर एक रिक्शा पर एक साथ। दुर्गी रमेश के हाथो को जोर से पकड़ना चाहती थी वही रमेश मारे शर्म के धरती में धंसा जा रहा था।

 

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सिधेसर मिसिर भी परेशान थे। दो बेटियों की शादी नहीं हो रही थी। दुर्गी के कारण पूरे इलाके में उनकी नाक पहले ही कट चुकी थी। फ़िर नये मामले के कारण तो वे किसी से आंख मिलाकर बात भी नहीं कर पाते थे। मिस्रिराइन ने तो घर के बाहर निकलना ही बंद कर दिया। दोनों बेटियां सुलक्षणा और सुपर्णा ने भी कालेज जाना छोड़ दिया था। आखिर कितना सुन सकती थी कि इनकी बहन ने एक भुमिहार का औजार काट लिया है।

 

लेकिन मन ही मन मिसिर जी खुश भी थे। उन्हें गर्व था कि उनकी बेटी ने सचमुच दुर्गा का अवतार लिया है। वे चाहते थे कि दुर्गी घर आकर रहे। रमेश भी रहे। लेकिन फ़िर डरते कि सुलक्षणा और सुपर्णा की शादी कैसे हो पायेगी। इसलिए मन मसोसकर रह गये।

 

उस दिन पहली बार मिसिर जी ने गांव के दो लौंडों को भरपेट मारा। दोनों ने मिसिर जी की बेटी को छेड़ा था। हालांकि बाद में पंचायत में मामला शांत हुआ। लेकिन मिसिर जी ने ठान लिया था कि अब जीवन ऐसे नहीं जिया जा सकता। लोहा को लोहा ही काटता है। भुमिहार सब कुत्ते की पूंछ की तरह हैं। साले ये कभी नहीं सुधरेंगे। उस दिन पहली बार लाल झंडे के लोग रात में उसके घर आये थे।

 

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रमेश ने अपना फ़ैसला सुना दिया था। इस बार वह अकेले नहीं जाएगा। मामला शांत होते ही दुर्गी भी दिल्ली जायेगी। घर में माला डी वाली बात का उसने जिक्र तक नहीं किया। दुर्गी दो राहे पर खड़ी थी। घर छोड़ेगी तब भुमिहार टोला के लोग सब जमीन हड़प लेंगे और नहीं गयी तब जीना हराम करते रहेंगे।

 

दुर्गी ने रमेश से कहा मुझे अपने साथ ले चलो, लेकिन पहले यहां की सारी जमीन संपत्ति बेच दो। इनके रहते घर छोड़ना मुमकिन नहीं है। रमेश को यह सलाह अच्छी लगी। लेकिन सवाल यही था कि उसकी जमीन कौन खरीदेगा।

 

दुर्गी ने जवाब दिया कि मिथिलेश यादव बड़े पैसा वाला है। वह खरीद लेगा और वह मुंहजोर भी है। भुमिहार टोला के लोग केवल उसी से डरते हैं। मिथिलेश यादव का नाम सुन रमेश का मन खट्टा हो गया था। लेकिन वह दुर्गी पर इल्जाम लगाये भी तो कैसे। कहीं अगर बात झुठ निकली तब दुर्गी क्या सोचेगी। हो सकता है माला डी की गोली उस समय की हो जब शुरु-शुरु में उसने लाकर दिये थे। आखिर उसने भी तो प्यार के लिए अपने मां-बाप और जाति समाज सबको छोड़ा था।

 

रात में दुर्गी और रमेश एक-दूसरे के साथ थे। दुर्गी के बदन की गर्मी रमेश को मोहित कर रही थी। खटिया बेकार साबित हो रहा था इसलिए दोनों जमीन पर आ गये और फ़िर सारी रात दोनों ने सब भुलाकर एक दूसरे में समाये थे।

 

सुबह होते ही रमेश मिथिलेश यादव के घर पहूंचा। दुआ सलाम के बाद तय हुआ कि पूरी जमीन और घर के बदले वह 4 लाख रुपए दे सकता है। रमेश जानता था कि जमीन का भाव आसमान छू रहा है और मिथिलेश आधा से अधिक कीमत दे रहा है। दुर्गी को इससे ऐतराज नहीं था। उसका कहना था कि चार लाख रुपए में दिल्ली में रहने के लिए एक मुट्ठी जमीन तो मिल ही जाएगी।

 

उस दिन आरा कलेक्ट्रीयट में दुर्गी और रमेश दोनों भूमिहीन हो गये थे। पैसे बैंक में जमा हो चुके थे। मिथिलेश यादव ने एक महीने का समय दिया था।

 

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दुर्गी के हाथ के कुछ बकाये शेष थे। उन्हें चुकाने के बाद दोनों ने तय किया कि अगली पूर्णिमा वाले दिन वे गांव को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ देंगे। इस बीच दोनों ने निर्णय लिया कि दिल्ली जाने से पहले मिसिर जी के घर जाया जाए। फ़िर मालूम नहीं कब मुलाकात हो न हो।

 

संदूक से चमचम लाल साड़ी, भर हाथ चुड़ी और भर मांग सिंदूर सजा जब दुर्गी रमेश के साथ बाहर निकली तो देखने वालों की आंखें फ़टी की फ़टी रह गयी। गांव से बाहर निकलने पर एक टेम्पो रिजर्व कराया रमेश ने। वह भी पूरे 300 रुपए में। दुर्गी को यह अच्छा नहीं लगा। अगर ऐसे ही पैसे खर्च हो गये तब दिल्ली में जमीन कैसे खरीदा जा सकेगा।

 

टेम्पो पर सवार हो दुर्गी अपने दुल्हा के साथ पहली बार नैहर जा रही थी। दो सेर सिरनी लिया था रमेश ने अपने ससुराल के लिए। नैहर में नजर पड़ते ही मिसिर जी घर से बाहर निकल गये। मिसिराइन कोने में बैठकर रोने लगी। दुर्गी की आंखों से आंसू बह निकले। लंबे समय के बाद मिसिराइन ने उसे गले लगाया था।

 

बाहर बथानी में रमेश चौकी पर आंखें मुंद मानों खतरे के टल जाने के सपने देख रहा था। उसकी आंखों के सामने मधेसर का चेहरा और दुर्गी का साहस पीपड़ वाले भूत के जैसे नंगा नाच कर रहा था। थोड़ी देर बाद मिसिर जी आये। रमेश ने पांव छूकर आशीर्वाद लिया जाना चाहा। मिसिर जी भी अपने दामाद को गले लगाना चाहते थे। लेकिन कुजात का ख्याल आते ही रुक गये। सुलक्षणा और सुपर्णा भी बहनोई के साथ ठिठोली करना चाहती थीं, लेकिन शायद इसके लिए मौका अनुकूल नहीं था।

 

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मधेसर सिंह की नामर्दगी और दुर्गी की वीरता पटना में चर्चा का विष्य बन चुका था। अखबारों ने दुर्गी को दुर्गा का अवतार माना था। टेलीविजन चैनल पर बार-बार खबरें आ रही थीं। दलितों पिछड़ों की राजनीति करने वाले एक नेता ने दुर्गी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन भी किया था। अब तो जागो बहनों नामक संस्था की पूरी टीम दुर्गी से मिलना चाहता था।

 

उधर दुर्गी इन सबसे बेखबर रमेश की बाहों में थी। दोनों हैरान-परेशान। दुर्गी को लाज भी आ रही थी। पहली बार नैहर में अपने भतार के साथ थी। पता नहीं सुबह मां और बाबूजी के सामने कैसे जाउंगी। फ़िर दिल्ली जाने की चिंता में दोनों ने पलक तक नहीं झपकाया।

 

अहले सुबह मिसिर जी ने रमेश को समझाया। देखो मेरी बेटी ने तुमसे बियाह कर जो किया है उसका दंश हम झेल रहे हैं। सुलक्षणा और सुपर्णा के लिए वर ढुंढना मुश्किल हो गया है। अब मधेसर सिंह की घटना से पूरा समाज थू-थू कर रहा है। तुम ही बताओ मैं क्या करूं। तुम दोनों घर छोड़कर चले जाओ। वर्ना इस उमर में जाति समाज से अलग होकर नहीं जी सकता। मेरे पास कुछ रुपए हैं। उन्हें रखो।

 

दरवाजे की ओट से दुर्गी तब सब सुन रही थी। उसने वहीं से कहा कि बाबू पैसा रहने दिजीये। हम लोग चले जायेंगे। रमेश तब खामोश ही रहा। फ़िर थोड़ी देर बाद दुर्गी दरवाजे के बाहर खड़ी थी। रमेश के हाथों में हाथ डाले सबके सामने। मिसिर जी और मिसिराइन सहित पूरा गांव देख रहा था। गांव की औरतें बोल रही थीं कुजात आदमी से बियाह के बाद सचमुच छिनार हो गयी है दुर्गी। अब उसे तो तनिक भी लाज नहीं आती।

 

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घर और जमीन की राजिस्ट्री हो चुकी थी। दुर्गी और रमेश कल की सुबह हमेशा-हमेशा के लिए गांव छोड़कर चले जायेंगे। भुमिहार टोले में कई लड़के बात कर रहे थे। मधेसर बाबू का बदला कैसे लिया जाय। कल तो वह छिनार चली जाएगी। आज की रात ही धावा बोलना होगा। मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र भी खूब ताव में था। वह अपने घर से दोनाली बंदूक ले आया। कोई कट्टा तो कोई भाला। कुल 9 लोग थे। योजना यह थी कि दुर्गी के सामने ही उसके भतार के पिछवाड़े गोली मारेंगे। फ़िर बाद में योजना यह बनी कि पहले उस छिनार को मजा चखायेंगे।

 

सब निकल पड़े। गांव का पूल पार करने के समय ही गांव की महिलाओं ने उन्हें देख लिया। वे सब शौच के लिये पईन पर आयी थीं। चन्द्रदीप यादव की मेहरारु लगभग दौड़ते हुए दुर्गी के घर गयी। रमेश ने हिम्मत से काम लिया। मिथिलेश यादव और उसके अन्य साथी भी गांव की सड़क पर हरवे हथियार से लैस खड़े थे। मिथिलेश ने रमेश को कहा कि तु लोग गांव से चल जा। हमनी सब देख लेम उ ससुरन के। दुर्गी भी यही चाहती थी लेकिन रमेश के माथे पर तो खून सवार था।

 

गांव में हड़कंप मचा था। भुमिहार टोले के लौंडों को इस बात का गुमान था कि हथियार केवल उनके पास ही हैं और कोई मारे डर के बोलेगा नहीं। इसलिए गांव की सीमा में पहूंचते ही सबने राम इकबाल पासी की दुकान पर बैठकर पहले दारू पिया और फ़िर पैसे मांगने पर राम इकबाल के सामने ही दो फ़ायरिंग किया। राम इकबाल कुछ न बोल सका। मन तो उसका कर रहा था कि गला हसूलिये से उतार दें साले की। लेकिन सब संख्या में 20 से अधिक थे।

 

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उधर दुर्गी अपना सामान बांध रही थी। उसे जल्दी थी। बहुत दिनों के बाद उसने रमेश को फ़िर से पाया था। वह उसे खोना नहीं चाहती थी। लेकिन रमेश गांव वालों के साथ मैदान में कूद चुका था। सामने से भुमिहार टोले के हमलावर आते दिखायी दिये। पहली फ़ायरिंग भुमिहारों ने किया। जवाब में रमेश ने एक साथ 4-4 हवाई फ़ायरिंग की। भुमिहार सहम गये। तबतक गांव के दलित टोले के लोगों ने गांव को घेर लिया था।

 

आवाज आयी, मारो स्सालों को। गोलियां चलने लगीं। मिथिलेश यादव ने 3 को मौत के घाट उतारा था वही रमेश ने भी 2 लोगों को गोली मारी थी। इस लड़ाई में यादव टोला का एक नौजवान भी मारा गया। थोड़ी ही देर में लाशों का ढेर लग गया था। दलित टोले के 4 लोगों को गोलियां लगी थीं, लेकिन वे जिंदा थे। दो भुमिहार भी जीवित ही थे। यादवों ने योजना बनायी कि सबको मार दिया जाय और लाशों को यही पईन में पत्थर बांध कर बहा दिया जाय।

 

लेकिन ऐसा नहीं हो सका। दारोगा विश्वजीत सिंह पूरे पलटन के साथ गांव में आ चुका था। पूरे इलाके में खबर आग की तरह फ़ैली कि यादवों ने एक साथ 18 भुमिहारों को मार गिराया है। खबर मिलते ही आरा से पुलिस की पांच गाड़ियां पहूंच गयीं। फ़िर अगले दिन प्राथमिकी दर्ज करायी गयी। एक प्राथमिकी मधेसर सिंह की पत्नी की ओर से तो दूसरी प्राथमिकी दुर्गी ने कराया था।

 

मामले को लेकर राजनीति उफ़ान पर थी। प्रदेश के बड़े-बड़े भुमिहार और दलितों एव पिछड़ों के नेता गांव पहूंचे। दुर्गी रमेश के बगैर फ़िर अकेली हो गयी थी। मधेसर सिंह की जोरु ने उसे मुख्य अभियुक्त बनाया था। मिथिलेश सिंह भी जेल में था। पूरा यादव टोला खाली पड़ा था।

 

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अनहोनी की संभावना को देख सिधेसर मिसिर बेटी को लाने पहूंचे। बहुत समझाया दुर्गी को लेकिन वह नहीं मानी। कहने लगी कि अब तो यहां मेरी अर्थी ही जाएगी। गांव वालों ने भी खूब समझाया॥ लेकिन सब बेकार। चन्द्रदीप यादव की पत्नी ने लाज त्यागते हुए मिसिर जी के सामने कहा कि कनिया अभी चल जा, जब समय ठीक होई त फ़िर चल अईह। मिसिर जी ने भी कहा कि अब हम तुम्हें कोई ताना नहीं देंगे। तुम हमारी बेटी हो, तुम्हारा यहां रहना ठीक नहीं है।

 

दुर्गी को नहीं जाना था, वह नहीं गयी। वह अपने घर में हसिया, बरछी और रमेश के बाबू जी की बंदूक हमेशा अपने साथ रखती थी। वह हर शाम तूफ़ान के आने का इंतजार करती और फ़िर जागी आंखों में सारी रात गुजार देती।

 

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उस दिन रात करीब साढे ग्यारह बजे किसी ने दुर्गी का दरवाजा खटखटाया। दुर्गी ने कोठा पर चढकर देखा। कुछ पुलिस वाले खड़े थे। उपर से ही बोली क्या बात है? आप लोग इतनी रात क्यों आये हैं? दारोगा विश्वजीत सिंह ने आवाज दिया कि दरवाजा खोलो। हमें जानकारी मिली है कि तुम्हारे घर में उग्रवादी छुपे बैठे हैं। दुर्गी ने कहा कि यहां उसके अलावा कोई और नहीं है। मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी।

 

विश्वजीत सिंह के कहने पर पुलिस वालों दुर्गी के घर का दरवाजा तोड़ डाला। इससे पहले कि दुर्गी कुछ करती विश्वजीत सिंह ने उसे पकड़ लिया और जबरन जीप में डाल दिया। थाना में उसे एक कमरे में रखा गया। थोड़ी देर बाद विश्वजीत सिंह और मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र सिंह कमरे में दाखिल हुए। दुर्गी ने विरोध किया। लेकिन भूखे लोमड़ियों का मुकाबला वह अकेले कैसे कर पाती।

 

सुबह-सुबह उसे छोड़ दिया गया। घर गयी। किसी से कुछ नहीं कहा। दिन भर पड़ी रही और रात के खौफ़नाक मंजय को याद करती रही। कहां एक ये भुमिहार और ब्राह्म्ण जो कहते हैं नारी को देवी शक्ति मानते हैं और दूसरी ओर उसकी इज्जत भी लूटते हैं। इन सबसे अच्छे तो दलित और पिछड़े हैं जो कम से कम अपनी मां-बेटियों की इज्जत करना तो जानते हैं।

 

दो दिनों बाद दारोगा विश्वजीत सिंह फ़िर दुर्गी के घर पहूंचा। इस बार दुर्गी ने कोई विरोध नहीं किया। दारोगा भी खुश था। उसे अपनी मर्दानगी पर नाज हो रहा था। स्साली एक बार में ही दीवानी हो गयी है। दुर्गी कमरे में एक मचिया पर बैठ गयी। दारोगा उसे बाहों में जकड़ना चाहता था। दुर्गी ने भी उसे मना नहीं किया और न ही कोई विरोध। दारोगा दुर्गी के उपर था और तभी दुर्गी ने हसिये से वार किया। दारोगा का गर्दन आधे पर लटक गया। फ़िर दुर्गी ने उसके गर्दन को पूरी तरह से अलग किया।

 

दुर्गी हाथ में दारोगा का सिर लिए चली जा रही थी। गांव वाले बदहवास थे। भुमिहार टोले के लोग भी खामोश। इस बार किसी ने भी नहीं कहा, दुर्गी छिनार जा रही है

 

ये इश्क नहीं है आसान प्रिये

तुम कल्पना, मैं कड़वा यथार्थ हूं,

तुम जीवन, मैं मुसीबतों का पहाड़ हूं

इसलिए, ये इश्क नही है आसान प्रिये।

तुम अनन्त, मैं शून्यता का प्रमाण हूं

तुम ज्योति, मैं चहुंओर फ़ैला अंधकार हूं

इसलिए, ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

तुम अर्चना और उपासना जैसी हो,

मैं विधुर अर्द्ध कुमार हूं

तुम सोलह साल की मराठन बाला हो,

मैं लालू का रिश्तेदार हूं

तुम राजनीति की ऐश्वर्या हो,

मैं नौटंकी का एक किरदार हूं

इसलिए ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

तुम सत्ता की मीठी चासनी हो,

मैं नीतीश जैसा खट्टा आचार हूं

तुम नरेंद्र मोदी की गर्मागर्म चाय हो,

मैं मुलायम जैसा बासी आहार हूं

तुम बिजली तुम ऊर्जा हो

मैं लोडशेडिंग का शिकार हूं

इसलिये ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

तुम कोसी की तेज लहरें हो

मैं सुशासन का बाढ हूं

तुम सरकारी फ़ैमिली पैक राहत हो

मैं पीड़ितों का खंडित जीवनाधार हूं

तुम बांध बनाने वाली कंपनी हो

मैं बाढ में डूबा एक इंसान हूं

इसलिये ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

तुम चुनावी घोषणापत्रों की जान हो

मैं सरकारी आदेशों के उपेक्षा का शिकार हूं

तुम अफ़सर लोगों के टेबल की शोभा हो

मैं आम आदमी का धुल खाता दरखास्त हूं

तुम नेताजी की लक्ष्मी हो,

मैं नगर निगम का चौकीदार हूं

इसलिये ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

नवल की कविता : पहले तुम कहते थे लो अब हम कहते हैं

तुम्हारे वेद तुम्हें मुबारक

तुम्हारा राम भी तुम्हें ही मुबारक

चाहो तो तुम अपनी दुर्गा और लक्ष्मी भी ले लो

ऐसा हम यूं ही नहीं कह रहे

पहले तुम कहते थे

लो अब हम कहते हैं।

तुम्हारे वेद अब सचमुच

कानों में गर्म शीशे ही तो है

तुम्हारे पुराणों में वर्णित कथायें

सब सुनना ही बेहतर है हमारे लिए

तुमने तो हमें अछूत कहा था

अब तुम सचमुच अछूत हो

यह हम ऐसा यूं ही नहीं कह रहे

पहले तुम कहते थे

लो अब हम कहते हैं।

तब तुम्हारी मर्जी थी,

तुम्हारा सिंहासन था

हमारे एकलव्य का अंगुठा मांगा

निर्दोष शंबूक का वध किया

तुम्हारे लिए तो हम कभी इंसान थे

आज तुम हमारे लिए इंसान नहीं

यह हम यूं ही नहीं कह रहे

पहले तुम कहते थे

लो अब हम कहते हैं।

छीन लेंगे तुमसे यह ऐश्वर्य तुम्हारा

जल, जंगल और जमीन भी हमारा होगा

तुम कहते हो इंसाफ का ठेका है तुम्हारे पास

धैर्य रखो और करो इंतजार

खिसक जायेगी जमीन, फट जाएगा आसमान तुम्हारा

यह हम यूं ही नहीं कह रहे

पहले तुम कहते थे

लो अब हम कहते हैं।

सीता राम की मोहताज नहीं, पटना साहित्य उत्सव में महिलाओं ने दिखाये बगावती तेवर

पटना(अपना बिहार, 17 फ़रवरी 2014) - आधुनिक युग में भी महिलाओं ने अब जीना सीख लिया है। दूसरे पटना साहित्य उत्सव के अंतिम दिन महिला वक्ताओं ने परंपराओं को दरकिनार करते हुए कहा कि आज की सीता अब किसी राम की मोहताज नहीं है। सीता : देवी और औरत विषयक सत्र को संबोधित करते हुए फिल्मकार नमिता गोखले ने कहा कि रामायण में वर्णित सीता ने भी राम द्वारा परित्यक्त होने पर खुद को संभाल लिया था। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में महिलाओं ने समाज के हर क्षेत्र में अपना आत्मविश्वास साबित किया है। हालांकि पुरूष समाज अभी भी उसे महज एक वस्तु ही मानता है। इससे पहले नमिता गोखले द्वारा निर्देशित वृत चित्र नमिता गोखले की सीता का प्रदर्शन किया गया।

 

साहित्य उत्सव के तीसरे दिन की शुरूआत राजनीतिक गोष्ठी सुशासन की कला से हुई। इस विशेष सत्र में प्रो. नवल किशोर चौधरी ने राज्य सरकार पर जमकर प्रहार किये वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जीवन पर पुस्तक लिखने वाले संकर्षण ठाकुर ने श्री कुमार के पक्ष में अपनी बातें रखीं। वहीं पुष्पेश पंत ने कहा कि आज की राजनीति में विकास सबसे बड़ा मुद्दा है। भ्रष्टाचार के सवाल ने भी राजनीति को प्रभावित किया है। सुबह के सत्र में ही मशहूर लेखिका लीला सेठ ने कहा कि उन्होंने उस समय पटना में वकालत शुरू किया था जब पूरे अदालत में केवल दो महिलायें थीं। उन्होंने कहा कि अब स्थिति बदल गयी है। बड़ी संख्या में मलिायें इस क्षेत्र में आ रही हैं। यह सकारात्मक संकेत है।

 

साहित्य उत्सव के तीसरे दिन यतीन्द्र मिश्रा की पुस्तक हमसफर का लोकार्पण किया गया। इस समारोह में मशहूर गीतकार गुलजार, लेखक यतीन्द्र मिश्रा के अलावा पीयूष मिश्रा, यतीन्द्र मिश्रा और डा. विभावरी आदि मौजूद थे। वहीं मगही साहित्य के इतिहास के विषय पर मिथिलेश सिंह और डा भरत ने अपने विचार व्यक्त किया। सत्र का संचालन नरेन जी ने किया। लोक साहित्य की दुनिया में अंगिका और बज्जिका विषयक सत्र में डा. लखन सिंह आरोही, डा. अमरेंद्र, डा. योगेन्द्र ने अपने विचार प्रस्तुत किये। इस सत्र का संचालन युवा साहित्यकार अरूण नारायण ने किया।

साहित्य उत्सव : बौद्धिक समाज को याद आया बेटी बेचवा

पटना(अपना बिहार, 16 फ़रवरी 2014) - कल रामाज्ञा राम पटना में थे। सूबे के प्रबुद्ध नागरिकों के बीच। बेटीबेचवा की कहानी सुना रहे थे। वही बेटीबेचवा जिसे पहली बार मंचित करने पर जगदीशपुर के सामंतों ने भिखारी ठाकुर और उनके सहयोगियों को खदेड़-खदेड़कर पीटा था। कल जो समाज बेटीबेचवा मजे ले लेकर सुन रहा था, उसमें जगदीशपुर वाला समाज भी शामिल था। पटना लिटरेचर फ़ेस्टिवल के दूसरे दिन बिहार के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के सहयोगी रहे रामाज्ञा राम ने भोजपुरी को लेकर भी अपने विचर व्यक्त किये। इस अवसर पर अरुणेश नीरन और सरिता बुधु ने भी अपने विचार व्यक्त किया।

 

साहित्य उत्सव के दूसरे दिन अखबार और मीडिया से जुड़े लोगों की बेचैनी भी सामने आयी। मीडिया पर आधारित सत्र को मशहूर पत्रकार रविश, श्रवण गर्ग, श्रीकांत और संदीप भटुडिया ने अपने विचार व्यक्त किये। इस मौके पर जहां एक ओर सत्र का संचालन कर रहे दैनिक जागरण के पत्रकार राघवेन्द्र दूबे ने अखबारों के पक्ष में कहा कि मीडिया अब भी सबसे अधिक लोकतांत्रिक संस्थान के रुप में काबिज है। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि अखबारों में छपने वाली खबरें अब प्रोडक्ट के रुप में पेश की जाने लगी हैं। इस्के बावजूद उन्होंने कहा कि तमाम प्रतिकुलतओं के बावजूद अखबारों में कोई बड़ा विचलन नहीं आया है।

 

वही श्रवण गर्ग ने यह कहकर अपनी झिझक मिटाने का प्रयास किया कि अखबार आज भी शोषितों की आवाज है। जबकि मशहूर टेलीविजन एंकर और पत्रकार रविश कुमार ने मीडिया में बाजार द्वारा लगायी गयी सेंधमारी की बात कही। उन्होंने कहा कि कुछ पत्रकारों ने अपने लिए एक दुनिया बना ली है। वे सीमित दायरे को ही अपनी दुनिया मान ली है। दिल्ली में बहुत सारे पत्रकार लूटियन जोंस की परिधि में ही रहकर खुद को पत्रकार मान रहे हैं। वहीं वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत ने साफ़गोई से कहा कि अखबार निकालना अब एक धंधा मात्र है, जिसका एक ही मकसद मुनाफ़ा कमाना होता है। उन्होंने कहा कि बाजार के कारण मीडिय की विश्वसनीयता कम हुई है।

 

बहरहाल, साहित्य उत्सव के दूसरे दिन कबीरपंथ को आधार बनाकर प्रबुद्ध समाज ने खुद को वंचित तबके के साथ जोड़ने का प्रयास किया। स्ररकार के प्रतिनिधि के रुप में जदयू के विधान पार्षद व तथाकथित साहित्यकार डा रामवचन राय ने कबीरपंथ को तीन श्रेणियों में विभाजित किया। उनका कहना था कि कबीर पंथ का पहला स्वरुप लोक जीवन की है। दूसरा स्वरुप मठों का है जिसके मूल में आध्यात्मिकता है। तीसरा स्वरुप शैक्षणिक संस्थाओं में पढा लिख जाने वाला कबीरपंथ है। इस विषय पर यतीन्द्र मिश्रा और अब्दुल बिस्मिल्लाह ने भी अपने विचार व्यक्त किया। अब्दुल बिस्मिल्लाह का कहना था कि कबीर प्रेम से अधिक पीड़ा के कवि हैं। ताज्जुब इस बत की हुई कि हिन्दू धर्म और सामंती ताकतों के विरुद्ध कबीर द्वारा किये गये विद्रोह की चर्चा तक करने से वक्ताओं ने बचने का प्रयास किया।

बहस तलब - शिव और विष्णु भी समलैंगिक थे : विक्रम सेठ की सचबयानी से उपजे सवाल

पटना में दूसरे साहित्य उत्सव के पहले दिन आयोजकों को थोड़ी निराशा झेलनी पड़ी। दरअसल हुआ यह कि विलेन बने मौसम ने उत्सव से दर्शकों को दूर रखा। फ़िर भी बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी और बुद्धिजीवी उत्सव में शरीक हुए। मौसम की मार और पहले दिन सरकारी एजेंडे के नाम होने के बावजूद कई सवाल खड़े हुए। हालांकि बौद्धिक जुगाली के पर्याय ये सवाल अपनी दशा और दिशाहीनता के कारण किसी खास अंजाम तक नहीं पहुंच सके। इनमें से एक सवाल विक्रम सेठ के द्वारा उठाया गया एक सवाल था।

सवाल किसी युवा ने पूछा था। ग़े राइट्स यानी समलैंगिकों के अधिकार के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फ़ैसला। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि विक्रम सेठ ने खुद को कई बार समलैंगिक समर्थक घोषित कर रखा है। सवाल था कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को किस नजरिए से देखा जाये।

 

फ़ौरी तौर पर यह सवाल मानों ऐसा था जैसे यह सवाल किसी ने पूर्व से निर्धारित योजना के मुताबिक पूछा गया हो। विक्रम ने इस सवाल का बखूबी जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला निंदनीय है। यह समलैंगिकों के मानवाधिकारों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है। अपनी बात को साबित करने के लिए विक्रम ने पौराणिक कथाओं का भी सहारा लिया। दक्षिण के एक देवता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वह शिव और विष्णु के बीच समलैंगिक रिश्ते का परिणाम था।

 

अन्य बातों को छोड़ दें तो यह एक बड़ा सवाल है खासकर उन लोगों के लिए जो हिन्दू देवताओं को पौरुषता का पर्याय मानते हैं। पौराणिक कथाओं में स्त्रियां उन्मुक्त थीं, इसके कई उदाहरण मिलते हैं। मसलन राम जिनके जन्मस्थली के सवाल पर आज देश में सवाल खड़े किये जा रहे हैं, उनके जन्म की ही कहानी पुत्रकामेष्टि यज्ञ से प्रारंभ होता है। अग्निदेव के खीर से कौशल्या और उसकी सौतनों को गर्भ प्राप्त हुआ। इसके अलावा पांचाली का उदाहरण दिया जा सकता है जिसने एक साथ पांच पतियों के साथ जीवन और अपना शरीर साझा किया। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि उसने सभी पतियों से एक-एक पुत्र भी प्राप्त किये।

 

बहरहाल, विक्रम के अनुसार इस देश में समलैंगिकता कोई नई बात नहीं है। इसके पौराणिक और ऐतिहासिक दोनों तरह के सबूत हैं। अतीत में भी उन्हें अपने तरीके से जीवन जीने की स्वतंत्रता थी। उन्होंने सवाल उठाया कि देश की मौजूदा व्यवस्था लोगों को उनका जीवन अपने तरीके से जीने से कैसे रोक सकता है। अब देखना है कि समलैंगिकता के सवाल पर हिन्दू धर्म के पुरोधाओं को समलैंगिक बताने के मामले को लेकर देशा का बौद्धिक जगत किस तरह जुगाली करता है।

चौराहा ! विजय कुमार सप्पति की कहानी

करीब ८ महीने पहले.

डॉक्टर वर्मा ने मुझे अपने करीब बिठाया और कहा, देखो देव, तुम एक संवेदनशील कवि और लेखक हो, मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा। तुम लंग कैंसर की एडवांस स्टेज पर हो। तुम्हारी सिगरेट पीने की आदत ने तुम्हे ख़तम कर दिया है। अब ज्यादा से ज्यादा ६ या ८ महीने बस !

मैंने उसे गले से लगा लिया, यार वर्मा, तुमने तो मेरी ज़िन्दगी की सबसे अच्छी खबर मुझे सुनाई है, पता नहीं कितने बरसो की मेरी ये तमन्ना थी कि मैं मर जाऊं। शुक्रिया तुम्हारा और सिगरेट का!

डॉक्टर वर्मा की आँखे भीग गयी, अब मैं तुम्हारी कविताये नहीं पढ़ पाऊंगा, इस बात का मुझे ज्यादा, बहुत ज्यादा दुःख है।

मैंने उसे फिर से गले लगा लिया, यार अब कुछ अगले जनम के लिए तो रखो!

 

करीब ४ महीने पहले

मैंने इन्टरनेट में सर्च किया और उसका पता ढूँढा और उसे फ़ोन किया। मैंने कहा, मैं देव बोल रहा हूँ निम्मो, एक बार मिलना है, शायद आखरी बार। जल्दी से मिलने आ जाओ।

बहुत देर की ख़ामोशी के बाद उसकी हिचकियो से भरी हुई भीगी हुई आवाज़ आयी, अब? इतने बरस बाद? क्या तुमने मुझे माफ़ कर दिया देव? क्या तुम्हारे मन में मेरे लिए अब कोई नफरत नहीं रही?

मैंने कहा, माफ़ी? प्रेम में माफ़ी? हाँ, क्रोध रह सकता है पर कोई उससे कैसे नफरत करे जिसे टूट-टूट कर चाहा हो। जीवन के इस मोड़ पर मैं माफ़ी जैसे शब्द से ऊपर, बहुत ऊपर उठ चूका हूँ। बस जीवन के आखरी कुछ दिन बचे हुए है। तुम्हे देखना चाहता हूँ एक बार! हाँ ; बेटी को लेते आना। और अमित को भी। उसे कुछ देना है

दूसरी ओर बहुत देर तक रोने की आवाज़ आती रही! यहाँ भी सात समंदर पार आकाश भीगा सा रहा, असमय मेघो ने बारिश की। मेरे आँखों के साथ मेरा मन भी भीग गया।

 

आज सुबह

घर के दरवाजे पर दस्तक भी हुई और घंटी भी बजी, मैं पूजा कर रहा था।

मैंने प्रभु को प्रणाम करते हुए दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा, आ रहा हूँ भाई, ज़रा रुक जाओ

मैंने अपना चश्मा पहना और फिर धीरे धीरे चलते हुए दरवाजे की ओर बढ़ा और फिर दरवाजा खोला। पुराना दरवाजा था, कुछ आवाज़ करते हुए खुला।

 

सामने जो शख्स खड़ा था, उसे देखकर मैं चौंका। मैं समझा, मेरी नजरो का धोखा होंगा, मैंने अपने चश्मे को साफ़ किया और उस शख्स को गौर से देखा। वो मुस्कराता हुआ खड़ा था और मैंने उसे पहचान लिया।

वो अमित था!

मुझे आभास हुआ कि मैंने जो फ़ोन किया था, शायद वो बात मान ली गयी है।

उसने कहा, देव मैं हूँ अमित, पहचाना या पूरी तरह से भूल गया?

मैंने कहा, नहीं। मैं तुझे कैसे भूल सकता हूँ, कभी भी नहीं, कम से कम इस जन्म में तो नहीं।

वो मुस्कराया, हां न, मैंने तो काम ही कुछ ऐसा किया था। खैर तूने मुझे बुलाया है। मुझे अन्दर नहीं बुलाएंगा रे।

मैंने कहा, आना। अन्दर आ, तेरा ही घर है।

मैंने उसके कंधे के पार देखा। दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आया।

मैंने अमित की ओर देखा, वो मुझे ही देख रहा था। जैसे ही उससे नज़रे मिली, वो मुस्कराया। अब भी तेरी आँखे उसे तलाश करती है देव? उसने मुझसे पुछा।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया, जिसे मैंने दिल से चाहा हो, उसे तो हमेशा ही मेरी नज़रे ढूंढेंगी। ये बात ये व्यापारी क्या समझेंगा।

वो अन्दर आया, चारो तरफ देखा, और कहा, वैसे ही है रे। कुछ भी तो नहीं बदला। हाँ शायद सफेदी करवाई है बस और कुछ नहीं।

मैंने कुछ नहीं कहा। उससे क्या कहता।

वो भीतर आया और घर के किनारे में रखे हुए सोफे पर बैठ गया।

उसने हँसते हुए कहा, देव, कुछ भी तो नहीं बदला है। सब कुछ वैसे ही रखा हुआ है। वही पुराना घर। पुराना सोफ़ा, पुराना फर्नीचर, तेरी तरह!

मैंने उसकी ओर देखा और कहा, हां तो, क्या हुआ, मेरा मन इसमें लगता है। बस वही मेरे लिए काफी है। और फिर मुझे मेरा पुरानापन पसंद है।

उसने हँसते हुए कहा, मेरा घर इससे कई गुना बड़ा और खूबसूरत है, आज आधे संसार में मेरे घर बने हुए है, इससे अच्छा सोफ़ा तो मेरे नौकर के घर में होंगा। कहकर उसने खिल्ली उड़ाने वाली नज़र से मुझे देखा। वो मेरी हंसी उड़ा रहा था।

मैं चुप रहा। मैंने उसे गहरी नज़र से देखा और कहा, तू बदला नहीं अमित।

उसने कहा, इसमें बदलने की क्या बात है, जो है सो वही मैने कहा।

मैंने हँसते हुए कहा, हाँ, तेरे पास कई बड़े घर है, वो भी आधे संसार में, लेकिन तूने उन सबको अपने पुस्तैनी मकान की नींव पर बनाया है। होंगे तेरे पास वो सारे घर, लेकिन आज वो तेरा पुराना घर नहीं है जिसमे तू कभी खेलता था। पैदा हुआ, पढ़ा लिखा, बढ़ा हुआ और इस काबिल बना कि उस घर को बेचकर उसे और इस देश को छोड़कर विदेश चला गया। जिसके पास अपने गाँव का घर नहीं, जिसमे उसने दिवाली का पहला दिया जलाया हुआ हो, उसके पास क्या है। वो तो बहुत गरीब हुआ जो कि तू है।

अमित का चेहरा गुस्से में लाल सा हो गया। फिर हम दोनों के बीच बहुत देर की ख़ामोशी रही।

मैंने कहा, चाय पियेंगा रे?

उसने करवट बदलते हुए कहा, हाँ।

मैंने उससे पुछा, मैंने निम्मो को और बच्ची को भी बुलाया था। वो लोग नहीं आये?

अमित ने कहा, आये है, हम सब कल देर रात यहाँ पहुंचे है, बिटिया की तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी, मैंने उन दोनों को थोड़ी देर आराम कर के आने को कहा है।

मैं किचन में गया और केतली में चाय उबालने रखा। मेरे पीछे अमित आ गया था।

मैंने उसे गहरी नजर से देखा, वो भी बुढा हो ही गया था, लेकिन मैं ज्यादा बुढा लगता था। वो थोडा कम लगता था। मुझे चश्मा लग गया था, उसे नहीं, मैं लगभग गंजा हो गया था, वो नहीं, वो अब भी सुन्दर और बेहतर दिखता था, मेरे नजरो के सामने से २५ बरस पहले के बहुत से चित्र गुजर गए।

उसने मुझे देखा और पुछा, तू क्यों चाय बना रहा है, कोई और नहीं है?

मैंने एक पल रूककर, भीगे स्वर में कहा, मैंने शादी नहीं की अमित।

वो चुप हो गया। मैंने उसकी ओर देखा और उसने मुझे देखा।

२५ बरस पहले के पल हम दोनों के बीच में फिर ठहर से गए थे।

मैंने उससे पुछा, शक्कर कितनी?

उसने कहा, तू बना तो। तेरे हाथ की चाय पीऊंगा। बरसो बीत गए।

मैंने कहा, ठीक है, आज तुझे मैं गुड़ की चाय पिलाता हूँ। याद है, हम दोनों कितना पिया करते थे।

उसने फिर मेरी खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज में हँसते हुए कहा, लेकिन यार देव, तूने अपने आपको नहीं बदला, अपने माइंडसेट को नहीं बदला, वही का वही रहा। आज भी केतली में चाय! यार मेरे नौकर भी इलेक्ट्रिक स्टोव में कॉफ़ी बनाकर पीते है। मैंने तो बरसो से चाय नहीं पी, मैं तो दुनिया की बेहतरीन कॉफ़ी पीता हूँ। Rwanda Blue Bourbon, Hawaiian Kona Coffee, Hacienda La Esmeralda मैं तो सिर्फ इन ब्रांड्स के काफी को पीता हूँ।

मैंने उसे टोककर कहा, फिर भी मेरे घर की चाय पीना चाहता है।

मैं सर हिलाते हुए हंस पड़ा।

उसने खिसियाने स्वर में कहा, तो क्या हुआ, दोस्त के घर में उसके पास जो होंगा वही तो पिऊंगा न।

मैंने सूखे हुए स्वर में कहा, दोस्त? क्या तू इस शब्द के अर्थ समझता है अमित। नहीं! न तब और न ही अब!

एक लम्बी खामोशी छा गयी। मैंने चाय उबाली और उसे कप में दिया। वो चुपचाप चाय पीने लगा। मैंने घर की खिडकियों को खोल दिया, ताज़ी हवा भीतर आई। दूर कहीं आरती चल रही थी।

उसने कहा, संगम के हनुमान मंदिर की आरती है न।

मैंने कहा, हाँ !

बहुत सी यादे हम दोनों के दरमियान फिर तैर गयी।

हम दोनों ने चुपचाप चाय पी।

चाय ख़त्म हुई। मैंने अमित से पुछा, वो दोनों कब तक आयेंगे?

अमित ने कहा, शायद दोपहर तक। तू मिलना चाहता था। हम सबसे। हमें देरी हो गयी आने में। वीसा इत्यादि में समय लग गया। बोल, क्या बात है।

मैंने कहा, कोई खास नहीं, बस एक बार तुम सभी को देखना चाहता था।

एक अजनबी सी चुप्पी हम दोनों के बीच फिर आ गयी।

फिर अमित ने कहा, तू कितना बुढा हो गया है। तूने उस कॉलेज की नौकरी को छोड़ देना था, ज़िन्दगी भर एक ही जगह रहने में क्या तुक है। तुझे मिला क्या, कुछ भी नहीं। वही छोटी सी नौकरी, वही तन्खवाह। कुछ किताबो में लिख पढ़ कर छप गया। बस और क्या? तू जहाँ था, वही पर खड़ा है देव। क्या खोया और क्या पाया, कभी हिसाब किताब लगाया है तूने ? सिफर! ए बिग जीरो! और कुछ भी नहीं। अबे; मुझे कहता है, पुश्तैनी घर के बारे में, अरे तूने क्या कर लिया, तू तो अपने नाम का एक घर भी नहीं बना सका। पड़ा हुआ है साले अपने पुराने घर में। और मुझे ज्ञान देता है। इतना कहकर वो हांफने लगा!

मैंने उसकी सारी बाते सुनी। सच्ची बात थी, पर कडवी थी।

मैंने कहा, व्यापारी तो तू है अमित। हिसाब किताब करना तू जाने। ज़िन्दगी भर तो वही करते आया है न। खरीदना और सिर्फ खरीदना। नहीं? वो चुप रहा।

उसके चेहरे पर एक रंग आ रहा था और एक रंग जा रहा था।

२५ बरस पुरानी दुश्मनी अब हम दोनों के जुबान में आ गयी थी।

मैंने आगे कहा, और फिर मुझे किसके लिए घर बनाकर रखना है, मैं तब भी अकेला ही था अब भी अकेला ही हूँ और अकेला ही जाऊँगा। मेरे तो आगे पीछे कोई नहीं; और रही बात मेरे जीरो होने की। तो ठीक है न। जो हूँ, उसमे खुश हूँ। मेरे हिसाब किताब में वो सब कुछ नहीं है, जो तेरी बैलेंस शीट में है। हाँ, एक रिश्ता मैंने बुना था, दोस्ती का तुझसे ! और..............!

अमित ने हँसते कहा, और एक रिश्ता बुना मोहब्बत का निर्मल से! जो तेरी न बन सकी। उसने मुझे चुना था देव। वो भी आज से २५ साल पहले। तू तब भी मुझसे हारा था और आज भी तू मुझसे कही पीछे, बहुत ज्यादा पीछे है।

मैंने कहा, हां। ये सही है अमित। मैं न दोस्ती जीत सका और न ही मोहब्बत। दोनों रिश्ते मैं हार गया था शायद। पर ज़िन्दगी का हिसाब किताब मुझे तेरी तरह नहीं आता है अमित। देख ले आज तू और निर्मल दोनों ही मेरी यादो में है। जबकि तूने दोबारा मुड़कर नहीं देखा , न ही मुझे और न ही इस शहर को ! हाँ, दोस्ती और मोहब्बत के अलावा भी एक रिश्ता बुना है मैंने। शब्दों से। शब्दों की तासीर से। शब्दों की परछाईयो से। शब्दों की दीवानगी से और शब्दों में धडकती ज़िन्दगी की छाँव से। और अब वही मेरी पहचान है। किताबे मेरी साथी बन गयी है । अमित, मैं अपना अकेलापन शब्दों से भरता हूँ और जीवित रखता हूँ खुद को। लिखना पढना ही अब मेरी पहचान है और वही शायद मेरे संग जायेंगी ! मेरे लिए रिश्ते तेरे व्यापार से कहीं बहुत ज्यादा और बहुत ऊपर है मेरे दोस्त ! अब मैं हांफने लग गया था। मैं थक गया था !

अमित ने मुझे पकड़कर बिठाया। मैं आँखे बंद करके बहुत देर तक अमित का हाथ पकड़कर बैठा रहा। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। एक अजीब सी ख़ुशी मन में आ रही थी। मेरे सबसे अच्छे दोस्त का हाथ था।

हम दोनों बहुत देर तक बैठे रहे। मेरे हाथ में उसका हाथ था और उसके हाथ में मेरा हाथ! हम दोस्त थे। बचपन के। भला उस दोस्ती की महक कैसे चली जाती। मेरी आँखों में बीते दिनों की याद आंसू ले आई। मैंने उठकर उसे अपने गले लगा लिया। बहुत देर तक हम यूँ ही एक दुसरे के गले लगे रहे। फिर मुझे लगा कि मेरा कन्धा उसके आंसुओ से भीग रहा है। मैंने उसे धीरे से अपने से अलग किया, देखा तो उसकी भी आँखे भीगी थी और मेरी भी। हम एक दुसरे को बहुत देर तक देखते रहे। एक पूरा जीवन हमने साथ जिया था। बरसो के पहले के चित्र बंद आँखों के सामने से गुजर गए। एक पूरी ज़िन्दगी आँखों में से गुजर गयी।

मैंने उससे कहा कि वो जाकर निर्मल और बच्ची को ले आये।

उसने हामी में सर हिलाया और जाने लगा ।

मैंने पुछा, बच्ची का नाम क्या है अमित ।

वो जाते जाते लौटा और मुस्कराया और मुझसे कहने लगा, यहाँ मैं तुझसे फिर जीत गया हूँ देव। तूने और निर्मल ने सोचा था कि तुम्हारी संतान होंगी और अगर वो बेटी हुई तो उसका नाम तुम अपेक्षा रखोंगे। जब हमें बेटी हुई तो निर्मल ने मुझसे इस नाम की रिक्वेस्ट की और मैं मान गया। मेरी बेटी का नाम तेरे सपनो की बेटी का है। अपेक्षा!

मैं अवाक था। मेरी आँखे और भीग गयी, मैं कुछ न कह सका और उसकी ओर देखकर मैंने अपनी बांहे फैला दी। उसने मुझे देखा और बिना मेरी बांहों में आये घर से बाहर चला गया ।

मैं फिर अपने आराम कुर्सी पर बैठ गया। मैं काँप रहा था। ज़िन्दगी भी क्या क्या रूप दिखाती है। मैं एक निशब्द एकांत के साए में चला गया। और बीते हुए समय की परतो में पता नहीं क्या तलाश करने लगा।

 

२५ बरस पहले..............

/// एक ///

बरसो पहले हम दोनों की दोस्ती सारे इलाहाबाद शहर में मशहूर थी। एक ही साइकिल पर घूमना, साथ साथ रहना, पढना और खाना पीना तक साथ-साथ । कभी मैं उसके घर रुक जाता, कभी वो मेरे घर रुक जाता। दोनों के घरवालो में सिर्फ पिता ही बचे थे। ज़िन्दगी अपनी गति से भाग रही थी। समय जैसे पलक झपकते ही बदल जाता था। स्कूल से कॉलेज तक का सफ़र और फिर नौकरी लगने तक का सफ़र। सब कुछ साथ साथ ही रहा। रोज सुबह संगम के तट पर भागना और फिर हनुमान जी के मंदिर की आरती में शामिल होना और फिर अपना दिन शुरू करना। ज़िन्दगी बहुत ही खूबसूरत थी । फिर उसके पिता नहीं रहे। वो हमारे संग ही रहने लगा। फिर मेरे पिता भी नहीं रहे। हम फिर भी साथ ही रहे। कभी मैं उसके घर तो कभी वो मेरे घर। हर दिन सिर्फ हमारी दोस्ती को बढाता ही था। मेरी नौकरी लगी एक कॉलेज में शिक्षक की, जो कि मेरे मन की थी। अमित को नौकरी पसंद नहीं थी। वो छोटे मोटे काम करते रहा। फिर उसने मसालों का व्यापार शुरू किया। धीरे धीरे उसने उस व्यापार में अपने पैर जमाने शुरू किया। मैं अपनी नौकरी में खुश और वो अपने व्यापार में खुश। कुछ भी हो जाए हम साथ में रात का खाना जरुर खाते थे।

सब कुछ ठीक ही था जब तक कि, निर्मल से मेरी मुलाकात नहीं हुई।

निर्मल मेरे ही कॉलेज में लेक्चरर बनकर आई और पहले ही दिन मैं उस से प्रेम कर बैठा। मैं हिंदी पढाता था और वो भी हिंदी ही की लेक्चरर थी। बस धीरे धीरे मुलाकाते हुई और प्रगाढ़ता बढ़ी। वो मुझे पसंद करती थी और मैं उसे चाहता था। हम दोनों में कितनी बाते एक जैसी ही थी। ...........हिंदी...कविता...प्रेम....जीवन को मुक्तता से जीना और दोनों का ही शिक्षण के क्षेत्र में होना। सब कुछ कितना अच्छा था। मेरा तो आगे पीछे कोई नहीं था। पर उसके घर में उसके माता पिता थे। वो एक मिडिल क्लास फॅमिली से थी। और उसके सपने थे। ज़िन्दगी की शुरुवात में जो गरीबी उसने देखी थी, उससे वो बाहर आना चाहती थी। बस इस एक विषय पर हम अलग थे। मैं सपने ज्यादा देखता नहीं था और अगर सोचता भी था तो सिर्फ एक मामूली ज़िन्दगी के बारे में ही सोचता था। गरीबी मैंने भी देखी थी पर मैं बहुत संतोषी था। निर्मल को संतोष नहीं था। उसके सपने बहुत बड़े थे। और मुझे ये बात बुरी नहीं लगती थी। सब मेरी तरह साधू तो नहीं थे न! मैं उसके परिवार से मिला। उन्हें मैं अच्छा लगा और मुझे वो सब। मैंने सोच लिया था कि निर्मल से ही शादी करके घर बसाऊंगा। मैंने निर्मल से शादी की बाते की। उसने हां कह दिया!

मैंने अमित को निर्मल के बारे में बताया। वो भी मिलना चाहता था। पर उन दिनों वो अपने व्यापार के सिलसिले में केरल, गोवा तथा अन्य जगहों पर जाता था और धीरे धीरे एक्सपोर्ट्स के बारे में सोच रहा था।

/// दो ///

दिवाली के दिन थे, जब वो वापस आया। आते ही मुझसे लिपट गया और कहने लगा, अबे देव, मुझे एक्सपोर्ट का लाइसेंस और परमिशन मिल गया है और बहुत जल्दी ही मैं अपना काम दुसरे देशो में स्टार्ट करूँगा, तू ये नौकरी छोड़ और मेरे साथ आ जा। मैंने हँसते हुए कहा, अरे, ये धंधा तुझे ही मुबारक हो, मैं यही ठीक हूँ। हां; तू आगे बढ़, मुझे इससे ज्यादा ख़ुशी क्या होंगी

उसने हँसते हुए कहा, तू नहीं बदलेंगा रे। अच्छा ये सब छोड़, मुझे बता तू मुझे निर्मल से कब मिला रहा है।

मैंने कहा, आज दिवाली है, शाम को उसके घर चलते है

हम शाम को तैयार हुए । वो तब भी मुझसे खुबसूरत ही था और अब कुछ नए कपडे भी खरीद लिया था। मेरे लिए भी कपडे लाया था। मैंने उसका लाया हुआ कुरता पहना और उसने कोट पैंट। मैंने कहा, तू तो यार और अच्छा लग रहा है। वो हंस दिया। हम दोनों निर्मल के घर चले। उसने कई उपहार खरीद रख&#