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गुरुवार, 1 सितंबर 2016

राजनीति नही, बाढ पर हो तथ्यपूर्ण वास्तविक चिंतन : जगदानंद

बाढ के संबंध में बात करने का आधार यदि भावनात्मक हो तो कुछ भी कहा जा सकता है लेकिन यदि वास्तविक तथ्य के आधार पर बात करें तो बिहार और बाढ दोनों एक-दूसरे से अपरिचित नहीं हैं। जब हम बाढ की बात करते हैं तो हमें यह समझना चाहिए कि बाढ की असली परिभाषा क्या है। किसी भी नदी में बाढ तो तब आती है जब नदी में आने वाला पानी उसकी संग्रहण क्षमता से अधिक हो। मैं यह मानता हूं कि बिहार जैसे राज्य के लिए बाढ का आना उतनी बड़ी समस्या नहीं है जितना कि यहां की नदियों में पानी का अभाव। Read More>>>

दोस्तों, सबसे पहले आप सभी से क्षमाप्रार्थी हूं कि आपका अपना बिहार लंबे समय तक आपसे दूर रहा। बैंडविड्थ खत्म हो जाने के कारण यह हुआ। लेकिन जैसे हर रात के बाद दिन आता है, दुख के बाद सुख आता है, आपका अपना बिहार भी आपके समक्ष मौजूद है आपके हर सुख-दुख में। - नवल, संपादक

समाज बदलें, देश बदलें

Text Box: साहित्य और समाज

28 अगस्त को जयंती पर विशेष : आज यदि राजेन्द्र यादव जीवित होते

दोस्तों, साहित्य समाज का हिस्सा है। सामाजिक ताने-बाने के हिसाब से इस पर मनन करें तो यह स्थापित भी होता है। हालांकि अब फ़िजा बदलने लगी है। वंचितों का साहित्य अब असर दिखाने लगा है। खास बात यह है कि जिस व्यक्ति की साहसिक सामाजिक उद्यमिता के कारण यह संभव हो पाया है, वह आज मरणोपरांत भी उपेक्षा का शिकार है। जब वे जीवित थे तब अपनी उपेक्षा उन्हें कभी प्रभावित नहीं करती थी। हालत यह होती कि जब लोग उनकी आलोचना(सही मायने में गालियां) करते तब वे ठठाकर हंसते थे। प्रगतिशीलता के नाम पर सामंती ताकतों की दलाली करने वाले साहित्यकार उन्हें कभी जातिवादी साहित्यकार कहकर गलियाते तो कभी कोई उन्हें महज मसखरा कह अपने मन की भड़ास निकालता था। और वे थे जो सिगार के धुंए में आलोचनाओं को उड़ा दिया करते थे।

जी हां हम बात कर रहे हैं राजेन्द्र यादव जी की। वहीं राजेन्द्र यादव जिन्होंने दलितों के साहित्य और नारी साहित्य को माता-पिता दोनों का प्यार व संरक्षण दिया। ओबीसी साहित्य को लेकर उनके मन में कई सवाल थे। ये सवाल संभवतः इस वजह से भी रहे होंगे क्योंकि जिन दिनों वे तथाकथित मुख्य धारा के साहित्य जो कि मूलरुप से सामंती ताकतों का साम्राज्य स्वरुप था, में वंचितों के लिए अधिकार सुनिश्चित कर रहे थे, उन दिनों ओबीसी वर्ग के साहित्यकार इस स्थिति में नहीं थे कि वे कोई पृथक रुप से चुनौती पेश कर पाते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उन्होंने ओबीसी साहित्य को अपना दुलार नहीं दिया। जैसे उन्होंने दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को साहित्य के केंद्रीय विषय के रुप में स्थापित किया, वैसे ही उन्होंने ओबीसी विमर्श को भी स्थापित करने का प्रयास किया।

असल में राजेन्द्र यादव जी सही मायने में सजग चिंतक थे। वे दूर दृष्टि रखते थे। वे मानते थे कि मुख्य धारा का साहित्य स्वयं ही अपनी मौत मरेगा और वंचित पूरी मजबूती के साथ अपनी बात रखेंगे।

आज उनका कहा सच हो रहा है। दलित, पिछड़ों और महिलाओं पर केंद्रित विमर्श साहित्य में अपनी पूरी भव्यता के साथ स्थान पा रहा है। असल में राजेन्द्र यादव वंचितों के साहित्य को सकारात्मक रुप से स्थापित करना चाहते थे। आजीवन उन्होंने यही किया। यह अलग बात है कि जब महिलायें उनके संरक्षण में बेबाकी से अपने विषयों पर बोलने लगीं तो तथाकथित रुप से मुख्य धारा के साहित्यकारों ने उन्हें रसिया से लेकर मसखरा तक की संज्ञा दी।

लेकिन इन सबसे बेखबर राजेन्द्र यादव की लेखनी न तो खामोश रही और न ही किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त। बदलते समाज के साथ साहित्य को भी समाजोन्मुख बनाने की कोशिश की। यही राजेन्द्र यादव जी की खासियत थी। वैसे यह बात भी सही है कि जो काम राजेन्द्र जी ने किया, उनके बदले किसी ब्राह्म्ण ने किया होता तो अबतक उसे भारत रत्न की उपाधि तो मिल ही जाती।

बहरहाल आज यदि राजेन्द्र यादव जीवित होते तो अपनी आंखों से देखते कि किस तरह वंचित समाज आज देश की राजनीति में अपना स्थान सुरक्षित कर रहा है। मुख्य धारा का साहित्य अपनी मौत मर रहा है और अपनी मौत टालने के लिए वह अपने विमर्श में वंचितों के विषयों को शामिल कर रहा है। वैसे यह भी महत्वपूर्ण है कि उनके जाने के बाद देश के द्विज साहित्यकारों ने उनके योगदानों की हत्या करने का षडयंत्र रचना शुरु कर दिया है। यह महज संयोग भी नहीं है। इतिहास गवाह है जिन-जिन लोगों ने वंचितों के पक्ष में आवाज उठायी, उन्हें एक-एक कर भुलाने की जबरन कोशिश की गयी। जोतिबा फ़ुले से लेकर बाबा साहब आम्बेडकर और अब राजेन्द्र यादव तक।

ब्राह्म्णवाद का अंत सुनिश्चित करती एक किताब

- नवल किशोर कुमार

ब्राह्म्णवादी मिथकों की परेशानी यह है कि वे स्वयं एक-दूसरे का न केवल विरोध करते हैं बल्कि समाज में तर्क की परंपरा को ही पूरी तरह खत्म कर देते हैं। एक मिथक राम और रावण का भी है। ब्राह्म्णों के अनुसार एक स्वयं भगवान और दूसरा भगवान का सबसे बड़ा भक्त था। फ़िर भी दोनों के बीच लड़ाई हुई और लड़ाई का फ़लाफ़ल क्या हुआ, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह जानना कि असल में इस लड़ाई का मकसद क्या था?

 

अजय एस शेखर एसएस केरल के एसएस विश्वविद्यालय, कलदी में अंग्रेजी के सहायक प्रोफ़ेसर हैं। वे लिखते हैं : रामायण और महाभारत जैसे हिन्दू महाकाव्यों में श्रीलंका के अपमानजनक संदर्भ का संबंध उसके बौद्ध देश होने से है। श्रीलंका सम्राट अशोक के काल से ही बौद्ध धर्म का अनुयायी है। आश्चर्य नहीं कि रावण जो कि श्रीलंका का बौद्ध सम्राट था, उसने हिन्दू साम्राज्यवाद का विरोध किया था, तो उसे दानव या असुर के रुप में चित्रित किया गया। मौर्य सम्राट अशोक की संतानों महेंद्र और संघमित्रा ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में सिलोन का शांतिपूर्वक और लोकतांत्रिक ढंग से मतांतरित करवाया। सिलोन का बौद्ध वृतांत महावंश भी इस बात का जिक्र करता है कि स्वयं बुद्ध लंका गये थे। उन्होंने अपने 65000 उपदेशों में से कुछ वहां भी दिये थे। संभव है कि अशोक ने बुद्ध द्वारा प्रवचन दिये जाने वाले स्थानों पर धम्म के प्रतीक स्तूप एवं स्तंभ भी बनवाये हों, जिनके शीर्ष पर सिंह उत्कीर्ण हो। (थापर, 1998:68)।

 

श्री शेखर उन युवा विचारकों में शामिल हैं जिन्होंने अबतक थोपे गये ब्राह्म्णवादी विचारों को खुलकर चुनौती दी है। इन युवा विचारकों में प्रमोद रंजन, संजीव चंदन, कर्मानंद आर्य, अश्विनी कुमार पंकज, पूजा सिंह और संजय जोठे भी शामिल हैं। इनके अलावा युवा राजनेताओं यथा राज्यसभा सांसद डा मीसा भारती ने भी अपने विचारों को मजबूती के साथ रखा है कि देश का बहुसंख्यक समाज अब बदलाव को तैयार है। अब वह केवल सुविधानुसार गढे गये मिथकों में विश्वास नहीं करेगा।

फ़ारवर्ड प्रेस और द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक "महिषासुर : एक जननायक" (संपादक : प्रमोद रंजन) एक सार्थक प्रयास के रुप में सामने आया है। इसमें शामिल किये गये लेख व अन्य सामग्रियां सामाजिक चैतन्यता की शून्यता को समाप्त करने का प्रयास करती हैं।

 

मसलन पुस्तक के संपादक प्रमोद रंजन के इस विचार से सहमत हुआ जा सकता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में सुव्यवस्थित इतिहास लेखन की परंपरा नहीं रही है। इसलिए महिषासुर के जीवनकाल अथवा शहादत का ठीक-ठीक काल निर्धारण बहुत कठिन है। दुर्गा की एक कथा मार्कण्डेय पुराण में है। इतिहासकारों ने इस पुराण का लेखन काल 250-500 ईसवी के बीच माना है। इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महिषासुर का काल इससे पूर्व रहा होगा। लेकिन महिषासुर से संबंधित संस्कृति को समझने के लिए मार्कण्डेय पुराण मात्र एक सहायक ग्रंथ है, जिससे मिलने वाली जानकारियां प्रायः विकृत हैं। दूसरी ओर इस संबंध में बहुजन गाथाओं और लोक परंपराओं में अधिक विश्वसनीय जानकारियां उपलब्ध है। इनसे साफ़ तौर पर मालूम चलता है कि महिषासुर एक ऐतिहासिक चरित्र रहा होगा, मिथकीय नहीं।

 

अतएव इस परंपरा की बेहतर समझ के लिए ब्राह्म्णेत्तर परंपराओं, संस्कृतियों की पड़ताल की जानी चाहिए। प्रसिद्ध इतिहासकार डी डी कौशंबी ने महिषासुर को पशुपालकों का आराध्य बताया है, जिसकी हत्या ब्राह्म्ण धर्म में महिशासुर मर्दिनी करती है। प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता(राजकमल प्रकाशन)। दूसरी ओर देवी प्रसाद चटोपध्याय ने 1959 में प्रकाशित अपने प्रसिद्ध इतिहास ग्रंथ "लोकायत : अ स्टडी इन एनसिएंट इंडिया मेटरलिज्म" के उप अध्याय "दुर्गापूजा का मूल स्रोत" में सप्रमाण साबित करते हुए लिखा है कि दुर्गापूजा में ऐसी बात नहीं है जिससे स्पष्ट रुप से अध्यात्मिक या धार्मिक कहा जा सके। यह कृति संबंधी जादू-टोना मात्र है। विभिन्न स्रोतों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि एक देवी के रुप में दुर्गा वास्तव में मिथकीय चरित्र है। ब्राह्म्णों की कल्पना मात्र है। जबकि महिषासुर एक वास्तविक चरित्र है, जो एक प्रतापी समतावादी जननायक था।

 

असल में जब प्रमोद रंजन या इनके जैसे अन्य विचारक ऐसा कहते हैं तो इसके पीछे बड़ी वजह यही है कि देश के बहुसंख्यक समाज को मिथकों में उलझाकर रखा गया है। एक मान्यता के मुताबिक हिन्दू धर्म में 99 हजार से अधिक देवी-देवता हैं। वह वर्ग जो आजतक मुट्ठी भर द्विजों का आतंक झेल रहा है, वह अब बदलने लगा है। प्रमोद रंजन एवं अन्य विचारकों व लेखकों का यह साझा प्रयास इसी का परिचायक है।

 

कदापि यह संभव है कि इस नये विचार में कुछ खामियां हों लेकिन ये खामियां किसी साजिश के कारण नहीं बल्कि सम्पूर्ण, समग्र व खुले दिमाग के साथ ब्राह्म्णेत्तर इतिहास का नहीं लिखा जाना संभव है। "महिषासुर : एक जननायक" न केवल इस मांग को आगे बढाता है बल्कि वह एक चुनौती भी देता है। एक ऐसी चुनौती जिसका जवाब द्विज समाज के पास सिवाय "साजिश" के बिल्कुल भी नहीं है। देश के संसद में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी इस साजिश का प्रदर्शन कर चुकी हैं। उनकी इस साजिश को बेनकाब करने का सार्थक प्रयास करने वाली और ब्राह्म्णवाद के खात्मे की वैज्ञानिक उद्घोषणा करने वाली इस पुस्तक की कीमत केवल सौ रुपए है। इसे फ़ारवर्ड प्रेस के वेबसाइट से आनलाइन भी खरीदा जा सकता है।

 

 

 

संवेदनशीलता : बाढ़ राहत शिविर मे जन्म लेने वाली बालिका की माँ को 15000 रुपये का चेक, पीड़ितों को कपड़ा ,साड़ी, धोती एवं बच्चो को चॉकलेट व खिलौना वितरण करते उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव। साथ में आपदा प्रबंधन मंत्री प्रो. चंद्रशेखर व जिलाधिकारी संजय अग्रवाल

रंग लायी तेजस्वी की सक्रियता, शेष बिहार से कटने से बच गया भागलपुर

पटना(अपना बिहार, 31 अगस्त 2016) - उपमुख्यमंत्री सह पथ निर्माण विभाग के मंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव की सक्रियता एक बार फिर रंग लायी है। उन्होंने बताया कि विदेश दौरे से लौटने के बाद उनके संज्ञान में यह मामला आया कि भयंकर बाढ़ के कारण भागलपुर के विक्रमशिला सेतु का पहुँच पथ लगभग टूटने के कगार पर है। सड़क के नीचे से पानी जा रहा है।स्थिति विकट है। भारी वाहनों का परिचालन बंद कर दिया गया है। सड़क कभी भी बह सकती है।

श्री यादव ने बताया कि जानकारी मिलते ही उन्होंने सोचा कि बाढ़ के कारण लोग पहले ही झुझ रहे है अगर सेतू का पहुँच पथ टूट जाएगा तो परिस्थितियां और कठिन हो जायेगी। इस बाबत उन्होंने तुरन्त विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिया कि किसी भी सूरत में इसे टूटने से बचाया जाए अन्यथा भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों का शेष बिहार से सम्पर्क टूट जायेगा और बाढ़ राहत कार्यों में अधिक कठिनाई आयेगी। किसी भी हाल में इसका समाधान होना चाहिए।

श्री यादव ने बताया कि विभागीय अधिकारियों और प्रशासन के सहयोग से दिन रात एक करके तुरन्त इसका मरम्मत किया गया और इसे पब्लिक के लिए खोल दिया गया। उन्होंने इसके लिए सभी पदाधिकारियों और अभियंताओं के प्रति आभार प्रकट किया। श्री यादव ने कहा कि अगर कहीं कोई समस्या है तो तुरंत सम्बंधित विभाग, प्रशासन और सरकार के संज्ञान में लायें। सरकार बिहार की जनता की सेवा करने को प्रतिबद्ध है।

ब्राह्म्णवाद की देन है डायन कुप्रथा

दोस्तों, अंधविश्वास और धर्म के बीच गहरा रिश्ता है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब हो जाती है जब धर्म को स्थापित करने के लिए अंधविश्वास को जायज ठहराया जाता है और जायज ठहराने के क्रम में मानवीय मूल्यों की सारी सीमायें लांघी जाती हैं। ऐसा ही एक अंधविश्वास "डायन कुप्रथा" है। यह एक ऐसी कुप्रथा है जिसके कारण पूरे हिन्दी पट्टी राज्यों में हर पांच मिनट पर एक महिला इसका शिकार होती है। पीड़ित महिलाओं के साथ प्रताड़ना का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि अधिकांश मामलों में उन्हें सार्वजनिक तरीके से मारा-पीटा जाता है और हालत तो उस समय असह्य हो जाती है जब उन्हें अर्द्धनग्न कर, बाल मुंड़कर पूरे गांव में घुमाया जाता है। इससे भी समाज का मन नहीं भरता है तो उन्हें जबरन मल तक पिलाया जाता है।

डायन कुप्रथा खत्म हो, इसके लिए आवश्यक है कि इस समस्या के सभी आयामों पर ईमानदारी से चिंतन-मनन हो। यह केवल सरकार के स्तर पर नहीं बल्कि समाज को भी यह सच स्वीकारना होगा। यदि इसके विभिन्न आयामों की बात करें तो सबसे पहला आयाम इस कुप्रथा का धर्म से जुड़ाव है।

बंगाल से है डायन कुप्रथा का जुड़ाव

हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक तरफ़ इस धर्म में महिलाओं को देवी माना जाता है तो दूसरी ओर उन्हें इसका शिकार भी होना पड़ता है। सबसे अधिक शक्ति की देवी यानी दुर्गा की पूजा पश्चिम बंगाल में होती है। नवरात्र के दौरान यहां के दुर्गा मंदिरों में भूत-पिशाच का खेल खेला जाता है। पश्चिम बंगाल का काला जादू भी इसी से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्यों में भी इसका खूब प्रसार हुआ है। एक उदाहरण असम का कौड़ी कामख्या मंदिर है, जो जादू-टोने से लेकर भूत-पिशाच आदि के लिए कुख्यात है।

इस्लाम भी देता है अंधविश्वास को बढावा

बिहार और उत्तरप्रदेश के कई हिस्सों में यह अत्यंत ही सामान्य बात है कि बड़ी संख्या में हिन्दू धर्मावलम्बी मजारों पर जाते हैं। दिलचस्प यह है कि उनकी यह आस्था इसलिए नहीं होती कि उन्हें इस्लाम कबूल होता है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए वे मजारों पर जाते हैं और ऐसा करने वालों में अधिकांश गरीब हिन्दू परिवारों की महिलायें होती हैं। इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि धर्म को अपना बिजनेस बनाने वाले मुल्ला इन महिलाओं को जमकर बेवकूफ़ बनाते हैं और वहां भी महिलाओं के शरीर से भूत उतारने की प्रक्रिया बखूबी की जाती है। एक दिलचस्प उदाहरण यह भी बिहार की राजधानी पटना के जिलाधिकारी आवास में एक मजार है और यहां सरकार की आंखों के सामने रोजाना सैंकड़ों भूतों का कल्याण किया जाता है।

केवल महिलायें ही क्यों कहलाती हैं डायन?

यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण है कि डायन की उपाधि पाने वाली केवल महिलायें होती हैं। पुरुष कभी भी डायन नहीं होते। कई समाजशास्त्री मानते हैं कि इस कुप्रथा के जरिए पुरुष समाज में महिलाओं पर अपना अधिकार बनाये रखना चाहता है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि किसी महिला को अकारण ही बांझ कहा जाता है जबकि नपुंसकता उसके पति में होती है। पुरुष कभी भी इस तथ्य को स्वीकार ही नहीं करना चाहता है कि वे नपुंसक भी हो सकते हैं।

दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों की महिलायें होती हैं डायन

एक अध्ययन बताती है कि पूरे देश में डायन कुप्रथा की शिकार महिलाओं में अधिकांश दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों की होती हैं। यह इसलिए भी संभव है क्योंकि इन वर्गों में सामाजिक चेतना का विकास अभी उस स्तर को नहीं प्राप्त कर पाया है जैसी चेतना उच्च जाति वर्ग में हुआ है। अशिक्षा भी वंचित वर्गों की महिलाओं में सबसे अधिक है।

क्या कहता है कानून?

भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना में ही हर किसी को सम्मान के साथ जीने का अधिकार निहित है। महिलाओं को डायन कहकर प्रताड़ित करने वालों के खिलाफ़ कानून भी है। अंग्रेज इसके लिए बधाई के पात्र हो सकते हैं क्योंकि उन्होंने ही यह कानून 1857 में बनाया था। उस समय जोतिबा फ़ुले का आंदोलन भी महत्वपूर्ण कारण था, जिनके कारण महिलाओं को पढने का अधिकार हासिल हुआ था। आजाद भारत में भी अंग्रेजों के इस कानून को स्वीकार किया गया और डायन कहकर किसी को प्रताड़ित करने के लिए अधिकतम 7 वर्षों तक की सजा का प्रावधान है।

क्या है कानून की लाचारी?

असल में जब किसी महिला को डायन कहकर प्रताड़ित किया जाता है तब ऐसा करने वाला कोई एक व्यक्ति नहीं होता है। कई मौकों पर तो यह भी बात सामने आती है कि महिलाओं पर जुल्म करने वाले लोगों में उसके अपने परिजन भी शामिल होते हैं। ऐसे में पुलिस भी गांववालों या स्थानीय समाज पर कार्रवाई करने के बदले चुप रहना ही बेहतर समझती है।

क्या है समाधान?

शिक्षा और जागरुकता डायन कुप्रथा को समाप्त करने के लिए अनिवार्य है। साथ ही यह भी अनिवार्य है कि सरकार कानून में संशोधन करे। ठीक वैसे ही जैसा शराबबंदी कानून बनाकर बिहार सरकार ने किया है। इस कानून के हिसाब से यदि किसी गांव या कस्बे में शराब का व्यवसाय होता है तो सामूहिक जुर्माना का प्रावधान है। इसी प्रकार डायन कहकर प्रताड़ित करने के मामले में किसी एक व्यक्ति को दंडित करने के बदले पूरे समाज को दंडित किया जाय। यह एक संशोधन अनिवार्य है। वजह यह है कि डायन कुप्रथा सामाजिक बुराई है और इसके लिए सजा भी पूरी सामाजिक व्यवस्था को दी जानी चाहिए।

How Can There Be an Indian Lincoln Mr Udit Raj?

- RAM PUNIYANI

Dalit activist and the ruling Bharatiya Janata Party (BJP) member of parliament in the Lok Sabha, Udit Raj, in his recent article in the Indian Express titled"‘Where is The Indian Lincoln" highlights some pertinent questions and brings forth the issue of the caste related atrocities. But he goes on to hide things which are more crucial to the process of caste annihilation.

 

He is on the dot when he says that atrocities against Dalits are due to a mindset which regards them inferior. While this explains how such acts have been taking place earlier as well as now, he undermines the fact that this mindset is due to a political ideology which upholds the caste system in a subtle way.

 

What he hides is the fact that such atrocities have gone up during past two years. What he does not state is that the Jhajjar violence in Haryana was legitimised by late Vishva Hindu Parishad (VHP) leader Acharya Giriraj Kishore, who belonged to Udit Raj’s political family called Sangh Parivar.

 

It is true that many countries in Europe could do away with birth based hierarchy of class and gender due to industrial revolution ushering in a journey towards substantive democracy.

 

India could not achieve such a desirable goal due to the objective restraints imposed by the colonial rule. The industrial revolutions of the West did away with the feudal classes along with their feudal mindset which was justifying the birth-based hierarchies.

 

In India due to the colonial rule, we have seen the birth of modern institutions along with the foundation of modern society. The foundation and the growth of Indian nationalism did aspire for the formal equality of all irrespective of caste, religion and gender.

 

Colonial masters in India were least interested in doing away with feudal powers. ‘Feudal-Clergy’ nexus persisted and gave rise to nationalism in the name of religion. Both Muslim nationalism and Hindu nationalism thrived.

 

The pace of change in colonies is not comparable to the other places where the industrial class along with workers and women combine overthrows the social and political alliance of the feudal-clergy combine.

 

So in colonies the process of secularization remains arrested and in post colonial societies the feudal mindset persists with the patronage of the certain sections of society.

 

In these societies the meaning of the word revolution has to be restricted to social transformation. The day to day efforts for social transformation are the revolutionary steps in that sense. India had its own trajectory.

 

Starting with Jotirao Phule, the Dalits started a slow and long journey towards equality. The journey for women’s equality begins with Savitribai Phule. These streams are totally opposed by the conservative religious elements. These conservatives later crystallize themselves as Muslim League on one side and Hindu Mahasabha-RSS on the other.

 

The march of Indian nationalism accommodates Ambedkar in some form. While he struggles for social democracy through means of temple entry (Kalaram Mandir), access to public spaces (Chavdar Talao), he goes on to support the burning of Manusmriti and states his resolve for the social equality. We can’t be mechanistic in understanding revolution in diverse societies.

 

These steps like those of Jotirao, Saviritibai and Ambedkar, Periyar are revolutionary. These are hesitantly supported by Indian nationalism and totally opposed by Hindu nationalism.

 

Gandhi, a symbol of Indian nationalism, did his best to oppose untouchability, while his stand on reserved constituency can be questioned. Nehru, the architect of modern India, later oversees Ambedkar formulate a Constitution which not only gives formal equality to all but also affirmative reservations to the Dalits.

 

Nehru’s attempt to bring in reforms like the Hindu Code bill are sabotaged by conservatives within his party and conservatives and Hindu nationalists outside his party.

 

The persistence of subordination of Dalits is mainly due to the persistence of mindset of Hindu nationalism, which even had opposed the Indian Constitution when it was being formed.

 

The Hindu nationalists have been strong opponents of reservations all through; this is what led to anti Dalit riots in Ahmedabad in 1981 and the anti OBC violence again in Ahmedabad in 1986.

 

The Hindu nationalist BJP intensified its Ram Temple movement in the wake of Mandal Commission implementation.

 

Udit Raj is right that those perpetrating crimes have not been punished, but that again is due to the prevalent mindset, which has its roots in Hindutva ideology, which spills beyond the parties and organisations working for a Hindu Rashtra (nation) directly.

 

While longing for revolution is good, ignoring the revolutionary changes at slow speed is disastrous and the likes of Udit Raj sitting in the lap of the BJP, which has been the vehicle of counter revolution as far as social changes are concerned, is a big setback to the process of social change.

 

Since BJP is the political arm of RSS, which aspires for a Hindu nation, Hindutva via Hindu nationalism, Raj is contributing precisely to the processes which are hampering the transition of caste equations towards those of equality.

 

If he wakes up to realise as to how mindsets are formed, he will realise that among other things his party has been transforming national institutions towards the values which will promote an anti-Dalit mindset.

 

Just one example from many such incidents is the one where the BJP has appointed one Sudarshan Rao as head of Indian Council of Historical Research (ICHR). Rao argues that the caste system had no problems and nobody had complaints against that.

 

RSS, BJP’s ideological patron, goes on to say that all castes were equal and problems came in due to the invasion of Muslim kings!

 

All this is putting the wool in the eyes of society to perpetuate the ideology which is inherently castiest and leads to the strengthening of mindset which looks down upon Dalits.

 

So a Rohith Vemula or a Una violence happens.

 

If Indian Nationalist movement was a mini revolution, the present politics being unfolded by Hindu nationalism is a counter revolution, duly supported by the likes of Udit Raj.

 

And lastly, if one concedes that there has been no Lincoln in India, one can also look forward to the post Rohith Vemula-Una upsurge of youth, Dalits and non-Dalits, which is going in the direction of caste annihilation!

 

 

Text Box: खास खबर : पटना में अमेरिकी राष्ट्रपतियों की शानदार कारों का काफिला

बाढ़ पीड़ितों की सेवा करें, राजनीति नहीं : तेजस्वी, सरकार कर रही बाढ़ पीड़ितों की हर संभव मदद , बाढ़ राहत कार्य पर उपमुख्यमंत्री ने जताया संतोष, आपदा प्रबंधन विभाग के मंत्री चंद्रशेखर के साथ लिया जायजा

पटना(अपना बिहार, 1 सितंबर 2016) - राज्य के 23 जिलों के 65 लाख की आबादी बाढ़ से परेशान है। सरकार जो सब कुछ कर सकती थी वह कर रही है। इसके अतरिक्त कई जिले सुखाड़ से ग्रस्त हैं। आपदा के समय पक्ष हो या विपक्ष सबको मिलकर पीड़ितों कीसेवा मे लगना चाहिये। ये बातें उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने राजधानी पटना के बाढ़ ग्रस्त इलाकों में चल रहे राहत कार्यों का जायजा लेने के बाद पत्रकारों से बातचीत में कही।

उन्होंने कहा कि बाढ़ के कारण जो नुकसान हुआ सरकार उसका मूल्यांकन करा रही है तथा पीड़ितों की पहचान करा कर उनकी  सूची बनाये जाने का निर्देश दिया हैं। किसी भी पीड़ित का नाम सूची मे ना छूटे, इसके लिये प्रशासन को निर्देश दिये गये हैं। उन्होंने कहा कि सभी बाढ़  पीड़ितों को सामान्य रुप से 6000 रुपए  प्रति परिवार की दर से उनके बैंक खाते मे जमा करायी जायेगी। जिनके पास बैंक खाता नही हैं उनका बैंक खाता खुलवाने लिये कैम्प लगाया जा रहा है।

इससे पहले उन्होंने पीड़तों से बाढ़ राहत शिविरों मे वितरण किये जा रहे राहत सामग्री,पशु चारा,दवा,खाना -नाश्ता,कपड़ा एवं अन्य व्यवस्थाओं के सम्बन्ध मे विस्तृत जानकारी भी ली। वहीं महावीर टोला में कटाव को लेकर उपमुख्यमंत्री ने कहा कि महावीर टोला मे कटाव निरोधक कार्य किये जा रहे हैं जरूरत पड़ी तो इस टोले को अन्य जगहों पर बसाया जायेगा। बाढ़ के कारण जो भूमिहीन हो जायेंगे उनके लिये भी व्यवस्था करनी है। फिर से उनके जीवन को पटरी पर लाना है।

उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने राजधानी पटना के दानापुर, कुर्जी, मनेर आदि बाढ़ ग्रस्त इलाकों में चल रहे राहत शिविरों का जायजा लिया। इस दौरान श्री यादव ने जिला प्रशासन द्वारा चलाये जा रहे राहत कार्यों पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार हर हाल में बाढ़ पीड़ितों को मदद करेगी।

उन्होंने कहा कि राहत शिविरों में विभागीय निर्देशों के अनुरूप बाढ़ प्रभावित परिवारां को दो समय का भोजन व नाश्ता उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही अस्थायी आंगनबाड़ी केंद्रों में छोटे-छोटे बच्चों का ख्याल रखा जा रहा है। श्री यादव ने जिला प्रशासन की इसलिए भी तारीफ की कि प्रशासन द्वारा राहत शिविरों में शुद्ध पेयजल एवं चिकित्सा सेवायें भी उपलब्ध करायी जा रही हैं। राहत शिविरों का जायजा लेने के क्रम में उपमुख्यमंत्री ने मवेशियों के चारे का प्रबंध करने एवं साफ-सफाई को लेकर निर्देश दिया। इस मौके पर जिलाधिकारी संजय अग्रवाल भी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर विधायक भाई वीरेंद्र, जिला राजद अध्यक्ष देवमुनी सिंह यादव,सामजिक कार्यकर्ता राज किशोर यादव,सुभाष यादव आदि गणमान्य उपस्थित रहे।

केवल मीडिया में नाम चमकाने के लिए बाढ़ पीड़ितों की मदद करने वालों पर सरकार रखेगी विशेष नजर

पटना(अपना बिहार, 1 सितंबर 2016) - सूबे के 12 जिलों में बाढ़ के प्रकोप को देखते हुए बड़ी संख्या में लोगों व संगठनों के द्वारा राहत दिये जाने की होड़ लग गयी है। लिहाजा किसी भी तरह की प्रतिकुलता से बचने के लिए राज्य सरकार ने सजगता दिखाते हुए निर्देश दिया है कि अब बाढ़ राहत सामग्रियों का वितरण केवल सरकार द्वारा अधिकृत संस्था के जरिए ही किया जा सकेगा। राज्य सरकार ने यह निर्देश दिया है कि बाढ़ पीड़ितों के मध्य वितरित की जाने वाली सामग्री का वितरण मानक की जांच के अनुरूप ही किया जाये और साथ ही वितरण के समय संबंधित जन संगठन या संस्था के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाय। वहीं राज्य सरकार ने लोगों से अपील किया है कि यदि वे बाढ़ पीड़ितों के राहत के लिए नकद राशि देना चाहते हैं तो उसे सीधे मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करायें। वहीं अन्य सामग्रियों को जिला प्रशासन द्वारा गठित राहत कोषांग में जमा करायें।

प्रशांत और सुशील मोदी आमने-सामने, मानहानि का मुकदमा करेंगे प्रशांत किशोर, सुशील मोदी ने मांगा था प्रशांत किशोर के काम का हिसाब, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चुनावी रणनीतिकार रहे हैं प्रशांत किशोर

पटना(अपना बिहार, 1 सितंबर 2016) - बिहार विकास मिशन से जुड़े प्रशांत किशोर और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी आमने-सामने आ गये हैं। पहल श्री मोदी ने किया। उन्होंने श्री किशोर के सहारे राज्य सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि 9.31 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी बिहार का 2025 तक विजन डॉक्यूमेंट आजतक नहीं बना है। उन्होंने यह भी कहा है कि मुख्यमंत्री के परामर्शी प्रशांत किशोर का चार माह से पता नहीं है, ऐसे में उन्हें अपने पद से हट जाना चाहिए। वहीं इस मामले में प्रशांत किशोर ने श्री मोदी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने का फैसला किया है।

विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक प्रशांत किशोर के सहायकों का कहना है कि जिन नौ करोड़ रुपयों का जिक्र भाजपा के सुशील मोदी कर रहे है, वे चुनाव से पहले चलाए गये 'बढ़ चला बिहार' अभियान पर खर्च हुए थे, जिसके तहत 40,000 ग्रामसभाएं आयोजित कर इस बात की जानकारी इकट्ठा की गयी थी कि लोग सरकार से किन कामों पर ध्यान देने की उम्मीद रखते हैं। उस अभियान में खर्च की गयी रकम दो फर्मों को दी गयी थी, जिनका प्रशांत किशोर से कोई लेना-देना नहीं है।

उल्लेखनीय है कि सुशील मोदी मोदी ने मंगलवार को कहा कि विधानसभा चुनाव के समय राज्य सरकार ने राज्य का 2025 तक का विजन डॉक्यूमेंट बनाने के लिए सिटीजन एलायंस को 39073 गांव और हो हजार हाट में लोगों से बात कर विजन डॉक्यूमेट बनाने का जिम्मा दिया था इसके लिए उसे 9.31 करोड़ भुगतान भी किया गया लेकिन आजतक यह नहीं बना है, मुख्यमंत्री  ने विधानसभा में कहा था कि डॉक्यूमेंट बनाने का काम हो रहा है। असल में सिटीजन एलायंस का संबंध सीएम के परामर्शी प्रशांत किशोर से है। अगर विजन डॉक्यमेंट बन गया होता तो  नीति आयोग के  निर्देश पर राज्यों को 15 साल का जो  विजन डॉक्यमेंट बनाना है उसे बनाने में आसानी होती।

उन्होंने कहा था कि श्री किशोर असल में  वे यूपी और पंजाब में कांग्रेस के चुनाव सलाहकार की भूमिका निभा रहे हैं। अब आंध्र के वाइएस आर के जगमोहन रेड्डी से उनका करार हुआ है। सीएम को बताना चाहिए के उनके परामर्शी ने बिहार के हित में उन्हें क्या सलाह दी। जब  विजन डॉक्यूमेंट नहीं बना और सीएम को सलाह नहीं दे रहे हैं तो उन्हें अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए।

जदयू सांसद पर जान से मारने की धमकी देने का आरोप

नालंदा/पटना(अपना बिहार, 1 सितंबर 2016) - नालंदा के जदयू सासंद पर जबरन जमीन हड़पने और महिला को जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगा है. मामले की शिकायत थाने में दर्ज नहीं किये जाने पर पीड़ित महिला ने कोर्ट की शरण ली. जिसके बाद सांसद सहित तीन लोगों के खिलाफ केस दर्ज कराया गया है. मिली जानकारी के मुताबिक इस हाई प्रोफाइल मामले में जदयू सांसद के खिलाफ कोर्ट में केस दर्ज किया गया है. नालंदा कोर्ट में किये गये केस में नालंदा के जदयू सासंद कौशलेंद्र कुमार सहित तीन लोगों को नामजद बनाया गया है. जबकि दस अज्ञात लोगों को भी अभियुक्त बनाया गया है. सभी के खिलाफ हिलसा कोर्ट में 558/सी/2016 के तहत परिवाद पत्र दायर किया गया है.

इस संबंध में पीड़ित महिला ने कोर्ट में याचिका दायर करते हुए बताया कि सांसद कौशलेंद्र कुमार ने मेरे मकान के बगल में एक जमीन खरीदा है. इसके बाद से सांसद जबरन मेरे मकान पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही दस लाख रुपये की भी मांग की जा रही है. पीड़िता ने सांसद पर मारपीट करने एवं जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप लगाया है.

बिहार का खाकर यूपी का गुणगाण करते हैं प्रशांत : टाइगर

पटना(अपना बिहार, 1 सितंबर 2016) - भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता संजय सिंह टाइगर ने कहा है कि बिहार की जनता की गाढ़ी कमाई से वेतन और कांग्रेस का गुणगान यह नहीं चलेगा । मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को स्पष्ट बताना होगा कि परामर्शी प्रशांत किशोर ने बिहार के विकास के लिए क्या परामर्श दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि वे खाते हैं बिहार का और गाते हैं उत्तर प्रदेश का।

श्री टाइगर ने कहा कि श्री किशोर को नौ माह पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने परामर्शी के पद पर नियुक्त किया था। उन्हें प्रतिमाह बैठक कर सरकार को परामर्श देने का दायित्व सौंपा गया था । विजन डाक्यूमेंट बनाने के लिये राज्य सरकार ने 10 करोड़ रूपया उस कंपनी को दिया जिसमें प्रशांत किशोर भी शामिल है। डाक्यूमेंट का फलाफल अब तक शून्य है । बिहार की गरीब जनता के धन की यह खुली लूट है।

राजनीति के बदले बाढ़ राहत में जुटे राजद कार्यकर्ता

पटना(अपना बिहार, 1 सितंबर 2016) - बुधवार को राजद कार्यालय का नजारा बदला-बदला रहा। आमतौर पर कार्यकर्ताओं और नेताओं से गुलजार रहने वाले राजद कार्यालय में राजनीति की जगह बाढ़ पीड़ितों के प्रति सेवा का भाव दिखा। दरअसल राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने राजद की ओर से बाढ़ पीड़ितों के बीच राहत बांटने का निर्देश जारी किया है। उनके निर्देश के आलोक में राजद कार्यकर्ता सुबह से ही जुट गये। इस संबंध में राजद के प्रदेश प्रवक्ता चितरंजन गगन ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा राहत शिविरों में बाढ़ पीड़ितों के लिए इंतजाम तो किये ही गये हैं लेकिन दियारा के इलाकों में लोगों को विशेष सहायता पहुंचाने के लिए राजद के द्वारा यह पहल किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि राहत सामग्री के रूप में राजद की ओर से चूड़ा, गुड़, माचिस, मोमबत्ती, हैलोजन टैबलेट, बैट्री आदि दिया जा रहा है। इन सभी सामग्रियों को पैकेट में बंद कर वितरित किया जाएगा।

शराबबंदी के पहले के आंकड़ों के सहारे सरकार पर निशाना

पटना(अपना बिहार, 1 सितंबर 2016) - वरिष्ठ भाजपा नेता सह लोक लेखा समिति के सभापति नंदकिशोर यादव ने कहा कि शराबबंदी के बाद अपराध में कमी होने का नीतीश कुमार का दावा सौ फीसदी खोखला निकला। हालांकि श्री यादव ने जिन आंकड़ों के आधार पर राज्य सरकार पर निशाना साधा है वे आंकड़े राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के द्वारा वर्ष 2015 में घटित अपराधों के आंकड़ों पर आधारित है। जबकि सूबे में शराबबंदी 1 अप्रैल 2016 से लागू है।

श्री यादव ने कहा कि बिहार सरकार के मासिक अपराध आंकड़े ही मुख्यमंत्री के दावों की हवा निकाल रहे हैं। शराबबंदी के बाद के अपराध आंकड़ों में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। सरकारी बेवसाइट पर जारी आंकड़ों के अनुसार ही अप्रैल, मई और जून में अपराध के आंकड़ों में निरंतर वृद्धि ही हुई है। खासकर संज्ञेय अपराध, हत्या, डकैती,  लूट-पाट, चोरी, दंगे, अपहरण,  रंगदारी के लिए अपहरण, बलात्कार, रोड डकैती एवं बैंक डकैती में लगातार इजाफा ही हो रहा है।

श्री यादव ने कहा कि शराबबंदी का ढोल पीट रहे नीतीश कुमार दूसरे राज्यों तक जाकर बिहार में अपराध में कमी का दावा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे नीतीश के दावों का झूठ उनकी सरकार के बेवसाइट पर ही अंकित है। विभागीय सरकारी पोर्टल के अनुसार अप्रैल माह में जहां 14279 संज्ञेय अपराध बिहार में हुए,  वहीं मई माह में यह संख्या 16208 और जून में 17507 हो गयी। इसी तरह अप्रैल में 192 हत्याएं सूबे में हुई, तो मई में 209 और जून में 219 हत्याएं। अप्रैल में डकैती की 23 घटनाएं तो जून में 35 डकैतियां हुईं। अप्रैल में अपहरण के 599 वारदात दर्ज हुए, तो मई में 638 और जून में 702 मामले दर्ज किये गये। रंगदारी के लिए अपहरण अप्रैल में एक हुए तो जून में चार। बिहार में बलात्कार की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल में बलात्कार के 61 मामले दर्ज किये गये, तो मई में 79 और जून में 95 मामले। इसी तरह रोड डकैती, बैंक डकैती और दंगों की संख्या में भी जबर्दस्त वृद्धि हुई है।

श्री यादव ने कहा कि बिहार सरकार के पोर्टल पर जून तक का ही आंकड़ा जारी है। इसमें कहीं भी अपराध में कमी नहीं दिख रहा है। कल नेशनल रिकार्ड ब्यूरो ने 2015 का जो अपराध आंकड़ा जारी किया है, उसने भी बिहार में अपराध सर चढ़ कर बोल रहा है। फिर नीतीश कुमार जवाब दें कि आखिर किस आंकड़े के आधार पर वो बिहार में अपराध में कमी का दावा कर रहे हैं। न खाता न बही, नीतीश जो कहें वो सही के भ्रमजाल में बिहार और देश की जनता अब फंसने वाली नहीं है।

सुमो ने दिया सरकार को श्राप, नई औद्योगिक नीति देख कोई झांकने भी नहीं आएगा

पटना(अपना बिहार, 1 सितंबर 2016) - पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भविष्यवाणी की है कि राज्य सरकार की नई औद्योगिक नीति 2016 देखने के बाद बिहार में कोई भी निवेशक झांकने तक नहीं आएगा। उनहोंने कहा कि नयी नीति में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को दिए जाने वाला 35 प्रतिशत पूंजीगत अनुदान और अन्य उद्योगों को मिलने वाले 20 प्रतिशत तक के पूंजीगत अनुदानों को समाप्त कर दिया गया है। इसके साथ ही स्वीकृत परियोजना लागत की 300 प्रतिशत तक की जाने वाली वैट प्रतिपूर्ति को भी मात्र 70 से 130 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया है। जब अनुदान व अन्य प्रोत्साहन दिए जाने के बावजूद बिहार में खाद्य प्रसंस्करण को छोड़ कर अन्य प्रक्षेत्रों में कोई उद्योग नहीं लगा, अब तो यहां कोई उद्यमी शायद झांकने भी नहीं आयेगा।

श्री मोदी ने कहा कि इसके अलावा सरकार ने डीजल जेनरेटर लगाने, प्रोजेक्ट रिपोर्ट, तकनीकी ज्ञान व भूमि विकास आदि पर दिए जाने वाले अलग-अलग अनुदानों को भी समाप्त कर दिया है। पहले जहां उद्योगों के लिए जमीन की रजिस्ट्री में स्टाम्प शुल्क और कृषि से उद्योग भूमि में परिवर्तन शुल्क में पूरी तरह से छूट थी वहीं अब पहले भुगतान करना होगा और बाद में सरकार प्रतिपूर्ति करेगी। इसी तरह से 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाले उद्योगों को कर्मचारी भविष्य निधि में मिलने वाली एक वर्ष की छूट को भी नई औद्योगिक नीति में समाप्त कर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि पूर्व की औद्योगिक नीति में खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में परियोजना लागत का 35 प्रतिशत कैपिटल अनुदान दिए जाने के कारण बिहार में चावल मिल, दाल मिल, कोल्ड स्टोरेज के तौर पर अन्य उद्योगों की तुलना में सर्वाधिक निवेश हुआ, मगर नई औद्योगिक नीति में सरकार ने इसे समाप्त कर दिया है। इसी प्रकार अन्य उद्योगों को दिए जाने वाले 20 प्रतिश त कैपिटल अनुदान को भी सरकार ने समाप्त कर दिया है।

श्री मोदी ने कहा कि दरअसल शराबबंदी के बाद सरकार के पास पैसा नहीं है, इसलिए एक-एक कर अधिकांश अनुदानों व रियायतों को समाप्त कर उसने मान लिया है कि अब यहां कोई उद्योग आने वाला नहीं है। पूर्व की औद्योगिक नीति जब इतनी उदार और आकर्षित करने वाली थी तब तो इक्के-दुक्के उद्यमी यहां आए, अब जब सारे अनुदानों व रियायतों को समाप्त कर दिया गया है तो कोई आने के लिए क्यों आकर्षित होगा?

जिनके राज में उद्योग हुए चौपट, वहीं जता रहे औद्योगिक नीति पर संदेह

पटना(अपना बिहार, 1 सितंबर 2016) - पूर्व मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र ने कहा है कि राज्य सरकार द्वारा जारी नयी औद्योगिक नीति दिशाहीन है। इससे बहुत अधिक उम्मीद बनती नहीं दिखती है। उन्होंने कहा कि बिहार सरकार नें बहुत सोच-समझकर ओर चिन्तन के बाद औद्योगिक नीति जारी की है। बिहार की उद्योगविहीनता रूग्ण उद्योगों की फिर से स्थापना कर या लघु उद्योग, मध्यम उद्योग जो अभी बंद है उनके चालू कराने के सबंध में 2006 में अनेक प्रकार के जो आकर्षण दिये गये उनका अभीतक कोई प्रभाव बिहार के उद्योग पर नहीं पड़ा है। यही संभावना नई नीति में भी परिलक्षित हो रही है। 25 साल में वित्त निगम ओर बिस्कों पूर्णत: निष्क्रिय रही है। 70 प्रतिशत से अधिक लघु उद्योगों को तो सरकार ने स्वंय स्वीकारा है। 14वीं वित्त आयोग को सरकार ने स्वीकृत कियां कि बिहार में 70 प्रतिशत उद्योग रूग्ण और बंद हो गई हैं। नये नीति में भी पुराने उद्योग को मजबूत करने की संभावना प्रदर्शित नही हो रही है। औद्योगीकरण के बगैर विकास संभव नही है। पिछले वर्षो में निजी निवेश सार्वजनिक निवेश और संयुक्त क्षेत्र में निवेश नहीं हो पाया हैं इसलिए बिहार के 16 चीनी मिलों के अतिरिक्त 13 अन्य उद्योग भी पुनर्जीवित नहीं हो सके। इसका ज्वलंत प्रमाण है कि आर्थिक विकास ठप्प सा गया है और दूसरे राज्यों की तुलना में सभी सर्वेक्षणों एवं अध्ययनों में बिहार को निचले पायदान पर दर्शाया गया है।

बिहार में ही लक्ष्य हासिल करने में जदयू पिछड़ा

पटना(अपना बिहार, 31 अगस्त 2016) - जहां एक ओर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जदयू का विस्तार देश के अन्य राज्यों में करने को लेकर ताबड़तोड़ दौरे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बिहार में ही उनका दल लक्ष्य हासिल करने में नाकामयाब साबित हुआ है। श्री कुमार ने इस बार अपने दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं से 50 लाख नये सदस्य बनाने का आहवान किया था। जदयू के चुनाव प्रभारी जर्नादन प्रसाद सिंह के मुताबिक 20 अगस्त तक सदस्यता अभियान की अवधि निर्धारित थी। लेकिन इस अवधि तक केवल 34 लाख नये सदस्य ही बनाये जा सके। इनमें सक्रिय सदस्यों की संख्या 1 लाख 76 हजार है जबकि लक्ष्य पांच लाख सक्रिय सदस्य बनाने का था।

जदयू के चुनाव प्रभारी ने बताया कि लक्ष्य हासिल नहीं हो सका, इसके लिए कई परिस्थितियां जिम्मेवार हैं। उन्होंने बताया कि सदस्यता अभियान की शुरूआत 5 जून से की गयी। जबकि उस समय सूबे में पंचायतों के चुनाव चल रहे थे। फिर इसके बाद शादी-विवाह के लगन का समय आ गया, इस कारण भी सदस्यता अभियान बाधित हुआ। यह पूछे जाने पर कि सदस्यता अभियान पर बाढ़ का असर तो नहीं हुआ, श्री सिंह ने बताया कि बाढ़ का कहर जिन जिलों में हुआ है, वहां पहले से ही सदस्यता अभियान चल रहा था। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि बाढ़ के कारण सदस्यता अभियान बाधित हुआ।

श्री सिंह ने बताया कि 20 अगस्त के बाद भी सदस्यता अभियान जारी है। लेकिन अब जो सदस्य बनेंगे उन्हें पार्टी के सांगठनिक चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं होगा। बताते चलें कि 26 अगस्त से ही प्रखंड स्तर पर जदयू के संगठन की प्रक्रिया जारी है। यह प्रक्रिया 31 अगस्त तक जारी रहेगी।

स्मार्ट सिटी भागलपुर का आगाज, राज्य मंत्रिपरिषद ने दी समझौते को मंजूरी, बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति 2016 मंजूर

पटना(अपना बिहार, 31 अगस्त 2016) - केंद्र सरकार द्वारा भागलपुर को स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल किये जाने के बाद अब राज्य सरकार ने भी इस दिशा में अहम पहल करते हुए कुल 462 करोड़ रुपए के व्यय करने का निर्णय लिया है। हालांकि इस पूरी परियोजना पर कुल 1309 करोड़ रुपए खर्च होंगे। मंगलवार को मंत्रिपरिषद की बैठक के बाद सचिव ब्रजेश मेहरोत्रा ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि भागलपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए एसपीवी कंपनी भागलपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड कंपनी के साथ समझौते को भी राज्य मंत्रिपरिषद ने मंजूरी दी।

श्री मेहरोत्रा ने बताया कि बैठक में कुल 19 प्रस्तावों को सहमति प्रदान की गयी। इसमें पटना हाईकोर्ट के पदाधिकारियों एवं कर्मियों के रहने के लिए अदालतगंज में भवन निर्माण हेतु 82 करोड़ 94 लाख 14 हजार रुपए के व्यय को मंजूरी दी गयी।

उन्होंने बताया कि राज्य में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए मंत्रिपरिषद ने बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति 2016 को मंजूरी दी। साथ ही बाढ़ के मद्देनजर व्यय हेतु कुल 754 करोड़ रुपए की राशि बिहार आकस्मिकता निधि से मंजूर किये जाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गयी। इस राशि का उपयोग बाढ़ पीड़ितों को राहत एवं पुनर्वास के लिए किया जा सकेगा। श्री मेहरोत्रा ने बताया कि किसान सलाहकार योजना के लिए 63 करोड़ 99 लाख 97 हजार रुपए के व्यय को मंजूरी मंत्रिपरिषद द्वारा दी गयी।

उपसभापति के लिए बहुमूल्य किताबें उपेक्षित

बिहार विधान परिषद के शताब्दी वर्ष समारोह के अवसर पर प्रकाशित करायी गयी थीं किताबें

पटना(अपना बिहार, 31 अगस्त 2016) - बिहार विधान परिषद के एनेक्सी में बहुमूल्य किताबें उपेक्षित पड़ी हैं। इन किताबों में अधिकांश वे हैं जिनका प्रकाशन बिहार विधान परिषद के शताब्दी वर्ष समारोह के मौके पर किया गया। इनमें परिषद के सौ वर्षों का शानदार इतिहास भी शामिल है। इसके अलावा बिहार के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक विषयों पर केंद्रित सैंकड़ों पुस्तकें शामिल हैं।

सबसे दिलचस्प यह है कि ये बहुमूल्य किताबें इस तरह उपेक्षित क्यों रखी गयी हैं, इसका ठीक-ठीक जवाब विधान परिषद के अधिकारी नहीं बताते हैं। जबकि विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो पहले ये किताबें परिषद के एनेक्सी के जिस कमरे में रखी गयी थीं, वह कमरा अब उपसभापति हारूण रशिद के कोषांग को आवंटित कर दिया गया है। जबकि उपसभापति के कक्ष में इसके लिए पूर्व से पर्याप्त स्थान मुकर्रर था।

इस संबंध में कुरेदने पर विधान परिषद के पदाधिकारी बताते हैं कि इन किताबों को पहले परिषद पुस्तकालय को दिया गया था। लेकिन वहां जगह की कमी होने के कारण अस्थायी तौर पर उन्हें एनेक्सी के गलियारे में रखा गया है। अब इन किताबों को पुस्तकालय समिति के सुपूर्द कर दिया गया है। जल्द ही समिति अपने हिसाब से इन बहुमूल्य पुस्तकों को सरकारी स्कूलों व कालेजों के पुस्तकालयों में भेजेगी।

बहरहाल बिहार की जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे से प्रकाशित ये किताबें बिहार की अस्मिता से जुड़ी हैं। सबसे दिलचस्प यह है कि इन किताबों को अनाथ अवस्था में देखने वालों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर अनेकानेक माननीय शामिल हैं, इसके बावजूद किताबें अभी भी अपने लिए किसी तारणहार का इंतजार कर रही हैं।