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Sunday, 30 April 2017

Editor’s Column

पेयजल संकट को लेकर सरकार गंभीर, मुख्य सचिव ने जिलाधिकारियों को दिये दिशा-निर्देश

पटना(अपना बिहार, 30 अप्रैल 2017) - मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह ने जिलाधिकारियों को गर्मी को देखते निर्देश दिया कि पेयजल की सुविधा का विशेष ख्याल रखें। इसकी कमी नहीं होने दें। इसके लिए हर आवश्यक कदम उठाएं। पाइप बिछाएं। टैंकर से पानी भेजवाएं। चापानल दुरुस्त कराएं। मुख्य सचिव विडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से जिलाधिकारियों से बात की और विकास योजनाओं की जानकारी ली। साथ ही विभिन्न मामलों पर दिशा-निर्देश जारी किए। उन्होंने कहा कि संभावित बाढ़ की सुरक्षा के इंतजाम पर अभी से ध्यान दें। गंगा के किनारे स्थित गांवों को प्राथमिकता के आधार पर जल्द-से-जल्द खुले में शौच से मुक्त करायें।

सवालों की आग...

- जाबिर हुसेन

आज की हमारी सभ्य दुनिया जिस सामाजिक अवस्था को विकास के नाम से जानती-पुकारती है, क्या वो करोड़ों लोगों के लिए मौत की खाई नहीं है?

मेरे जैसे लोगों को, आज की तारीख में, ऐसा मानने में, कोई परेशानी नहीं है। परेशानी इस कारण नहीं है कि विकास की इस सामाजिक अवस्था ने देश के सामने जो चुनौतियां खड़ी की हैं, उनसे हमारा समाज किसी तौर पर विचलित दिखाई नहीं देता। वो इंच-भर भी, आगे या पीछे, हिल-डोल कर, अपने इर्द-गिर्द मंडराती मौत की छाया को पहचानने की कोशिश नहीं करता। हम, जो इस समाज का एक अहम हिस्सा हैं, अपने दिमाग में पलने वाले सवालों की आग से खुद को, और एक प्रकार से, पूरे समाज को बिल्कुल अलग करके जीते-मरते हैं। हमारी अपनी दुनिया में इन सवालों के लिए कोई जगह कहां रह गई है!

दिमाग में सवालों की आग हमेशा-हमेशा के लिए बुझ जाए तो नए विचारों के बीज कहां फूटेंगे? उस सामाजिक अवस्था में, जिसका मैंने ऊपर जिक्र किया, विचारों की खेती आखिर कैसे हो सकेगी!

लेकिन विचारों से हमारी दूरी जितनी भी हो, क्या ये सही नहीं कि विचार ही संकट ही हर घड़ी में, अपनी साहसिकता के कारण, हमारा बचाव भी करते हैं? हमारी उपेक्षा, हमारे तिरस्कार के बावजूद, विचार ही आखिरकार हर लड़ाई में हमारे लिए कवच का काम करते हैं। और हम अपने दुश्मनों से दो-दो हाथ करके सुरक्षित अपनी दुनिया मे लौट आते हैं।

विचारों पर हमले कब रुके हैं, जो अब रुकेंगे। विचारों की सच्चाई को आंकने के लिए भी तो इन पर हमलों का जारी रहना जरूरी है। हमले न हों, हमले धीमे पड़ जाएं, तो दिमाग में पलने वाले सवाल क्या चैन की नींद नहीं सो जाएंगे?

इसलिए सवालों की आग को जिंदा रखना, और इस आग में विचारों के प्रति अपनी वफादारी का लहू डालते रहना निहायत जरूरी है! (लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद सह विधान परिषद के पूर्व सभापति हैं)

भारत की कश्मीर नीतिः आगे का रास्ता

-राम पुनियानी

कश्मीर घाटी में अशांति और हिंसा, जिसने बुरहान वानी की जुलाई 2016 में फर्जी मुठभेड़ में हत्या के बाद से और गंभीर रूप ले लिया है, में कोई कमी आती नहीं दिख रही है। बल्कि हालात और खराब होते जा रहे हैं। अप्रैल 2017 में हुए उपचुनावों में बहुत कम मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मतदान का प्रतिशत सात के आसपास था। इन उपचुनावों के दौरान हिंसा भी हुई जिसमें कई नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए। हम सबने देखा कि किस तरह एक कश्मीरी युवक को सेना की गाड़ी से बांध दिया गया ताकि पत्थरबाज, गाड़ी पर पत्थर न फेंके। यह घटना दिल दहला देने वाली थी।

घाटी में पत्थरबाजी में कोई कमी नहीं आ रही है। पत्थर फेंकने वाले युवाओं को लोग अलग-अलग दृष्टिकोणों से देख रहे हैं। शेख अब्दुल्ला ने चुनाव की पूर्व संध्या पर कहा कि पत्थर फेंकने वाले अपने देश की खातिर ऐसा कर रहे हैं। उनके इस बयान की कटु निंदा हुई। कुछ लोगों ने इसे केवल एक चुनाव जुमला निरूपित किया।

मीडिया के एक तबके का कहना है कि पत्थर फेंकने वाले पाकिस्तान समर्थक हैं और हमारे पड़ोसी देश के भड़काने पर ऐसा कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है। कश्मीर में पत्थरबाजी का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है परंतु हाल के कुछ महीनों में इस तरह की घटनाओं में जबरदस्त वृद्धि हुई है। युवा दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। एक ओर हैं आतंकवादी और अतिवादी और दूसरी ओर, सुरक्षाबल। दोनों ही उन्हें डरा धमका रहे हैं और उनके खिलाफ हिंसा कर रहे हैं। यह साफ है कि जब भी दमनचक्र तेज़ होता है तब पत्थरबाजी की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। मकबूल भट्ट को 1984 में फांसी दिए जाने के बाद, अफज़ल गुरू को 2013 में मृत्युदंड दिए जाने के बाद और अब बुरहान वानी की मौत के बाद इस तरह की घटनाओं में इजाफा हुआ है।

ये लड़के कौन हैं जो पत्थर फेंकते हैं? क्या वे पाकिस्तान से प्रेरित और उसके द्वारा प्रायोजित हैं? सुरक्षा बलों की कार्यवाहियों में घाटी में सैंकड़ों लोग मारे जा चुके हैं, हज़ारों घायल हुए हैं और कई अपनी दृष्टि गंवा बैठे हैं। मीडिया का एक हिस्सा चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि पत्थरबाजी के पीछे पाकिस्तान है और वही पत्थरबाजों को धन दे रहा है। जो प्रश्न हमें अपने आप से पूछना चाहिए वह यह है कि क्या कोई भी युवा, किसी के भड़काने पर या धन के लिए अपनी जान दांव पर लगा देगा। क्या वह अपनी आंखें खो देने या गंभीर रूप से घायल होने का खतरा मोल लेगा? पत्थरबाजों में से अनेक किशोरवय के हैं और आईटी का अच्छा ज्ञान रखते हैं। परंतु वे घृणा से इतने लबरेज़ हैं कि वे अपनी जान और अपने भविष्य को दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वे कितने अधिक कुंठित हैं।

केवल मीडिया के एक छोटे से तबके ने इस मुद्दे की गहराई में जाकर पत्थरबाजों से बातचीत की। उन्होंने जो कुछ कहा उससे कश्मीर घाटी में कानून और व्यवस्था की स्थिति के बारे में हमारी सोच को पूरी तरह से बदल देने की क्षमता है। इनमें से कई ऐसे परिवारों से हैं, जिन्हें अब जिंदगी से कोई उम्मीद बाकी नहीं है। उन्होंने शारीरिक प्रताड़ना झेली है, उन्हें हर तरह से अपमानित किया गया है और उनके साथ मारपीट आम है। उनके लिए पत्थर फेंकना एक तरह से कुंठाओं से मुक्त होने का प्रयास है। उनमें से कुछ निश्चित तौर पर पाकिस्तान समर्थक हो सकते हैं परंतु मूल मुद्दा यही है कि घाटी के युवाओं में गहन असंतोष और अलगाव का भाव घर कर गया है और इसका कारण है वह पीड़ा और यंत्रणा, जो उनके क्षेत्र में लंबे समय से सेना की मौजूदगी के कारण उन्हें झेलनी पड़ रही है। बुरहान वानी की हत्या के बाद, पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस, दोनों को ही यह अहसास हो गया था कि वहां स्थितियां बिगड़ सकती हैं। राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, असंतुष्टों के साथ बातचीत करना चाहती थीं परंतु सरकार में उनकी गठबंधन साथी भाजपा ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। महबूबा मुफ्ती का मानना है कि केवल बातचीत से ही समस्या का हल निकल सकता है। इसके विपरीत, भाजपा, गोलाबारूद और सेना की मदद से असंतोष को कुचल देना चाहती है।

ऐसे समय में हमें घाटी में शांति स्थापना के पूर्व के प्रयासों को याद करना चाहिए। यूपीए-2 ने वार्ताकारों के एक दल को कश्मीर भेजकर समस्या का अध्ययन करने और उसका हल सुझाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस दल में कई प्रतिष्ठित नागरिक शामिल थे। दल ने सुझाव दिया था कि कश्मीर विधानसभा की स्वायत्तता बहाल की जाए, जिसका प्रावधान कश्मीर की विलय की संधि में था। दल ने यह सुझाव भी दिया था कि असंतुष्टों के साथ बातचीत के रास्ते खोले जाएं, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को रद्द किया जाए और पाकिस्तान के साथ चर्चा हो।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम विलय की संधि की शर्तों को याद करें और वार्ताकारों की सिफारिशों को गंभीरता से लें। कश्मीर के भारत में विलय के 70 साल बाद भी हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय राष्ट्र निर्माताओं का कभी यह इरादा नहीं था कि कश्मीर का भारत में जबरदस्ती विलय करवाया जाए या वहां व्याप्त असंतोष को सेना के बूटों तले कुचला जाए। भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 30 अक्टूबर, 1948 को बंबई में एक आमसभा को संबोधित करते हुए कहा थाः ‘‘कुछ लोग यह मानते हैं कि हर मुस्लिम-बहुल इलाके को पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए। वे यह पूछते हैं कि हमने कश्मीर को भारत का भाग बनाने का निर्णय क्यों लिया है? इस प्रश्न का उत्तर बहुत आसान है। हम कश्मीर में इसलिए हैं क्योंकि कश्मीर के लोग ऐसा चाहते हैं। जिस क्षण हमें यह एहसास होगा कि कश्मीर के लोग यह नहीं चाहते कि हम वहां रहें, उसके बाद हम एक मिनट भी वहां नहीं रहेंगे...हम कश्मीरीयों को दगा नहीं देंगे’’ (द हिन्दुस्तान टाईम्स, 31 अक्टूबर, 1948)।

कश्मीर में स्थिति अत्यंत गंभीर है और केन्द्र सरकार के मनमानीपूर्ण व्यवहार के कारण दिन प्रतिदिन और गंभीर होती जा रही है। अगर हम स्वर्ग जैसी इस भूमि पर शांति चाहते हैं तो हमें महबूबा मुफ्ती और शेख अब्दुल्ला जैसे व्यक्तियों के विचारों का भी सम्मान करना होगा। स्थायी शांति तभी स्थापित हो सकती है जब हम लोगों के दिलों को जीतें। अति-राष्ट्रवादी फार्मूलों से काम नहीं चलेगा। (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

महात्मा गांधी और महात्मा फुले...

- प्रेम कुमार मणि

गाँधी का जीवन चरित एक संत सदृश था . कुछ केलिए वह साबरमती के संत थे ,तो कुछ केलिए महात्माजी . हमारे देश में संत -महात्माओं की एक समृद्ध परंपरा है .देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक आंदोलन , भक्ति आंदोलन , में इन संतों ने ही ईश्वर के नाम पर समानता की गुहार लगाई थी . '-जात- पात पूछे नहीं कोई ,हरी को भजे सो हरी का होइ ' .

उन्नीसवीं सदी में इस संत -मत को एक सामाजिक - राजनीतिक आयाम दिया महाराष्ट्र के जोतिबा फुले(1827 -1891 ) ने .यही समय था जब बंगाली भद्रवर्ग का एक हिस्सा नवजागरण के फलसफे गढ़ रहा था .युवा फुले ने समाज के वंचित तबकों के लिए वास्तविक आजादी का उद्घोष किया . उन्होंने आतंरिक उपनिवेशवाद , यानि ब्राह्मणवाद ,के खिलाफ खुला जंग छेड़ दिया ,जैसा मध्यकाल में कबीर -रैदास ने किया था .वह भारतीय किसानों के लिए संघर्ष करने वाले प्रथम योद्धा भी थे .1848 में ,ठीक उस वक़्त जब तीस वर्षीय कार्ल मार्क्स यूरोप में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो रख रहे थे ,तब भारत के एक कोने में इक्कीस वर्षीय फुले वंचितों के लिए स्कूल खोल रहे थे . प्रोमेथ्युस की तरह ज्ञान की ज्योति वंचितों के बीच बिखेर रहे थे . फुले को प्रिटोरिया में अंग्रेजों द्वारा नहीं ,अपने गाँव में ही कुछ लोगों द्वारा बैलगाड़ी से जबरन उतार दिया गया था ,क्योंकि वह शूद्र थे . गाँधी आधुनिक सभ्यता को भारत केलिए विनाशकारी मानते थे ,फुले ब्राह्मणवादी सभ्यता को .

फुले और गाँधी दोनों महात्मा थे .किन्तु गाँधी संतों की वैचारिकता से दूर हटते गए .वह अपनी धज में ही महात्मा रह गए सभी संतों ने वर्णवाद और जातिवाद को नकारा , गाँधी ने इसे स्वीकृति दी . शायद उनकी दृष्टि में बाह्य उपनिवेशवाद से लड़ने केलिए आंतरिक उपनिवेशवाद को नजरअंदाज करना आवश्यक था . और यदि यही सच है ,तब उनके संत -महात्मा होने पर प्रश्नचिन्ह है . क्या यह एक महात्मा की महात्मा से मुठभेड़ है ?(लेखक पूर्व विधान पार्षद सह साहित्यकार हैं)

गांधीवादी अर्थशास्त्र बनाम दुनिया का अर्थशास्त्र

- शिवानंद तिवारी

गांधीवादी नरहरि पारिख ने आधुनिक अर्थशास्त्र के विकास को यूरोप द्वारा दुनिया की लूट के औचित्य को प्रतिपादित करने वाला शास्त्र कहा है : जिस रूप में और जिस पद्यति से आज इस विषय पर चरचा होती है, अर्थात आज जिसे अर्थशास्त्र कहा जाता है, उसका जन्म और विकास पिछले तीन सौ वर्षों में हुआ है।यूरोप के लुटेरे राष्ट्रों ने सात समुद्र पार कर के व्यापार के नाम पर दुनिया भर में जो लूट मचायी उसी के साथ इस शास्त्र का जन्म हुआ है।और यूरोप में कारखानो और पूँजीवाद का जो विकास हुआ, उसीके साथ इस शास्त्र का भी विकास हुआ। इसलिए भयंकर अत्याचार, अन्याय और शोषण के साथ वर्तमान अर्थशास्त्र के जन्म विकास का गहरा सम्बंध है। आर्थिक प्रगति के नाम पर यूरोप के अर्थशास्त्रियों ने यूरोप के राष्ट्रों ने इस अत्याचार, अन्याय और शोषण का बचाव भी किया है।

दरअसल, आधुनिक अर्थशास्त्र इस बुनियादी भ्रम का शिकार है कि मनुष्य केवल उपभोक्ता है और इस उपभोग के लिए उसे उत्पादन करना और क्रयशक्ति को अर्जित करना पड़ता है। इसका एक आवश्यक परिणाम यह होता है कि 'आर्थिक वृद्धि' मनुष्य के उपभोग को निरंतर बढ़ाते रहने पर आश्रित हो जाती है। सच तो यह है कि अपने को नैतिक-निरपेक्ष मानते हुए भी अर्थशास्त्र यहाँ नैतिक जगत में प्रवेश करता है--यद्यपि नैतिकता की संवृद्धि के लिए नहीं बल्कि उसका ह्रास करने के लिए--और उपभोग को एक जीवन मूल्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है।वह केवल माँग की पूर्ति ही नहीं करता, नयी माँगो की सृष्टि भी करता है--कृत्रिम माँगो की भी--क्योंकि उसके बिना आर्थिक प्रक्रिया का विकास रुकने लगता है, जिस का तात्पर्य होता है सम्पूर्ण अर्थ-व्यवस्था का ढह जाना। 'जरूरत' और 'खपत' के सिद्धांतकार अलफ्र̃ेड मार्शल को भी यह मानना पड़ा था कि 'आर्थिक संगठन का उद्देश्य जरूरतों को पूरी करना ही नहीं, नयी जरूरतों की सृष्टि करना भी है। मनुष्य को उपभोक्ता मान लेने और उसके उपभोग को बढ़ाते रहकर अपना विकास करती रहने वाली अर्थव्यवस्था ने बहुत सी सामाजिक-राजनीतिक हिंसा तो की ही, साथ ही प्रकृतिक संसाधनों के प्रति भी उसका रूख अत्यंत हिंसक रहा है।

क्या यह अर्थव्यवस्था हमारी जरूरतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाते रहे बिना जीवित रह सकती है ? क्या इन जरूरतों का निरंतर बढ़ते रहना और उनकी पूर्ति हमारे हिंसक हए बिना संभव है--अपने आप के प्रति हिंसक और अपने सामाजिक और प्रकृतिक परिवेश के प्रति हिंसक ? नंदकिशोर आचार्य की किताब 'सभ्यता के विकल्प' से।(लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद हैं)

 

संपादकीय : इस कारण बेशर्म बन रहे सुशील मोदी

दोस्तों, भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी इन दिनों राजद प्रमुख लालू प्रसाद पर नित दिन आरोप लगा रहे हैं कि कैसे उन्होंने धन-संपत्ति अर्जित किया। सबसे दिलचस्प यह है कि अबतक उनके द्वारा किये गये तमाम तथाकथित खुलासे बेनामी नहीं हैं। सभी पहले से ही पब्लिक डोमेन में है और सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के अनुकूल है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि राजद प्रमुख ने अवैध तरीके से तथाकथित अचल संपत्तियां अर्जित की तो उन्होंने पूरी पारदर्शिता क्यों बरती। इससे भी बड़ा सवाल यह कि लालू प्रसाद को बदनाम करने के लिये राजनीति को बेशर्म बनाने के पीछे श्री मोदी की असली मंशा क्या है। एक सवाल यह भी कि वह कौन है जो राजनीतिक बेशर्मी करने के लिए श्री मोदी को बाध्य कर रहा है।

इन तमाम सवालों के जवाब खुद श्री मोदी की बेशर्म राजनीति दे रही है। एक झुठ को सच साबित करने के लिए श्री मोदी बार-बार झुठ बोलते नजर आ रहे हैं। मसलन पहले उन्होंने कहा कि तेज प्रताप यादव ने 90 लाख की मिट्टी का घोटाला किया। मामला सरकारी था। सरकार ने जांच करवाकर रिपोर्ट सार्वजनिक किया। सच्चाई यह सामने आयी कि चिड़ियाघर में पेड़ों की कटाई के कारण बने गड्ढों को भरने के लिये 9 लाख रुपए की मिट्टी चिड़ियाघर प्रशासन द्वारा खरीदी गयी।

दूसरा बेशर्म आरोप सुशील मोदी ने शापिंग काम्पलेक्स को लेकर लगाया। लालू प्रसाद ने पूरी पारदर्शिता के साथ जनता को बताया कि कानून सम्मत तरीके से उन्होंने कंपनी बनायी और प्रेमचंद गुप्ता की कंपनी डिलाइट मार्केटिंग के सारे शेयर खरीदे। इस कंपनी के पास जमीन थी, जिसे उन्होंने एक बिल्डर को शापिंग काम्पलेक्स बनाने के लिए दिया।

तीसरा गंभीर आरोप यह लगाया गया कि मंत्री बनाने के एवज में लालू प्रसाद ने रघुनाथ झा और कांति सिंह से जमीनें ली। दोनों मामलों में श्री मोदी को मुंह की खानी पड़ी। वजह यह कि श्री प्रसाद चाहते तो बेनामी तरीके से जमीन का हस्तांतरण करवाते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प यह है कि सवर्ण मीडिया भी लालू प्रसाद को बदनाम करने में जुटी है। बिना तथ्यों की जांच के वह केवल बयानों को सच बताकर जनता के बीच परोस रहा है।

खैर राजद ने श्री मोदी को जवाब उनकी ही भाषा में दिया है। उनके तमाम काले कारनामों की पोल खुल चुकी है। मनी लांड्रिंग से लेकर चर्च की जमीन हथियाने तक के मामले सामने आ चुके हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि परजीवी सुशील मोदी किसके सहारे बेशर्म राजनीति की नयी परिभाषा गढ रहे हैं। इसका जवाब भी जटिल नहीं है और आने वाले समय में इस सच का खुलासा भी हो ही जाएगा। फ़िलहाल तो बेशर्म राजनीति के पैंतरे देखने का समय है।

संपादकीय : अजान गुंडागर्दी तो भजन कीर्तन क्या?

दोस्तों, प्राख्यात गायक सोनू निगम ने मस्जिदों में अजान को गुंडागर्दी करार दिया है और देश के अंधभक्त हिन्दू इसे क्रांतिकारी बयान मानकर अल्पसंख्यकों को गालियां दे रहे हैं। वैसे यह पहला वाक्या नहीं है। प्रवीण तोगड़िया जैसे लोग पहले भी इस तरह का जहर उगल चुके हैं। दिलचस्प यह है कि अब जहर उगलने वालों में फ़िल्मी कलाकार भी शामिल हो गये हैं। पहले अनुपम खेर और बाद में अभिजीत ने फ़िल्मी जगत के भगवाकरण का आगाज किया था। Read More>>>

संपादकीय : बाबा साहब ने दिया था दलितों-पिछड़ों को एक होने का संदेश

दोस्तों, बाबा साहब डा भीमराव आम्बेडकर पिछली सदी के सबसे बड़े महानायक थे। यहां तक कि महात्मा गांधी जैसे अनेक बाबा साहब के संघर्ष के आगे बौने साबित होते हैं। यह अलग बात है कि आज इस सच्चाई को वंचित वर्ग तो स्वीकार करता है लेकिन सवर्ण तबका अभी भी बाबा साहब को तुच्छ ही समझता है। इसकी वजह भी है। बाबा साहब ने दलित और पिछड़े दोनों वर्गों की मुक्ति के लिए सवर्णों से संघर्ष किया। महात्मा गांधी की तुलना में उनका संघर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि गांधी अंग्रेजों से केवल सत्ता हस्तांतरण की लड़ाई लड़ रहे थे तो बाबा साहब अपने ही देश के सवर्ण/सामंतों से।

यह बाबा साहब का संघर्ष ही था जिसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ बनाया। जिन दिनों देश में संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरु हुई, सवर्णों ने संविधान सभा पर कब्जा कर लिया। लेकिन योग्यता नहीं रहने के कारण बाबा साहब को संविधान बनाने की जिम्मेवारी देना उनकी बाध्यता थी। संभव यह ही है कि सवर्णों के मन में तब यह बात रही होगी कि यदि आंबेडकर संविधान बनायेंगे तो उन विषयों से दूर ही रहेंगे, जिसके लिए वे संघर्ष करते रहे हैं।

लेकिन बाबा साहब ने समय रहते सवर्णों की इस साजिश को समझा और देश में वंचितों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। वे चाहते थे कि पिछड़े वर्ग के नेता भी अपने वर्ग के लोगों के हक में आगे आयें, लेकिन उन दिनों सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे पिछड़े नेता स्वयं को पिछड़ा वर्ग का नेता मानने से भी इन्कार करते थे। नेहरु और अन्य तत्कालीन कांग्रेसी सवर्ण पहले से ही आरक्षण के पक्ष में नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि बाबा साहब पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं कर सके। लेकिन बाबा साहब ने पिछड़े वर्ग के लिए आयोग बनाकर एक विकल्प को जिंदा रखा। वे जानते थे कि इस देश का पिछड़ा वर्ग बहुजन परिवार का सबसे बड़ा सदस्य है। वह अपने अधिकार के लिए सजग होगा।

दिलचस्प यह कि यही हुआ भी। कांग्रेसी हुक्मरान एक बार फ़िर साजिश करने में कामयाब हुए। एक ब्राह्म्ण काका कालेलकर की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया, जिसका मकसद पिछड़े वर्ग की शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक हालात का अध्ययन कर सरकार को अनुशंसायें देना था। कालेलकर बड़े चालाक निकले। इतिहास उन्हें बेईमान न कहे, इस कारण उन्होंने पंडित नेहरु को अपनी अनुशंसायें तो सौंप दी लेकिन साथ ही एक पत्र भी दिया, जिसमें अपनी ही अनुशंसाओं को लागू नहीं करने का अनुरोध भी किया।

खैर बाद के दिनों में बाबा साहब के निधन के बाद वंचितों का संघर्ष कमजोर पड़ता चला गया। लेकिन साथ ही एक दिलचस्प परिवर्तन यह भी आया कि वंचितों का संघर्ष नये स्वरुप में सामने आया। परिणाम यह हुआ कि मोरारजी देसाई सरकार को मंडल कमीशन बनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। हालांकि इसके लिए उन्हें कुर्बानी भी देनी पड़ी। उन दिनों जय प्रकाश नारायण ने अपनी ही सरकार को खूब कड़वे वचन सुनाया था। इसके विरोध में पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में उनका तीखा विरोध भी हुआ था।

बहरहाल कटु सत्य यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद वंचित वर्ग बिखरा पड़ा है। दलितवाद और पिछड़ावाद दोनों राजनीतिक साजिश के शिकार हो रहे हैं। इसका लाभ सवर्ण उठा रहे हैं। आवश्यकता है कि देश का वंचित वर्ग बाबा साहब के संघर्ष को याद करे। यह भी समझे कि इस देश में बहुजनों का विकास कैसे हो सकता है, जिससे यह तबका आज भी वंचित है।

केवल याद रहे गांधी, हाशिए पर रहे गांधी के आदर्श

दोस्तों, चंपारण सत्याग्रह के 100 वर्ष पूरे होने पर राजधानी पटना सहित पूरे बिहार में राज्य सरकार द्वारा भव्य आयोजन किया गया। सबसे दिलचस्प यह है कि पूरे आयोजन का भार शिक्षा विभाग ने उठाया। वहीं शिक्षा विभाग जिसने नियोजित शिक्षकों से लेकर वित्त रहित शिक्षण संस्थानों के कर्मियों के बकाये का भुगतान नहीं किया है। परिणाम यह है कि शिक्षक इंटर की कापियों के मूल्यांकन कार्य का बहिष्कार कर रहे हैं।  वैसे चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष के पूरे होने पर आयोजित भव्य समारोह ने एक बात को स्थापित कर दिया कि राज्य सरकार को महात्मा गांधी याद रहे लेकिन उसने उनके आदर्शों को चलता कर दिया।

दो दिवसीय मुख्य आयोजन नवनिर्मित सम्राट अशोक ज्ञान भवन में किया गया। इस भवन के निर्माण में साढे̃ चार सौ करोड़ रुपए से अधिक की राशि व्यय की गयी है। यहां यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है कि ज्ञान भवन का निर्माण क्यों किया गया, बल्कि यह महत्वपूर्ण यह है कि महात्मा गांधी ने अपने सत्याग्रह के दिनों में चंपारण सहित राज्य के अनेक जिलों में कस्तूरबा विद्यालय की स्थापना की थी, उनका क्या हुआ। हालत यह है कि भितिहरवा आश्रम स्थित कस्तूरबा स्कूल आज भी सरकारी सहायता की बाट जोह रहा है।

चंपारण छोड़िए, राजधानी पटना में महात्मा गांधी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है। जिन दिनों देश आजाद हुआ था उन दिनों बिहार सांप्रदायिक दंगे की आग में जल रहा था। तब महात्मा गांधी ने पटना में करीब दो महीने तक कैंप किया था। राज्य सरकार ने वर्ष 2011 में इसकी अहमियत को समझते हुए जर्जर हो चुके भवन की मरम्मती के नाम पर एक करोड़ रुपए खर्च कर दिये। लेकिन आज भी इसकी बदहाली बदस्तूर जारी है। छत से पानी टपकने के कारण राज्य सरकार के किये कराये पर पानी फिर रहा है। इतना ही नहीं राज्य सरकार ने इस भवन महात्मा गांधी के नाम पर सत्य व अहिंसा शोध संस्थान को मंजूरी दी थी। इसके लिए ए एन सिन्हा शोध संस्थान को करोड़ों रुपए की धनराशि भी दी गयी लेकिन आज तक सत्य और अहिंसा शोध संस्थान साकार नहीं हो सका है।

बहरहाल चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी समारोह का अभी आगाज हुआ है। राज्य सरकार के द्वारा तय किये गये कार्यक्रमों के मुताबिक अभी भव्य कार्यक्रमों की लंबी सूची शेष है। जाहिर तौर पर इन कार्यक्रमों के नाम पर करोड़ों रुपए फूंके जायेंगे। लेकिन सवाल तो अब भी वही है कि महात्मा गांधी के सपनों का क्या होगा। हालांकि सरकार ने शराबबंदी लागू कर अपने लिए एक उपलब्धि जरूर हासिल कर ली है लेकिन शराबबंदी के अलावा भी बिहार में बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, भूमिहीनता और आर्थिक विषमता कई और समस्यायें मुंह बाये खड़ी हैं।

 

पुलिस महकमे में व्यापक फेरबदल, 14 वरीय आईपीएस पदाधिकारियों का तबादला ** सूबे में हीट एक्शन प्लान बनाने का निर्देश, सीएम ने की समीक्षा बैठक ** सत्ता और वोट के लिए नीतीश ने किया आत्मसमर्पण : पप्पू ** सुमो के दावों में दम नहीं : शिवानंद, लालू प्रसाद को बदनाम करना सुशील मोदी का एकमात्र मकसद ** दागता रहूंगा लालू पर गोला : सुमो, फिर दुहराया मंत्री व टिकट के लिए जमीन लेने का आरोप ** लोजपा की दो दिवसीय बैठक दादरा नगर हवेली में शुरू ** बेटे संग रामविलास ने किया उद्घाटन ** जिस जमीन की राजिस्ट्री वह अवैध कैसे : मनोज, सामाजिक न्याय की धारा का अपमान कर रहे सुशील मोदी ** पेयजल संकट को लेकर सरकार गंभीर, मुख्य सचिव ने जिलाधिकारियों को दिये दिशा-निर्देश ** इग्नू ने बीएड सीटों की घटायी संख्या, जदयू ने जताया एतराज ** जगन्नाथ मिश्र को आयी भूमि सुधार की याद ** खाद्य आयुक्त की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने लगायी फटकार ** नहीं पहुंचा विधान परिषद में छेड़छाड़ का आरोपी भाजपाई पार्षद ** जनता को गुमराह कर रहे सुशील मोदी : जगदानंद ** कब रूकेगा मौतों का यह अंतहीन सिलसिला, तेजप्रताप ने केंद्र से पूछा सवाल

· पुलिस महकमे में व्यापक फेरबदल, 14 वरीय आईपीएस पदाधिकारियों का तबादला

· सूबे में हीट एक्शन प्लान बनाने का निर्देश, सीएम ने की समीक्षा बैठक 

· सत्ता और वोट के लिए नीतीश ने किया आत्मसमर्पण : पप्पू

· सुमो के दावों में दम नहीं : शिवानंद, लालू प्रसाद को बदनाम करना सुशील मोदी का एकमात्र मकसद

· दागता रहूंगा लालू पर गोला : सुमो, फिर दुहराया मंत्री व टिकट के लिए जमीन लेने का आरोप

· लोजपा की दो दिवसीय बैठक दादरा नगर हवेली में शुरू

· बेटे संग रामविलास ने किया उद्घाटन

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News Update

मन की बात कहने से पहले इस बिहारी नौजवान के पत्र को पढ लिजीये नरेंद्र मोदी जी। आपकी मदहोशी खत्म हो जायेगी

आदरणीय मोदी जी,

आशा करता हूँ कि आप ठीक होंगे । मैं भी खैरियत से हूँ , अभी-अभी पिज़्ज़ा खा के डकार मारी तो सोचा आपको एक खत लिख दूँ । आपको दिल्ली के mcd चुनाव जीतने की बधाई ! उससे पहले भी हुई आपकी ऐतिहासिक जीतों के लिए बधाई ! आप हिमाचल प्रदेश में हैं, उधर भी चुनाव आने वाले हैं ,बढ़िया से भाषण दीजियेगा ,हम इंतज़ार कर रहे हैं आपके भाषण का ,बाकी इधर का माहौल ठीक हैं।

आप चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश को शमशान और कब्रिस्तान वाला पाठ पढ़ा के गए ,लोग आज भी आपकी तारीफ करते हैं ! फिर जीतने के वाद आप आये नहीं तो सोचा आपको खत लिख दूँ । यहाँ सब बढ़िया है ,गुंडाराज बिल्कुल खत्म है ,कोई इंसान को परेशानी नहीं ,पुलिस वाले मारे गए हैं थोड़े बहुत ,उनसे हमको क्या ,वो कौन से हमारे रिश्तेदार थे जो उस पर कुछ कहा जाए !योगी जी ने बढ़िया से संभाल लिया है सब कुछ।

इधर दिल्ली में भी कुछ किसान आये थे, तमिलनाडु से । उन्होंने भी खूब ढोंग किया ,पेशाब तक पी लिया ! फिर वो चले गए । गालियां बहुत पड़ीं उनको ,लेकिन हमको क्या ,वो कौन से हमारे रिश्तेदार थे , आप भी क्या करते, उनसे मिलकर ,अभी चुनाव तो है नहीं तमिलनाडु में ,जब होगा तो फिर से शमशान कब्रिस्तान की तरह आप भाषण दीजियेगा ,मैं दावे के साथ कह रहा जीत पक्की है भाजपा की।

फिर उसके बाद उधर नक्सलियों ने सुकमा में कुछ जवानों को मार डाला ,जिनमे ज्यादा कुछ तो नहीं बस कुछ माँओं ने अपने बेटे खोए ,कुछ बहनो ने भाई ,कुछ पत्नियों ने अपने पति ,हमने भी कड़ी निंदा की ,कसम से पूरा फेसबुक भर दिया निंदा से । अब क्या करते ,राजनाथ जी भी वही कर रहे थे ,हमको लगा देश निर्माण हो रहा है तो हम भी खूब निंदा किये । हाँ गाली नहीं देते तो गाली नहीं दे पाए । आपके कुछ चाहने वाले हैं जो फेसबुक पर भी मौजूद हैं ,वो बहुत अच्छी गालियां देते हैं ,उनसे सीख रहा हूँ ,जैसे ही कोर्स कम्पलीट होगा ,हम भी बहुत अच्छे से देंगे गालियाँ । ख़ैर तो मैं कह रहा था कि सुकमा के जवानों की लाशें उनके परिवारों को मिल गयी हैं ,वे थोड़े दिन रोयेंगे, लेकिन इससे क्या ! आपने कह ही दिया कि शहीदों की शहादत बेकार नहीं जायेगी तो उसी की उम्मीद में वे रहें। लेकिन, हमको क्या ,वे कौन से हमारे रिश्तेदार थे ।

आज सुबह की खबर देखी ,हमेशा की तरह आज भी सबसे पहले आपकी फोटो दिखी,बहुत ही सुंदर तस्वीर थी ! मगर फिर एक और छोटी सी खबर दिखी -कश्मीर वाली । नहीं ऐसा कुछ खास नहीं हुआ, बस थोड़े से जवान और मार दिए गए ,लेकिन हमको क्या , वे कौन से हमारे रिश्तेदार थे । अभी फेसबुक पर सबने निंदा करनी शुरू कर दी है ,थोड़ी सी मैने भी कर दी ,मनमोहन सिंह की निंदा , मनमोहन को जानते हैं ना आप ? वही जो सोनिया के इशारों पर नाचते थे ,हां उनकी ही। अभी शायद आपके उधर से निंदा नहीं आयी ,आ गयी होगी मैं चेक करता हूँ ,हो सकता है केंद्र और राज्यसरकारों के कामों को लेकर कोई वैठक हो रही हो ,फिर उसके बाद निंदा हो ।

खैर ,आप बढ़िया से प्रचार कीजिये हिमाचल में , आपके भाषण का इंतजार हैं हमको ,निराश मत कीजियेगा ,और मेरी मानिए वहां भी तीन तलाक पर बोल दीजिये ,मंदिर बनवाने का ऐलान कर दिजीये ,और शमशान वाला भी करके देख लीजिए ,मैं बता रहा आपको, जीत पक्की है।

उधर आप हिमाचल से आओ ,तब तक हम भी इधर कूलर में पानी भर लेते हैं ,टीवी पर ज़ी न्यूज़ लगा दिए हैं ,बहुत बढ़िया और निष्पक्ष चैनल हैं । बाकी जो मर-खप गए ,मरने दो हमको क्या ,वे कौन से हमारे रिश्तेदार थे । आप आनंद में रहिये, हम भी मज़े में हैं ,

शुक्रिया !

(यह पत्र विनोद कुमार ने लिखा है जो एक स्कूल टीचर हैं)

नीतीश कुमार के लिए मौका और चुनौतियां

- बालेन्दु शेखर मंगलमूर्ति

एक समाचार आया है. कि नीतीश कुमार प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन के विरोध में यूपीए गठबंधन का चेहरा होंगे. इस समाचार के कई मायने हैं. मैं जिन दिनों राजनीतिक पोस्ट लिखा करता था, तो इस मुद्दे पर काफी बार लिखा था.

इस समाचार के कई मायने हैं. यूपी में जिस तरह से कांग्रेस, समाजवादियों और बसपा की हार हुई है, और सोनिया गाँधी को यकीन हो गया है कि राहुल गाँधी में अभी वो नेतृत्व क्षमता उभर कर नहीं आई है, और एक और हार कांग्रेस को खत्म कर देगी. तो उन्होंने एक समझदार राजनेता होने का सबूत देते हुए जो नेक्स्ट बेस्ट पॉसिबल विकल्प है, उस पर अमल किया है. आज कांग्रेस मंझधार में है. राहुल गाँधी को जिम्मेदारी समय रहते दी नहीं गयी और दूसरी ओर कांग्रेस के भरोसेमंद नेता जैसे मनमोहन सिंह अब बूढ़े हो चले हैं. तो ऐसे में कांग्रेस में नेतृत्व का संकट उत्पन्न हो चला है.

नीतीश कुमार के लिए ये अंतिम मौका है, जब वे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पैठ बना सकते हैं. वे अपने बलबूते ऐसा करने में अक्षम हैं, पर बिहार में काम करने के चलते उन्हें एक ब्रांड इमेज मिली है. जिसकी बदौलत वे भाजपा विरोधी मुहीम का चेहरा बन सकते हैं. हालिया राजनीतिक घटनाओं ने उनकी राह सुगम की है. उनकी महत्वाकांक्षा भी रही है. और ऐसा सोचना गलत भी नहीं है. उनके पास व्याप्त राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव है. वे राजनीतिक तौर पर परिपक्व हैं और फैसले सोच समझ कर लेते हैं.

हालाँकि उनके दल के पास मैनपावर की कमी है. ऐसे में कांग्रेस और यूपीए के घटक दलों के सक्षम लोग एक अच्छी मिनिस्ट्री बना सकते हैं. पर यूपीए का चेहरा बन जाना जदयू के कार्यकतार्ओं के लिए अच्छा समाचार हो सकता है. साथ ही ये पूर्वी भारत के लिए भी अच्छा समाचार है. भारत के इन क्षेत्रों का पिछड़ापन देश की तेज गति से आर्थिक तरक्की में रोड़ा रहा है. अगर वे प्रधान मंत्री बन पाते हैं, तो वे उम्मीद है कि इन क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष प्रयास करेंगे.

पर उनकी राह बहुत कठिन है. जदयू हो या यूपीए हो, इनके पास संगठन की समस्या बहुत बड़ी समस्या है. ये अभी संगठनात्मक तौर पर बेहद कमजोर हैं. सोशल मीडिया टीम बिखड़ी हुई है. लोग हतोत्साहित हैं. भाजपा की लगातार जीत से उनके कार्यकतार्ओं के हौसले बुलंद हैं. भाजपा हिंदुत्व का कार्ड खेल रही है. अगर नीतीश कुमार बिहार के विकास में और गति लाते हैं, तो उनका आभा मंडल और निखरेगा, मौजूदा परिस्थितियां उनके पक्ष में सहयोग कर रही हैं. यूपी में अखिलेश यादव की हार, और दूसरी ओर तमिलनाडु में जयललिता की मौत ने उनकी राह सुगम की है. रही बात ममता बनर्जी की, तो कांग्रेस के आग्रह को टालना उनके लिए मुश्किल होगा. खुद कांग्रेस के लिए नीतीश कुमार बेहतर उम्मीदवार हैं, राहुल गाँधी के राजनीतिक भविष्य के लिए वे खतरा नहीं हैं, बल्कि उनकी भूमिका मनमोहन सिंह की तरह होगी, जो राहुल गाँधी के लिए सीट को गर्म रखेंगे. लालू यादव भी साथ रहेंगे, अभी वे नीतीश कुमार या कांग्रेस को चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं.

नीतीश कुमार इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं, विकास का एजेंडा सामने रखना है और साथ ही जातिगत एजेंडा भी चलाना है. बिलकुल भाजपा की तर्ज पर. भाजपा ने यूपी में यही किया. मोदी अमित शाह की टीम ने यूपी में जाति कार्ड बखूबी खेला. इस रणनीति की सफलता को देखते हुए दलित, पिछड़े, सामान्य वर्ग की जातियों का वोट पाना यूपीए के लिए आसान कतई नहीं होगा.

इस बार आगामी चुनाव में यूपीए को मुस्लिम वोटों की पूरी उम्मीद रहेगी. इसके अलावा नीतीश कुमार की जाति भी सपोर्ट करेगी. लालू यादव के चलते बिहार में यादव सपोर्ट करेंगे. हालाँकि ये पर्याप्त नहीं होगा चुंकि चुनाव का स्केल नेशनल है. साथ ही यूपीए के पास एनडीए के विपरीत मीडिया और अदानी, अम्बानी का फिनांस नहीं है. ऐसे में इन्हें अपनी रणनीति स्पष्ट रूप से बनानी होगी. इन्हें अपना एजेंडा जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखना होगा. इकनोमिक, पोलिटिकल, सोशल, सब. किस तरह का भारत ये चाहते हैं. सिर्फ मोदी विरोध से कुछ हासिल नहीं होगा.(लेखक सीडब्ल्यूएस के प्रांतीय निदेशक हैं)

सामाजिक न्याय की जड़ में मट्ठा मत डालिये लालू जी और नीतीश जी

दोस्तों, कड़वी सच्चाई यही है कि सामाजिक न्याय के बूते सत्ता प्राप्त करने वाले लालू-नीतीश दोनों की नजरों में सामाजिक न्याय का कोई महत्व नहीं रह गया है। एक बड़ा प्रमाण यह कि जातिगत जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग इन दोनों नेताओं ने ठंढे बस्ते में डाल दी है। इतना ही नहीं सवर्ण आयोग बनाने वाले नीतीश कुमार ने सवर्णपरस्ती की दिशा में एक कदम और बढाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर सवर्ण आयोग बनाने की बात कही है।

बात सबसे पहले लालू प्रसाद की। सामाजिक न्याय के इस मसीहे ने अपने पहले कार्यकाल(1990-95) के दौरान वंचितों के विकास के लिए जो जज्बा दिखाया था, उसी का परिणाम रहा कि दलितों और पिछड़ों में शिक्षा की भूख जगी और महज एक दशक में ही साक्षरता दर में 14 फ़ीसदी से अधिक की वृद्धि हुई। उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी भी बढी। भोला राम तुफ़ानी, भगवतिया देवी जैसे गरीब भी जीतकर विधानसभा पहुंचे। लेकिन बाद के दिनों में सामाजिक न्याय की लहर कमजोर पड़ी और इसकी वजह श्री प्रसाद को चारा घोटाले में फ़ंसाने वाली सवर्णों की साजिश रही। इन तमाम प्रतिकुलताओं के बावजूद लालू-राबड़ी सरकार ने सामाजिक न्याय की उम्मीदों को जिंदा रखा।

इस उम्मीद को मटियामेट करने का श्रेय नीतीश कुमार को जाता है। वंचित वर्ग उन्हें अमीरदास आयोग को भंग करने के लिए कभी माफ़ नहीं करेगा। वही अमीरदास आयोग जिसका गठन लालू-राबड़ी सरकार ने रणवीर सेना में शामिल भाजपाईयों की संलिप्तता की जांच के लिये किया था। जरा सोचिये कि यदि अमीरदास आयोग ने अपनी रिपोर्ट (जो कि लगभग तैयार थी) सरकार को दी होती तो भाजपा का वंचित विरोधी चेहरा पहले ही सामने आ चुका होता और यह भी संभव था कि रणवीर सेना के गुंडों को उनके किये की सजा मिलती। लेकिन नीतीश कुमार ने ऐसा नहीं होने दिया।

बीते वक्त में वंचितों के साथ नीतीश कुमार की गद्दारी को छोड़ भी दें तो वर्तमान में भी सामाजिक न्याय के नाम से उनकी चिढ साफ़-साफ़ दिखती है। नौकरशाहों की अपनी फ़ौज में नीतीश ने सवर्ण अधिकारियों को रखा है, जो उन्हें नित दिन सामाजिक न्याय से दूर किये जा रहे हैं। इतना ही नहीं भूमिहार को विधानसभा का अध्यक्ष बनाने के बाद वे अब एक भाजपाई राजपूत को विधान परिषद का सभापति बनाने पर अड़े हैं। सूत्रों की मानें तो राज्य में विभिन्न आयोगों और निगमों के गठन में हो रही देरी की एक वजह नीतीश कुमार की सवर्णपरस्ती ही है। रोजगार सृजन के मामले में लेटलतीफ़ी की एक वजह यह भी है कि श्री कुमार ने नवरत्न सवर्ण दरबारी लालू प्रसाद के कार्यकाल वाली कहानी नहीं दुहराना चाहते जब बड़ी संख्या में वंचित वर्ग के लोगों का नियोजन हुआ था।

खैर अभी भी समय है जब सामाजिक न्याय के ये दोनों महानायक सामाजिक न्याय की सुध लें। याद रखिए जबतक सामाजिक न्याय की विचारधारा जीवित है तबतक बिहार गुजरात नहीं बनेगा। नहीं तो यूपी की जनता ने परिणाम पहले ही दिखा दिया है।

ब्राह्म्ण या भुमिहार नहीं थे परशुराम !

दोस्तों, यह सर्वविदित है कि भारत एक धर्म प्रधान देश है। खासकर हिन्दू धर्म ग्रंथों के आधार पर भारत का मूल्यांकन करें तो हम पाते हैं कि धर्म ही इस देश का असली आधार है। वहीं धर्म वैसे तो महज एक जीवनशैली है जिसे संविधान में स्वीकारा गया है और हर किसी को अपने हिसाब से अपनी अभिरूचि के हिसाब से धर्म का आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि धर्म का एक इस्तेमाल सत्तात्मक वर्चस्व के लिए किया जाता रहा है। रही सही कसर ग्रंथकारों और इतिहासकारों ने पूर्ण कर दी है। परिणाम यह हुआ है कि आज धर्म को लेकर जितनी मतभिन्नतायें भारतीय समाज में हैं, उतनी मतभिन्नता किसी और देश में नहीं है। ऐसी ही मतभिन्नता परशुराम को लेकर है। बा्रह्म्णवादियों ने परशुराम को भगवान की उपाधि दी है। सबसे दिलचस्प यह है कि परशुराम की जो परिकल्पना ग्रंथों में की गयी है उसके अनुसार उनका मुख्य पेशा पांडित्य नहीं था, बल्कि वे एक श्रम आधारित उद्यमी थे। हिन्दू ग्रंथों में कई स्थानों पर उनके रथकार होने का उल्लेख मिलता है। रथकार यानी रथ बनाने वाले। संभवत: यही वजह रही कि परशुराम की परिकल्पना में उनके लिए जिस अस्त्र की कल्पना की गयी है, वह एक कुल्हाड़ी है, जिसका इस्तेमाल सामान्य तौर पर लकड़ी काटने के लिए किया जाता है। इससे भी दिलचस्प यह है कि बिहार के भुमिहार समाज के लोग उन्हें अपना अराध्य मानते हैं। वहीं दूसरी ओर विश्वकर्मा समाज के लोग अपने पुरोधा।

प्राचीन ग्रंथो उपनिषद एवं पुराण आदि का अवलोकन करें तो पायेगें कि आदि काल से ही विश्वकर्मा शिल्पी अपने विशिष्ट ज्ञान एवं विज्ञान के कारण ही न मात्र मानवों अपितु देवगणों द्वारा भी पूजित और वंदित है । भगवान विश्वकर्मा के आविष्कार एवं निर्माण कोर्यों के सन्दर्भ में इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी आदि का निर्माण इनके द्वारा किया गया है । पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोगी होनेवाले वस्तुएं भी इनके द्वारा ही बनाया गया है । कर्ण का कुण्डल, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान का त्रिशुल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है ।

अब यदि परशुराम की बात करें तो हिन्दू ग्रंथों में एक कहानी का वर्णन है। कहानी यह कि प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्चात वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने श्वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करना और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन कर लेना। इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी। इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे।

भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली। समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे - रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस और परशुराम।

कथा है कि हैहय वंशाधिपति कार्त्तवीर्यअर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश वन में आखेट करते वह जमदग्निमुनि के आश्रम जा पहुँचा और देवराज इन्द्र द्वारा उन्हें प्रदत्त कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर ले गया।

कुपित परशुराम ने फरसे के प्रहार से उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं व सिर को धड़ से पृथक कर दिया। तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस काण्ड से कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया। यही नहीं उन्होंने हैहय वंशी क्षत्रियों के रुधिर से स्थलत पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर भर दिये और पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से किया।

इसी प्रकार परशुराम को लेकर कई और हिन्दू ग्रंथों में कई अन्य उल्लेख भी मिलते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही बताते हुए बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये और क्रोधान्ध हो "सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा तक कह डाला। तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू। असल सवाल यही खड़ा होता है कि परशुराम की भूमिका पूरे रामायण में महज इतनी ही क्यों रही।

परशुराम इसके बाद सीधे द्वापर युग में तब नजर आते हैं जब भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास आयी। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके। हालांकि इस बात का भी उल्लेख नहीं मिलता कि इस युद्ध का अंतिम परिणाम क्या हुआ। क्या भीष्म ने परशुराम का वध कर डाला था या फिर परशुराम जिन्हें भगवान की उपाधि हासिल थी, भगवान होकर भी हार गये। वह भी एक क्षत्रिय से।

बहरहाल हिन्दू धर्म ग्रंथों के आधार पर किसी भी चरित्र अथवा लोक नायक की संपूर्ण एवं समग्र व्याख्या स्पष्ट तौर पर नहीं की जा सकती है। परंतु परशुराम की जो परिकल्पना अबतक सामने आती है, वह इतना तो स्पष्ट प्रमाण देती है कि सत्ता के वर्चस्व को लेकर आदिकाल से संघर्ष चलता आ रहा है। इस संघर्ष में केवल तथाकथित रूप से उच्च जातियों के लोग ही नहीं बल्कि शुद्र समझे जाने वाले लोग भी शामिल थे। वैसे यह दिलचस्प है कि जिन्हें हिन्दू ग्रंथों में शुद्र कहकर उपेक्षित किया गया, वे आज ब्राह्म्णवादियों की नजर में भगवान हैं। कहने का आशय यह कि शुद्रों के नायकत्व को हड़पने की साजिश शुरू से की जाती रही है, ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मणवादियों ने गौतम बुद्ध को भगवान बुद्ध कहा है।

अपनी

बात